अथ श्री मधुराष्टकं रचना : श्री वल्लभाचार्य।।

अधरं मधुरं वदनं मधुरंनयनं मधुरं हसितं मधुरम् । हृदयं मधुरं गमनं मधुरंमधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥ १ ॥ वचनं मधुरं चरितं मधुरंवसनं

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अथ श्रीनन्दकुमाराष्टकम्

सुन्दरगोपालम् उरवनमालं नयनविशालं दुःखहरम् ॥ ॥वृन्दावनचन्द्रमानन्दकन्दं परमानन्दं धरणिधरम्॥ ॥वल्लभघनश्यामं पूर्णकामम् अत्यभिरामं प्रीतिकरम्॥ ॥भज नन्दकुमारं सर्वसुखसारं तत्त्वविचारं ब्रह्मपरम्॥ १॥ ॥सुन्दरवारिजवदनं निर्जितमदनम्

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अथ श्री महागणपति घनापाठः

ॐ ग॒णाना॓म् त्वा ग॒णप॑तिग्ं हवामहे क॒विं क॑वी॒नाम् उप॒मश्र॑वस्तवम् । ज्ये॒ष्ठ॒राजं॒ ब्रह्म॑णां ब्रह्मणस्पत॒ आ नः॑ शृ॒ण्वन्नू॒तिभि॑स्सीद॒ साद॑नम् ॥ प्रणो॑ दे॒वी सर॑स्वती॒

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जीवन एक यज्ञ है ।।

जय श्रीमन्नारायण, परमात्मा के मिलन रूपी यज्ञ मे श्रद्धा पत्नी है, आत्मा यजमान है, शरीर यज्ञ वेदी है, और फल

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धर्म तथा धार्मिक मनुष्य के दस लक्षण !!

नमों नारायणाय, मनुस्मृति में धर्म के दस लक्षणों का वर्णन है, जिन्हे आचरण में उतारने वाला व्यक्ति ही धार्मिक कहलाने

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सनातन धर्मं में संस्कार की आवश्यकता।।

नमों नारायणाय, वैदिक सनातन धर्म की संस्कृति संस्कारों पर ही आधारित है । हमारे ऋषि-मुनियों ने मानव जीवन को पवित्र

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About Sansthanam

श्री त्रिदंडी देव सेवाश्रम संस्थान, सिलवासा में आपका हार्दिक अभिनन्दन है ।। श्री त्रिदंडी देव सेवाश्रम संस्थान, सिलवासा. हमारे पूर्वज

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वैदिक संस्कृति में मुख्य रूप से सोलह संस्कार माने गए है ।।

“संस्कार” चरक ॠषि ने कहा है:- “संस्कारो हि गुणान्तराधानमुच्यते” ।। अर्थात् पहले से विद्यमान दुर्गुणों को हटाकर उनकी जगह सद्

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श्रीमद्भागवतान्तर्गतं वेणुगीतम् ।।

श्रीमद्भागवतान्तर्गतं वेणुगीतम् ।। श्रीशुक उवाच:- इत्थं शरत्स्वच्छजलं पद्माकरसुगन्धिना । न्यविशद्वायुना वातं स गोगोपालकोऽच्युतः ।।१।। अर्थ:- श्री शुकदेवजी कहते हैं – परीक्षित !

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हमारे जीवन के कुछ यथार्थ सत्य ।।

मित्रों, वाल्मीकि रामायण के अयोध्याकाण्ड के अंतर्गत कुछ जीवन के यथार्थ हैं, आइये उसे जानें और जीवन में अपनाने का

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