भक्ति की पराकाष्ठा ।।

जय श्रीमन्नारायण,

वाणी गुणानुकथने श्रवणौ कथायां,
हस्तौ च कर्मसु मनस्तव पादयोर्न: ।।
स्मृत्यां शिरस्तव निवासजगत्प्रणामे,
दृष्टि: सतां दर्शनेअस्तु भवत्तनुनाम्।।
(श्रीमद्भागवतम 10वां स्कन्ध 10वां अध्याय श्लोक 38)

अर्थ:- प्रभो ! हमारी वाणी आपके मंगलमय गुणोंका वर्णन करती रहे । हमारे कान आपकी रसमयी कथामें लगी रहें । हमारे हाथ आपकी सेवा में और मन आपके चरण-कमलों की स्मृति में रम जाएँ । यह सम्पूर्ण जगत् आपका निवास-स्थान है । हमारा मस्तक सबके सामने झुका रहे । सन्त आपके प्रत्यक्ष शरीर हैं । हमारी ऑंखें उनके दर्शन करती रहें ।।

हे नाथ ! हे मेरे नाथ ! मैं आपको भूलूँ नहीं !
हे गोविंद ! हे गोपाल ! हे गिरधर ! हे मेरे प्रभु !
मैं आपका हूँ ! और आप सिर्फ मेरे हैं ।।

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नारायण सभी का नित्य कल्याण करें ।। Sansthanam.

।। नारायण नारायण ।।

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