राधाजी के नाम की महिमा ।।

जय श्रीमन्नारायण, मित्रों, परम प्रिया श्री राधाजी के नाम की महिमा का गान करते हुए स्वयं हमारे प्रियतम श्री कृष्ण

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भक्ति की पराकाष्ठा ।।

जय श्रीमन्नारायण, वाणी गुणानुकथने श्रवणौ कथायां, हस्तौ च कर्मसु मनस्तव पादयोर्न: ।। स्मृत्यां शिरस्तव निवासजगत्प्रणामे, दृष्टि: सतां दर्शनेअस्तु भवत्तनुनाम्।। (श्रीमद्भागवतम

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गजेन्द्रमोक्ष स्तोत्र ।।

श्रीशुक उवाच:- ” एवं व्यवसितो बुद्ध्या समाधाय मनो ह्रदि । जजाप परमं जाप्यं प्राक्जन्मन्यनुशिक्षितम् ॥ ” १ ॥ गजेन्द्र उवाच:-

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अथ श्री मधुराष्टकं रचना : श्री वल्लभाचार्य।।

अधरं मधुरं वदनं मधुरंनयनं मधुरं हसितं मधुरम् । हृदयं मधुरं गमनं मधुरंमधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥ १ ॥ वचनं मधुरं चरितं मधुरंवसनं

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जीवन एक यज्ञ है ।।

जय श्रीमन्नारायण, परमात्मा के मिलन रूपी यज्ञ मे श्रद्धा पत्नी है, आत्मा यजमान है, शरीर यज्ञ वेदी है, और फल

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धर्म तथा धार्मिक मनुष्य के दस लक्षण !!

नमों नारायणाय, मनुस्मृति में धर्म के दस लक्षणों का वर्णन है, जिन्हे आचरण में उतारने वाला व्यक्ति ही धार्मिक कहलाने

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वैदिक संस्कृति में मुख्य रूप से सोलह संस्कार माने गए है ।।

“संस्कार” चरक ॠषि ने कहा है:- “संस्कारो हि गुणान्तराधानमुच्यते” ।। अर्थात् पहले से विद्यमान दुर्गुणों को हटाकर उनकी जगह सद्

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श्रीमद्भागवतान्तर्गतं वेणुगीतम् ।।

श्रीमद्भागवतान्तर्गतं वेणुगीतम् ।। श्रीशुक उवाच:- इत्थं शरत्स्वच्छजलं पद्माकरसुगन्धिना । न्यविशद्वायुना वातं स गोगोपालकोऽच्युतः ।।१।। अर्थ:- श्री शुकदेवजी कहते हैं – परीक्षित !

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हमारे जीवन के कुछ यथार्थ सत्य ।।

मित्रों, वाल्मीकि रामायण के अयोध्याकाण्ड के अंतर्गत कुछ जीवन के यथार्थ हैं, आइये उसे जानें और जीवन में अपनाने का

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अष्टलक्ष्मी स्तोत्रम् ।।

जय श्रीमन्नारायण, ।। अष्टलक्ष्मी स्तोत्रम् ।। आदिलक्ष्मी – सुमनसवन्दित सुन्दरि माधवि, चन्द्र सहोदरि हेममये ।। मुनिगणमण्डित मोक्षप्रदायिनि, मञ्जुळभाषिणि वेदनुते ।।

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