सच्चे सत्संगी के लक्षण ।। Shrimad Bhagwat Katha – Swami Dhananjay Maharaj

0
13
जय श्रीमन्नारायण,


मित्रों, आइये आज सत्संगियों के लक्षण के विषय में चर्चा करते हैं, मुख्य रूप से सच्चे सत्संगी के चार लक्षण होते है ।।

१.पहला लक्षण ये होता है की सच्चा सत्संगी हमेशा पीछे बैठता है । कभी उसको ऐसा कोई आग्रह नहीं रहता है की मै आगे बैठू । सच्चे सत्संगी को किसी प्रकार की कोई अकड़ नहीं रहता है की ये मेरा जगह है, मैं तो यहीं बैठूँगा, जहा उसको जगह मिले वहीँ बैठकर वो सत्संग सुधा का पान करता है ।।

२.दूसरा लक्षण सत्संगी का यह होता है की सच्चा सत्संगी हमेशा दूसरों को ही मान-सम्मान देता है
और खुद अमानी बनकर रहता है । वह कभी भी मान-सम्मान पाने की इच्छा नहीं रखता ।।

३.तीसरा लक्षण सच्चे सत्संगी का यह होता है, कि वह सदा दूसरों को सत्संग की जगह पर स्थान देता है ।।

४.चौथा लक्षण ये बताया गया है, कि सच्चा सत्संगी कभी भी सेवा मे रूचि रखता है । जो सेवा उसे मिल जाए वह वही करता है । बताया गया है की हम सबको अपने जीवन का निरिक्षण करना चाहिए । हममे कितने सच्चे सत्संगी के लक्षण है इसका निरिक्षण हमें सदैव करते रहना चाहिए ।।
उड़िया बाबा कहते थे की सच्ची भक्ति आपने तभी की जब आपने अपने जीवन का निरिक्षण करके जीवन मे आये दोषों को दूर करने का प्रयत्न किया । जीवन मे कितनी ही मुसीबत आये पर एक परम प्रभु की याद सदैव बनी रहनी चाहिए ।।

भागवत में लिखा है –

वाग्गद्गदा द्रवते यस्य चित्तं, रुदत्यभिक्ष्णम् हसति क्वचिच्च ।।विल्लज्ज उद्गायति नृत्यते वा, मद्भक्तियुक्तो भुवनं पुनाति ।।

अर्थ:- (सच्चा सत्संगी – सत्संग सुनकर) जिसकी वाणी गद्गद हो जाय चित्त द्रवित हो जाय, कभी रोने लगे, कभी हँसने लगे । लोक-लाज छोड़कर कभी जोर-जोर से गाने लगे, कभी नाचने लगे । ऐसा मेरा भक्त त्रिभुवन को पावन करने वाला होता है ।।

“सत्संग करते-करते सच्चे सत्संगी को ईश्वर के भजन में ऐसे डूब जाना चाहिए की दुनियादारी नाम की कोई चीज ना रह जाये । भगवान की भक्ति मे सरावोर हो जाए और आनंद की तरंगों में सराबोर हो जाए ।।

भगवान नारायण और माता महालक्ष्मी सभी का नित्य कल्याण करें ।।

मित्रों, नित्य नवीन सत्संग हेतु कृपया इस पेज को लाइक करें – www.facebook.com/swamidhananjaymaharaj

www.dhananjaymaharaj.com
www.sansthanam.com
www.dhananjaymaharaj.blogspot.in
www.sansthanam.blogspot.in

जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम् ।।

।। नमों नारायण ।।

Previous articleहोठों में होंठ डालकर कीस करना कितना उचित है?
Next articleकपिल – देवहूति सम्वाद।।
भागवत प्रवक्ता- स्वामी धनञ्जय जी महाराज "श्रीवैष्णव" परम्परा को परम्परागत और निःस्वार्थ भाव से निरन्तर विस्तारित करने में लगे हैं। श्रीवेंकटेश स्वामी मन्दिर, दादरा एवं नगर हवेली (यूनियन टेरेटरी) सिलवासा में स्थायी रूप से रहते हैं। वैष्णव धर्म के विस्तारार्थ "स्वामी धनञ्जय प्रपन्न रामानुज वैष्णव दास" के श्रीमुख से श्रीमद्भागवत जी की कथा का श्रवण करने हेतु संपर्क कर सकते हैं।।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here