प्रथम स्कन्धः ।। अथ पञ्चदशोऽध्यायः ।। BHAGWAT PURAN.

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 श्री राधाकृष्णाभ्याम् नम:  

 श्रीमद्भागवत महापुराणम्  

 प्रथम स्कन्धः 

 अथ पञ्चदशोऽध्यायः ।।


सूत उवाच:-
एवं कृष्णसखः कृष्णो भ्रात्रा राज्ञा विकल्पितः
नानाशङ्कास्पदं रूपं कृष्णविश्लेषकर्शितः 1
  

सूतजी कहते हैं —– भगवान् श्रीकृष्ण के प्यारे सखा अर्जुन एक तो पहले ही श्रीकृष्ण के विरह से कृश हो रहे थे, उस पर राजा युधिष्टिर ने उनकी विषादग्रस्त मुद्रा देखकर उसके विषय में कई प्रकार की आशंकाएँ करते हुए प्रश्नों की झड़ी लगा दी ।।1।।

शोकेन शुष्यद्वदन हृत्सरोजो हतप्रभः
विभुं तमेवानुस्मरन्नाशक्नोत्प्रतिभाषितुम् 2
    

शोक से अर्जुन का मुख और हृदय -कमल सुख गया था , चेहरा फीका पद गया था। वे उन्हीं भगवान् श्रीकृष्ण के ध्यान में ऐसे डूब रहे थे कि बड़े भाई के प्रश्नों का कुछ भी उत्तर न दे सके ।।2।।

कृच्छ्रेण संस्तभ्य शुचः पाणिनामृज्य नेत्रयोः
परोक्षेण समुन्नद्ध प्रणयौत्कण्ठ्यकातरः 3
सख्यं मैत्रीं सौहृदं च सारथ्यादिषु संस्मरन्
नृपमग्रजमित्याह बाष्पगद्गदया गिरा 4
    

श्रीकृष्ण की आँखों से ओझल हो जाने के कारण वे बढ़ी हुई प्रेमजनित उत्कंठा के परवश हो रहे थे। रथ हाँकने, टहलने आदि के समय भगवान् ने उनके साथ जो मित्रता,अभिन्नहृदयता और प्रेम से भरे हुए व्यवहार किये थे, उनकी याद -पर-याद  आ रही थी ; बड़े कष्ट से उन्होंने अपने शोक का वेग रोका, हाथ से नेत्रों के आँसू पोंछे और फिर रुँधे हुए गले से अपने बड़े भाई महाराज युधिष्टिर से कहा ।।3-4।।

अर्जुन उवाच
वञ्चितोऽहं महाराज हरिणा बन्धुरूपिणा
येन मेऽपहृतं तेजो देवविस्मापनं महत् 5
    

अर्जुन बोले —– महाराज ! मेरे ममेरे भाई अथवा अत्यन्त घनिष्ट मित्र का रूप धारणकर श्रीकृष्ण ने मुझे ठग लिया। मेरे जिस प्रबल पराक्रम से बड़े -बड़े देवता भी आश्चर्य में डूब जाते थे, उसे श्रीकृष्ण ने मुझसे छीन लिया ।।5।।

यस्य क्षणवियोगेन लोको ह्यप्रियदर्शनः
उक्थेन रहितो ह्येष मृतकः प्रोच्यते यथा 6
    

जैसे यह शरीर प्राण से रहित होने पर मृतक कहलाता है, वैसे ही उनके क्षणभर के वियोग से यह संसार अप्रिय दीखने लगता है ।।6।।

यत्संश्रयाद्द्रुपदगेहमुपागतानां राज्ञां स्वयंवरमुखे स्मरदुर्मदानाम्
तेजो हृतं खलु मयाभिहतश्च मत्स्यः सज्जीकृतेन धनुषाधिगता च कृष्णा 7
    

उनके आश्रय से द्रौपदी -स्वयंवर में राजा द्रुपद के घर आये हुए कमोन्मत्त राजाओं का तेज मैंने हरण कर लिया, धनुष पर बाण चढ़ाकर मत्स्यवेध किया और इस प्रकार द्रौपदी को प्राप्त किया था ।।7।।

यत्सन्निधावहमु खाण्डवमग्नयेऽदामिन्द्रं च सामरगणं तरसा विजित्य
लब्धा सभा मयकृताद्भुतशिल्पमाया दिग्भ्योऽहरन्नृपतयो बलिमध्वरे ते 8
    

उनकी सन्निधिमात्र से मैंने समस्त देवताओं के साथ इन्द्र को अपने बल से जीतकर अग्निदेव को उनकी तृप्ति के लिए खाण्डव वन का दान कर दिया और मय दानव की निर्माण की हुई, अलौकिक कलाकौशल से युक्त मायामयी सभा प्राप्त की और आपके यज्ञ में सब ओर से आ -आकर राजाओं ने अनेकों प्रकार की भेंटें समर्पित कीं ।।8।।

यत्तेजसा नृपशिरोऽङ्घ्रिमहन्मखार्थमार्योऽनुजस्तव गजायुतसत्त्ववीर्यः
तेनाहृताः प्रमथनाथमखाय भूपा यन्मोचितास्तदनयन्बलिमध्वरे ते 9
    

दस हजार हाथियों की शक्ति और बल से सम्पन्न आपके इन छोटे भाई भीमसेन ने उन्हीं की शक्ति से राजाओं के सिरपर पैर रखनेवाले अभिमानी जरासन्ध का वध किया था; तदनन्तर उन्हीं भगवान् ने उन बहुत से राजाओं को मुक्त किया, जिनको जरासन्ध ने महाभैरव यज्ञ में बलि चढ़ाने के लिये बंदी बना रखा था। उन सब राजाओं ने आपके यज्ञ में अनेकों प्रकार के उपहार दिये थे ।।9।।

पत्न्यास्तवाधिमखकॢप्तमहाभिषेक श्लाघिष्ठचारुकबरं कितवैः सभायाम्
स्पृष्टं विकीर्य पदयोः पतिताश्रुमुख्या यस्तत्स्त्रियोऽकृतहतेशविमुक्तकेशाः 10
    

महारानी द्रौपदी राजसूय यज्ञ के महान अभिषेक से पवित्र हुए अपने उन सुन्दर केशों को, जिन्हें दुष्टों ने भरी सभा में छूने का साहस किया था, बिखेरकर तथा आँखों में आँसू भरकर जब श्रीकृष्ण के चरणों में गिर पड़ी, तब उन्होंने उसके सामने उसके उस घोर अपमान का बदला लेने की प्रतिज्ञा करके उन धूर्तों की स्त्रियों की ऐसी दशा कर दी की वे विधवा हो गयें और उन्हें अपने केश अपने हाथों खोल देने पड़े ।।10।।

यो नो जुगोप वन एत्य दुरन्तकृच्छ्राद्दुर्वाससोऽरिरचितादयुताग्रभुग्यः
शाकान्नशिष्टमुपयुज्य यतस्त्रिलोकीं तृप्ताममंस्त सलिले विनिमग्नसङ्घः 11
    

वनवास के समय हमारे वैरी दुर्योधन दे षड्यन्त्र से दस हजार शिष्यों को साथ बिठाकर भोजन करनेवाले महर्षि दुर्वासा ने हमें दुस्तर संकट में डाल दिया था। उस समय उन्होंने द्रौपदी के पात्र में बची हुई शाककी एक पत्ती का ही भोग लगाकर हमारी रक्षा की। उनके ऐसा करते ही नदी में स्नान करती हुई मुनिमण्डली को ऐसा प्रतीत हुआ मानो उनकी तो बात ही क्या, सारी त्रिलोकी ही तृप्त हो गयी हैं ।।11।।

यत्तेजसाथ भगवान्युधि शूलपाणिर्विस्मापितः सगिरिजोऽस्त्रमदान्निजं मे
अन्येऽपि चाहममुनैव कलेवरेण प्राप्तो महेन्द्रभवने महदासनार्धम् 12
    

उनके प्रताप से मैंने युद्ध में पार्वतीसहित भगवान् शंकर को आश्चर्य में डाल दिया तथा उन्होंने मुझको अपना पाशुपत नामक अस्त्र दिया; साथ ही दुसरे लोकपालों ने भी प्रसन्न होकर अपने -अपने अस्त्र मुझे दिए। और तो क्या , उनकी कृपा से मैं इसी शरीर से स्वर्ग में गया और देवराज इन्द्रकी सभा में उनके बराबर आधे आसनपर बैठने का सम्मान मैंने प्राप्त किया ।।12।।

तत्रैव मे विहरतो भुजदण्डयुग्मं गाण्डीवलक्षणमरातिवधाय देवाः
सेन्द्राः श्रिता यदनुभावितमाजमीढ तेनाहमद्य मुषितः पुरुषेण भूम्ना 13
    

उनके आग्रह से जब मैं स्वर्ग में ही कुछ दिनोंतक रह गया, तब इन्द्र के साथ समस्त देवताओं ने मेरी इन्हीं गाण्डीव धारण करनेवाली भुजाओं का नवातकवच आदि दैत्यों को मारने के लिये आश्रय लिया। महाराज ! यह सब जिनकी महती कृपा का फल था, उन्हीं पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण ने मुझे आज ठग लिया? ।।13।।

यद्बान्धवः कुरुबलाब्धिमनन्तपारमेको रथेन ततरेऽहमतीर्यसत्त्वम्
प्रत्याहृतं बहु धनं च मया परेषां तेजास्पदं मणिमयं च हृतं शिरोभ्यः 14
    

महाराज ! कौरवों की सेना भीष्म-द्रौण आदि अजेय महामत्स्यों से पूर्ण अपार समुद्र के समान दुस्तर थी, परंतु उनका आश्रय ग्रहण करके अकेले ही रथपर स्वर हो मैं उसे पार कर गया। उन्हीं की सहायता से, आपको याद होगा, मैंने शत्रुओं से राजा विराट का सारा गोधन तो वापस ले ही लिया, साथ हिन् उनके सिरोंपर से चमकते हुए मणिमय मुकुट तथा अंगों के अलंकारतक छीन लिये थे ।।14।।

यो भीष्मकर्णगुरुशल्यचमूष्वदभ्र राजन्यवर्यरथमण्डलमण्डितासु
अग्रेचरो मम विभो रथयूथपानामायुर्मनांसि च दृशा सह ओज आर्च्छत् 15
    

भाईजी ! कौरवों की सेना भीष्म ,कर्ण,द्रौण,शल्य तथा अन्य बड़े -बड़े राजाओं और क्षत्रिय वीरों के रथों से शोभायमान थी। उसके सामने मेरे आगे -आगे चलकर वे अपनी दृष्टी से ही उन महारथी यूथपतियों की आयु,मन,उत्साह और बल को छीन लिया करते थे ।।15।।

यद्दोःषु मा प्रणिहितं गुरुभीष्मकर्ण नप्तृत्रिगर्तशल्यसैन्धवबाह्लिकाद्यैः
अस्त्राण्यमोघमहिमानि निरूपितानि नोपस्पृशुर्नृहरिदासमिवासुराणि 16
    

द्रोणाचार्य,भीष्म,कर्ण,भूरिश्रवा, सुशर्मा,शल्य,जयद्रथ और बह्लिक आदि वीरों ने मुझपर अपने कभी न चूकनेवाले अस्त्र चलाये थे; परंतु जैसे हिरण्यकशिपु  आदि दैत्यों के अस्त्र -शस्त्र भागवद्भक्त प्रह्लाद का स्पर्श नहीं करते थे, वैसे ही उनके शास्त्रास्त्र मुझे छूतक नहीं सके। यह श्रीकृष्ण के भुजदण्डों की छत्रछाया में रहने का ही प्रभाव था ।।16।।

सौत्ये वृतः कुमतिनात्मद ईश्वरो मे यत्पादपद्ममभवाय भजन्ति भव्याः
मां श्रान्तवाहमरयो रथिनो भुविष्ठं न प्राहरन्यदनुभावनिरस्तचित्ताः 17
    

श्रेष्ट पुरुष संसार से मुक्त होने के लिये जिनके चरणकमलों का सेवन करते हैं, अपने -आपतकको दे डालनेवाले उन भगवान् को मुझ दुर्बुद्धि ने सारथितक बना डाला। अहा ! जिस समय मेरे घोड़े थक गये थे और मैं रथे से उतरकर पृथ्वी पर खड़ा था, उस समय बड़े -बड़े महारथी शत्रु भी मुझपर प्रहार न कर सके ; क्योंकि श्रीकृष्ण के प्रभाव से उनकी बुद्धि मारी गयी थी ।।17।।

नर्माण्युदाररुचिरस्मितशोभितानि हे पार्थ हेऽर्जुन सखे कुरुनन्दनेति
सञ्जल्पितानि नरदेव हृदिस्पृशानि स्मर्तुर्लुठन्ति हृदयं मम माधवस्य 18
    

महाराज ! माधव के उन्मुक्त और मधुरमुसकान से युक्त ,विनोदभरे एवं हृदयस्पर्शी वचन और उनका मुझे ‘पार्थ, सखा, कुरुनन्दन’ आदि कहकर पुकारना, मुझे याद आनेपर मेरे हृदय में उथल -पुथल मचा देते हैं ।। 18।।

शय्यासनाटनविकत्थनभोजनादिष्वैक्याद्वयस्य ऋतवानिति विप्रलब्धः
सख्युः सखेव पितृवत्तनयस्य सर्वं सेहे महान्महितया कुमतेरघं मे 19
    

सोने,बैठने,टहलने और अपने सम्बन्ध में बड़ी -बड़ी बातें करने तथा भोजन आदि करने में हम प्रायः एक साथ रहा करते थे। किसी -किसी दिन मैं व्यंग्य से उन्हें कह बैठता, ‘ मित्र ! तुम तो बड़े सत्यवादी हो ! ‘ उस समय भी वे महापुरुष अपनी महानुभावता के कारण, जैसे मित्र अपने मित्र का और पिता अपने पुत्र का अपराध सह लेता है उसी प्रकार, मुझ दुर्बुद्धि के अपराधों को सह लिया करते थे ।।19।।

सोऽहं नृपेन्द्र रहितः पुरुषोत्तमेन सख्या प्रियेण सुहृदा हृदयेन शून्यः
अध्वन्युरुक्रमपरिग्रहमङ्ग रक्षन्गोपैरसद्भिरबलेव विनिर्जितोऽस्मि 20
    

महाराज ! जो मेरे सखा , प्रिय मित्र — नहीं-नहीं मेरे हृदय ही थे , उन्हीं पुरुषोत्तम भगवान् से मैं रहित हो गया हूँ। भगवान् की पत्नियों को द्वारका से अपने साथ ला रहा था, परन्तु मार्ग में दुष्ट गोपों ने मुझे एक अबला की भाँति हरा दिया और मैं उनकी रक्षा नहीं कर सका ।।20।।

तद्वै धनुस्त इषवः स रथो हयास्ते सोऽहं रथी नृपतयो यत आनमन्ति
सर्वं क्षणेन तदभूदसदीशरिक्तं भस्मन्हुतं कुहकराद्धमिवोप्तमूष्याम् 21
    

वही मेरा गाण्डीव धनुष हैं, वे ही बाण हैं, वही रथ है, वही घोड़े हैं और वही मैं रथी अर्जुन हूँ, जिसके सामने बड़े -बड़े राजालोग सिर झुकाया करते थे। श्रीकृष्ण के बिना ये सब एक ही क्षण में नहीं के समान सारशून्य हो गये — ठीक उसी तरह, जैसे भस्म में डाली हुई आहुति, कपटभरी सेवा और ऊसर में बोया हुआ बीज व्यर्थ जाता है ।।21।।

राजंस्त्वयानुपृष्टानां सुहृदां नः सुहृत्पुरे
विप्रशापविमूढानां निघ्नतां मुष्टिभिर्मिथः 22
वारुणीं मदिरां पीत्वा मदोन्मथितचेतसाम्
अजानतामिवान्योन्यं चतुःपञ्चावशेषिताः 23
    

राजन ! आपने द्वारकावासी अपने जिन सुहृद सम्बन्धियों की बात पूछी है , वे ब्राह्मणों के शापवश मोहग्रस्त हो गये और वारुणी मदिरा के पान से मदोन्मत्त होकर अपरिचितों की भाँति आपस में ही एक -दूसरे से भीड़ गये और घूँसों से मार -पीट करके सब-के-सब नष्ट हो गये। उनमें से केवल चार-पाँच ही बचे हैं ।।22-23।।

प्रायेणैतद्भगवत ईश्वरस्य विचेष्टितम्
मिथो निघ्नन्ति भूतानि भावयन्ति च यन्मिथः 24
    

वास्तव में यह सर्वशक्तिमान भगवान् की ही लीला है कि संसार के प्राणी परस्पर एक -दूसरे का पालन-पोषण भी करते हैं और एक-दूसरे को मार भी डालते हैं ।।24।।

जलौकसां जले यद्वन्महान्तोऽदन्त्यणीयसः
दुर्बलान्बलिनो राजन्महान्तो बलिनो मिथः 25
एवं बलिष्ठैर्यदुभिर्महद्भिरितरान्विभुः
यदून्यदुभिरन्योन्यं भूभारान्सञ्जहार ह 26
    

राजन ! जिस प्रकार जलचरों में बड़े जन्तु छोटों को , बलवान दुर्बलों को एवं बड़े और बलवान भी परस्पर एक -दूसरे को खा जाते हैं , उसी प्रकार अतिशय बली और बड़े और बड़े यदुवंशियों के द्वारा भगवान् ने दूसरे राजाओं का संहार कराया। तत्पश्चात यदुवंशियों के द्वारा ही एक से दूसरे यदुवंशी का नाश कराके पूर्णरूप से पृथ्वी का भार उतार दिया ।।25-26।।

देशकालार्थयुक्तानि हृत्तापोपशमानि च
हरन्ति स्मरतश्चित्तं गोविन्दाभिहितानि मे 27
    

भगवान् श्रीकृष्ण ने मुझे जो शिक्षाएँ दी थीं, वे देश,काल और प्रयोजन के अनुरूप तथा हृदय के ताप को शान्त  करनेवाली थीं; स्मरण आते ही वे हमारे चित्त का हरण कर लेती हैं।।27।।

सूत उवाच
एवं चिन्तयतो जिष्णोः कृष्णपादसरोरुहम्
सौहार्देनातिगाढेन शान्तासीद्विमला मतिः 28
    

सूतजी कहते हैं —– इस प्रकार प्रगाढ़ प्रेम से भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमलों का चिन्तन करते-करते अर्जुन की चित्तवृत्ति अत्यन्त निर्मल और प्रशान्त हो गयी ।।28।।

वासुदेवाङ्घ्र्यनुध्यान परिबृंहितरंहसा
भक्त्या निर्मथिताशेष कषायधिषणोऽर्जुनः 29
    

उनकी प्रेममयी भक्ति भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमलों के अहर्निश चिन्तन से अत्यन्त बढ़ गयी। भक्ति के वेग ने उनके हृदय को मथकर उसमें से सारे विकारों को बाहर निकाल दिया ।।29।।

गीतं भगवता ज्ञानं यत्तत्सङ्ग्राममूर्धनि
कालकर्मतमोरुद्धं पुनरध्यगमत्प्रभुः 30
    

उन्हें युद्ध के प्रारम्भ में भगवान् के द्वारा उपदेश किया हुआ गीता-ज्ञान पुनः स्मरण हो आया, जिसकी काल के व्यवधान और कर्मों के विस्तार के कारण प्रमादवश कुछ दिनों के लिये विस्मृति हो गयी थी ।।30।।

विशोको ब्रह्मसम्पत्त्या सञ्छिन्नद्वैतसंशयः
लीनप्रकृतिनैर्गुण्यादलिङ्गत्वादसम्भवः 31
    

ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति से माया का आवरण भंग होकर गुणातीत अवस्था प्राप्त हो गयी। द्वैतका संशय निवृत्त हो गया। सूक्ष्मशरीर भंग हुआ। वे शोक एवं जन्म-मृत्यु के चक्र से सर्वथा मुक्त हो गये ।।31।।

निशम्य भगवन्मार्गं संस्थां यदुकुलस्य च
स्वःपथाय मतिं चक्रे निभृतात्मा युधिष्ठिरः 32
    

भगवान् के स्वधामगमन और यदुवंश के संहार का वृत्तान्त सुनकर निश्चलमति युधिष्टिर ने स्वर्गारोहण का निश्चय किया।।32।।

पृथाप्यनुश्रुत्य धनञ्जयोदितं नाशं यदूनां भगवद्गतिं च ताम्
एकान्तभक्त्या भगवत्यधोक्षजे निवेशितात्मोपरराम संसृतेः 33
    

कुन्ती ने भी अर्जुन के मुख से यदुवंशियों के नाश और भगवान् के स्वधामगमन की बात सुनकर अनन्य भक्ति से अपने हृदय को भगवान् श्रीकृष्ण में लगा दिया और सदा के लिए इस जन्म-मृत्युरूप संसार से अपना मुँह मोड़ लिया ।।33।।

ययाहरद्भुवो भारं तां तनुं विजहावजः
कण्टकं कण्टकेनेव द्वयं चापीशितुः समम् 34
    

भगवान् श्रीकृष्ण ने लोकदृष्टि में जिस यादवशरीर से पृथ्वी का भार उतारा था, उसका वैसे ही परित्याग कर दिया, जैसे कोई काँटे से काँटा निकलकर फिर दोनों को फ़ेंक दे। भगवान् की दृष्टि में दोनों ही समान थे ।।34।।

यथा मत्स्यादिरूपाणि धत्ते जह्याद्यथा नटः
भूभारः क्षपितो येनजहौ तच्च कलेवरम् 35
    

जैसे वे नटके समान मत्स्यदि रूप धारण करते हैं और फिर उनका त्याग कर देते हैं, वैसे ही उन्होंने जिस यादवशरीर से पृथ्वी का भार दूर किया था, उसे त्याग भी दिया ।।35।।

यदा मुकुन्दो भगवानिमां महीं जहौ स्वतन्वा श्रवणीयसत्कथः
तदाहरेवाप्रतिबुद्धचेतसामभद्रहेतुः कलिरन्ववर्तत 36
    

जिनकी मधुर लीलाएँ श्रवण करनेयोग्य हैं, उन भगवान् श्रीकृष्ण ने जब अपने मनुष्य के- से शरीर से इस पृथ्वी का परित्याग कर दिया, उसी दिन विचारहीन लोगों को अधर्म में फँसानेवाला कलियुग आ धमका ।।36।।

युधिष्ठिरस्तत्परिसर्पणं बुधः पुरे च राष्ट्रे च गृहे तथात्मनि
विभाव्य लोभानृतजिह्महिंसनाद्यधर्मचक्रं गमनाय पर्यधात् 37
    

महाराज युधिष्टिर से कलियुग का फैलना छिपा न रहा। उन्होंने देखा—देश में, नगर में, घरों में और प्राणियों में लोभ,असत्य,छल,हिंसा आदि अधर्मों की बढ़ती हो गयी हैं। तब उन्होंने महाप्रस्थान का निश्चय किया ।।37।।

स्वराट्पौत्रं विनयिनमात्मनः सुसमं गुणैः
तोयनीव्याः पतिं भूमेरभ्यषिञ्चद्गजाह्वये 38
    

उन्होंने अपने विनयी पौत्र परीक्षित को, जो गुणों में उन्हीं के समान थे, समुद्र से घिरी हुई पृथ्वी के सम्राट पद पर हस्तिनापुर में अभिषिक्त किया।।38।।

मथुरायां तथा वज्रं शूरसेनपतिं ततः
प्राजापत्यां निरूप्येष्टिमग्नीनपिबदीश्वरः 39
    

उन्होंने मथुरा में शुरसेनाधिपति के रूप में अनिरुद्ध के पुत्र वज्र का अभिषेक किया। इसके बाद समर्थ युधिष्टिर ने प्राजापत्य यज्ञ करके आहवनीय आदि अग्नियों को अपने में लीन कर दिया अर्थात गृहस्थाश्रम के सभी धर्म से मुक्त होकर उन्होंने सन्यास ग्रहण किया ।।39।।

विसृज्य तत्र तत्सर्वं दुकूलवलयादिकम्
निर्ममो निरहङ्कारः सञ्छिन्नाशेषबन्धनः 40
    

युधिष्टिर ने अपने सब वस्त्राभूषण आदि वहीं छोड़ दिये एवं ममता और अहंकार से रहित होकर समस्त बन्धन काट डाले ।।40।।

वाचं जुहाव मनसि तत्प्राण इतरे च तम्
मृत्यावपानं सोत्सर्गं तं पञ्चत्वे ह्यजोहवीत् 41
    

उन्होंने दृढ भावना से वाणी को मन में, मन को प्राण में, प्राण को अपान में और अपान को उसकी क्रिया के साथ मृत्यु में तथा मृत्यु को पंचभूतमय शरीर में लीं कर लिया ।।41।।

त्रित्वे हुत्वा च पञ्चत्वं तच्चैकत्वे ञ्जुहोन्मुनिः
सर्वमात्मन्यजुहवीद्ब्रह्मण्यात्मानमव्यये 42
    

इस प्रकार शरीर को मृत्युरूप अनुभव करके उन्होंने उसे त्रिगुण में मिला दिया, त्रिगुण को मूल प्रकृति में, सर्वकारणरूपा प्रकृति को आत्मा में और आत्मा को अविनाशी ब्रह्म में विलीन कर दिया। उन्हें यह अनुभव होने लगा कि यह सम्पूर्ण दृश्यप्रपंच ब्रह्मस्वरुप है ।।42।।

चीरवासा निराहारो बद्धवाङ्मुक्तमूर्धजः
दर्शयन्नात्मनो रूपं जडोन्मत्तपिशाचवत् 43
    

इसके पश्चात उन्होंने शरीर पर चीर-वस्त्र धारण कर लिया, अन्न-जल का त्याग कर दिया, मौन ले लिया और केश खोलकर बिखेर लिये। वे अपने रूप को ऐसा दिखाने लगे जैसे कोई जड़, उन्मत्त या पिशाच हो ।।43।।

अनवेक्षमाणो निरगादशृण्वन्बधिरो यथा
उदीचीं प्रविवेशाशां गतपूर्वां महात्मभिः
हृदि ब्रह्म परं ध्यायन्नावर्तेत यतो गतः 44
    

फिर वे बिना किसी की बाट देखे तथा बहरे की तरह बिना किसी की बात सुने, घर से निकल पड़े। हृदय  में उस परब्रह्म का ध्यान करते हुए, जिसको प्राप्त करके फिर लौटना नहीं होता, उन्होंने उत्तर दिशा की यात्रा की, जिस ओर पहले बड़े-बड़े महात्माजन जा चुके हैं। ।।44।।

सर्वे तमनुनिर्जग्मुर्भ्रातरः कृतनिश्चयाः
कलिनाधर्ममित्रेण दृष्ट्वा  स्पृष्टाः प्रजा भुवि 45
    

भीमसेन,अर्जुन आदि युधिष्टिर के छोटे भाइयों ने भी देखा की अब पृथ्वी में सभी लोगों को अधर्म के सहायक कलियुग ने प्रभावित कर डाला है; इसलिये वे भी श्रीकृष्णचरणों की प्राप्ति का दृढ निश्चय करके अपने बड़े भाई के पीछे-पीछे चल पड़े ।।45।।

ते साधुकृतसर्वार्था ज्ञात्वात्यन्तिकमात्मनः
मनसा  धारयामासुर्वैकुण्ठचरणाम्बुजम् 46
    

उन्होंने जीवन के सभी लाभ भलीभांति प्राप्त कर लिए थे; इसलिए यह निश्चय करके कि  भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमल ही हमारे परम पुरुषार्थ हैं, उन्होंने उन्हें हृदय में धारण किया ।।46।।

तद्ध्यानोद्रिक्तया भक्त्या विशुद्धधिषणाः परे
तस्मिन्नारायणपदे एकान्तमतयो गतिम् 47
अवापुर्दुरवापां ते असद्भिर्विषयात्मभिः
विधूतकल्मषा स्थानं  विरजेनात्मनैव हि 48
    

पाण्डवों के हृदय में भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमलों के ध्यान से भक्ति-भाव उमड़ आया, उनकी बुद्धि सर्वथा सुद्ध होकर भगवान् श्रीकृष्ण के उस सर्वोत्कृष्ट स्वरुप में अनन्यभाव से स्थिर हो गयी; जिसमें निष्पाप पुरुष ही स्थिर हो पाते हैं। फलतः उन्होंने अपने विशुद्ध अन्तःकारण से स्वयं ही वह गति प्राप्त की, जो विषयासक्त दुष्ट मनुष्यों को कभी प्राप्त नहीं हो सकती ।।47-48।।

विदुरोऽपि परित्यज्य प्रभासे देहमात्मनः
कृष्णावेशेन तच्चित्तः पितृभिः स्वक्षयं ययौ 49
    

संयमी एवं श्रीकृष्ण के प्रेमावेश में मुग्ध भगवन्मय विदुरजी ने भी अपने शरीर को प्रभासक्षेत्र में त्याग दिया। उस समय उन्हें लेने के लिये आये हुए पितरों के साथ वे अपने लोक (यमलोक)—को चले गये ।।49।।

द्रौपदी च तदाज्ञाय पतीनामनपेक्षताम्
वासुदेवे भगवति ह्येकान्तमतिराप तम् 50
    

द्रौपदी ने देखा कि अब पाण्डवलोग निरपेक्ष हो गये हैं; तब वे अनन्यप्रेम से भगवान् श्रीकृष्ण का ही चिन्तन करके उन्हें प्राप्त हो गयीं ।।50।।

यः श्रद्धयैतद्भगवत्प्रियाणां पाण्डोः सुतानामिति  सम्प्रयाणम्
शृणोत्यलं स्वस्त्ययनं पवित्रं लब्ध्वा हरौ  भक्तिमुपैति सिद्धिम् 51

भगवान् के प्यारे भक्त पाण्डवों के महाप्रयाण की इस परम पवित्र और मंगलमयी कथा को जो पुरुष श्रद्धा से सुनता है, वह निश्चय ही भगवान् की भक्ति और मोक्ष प्राप्त करता है ।।51।।

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायाम् प्रथमस्कन्धे पांडव स्वर्गारोहणम् नाम पञ्चदशोऽध्यायः ।।

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