श्री त्रिदंडी देव सेवाश्रम संस्थान, सिलवासा की ओर से सभी मित्रों, शुभचिन्तकों एवं सभी वैष्णवों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें । आप सभी पर माँ लक्ष्मी एवं भगवान नारायण की कृपा सदैव बनी रहे ।। नारायण नारायण ।।

Yagyaah

प्रकृति के संरक्षणार्थ, अपने शहर में यज्ञों का आयोजन करवाइए !!

जय श्रीमन्नारायण,

यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः ।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पंडितं बुधाः ॥ ( गीता अ.४.श्लोक.१९.)

अर्थ : जिसके सम्पूर्ण शास्त्रसम्मत कर्म बिना कामना और संकल्प के होते हैं, तथा जिसके समस्त कर्म ज्ञानरूप अग्नि द्वारा भस्म हो गए हैं, उस महापुरुष को ज्ञानीजन भी पंडित कहते हैं || १९ ||

भावार्थ:- बात तो पूर्ण सत्य है, लेकिन समझने वाली बात यह है, कि जिसके कर्म बिना कामना और संकल्प के होते हैं -- कैसे कर्म ? शास्त्र सम्मत कर्म ! दूसरी बात है, जिसके समस्त कर्म ज्ञान रूपी अग्नि में जलकर भस्म हो चुके हों ! भाई जी ज्ञान रूपी अग्नि और समस्त कर्म जलकर भस्म हो जाय - ये कुछ अंदर नहीं बैठ रहा है - जरा स्पष्ट करें !!

ये विषय तो स्पष्ट ही है, समस्त कर्म अर्थात कोई भी कर्म - मतलब - सुबह से शाम तक, सोने से खाने तक, लैट्रिन से लेकर बाथरूम तक, फैक्टरी कि नौकरी से लेकर श्रीमती जी के आज्ञा पालन तक - अर्थात कोई भी कर्म मतलब कोई भी कर्म - सब कुछ - शास्त्रसम्मत हो, अर्थात जिस कर्म को करने कि आज्ञा शास्त्र नहीं देते वो कर्म नहीं करना - यही ज्ञान है !!

और ये ज्ञान रूपी अग्नि जिसके अंदर समा जाय अर्थात आ जाय, फिर इस अग्नि से सम्पूर्ण कर्तब्य कर्म जलकर भस्म हो जाते हैं !!

इसलिए कर्म ही प्रधान है, इस संसार में === और संस्कृत तथा संस्कृति के रक्षण एवं विस्तार से बड़ा कोई कर्म नहीं है !!

!! नमों नारायण !!

सत्कर्मों का आयोजन, वैदिक संस्कृति के प्रसार एवं विस्तार का सहज उपाय है, तथा सर्वोत्तम धर्म भी यही है !!

जय श्रीमन्नारायण,

१.आज के समय में यज्ञ कि आवश्यकता �

सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः !
अनेन प्रसविष्यध्वमेषवोस्त्विष्ट कामधुक् !! (गीता.अ.३.श्लोक.१०.)

आदिकाल में जब प्रजापति ब्रह्मा ने संसार को रचा कल्प के आदि में यज्ञ सहित प्रजाओं को रचकर उनसे कहा कि तुम लोग इस यज्ञ द्वारा वृद्धि को प्राप्त होओ और यह यज्ञ तुम लोगों को इच्छित भोग प्रदान करने वाला हो !!
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ !!
ब्रह्मा ने कहा:- तुम लोग इस यज्ञ द्वारा देवताओं को उन्नत करो, और वे देवता तुम लोगों को उन्नत करें ! इस प्रकार निःस्वार्थ भाव से एक-दूसरे को उन्नत करते हुए तुम लोग परम कल्याण को प्राप्त हो जाओगे !!
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः !
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुंक्ते स्तेन एव सः !!
ब्रह्मा ने कहा:- यज्ञ द्वारा बढ़ाए हुए देवता तुम लोगों को बिना माँगे ही इच्छित भोग निश्चय ही देते रहेंगे ! इस प्रकार उन देवताओं द्वारा दिए हुए भोगों को जो पुरुष उनको बिना दिए स्वयं भोगता है, वह चोर ही है !!
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः !
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्‌ !!
ब्रह्मा जी कहते हैं:- यज्ञ से बचे हुए अन्न को खाने वाले (अर्थात अपने धन का सिर्फ अपने लिए प्रयोग न करके धर्म को बढ़ाने का कार्य करने वाले) श्रेष्ठ पुरुष सब पापों से मुक्त हो जाते हैं, और जो पापी लोग अपना शरीर-पोषण करने के लिए ही अन्न पकाते हैं, (अर्थात अपने धन का केवल अपने खान-पान एवं शानो-शौकत के लिए ही प्रयोग करते हैं) वे तो पाप को ही खाते हैं ! अर्थात ऐसे लोगों का पतन एक न एक दिन निश्चित ही होने वाला है !!

अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः !
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः !!
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्‌ !
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्‌ !!
ब्रह्मा जी का कथन है:- सम्पूर्ण प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न की उत्पत्ति वृष्टि से होती है, वृष्टि (वर्षा अथवा बारिस) यज्ञ से होती है, और यज्ञ विहित (वेदों द्वारा निर्धारित) कर्मों से होता है ! कर्मसमुदाय को तू वेद से उत्पन्न और वेद को अविनाशी परमात्मा से उत्पन्न हुआ जान ! इससे सिद्ध होता है कि सर्वव्यापी परम अक्षर परमात्मा सदा ही यज्ञ में प्रतिष्ठित है !!
अर्थात परमात्मा ही यज्ञ है, और यज्ञ ही परमात्मा है !!

दूसरी बात:- यज्ञ कि समिधाओं के रूप में 72 प्रकार कि औषधियों का वर्णन मिलता है, जिससे हजारों रोगों के कीटाणुओं का क्षय होता है, और एक ऐसी उर्जा का निर्माण होता है, जो इस वायुमंडल को स्वच्छ एवं निर्मल बनाता है, जिससे प्राण शक्ति अथवा जीवन शक्ति का विकास होता है !!

परमात्मा ने हमें इस सृष्टि के रूप में जो अक्षय कोष प्रदान किया है, उसे सुचारू रूप से संचालित रखना हमारा कर्तव्य है, और अगर हम ऐसा नहीं करते, तो ऐसे लोगों के लिए भगवान श्री कृष्ण गीता में कहते हैं:-
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः !
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति !!
कृष्ण ने कहा:- हे पार्थ ! जो पुरुष इस संसार में इस प्रकार परम्परा से प्रचलित सृष्टिचक्र के अनुकूल नहीं बरतता अर्थात अपने कर्तव्य का पालन नहीं करता, वह इन्द्रियों द्वारा भोगों में रमण करने वाला पापायु पुरुष व्यर्थ ही इस धरती पर बोझ के समान जीवित रहता है !!

परन्तु जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करने वाला, और आत्मा में ही तृप्त, तथा आत्मा में ही सन्तुष्ट हो, उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है, अर्थात जिसे धन, यश, पुत्र, पत्नी, वाहन, फैक्टरी तथा अन्य सांसारिक वस्तुओं कि कोई इच्छा या आवश्यकता नहीं हो, उसे इन सभी कार्यों को करने कि कोई आवश्यकता नहीं है !!

लेकिन जिसे इन सभी वस्तुओं कि आवश्यकता हो, अर्थात जिसे धन, यश, पुत्र, पत्नी, वाहन, फैक्टरी तथा अन्य सभी प्रकार कि सांसारिक वस्तुओं को पाने कि इच्छा या लालसा हो, उसे समस्त वैदिक कर्मों को करने कि परम आवश्यकता है !! क्योंकि:-

कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः !
लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि !!
अर्थात:- जनकादि ज्ञानीजन भी आसक्ति रहित कर्मद्वारा ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए थे, इसलिए तथा लोकसंग्रह को देखते हुए भी, तू कर्म करने के ही योग्य है, अर्थात हे अर्जुन (हे मनुष्य) तेरे लिए कर्म करना ही उचित है !!
भगवान खुद अपने विषय में कहते हैं:-

न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन !
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि !!
अर्थ:- हे अर्जुन ! मुझे इन तीनों लोकों में, न तो कुछ कर्तव्य है, और न ही कोई भी प्राप्त करने योग्य वस्तु अप्राप्तब्य है, तो भी मैं नियमित रूप से वेद विहित कर्मों को करता हूँ !!

इसीलिए जिसे इस संसार से कुछ चाहिए, उसे कर्म अर्थात यज्ञादि श्रेष्ठ कर्म, धर्मादि - संस्कृत एवं संस्कृति के रक्षण जैसे कर्म अवश्य करने चाहिएं ! यथा:-

काङ्‍क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः !
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा !!
अर्थात : इस मनुष्य लोक में कर्मों के फल को चाहने वाले लोग देवताओं का पूजन किया करते हैं, क्योंकि उनको कर्मों से मिलने वाले फल की सिद्धि शीघ्र ही हो जाती है ! इसीलिए पूर्वकाल में मुमुक्षुओं ने भी इस प्रकार जानकर ही कर्म किए हैं, इसलिए तू भी पूर्वजों द्वारा सदा से किए जाने वाले कर्मों को ही कर !!

तथा यज्ञ भी कितने प्रकार का होता है, यथा:-

द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे !
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः !!
अर्थ:- कई पुरुष द्रव्य संबंधी यज्ञ करने वाले हैं, कितने ही तपस्या रूप यज्ञ करने वाले हैं, तथा दूसरे कितने ही योगरूप यज्ञ करने वाले हैं, कितने ही अहिंसादि तीक्ष्णव्रतों से युक्त यत्नशील पुरुष स्वाध्यायरूप ज्ञानयज्ञ करने वाले हैं !! लेकिन कृष्ण कहते हैं, कि �

ये यथा माँ प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्‌ !
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः !!
अर्थात:- हे अर्जुन ! जो भक्त मुझे जिस प्रकार भजते हैं, मैं भी उनको उसी प्रकार भजता हूँ, क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं !!

कोई अगर कहता है, कि भगवान को पैसा नहीं चाहिए, भगवान कहाँ पैसा मांगता है � तो भगवान भी कह देते हैं, कि मेरे भक्त को कहाँ पैसा चाहिए, भगत पैसा क्या करेगा !!

इसलिए ध्यान रखना चाहिए, कि अगर हम गृहस्थ हैं, तो गृहस्थों के लिए निर्धारित कर्म हमारा कर्तब्य है, हमारी आवश्यकता है, हमारी मज़बूरी नहीं !!

स्व परिश्रम द्वारा अर्जित धन को सत्कर्मों में लगाने को �यज्ञ� कहा गया है ! उपनिषद् में कहा गया है, न कर्मणा, न प्रजया, धनेन, त्यागेन चैके अमृतत्वमानशुः। श्रेष्ठ लोगों ने कर्म और धन से नहीं, अपितु त्याग से ही अमृतत्व प्राप्त किया है ! हमारी संस्कृति में अर्थ, अर्थात धन के महत्व को स्वीकार किया गया है, किंतु धन से मात्र आवश्यकता की पूर्ति करना नहीं, अपितु उसे सत्कर्मों में व्यय करने की प्रेरणा दी गई है !!

जो धन-संपदा का संचय न कर, सत्कर्मों के लिए, त्याग करने को तत्पर रहता है, वही जीवन मुक्त हो सकता है ! लेकिन जबसे धर्मग्रंथों के इन वचनों की अवहेलना करके धन-संपत्ति के अधिकाधिक संचय और अंधाधुंध उपभोग की प्रवृत्ति पनपी है, तब से समाज में अशांति, दुराचार, तथा मौसम कि भी अनियमितता जैसी समस्याएं खड़ी हो गयी है ! और इससे मुक्ति का एकमात्र उपाय भी यज्ञ ही है !!

=== !! अस्तु !! ===
!! नमों नारायण !!

श्री रूद्र + चंडी महायज्ञ !!

श्री रुद्र महायज्ञ !!


शत चंडी, सहस्र चंडी तथा लक्ष चंडी महायज्ञ !!


श्री लक्ष्मी नारायण महायज्ञ !!


श्रीमद्भागवत कथा, ज्ञानयज्ञ !!


स्वामी जी के कार्यक्रमों का आयोजन !!

स्वामी श्री धनञ्जय जी महाराज के श्री मुख से संगीतमय भागवत कथा सुनने के लिए, श्री त्रिदंडी देव सेवाश्रम संस्थान, {श्री वेंकटेश देवस्थानम् (तिरुपति बालाजी मंदिर)} सिलवासा से संपर्क करें !! नमों नारायणाय !!

संपर्क सूत्र:- 0260-6538111, मोबाईल:- 09375288850.

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