द्वितीय स्कन्धः ।। अथ नवमोऽध्यायः।। BHAGWAT PURAN.

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।। श्री राधाकृष्णाभ्याम् नम: ।।  ।। श्रीमद्भागवत महापुराणम् ।।
।। द्वितीय स्कन्धः ।।  ।। अथ नवमोऽध्यायः ।।

श्रीशुक उवाच
आत्ममायामृते राजन्परस्यानुभवात्मनः
न घटेतार्थसम्बन्धः स्वप्नद्रष्टुरिवाञ्जसा 1

श्रीशुकदेवजी ने कहा — परीक्षित ! जैसे स्वप्न में देखे जानेवाले पदार्थो के साथ उसे देखनेवाले का कोई सम्बन्ध नहीं होता, वैसे ही देहादि से अतीत अनुभवस्वरूप आत्मा का माया के बिना दृश्य पदार्थों के साथ कोई सम्बन्ध नहीं हो सकता ॥1॥

बहुरूप इवाभाति मायया बहुरूपया
रममाणो गुणेष्वस्या ममाहमिति मन्यते 2

विविध रूपवाली माया के कारण वह विविध रूपवाला प्रतीत होता है और जब उसके गुणों में रम जाता है तब ‘यह मैं हूँ, यह मेरा है’ इस प्रकार मानने लगता हैं ॥2॥

यर्हि वाव महिम्नि स्वे परस्मिन्कालमाययोः
रमेत गतसम्मोहस्त्यक्त्वोदास्ते तदोभयम् 3

किन्तु जब यह गुणों को क्षुब्ध करनेवाले काल और मोह उत्पन्न करनेवाली माया — इन दोनों से परे अपने अनन्त स्वरुप में मोहरहित होकर रमण करने लगता है — आत्माराम हो जाता है ; तब यह ‘मैं,मेरा’ का भाव छोड़कर पूर्ण उदासीन -गुणातीत हो जाता है ॥3॥

आत्मतत्त्वविशुद्ध्यर्थं यदाह भगवानृतम्
ब्रह्मणे दर्शयन्रूपमव्यलीकव्रतादृतः 4

ब्रह्माजी की निष्कपट तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान् ने उन्हें अपने रूप का दर्शन कराया और आत्मतत्त्व ज्ञान के लिए उन्हें परम सत्य परमार्थ वास्तु का उपदेश किया ( वही  बात मैं तुम्हें सुनाता हूँ )॥4॥

स आदिदेवो जगतां परो गुरुः स्वधिष्ण्यमास्थाय सिसृक्षयैक्षत
तां नाध्यगच्छद्दृशमत्र सम्मतां प्रपञ्चनिर्माणविधिर्यया भवेत् 5

तीनों लोकों के परम गुरु आदिदेव ब्रह्माजी अपने जन्मस्थान कमलपर बैठकर सृष्टि करने की इच्छा विचार करने लगे। परन्तु जिस ज्ञानदृष्टि से सृष्टि का निर्माण हो सकता था और जो सृष्टि -व्यापार के लिये वांछनीय है , वह दृष्टि उन्हें प्राप्त नहीं हुई ॥5॥

स चिन्तयन्द्व्यक्षरमेकदाम्भस्युपाशृणोद्द्विर्गदितं वचो विभुः
स्पर्शेषु यत्षोडशमेकविंशं निष्किञ्चनानां नृप यद्धनं विदुः 6

एक दिन वे यही चिंता कर रहे थे कि प्रलय के समुद्र में उन्होंने व्यंजनों के सोलहवें एवं इक्कीसवें अक्षर ‘त’ तथा ‘प’ को — ‘तप -तप ‘ (‘तप करो’) इस प्रकार दो बार सुना। परीक्षित ! महत्मालोग इस तप को ही त्यागियों का धन मानते हैं ॥6॥

निशम्य तद्वक्तृदिदृक्षया दिशो विलोक्य तत्रान्यदपश्यमानः
स्वधिष्ण्यमास्थाय विमृश्य तद्धितं तपस्युपादिष्ट इवादधे मनः 7

यह सुनकर ब्रह्माजी ने वक्ता को देखने की इच्छा से चारों ओर देखा, परन्तु वहाँ दूसरा कोई दिखायी न पड़ा। वे अपने कमलपर बैठ गये और ‘मुझे तप करने की प्रत्यक्ष आज्ञा मिली है’ ऐसा निश्चयकर और उसी में अपना हित समझकर उन्होंने अपने मन को तपस्या में लगा दिया ॥7॥

दिव्यं सहस्राब्दममोघदर्शनो जितानिलात्मा विजितोभयेन्द्रियः
अतप्यत स्माखिललोकतापनं तपस्तपीयांस्तपतां समाहितः 8

ब्रह्माजी तपस्वियों में सबसे तपस्वी हैं। उनका ज्ञान अमोघ है। उन्होंने उस समय एक सहस्त्र दिव्य वर्षपर्यंत एकाग्र चित्त से अपने प्राण,मन,कर्मेन्द्रिय और ज्ञानेन्द्रियों को वश में करके ऐसी तपस्या की, जिससे वे समस्त लोकों को प्रकाशित करने में समर्थ हो सके ॥8॥

तस्मै स्वलोकं भगवान्सभाजितः सन्दर्शयामास परं न यत्परम्
व्यपेतसङ्क्लेशविमोहसाध्वसं स्वदृष्टवद्भिर्पुरुषैरभिष्टुतम् 9

उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान् ने उन्हें अपना वह लोक दिखाया,जो सबसे श्रेष्ठ है और जिससे परे कोई दूसरा लोक नहीं है। उस लोक में किसी भी प्रकार के क्लेश,मोह और भय नहीं हैं। जिन्हें कभी एक बार भी उसके दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, वे देवता बार -बार उसकी स्तुति करते रहते हैं ॥ 9॥

प्रवर्तते यत्र रजस्तमस्तयोः सत्त्वं च मिश्रं न च कालविक्रमः
न यत्र माया किमुतापरे हरेरनुव्रता यत्र सुरासुरार्चिताः 10

वहाँ रजोगुण,तमोगुण और इनसे मिला हुआ सत्त्वगुण भी नहीं हैं। वहाँ न काल की दाल गलती है और न माया ही कदम रख सकती है; फिर माया के बाल -बच्चे तो जा ही कैसे सकते हैं। वहाँ भगवान् के वे पार्षद निवास करते हैं, जिनका पूजन देवता और दैत्य दोनों ही करते हैं॥10॥

श्यामावदाताः शतपत्रलोचनाः पिशङ्गवस्त्राः सुरुचः सुपेशसः
सर्वे चतुर्बाहव उन्मिषन्मणि प्रवेकनिष्काभरणाः सुवर्चसः
प्रवालवैदूर्यमृणालवर्चसः परिस्फुरत्कुण्डलमौलिमालिनः 11

उनका उज्जवल आभा से युक्त श्याम शरीर शतदल  कमल के समान कोमल नेत्र और पीले रंग के वस्त्र से शोभायमान है। अंग -अंग से राशी-राशी सौन्दर्य बिखरता रहता है। वे कोमलता की मूर्ति हैं। सभी के चार -चार भुजाएँ हैं। वे स्वयं तो अत्यन्त तेजस्वी हैं ही, मणिजटित सुवर्ण के प्रभामय आभूषण भी धारण किये रहते हैं। उनकी छवि मूँगे, वैदूर्यमणि और कमल के उज्जवल तन्तु के समान है। उनके कानों में कुण्डल, मस्तकपर मुकुट और कंठ में मालाएँ शोभायमान हैं ॥11॥

भ्राजिष्णुभिर्यः परितो विराजते लसद्विमानावलिभिर्महात्मनाम्
विद्योतमानः प्रमदोत्तमाद्युभिः सविद्युदभ्रावलिभिर्यथा नभः 12

जिस प्रकार आकाश बिजलीसहित बादलों से शोभायमान होता है, वैसे ही वह लोक मनोहर कामिनियों की कान्ति से युक्त महात्माओं के दिव्य तेजोमय विमानों से स्थान -स्थान पर सुशोभित होता रहता है ॥ 12॥

श्रीर्यत्र रूपिण्युरुगायपादयोः करोति मानं बहुधा विभूतिभिः
प्रेङ्खं श्रिता या कुसुमाकरानुगैर्विगीयमाना प्रियकर्म गायती 13

उस बैकुण्ठ लोक में लक्ष्मीजी सुन्दर रूप धारण करके अपनी विविध विभूतियों के द्वारा भगवान् के चरणकमलों की अनेकों प्रकार से सेवा करती करती रहती हैं , तब उनके सौन्दर्य और सुरभि से उन्मत्त होकर भौंरे स्वयं उन लक्ष्मी जी गुण -गान करने लगते हैं ॥ 13॥

ददर्श तत्राखिलसात्वतां पतिं श्रियः पतिं यज्ञपतिं जगत्पतिम्
सुनन्दनन्दप्रबलार्हणादिभिः स्वपार्षदाग्रैः परिसेवितं विभुम् 14

ब्रह्माजी ने देखा कि उस दिव्य लोक में समस्त भक्तों के रक्षक, लक्ष्मीपति,यज्ञपति एवं विश्वपति भगवान् विराजमान हैं। सुनन्द,नन्द,प्रबल और अर्हण आदि मुख्य -मुख्य पार्षदगण उन प्रभु की सेवा कर रहे हैं ॥ 14॥

भृत्यप्रसादाभिमुखं दृगासवं प्रसन्नहासारुणलोचनाननम्
किरीटिनं कुण्डलिनं चतुर्भुजं पीतांशुकं वक्षसि लक्षितं श्रिया 15

उनका मुखकमल प्रसाद -मधुर मुस्कान से युक्त है। आँखों में लाल-लाल डोरियाँ हैं। बड़ी मोहक और मधुर चितवन है। ऐसा जान पड़ता है कि अभी -अभी अपने प्रेमी भक्त को अपना सर्वस्व दे देंगे। सिरपर मुकुट,कानों में कुण्डल और कंधे पर पीताम्बर जगमगा रहे हैं। वक्षः स्थलपर एक सुनहरी रेखा के रूप में श्रीलक्ष्मीजी विराजमान हैं और सुंदर चार भुजाएँ हैं ॥15॥

अध्यर्हणीयासनमास्थितं परं वृतं चतुःषोडशपञ्चशक्तिभिः
युक्तं भगैः स्वैरितरत्र चाध्रुवैः स्व एव धामन्रममाणमीश्वरम् 16

वे एक सर्वोत्तम और बहुमूल्य आसनपर विराजमान हैं। प्रुरुष,प्रकृति,महत्त्व,अहंकार,मन,दस इन्द्रिय,शब्दादि पाँच तन्मात्राएँ और पंचभूत — ये पचीस शक्तियाँ मूर्तिमान होकर उनके चारों ओर खड़ी हैं। समग्र ऐश्वर्य,धर्म,कीर्ति,श्री,ज्ञान और वैराग्य — इन छः नित्यसिद्ध स्वरूपभूत शक्तियों से वे सर्वदा युक्त रहते हैं। उनके अतिरिक्त और कहीं भी ये नित्यरूप से निवास नहीं करतीं। वे सर्वेश्वर प्रभु अपने नित्य आनन्दमय स्वरुप में ही नित्य -निरन्तर निमग्न रहते हैं ॥ 16॥

तद्दर्शनाह्लादपरिप्लुतान्तरो हृष्यत्तनुः प्रेमभराश्रुलोचनः
ननाम पादाम्बुजमस्य विश्वसृग्यत्पारमहंस्येन पथाधिगम्यते 17

उनका दर्शन करते ही ब्रह्माजी का हृदय आनन्द के उद्रेक से लबालब भर गया। शरीर पुलकित हो उठा, नेत्रों में प्रेमाश्रु छलक आये। ब्रह्माजी ने भगवान् के उन चरणकमलों में, जो परमहंसों के निवृत्तिमार्ग से प्राप्त हो सकते हैं, सिर झुकाकर प्रणाम किया ॥17॥

तं प्रीयमाणं समुपस्थितं कविं प्रजाविसर्गे निजशासनार्हणम्
बभाष ईषत्स्मितशोचिषा गिरा प्रियः प्रियं प्रीतमनाः करे स्पृशन् 18

ब्रह्माजी के प्यारे भगवान् अपने प्रिय ब्रह्मा को प्रेम और दर्शन के आनन्द में निमग्न,शरणागत तथा प्रजा -सृष्टि के लिये आदेश देने के योग्य देखकर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने ब्रह्माजी से हाथ मिलाया तथा मन्द मुस्कान से अलंकृत वाणी में कहा — ॥ 18॥

श्रीभगवानुवाच
त्वयाहं तोषितः सम्यग्वेदगर्भ सिसृक्षया
चिरं भृतेन तपसा दुस्तोषः कूटयोगिनाम् 19

श्रीभगवान् ने कहा — ब्रह्माजी ! तुम्हारे हृदय में तो समस्त वेदों का ज्ञान विद्यमान है। तुमने सृष्टि रचना की इच्छा से चिरकालतक तपस्या करके मुझे भलीभाँति संतुष्ट कर दिया है। मन में कपट रखकर योगसाधन करनेवाले मुझे कभी प्रसन्न नही कर सकते ॥19॥

वरं वरय भद्रं ते वरेशं माभिवाञ्छितम्
ब्रह्मञ्छ्रेयःपरिश्रामः पुंसां मद्दर्शनावधिः 20

तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारी जो अभिलाषा हो, वही वर मुझसे माँग लो। क्योंकि मैं मुँहमाँगी वस्तु देने में समर्थ हूँ। ब्रह्माजी ! जीव के समस्त कल्याणकारी साधनों का विश्राम — पर्यवसान मेरे दर्शन में ही है ॥ 20॥

मनीषितानुभावोऽयं मम लोकावलोकनम्
यदुपश्रुत्य रहसि चकर्थ परमं तपः 21

तुमने मुझे देखे बिना ही उस सुने जल में मेरी वाणी सुनकर इनती घोर तपस्या की है, इसी से मेरी इच्छा से तुम्हें मेरे लोग का दर्शन हुआ है ॥21॥

प्रत्यादिष्टं मया तत्र त्वयि कर्मविमोहिते
तपो मे हृदयं साक्षादात्माहं तपसोऽनघ 22

तुम उस समय सृष्टिरचना का कर्म करने में किंकर्तव्यविमूढ़ हो रहे थे। इसी से मैंने तुम्हें तपस्या करने की आज्ञा दी थी। क्योंकि निष्पाप ! तपस्या मेरा हृदय है और मैं स्वयं तपस्या का आत्मा हूँ ॥22॥

सृजामि तपसैवेदं ग्रसामि तपसा पुनः
बिभर्मि तपसा विश्वं वीर्यं मे दुश्चरं तपः 23

मैं तपस्या से ही इस संसार की सृष्टि करता हूँ, तपस्या से ही इसका धारण -पोषण करता हूँ और फिर तपस्या से ही इसे अपने में लीं कर लेता हूँ। तपस्या मेरी एक दुर्लघ्य शक्ति है ॥23॥

ब्रह्मोवाच
भगवन्सर्वभूतानामध्यक्षोऽवस्थितो गुहाम्
वेद ह्यप्रतिरुद्धेन प्रज्ञानेन चिकीर्षितम् 24

ब्रह्माजी ने कहा — भगवन ! आप समस्त प्राणियों के अन्तःकरण में साक्षीरूप से विराजमान रहते हैं। आप अपने अप्रतिहत ज्ञान से यह जानते ही हैं कि मैं क्या करना चाहता हूँ ॥24॥

तथापि नाथमानस्य नाथ नाथय नाथितम्
परावरे यथा रूपेजानीयां ते त्वरूपिणः 25

नाथ ! आप कृपा करके मुझ याचक की यह माँग पूरी कीजिये कि  मैं रूपरहित आपके सगुण और निर्गुण डॉन ही रूपों को जान सकूँ ॥ 25॥

यथात्ममायायोगेन नानाशक्त्युपबृंहितम्
विलुम्पन्विसृजन्गृह्णन्बिभ्रदात्मानमात्मना 26
क्रीडस्यमोघसङ्कल्प ऊर्णनाभिर्यथोर्णुते
तथा तद्विषयां धेहि मनीषां मयि माधव 27

आप माया के स्वामी हैं, आपका संकल्प कभी व्यर्थ नहीं होता। जैसे मकड़ी अपने मुँह से जाला निकालकर उसमें क्रीड़ा करती है और फिर उसे अपने में लीं कर लेती है, वैसे ही आप अपनी माया का आश्रय लेकर इस विविध -शक्तिसम्पन्न जगत की उत्पत्ति, पालन और संहार करने के लिए अपने -आपको को ही अनेक रूपों में बना देते हैं और क्रीडा करते हैं। इस प्रकार आप कैसे करते हैं — इस मर्म को मैं जान सकूँ, ऐसा ज्ञान आप मुझे दीजिये ॥26-27॥

भगवच्छिक्षितमहं करवाणि ह्यतन्द्रितः
नेहमानः प्रजासर्गं बध्येयं यदनुग्रहात् 28

आप मुझपर ऐसी कृपा कीजिये कि मैं सजग रहकर सावधानी से आपकी आज्ञा का पालन कर सकूँ और सृष्टि की रचना करते समय भी कर्तापन आदि के अभिमान से बंध न जाऊँ ॥28॥

यावत्सखा सख्युरिवेश ते कृतः प्रजाविसर्गे विभजामि भो जनम्
अविक्लवस्ते परिकर्मणि स्थितो मा मे समुन्नद्धमदो ञ्ज मानिनः 29

प्रभो ! आपने एक मित्र के समान हाथ पकड़कर मुझे अपना मित्र स्वीकार किया हैं। अतः जब मैं आपकी इस सेवा — सृष्टिरचना मे लगूं और सावधानी से पूर्वसृष्टि के गुण -कर्मानुसार जीवों का विभाजन करने लगूँ , तब कहीं अपने को जन्म -कर्म से स्वतंत्र मानकर प्रबल अभिमान न कर बैठूँ ॥ 29॥

श्रीभगवानुवाच
ज्ञानं परमगुह्यं मे यद्विज्ञानसमन्वितम्
सरहस्यं तदङ्गं च गृहाण गदितं मया 30

श्रीभगवान ने कहा — अनुभव , प्रेमाभक्ति और साधनों से युक्त अत्यन्त गोपनीय अपने स्वरुप का ज्ञान मैं तुन्हें कहता हूँ; तुम उसे ग्रहण करो ॥30॥

यावानहं यथाभावो यद्रूपगुणकर्मकः
तथैव तत्त्वविज्ञानमस्तु ते मदनुग्रहात् 31

मेरा जितना विस्तार है, मेरा जो लक्षण है, मेरे जितने और जैसे रूप,गुण और लीलाएँ हैं — मेरी कृपा से तुम उनका तत्त्व ठीक-ठीक वैसा ही अनुभव करो ॥31॥

अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत्सदसत्परम्
पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् 32

सृष्टि के पूर्व केवल मैं -ही-मैं था। मेरे अतिरिक्त न स्थूल था न सूक्ष्म न तो दोनों का कारण अज्ञान। जहाँ यह सृष्टि नहीं है, वहाँ मैं -ही-मैं-हूँ और इस सृष्टि के रूप में जो कुछ प्रतीत हो रहा है, वह भी मैं ही हूँ और जो कुछ बच रहेगा, वह भी मैं ही हूँ ॥32॥

ऋतेऽर्थं यत्प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि
तद्विद्यादात्मनो मायां यथाभासो यथा तमः 33

वास्तव में न होने पर भी जो कुछ अनिर्वचनीय वस्तु मेरे अतिरिक्ति मुझ परमात्मा में दो चंद्रमाओं की तरह मिथ्या ही प्रतीत हो रही अथवा विद्यमान होनेपर भी आकाश -मण्डल के नक्षत्रों में राहु की भाँति जो मेरी प्रतीति नहीं होती, इसे मेरी माया समझना चाहिये ॥33॥

यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु
प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम् 34

जैसे प्राणियों के पंचभूतरहित छोटे -बड़े शरीरों में आकशादि पंचमहाभूत उन शरीरों के कार्यरूप से निर्मित होने के कारण प्रवेश करते भी हैं और पहले से ही उन स्थानों और रूपों में कारणरूप से विद्यमान रहने के कारण प्रवेश नहीं भी करते, वैसे ही उन प्राणियों के शरीरों की दृष्टि से मैं उनमें आत्मा के रूप से प्रवेश किये हुए हूँ और आत्मदृष्टि से अपने अतिरिक्त और कोई वस्तु न होने के कारण उनमें प्रविष्ट नहीं भी हूँ ॥34॥

एतावदेव जिज्ञास्यं तत्त्वजिज्ञासुनात्मनः
अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत्स्यात्सर्वत्र सर्वदा 35

यह ब्रह्म नहीं, यह ब्रह्म नहीं — इस प्रकार निषेध की पद्धति से , और यह ब्रह्म है, यह ब्रह्म है —इस अन्वय की पद्धति से यही सिद्ध होता है की सर्वातीत एवं सर्वस्वरूप भगवान् ही सर्वदा और सर्वत्र स्थित हैं, वाही वास्तविक तत्त्व हैं। जो आत्मा अथवा परमात्मा का तत्त्व जानना चाहते हैं, उन्हें केवल इनता ही जानने की आवश्यकता है ॥35॥

एतन्मतं समातिष्ठ परमेण समाधिना
भवान्कल्पविकल्पेषु न विमुह्यति कर्हिचित् 36

ब्रह्माजी ! तुम अविचल समाधि के द्वारा मेरे इस सिद्धांत में पूर्ण निष्ठा कर लो। इससे तुम्हे कल्प -कल्प में विविध प्रकार की सृष्टिरचना करते रहनेपर भी कभी मोह नहीं होगा ॥36॥

श्रीशुक उवाच
सम्प्रदिश्यैवमजनो जनानां परमेष्ठिनम्
पश्यतस्तस्य तद्रूपमात्मनो न्यरुणद्धरिः 37

श्रीशुकदेवजी कहते हैं — लोकपितामह ब्रह्माजी को इस प्रकार उपदेश देकर अजन्मा भगवान् ने उनके देखते -ही-देखते अपने उस रूप को छिपा लिया॥ 37॥

अन्तर्हितेन्द्रियार्थाय हरये विहिताञ्जलिः
सर्वभूतमयो विश्वं ससर्जेदं स पूर्ववत् 38

जब सर्वभूतस्वरुप ब्रह्माजी ने देखा कि भगवान् ने अपने इन्द्रियगोचर स्वरुप को हमारे नेत्रों के सामने से हटा लिया हैं, तब उन्होंने अंजली बाँधकर उन्हें प्रणाम किया और पहले कल्प में जैसी सृष्टि थी, उसी रूप में इस विश्व की रचना की॥38॥

प्रजापतिर्धर्मपतिरेकदा नियमान्यमान्
भद्रं प्रजानामन्विच्छन्नातिष्ठत्स्वार्थकाम्यया 39

एक बार धर्मपति, प्रजापति ब्रह्मजी ने सारी जनता का कल्याण हो, अपने इस स्वार्थ की पूर्ति के लिए विधिपूर्वक यम -नियमों को धारण किया ॥ 39॥

तं नारदः प्रियतमो रिक्थादानामनुव्रतः
शुश्रूषमाणः शीलेन प्रश्रयेण दमेन च 40
मायां विविदिषन्विष्णोर्मायेशस्य महामुनिः
महाभागवतो राजन्पितरं पर्यतोषयत् 41

उस समय उनके पुत्रों में सबसे अधिक प्रिय, परम भक्त देवर्षि नारदजी ने मायापति भगवान् की माया का तत्त्व जानने की इच्छा से बड़े संयम, विनय और सौम्यता से अनुगत होकर उनकी सेवा की और उन्होंने सेवा से ब्रह्माजी को बहुत ही संतुष्ट कर लिया ॥40-41॥

तुष्टं निशाम्य पितरं लोकानां प्रपितामहम्
देवर्षिः परिपप्रच्छ भवान्यन्मानुपृच्छति 42

परीक्षित ! जब देवर्षि नारद ने देखा कि मेरे लोकपितामह पिताजी मुझपर प्रसन्न हैं, तब उन्होंने उनसे यही प्रश्न किया, जो तुम मुझसे कर रहे हो ॥42॥

तस्मा इदं भागवतं पुराणं दशलक्षणम्
प्रोक्तं भगवता प्राह प्रीतः पुत्राय भूतकृत् 43

उनके प्रश्न से ब्रह्माजी और भी प्रसन्न हुए। फिर उन्होंने यह दस लक्षणवाला भागवतपुराण अपने पुत्र नारद को सुनाया, जिसका स्वयं भगवान् ने उन्हें उपदेश किया था ॥43॥

नारदः प्राह मुनये सरस्वत्यास्तटे नृप
ध्यायते ब्रह्म परमं व्यासायामिततेजसे 44

परीक्षित ! जिस समय मेरे परमतेजस्वी पिता सरस्वती के तटपर बैठकर परमात्मा के ध्यान में मग्न थे, उस समय देवर्षि नारदजी ने वही भागवत उन्हें सुनाया ॥44॥

यदुताहं त्वया पृष्टो वैराजात्पुरुषादिदम्
यथासीत्तदुपाख्यास्ते प्रश्नानन्यांश्च कृत्स्नशः 45

तुमने मुझसे जो यह प्रश्न किया है कि विराट्पुरुष से इस जगत की उत्पत्ति कैसे हुई तथा दूसरे भी जो बहुत -से प्रश्न किये हैं , उन सबका उत्तर मैं उसी भागवतपुराण के रूप में देता हूँ ॥45॥

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