कुरु का जन्म एवं कुरुवंश का विस्तार।। Kuru Se Kuruvansh Ka Vistar.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, कुरुवंश के प्रथम राजा का नाम कुरु था। कुरु बड़े प्रतापी और बड़े तेजस्वी राजा थे। उन्हीं के नाम पर कुरुवंश की शाखाएं निकलीं और विकसित हुईं। एक से एक प्रतापी और तेजस्वी वीर कुरुवंश में पैदा हो चुके हैं। पांडवों और कौरवों ने भी कुरुवंश में ही जन्म लिया था। महाभारत का युद्ध भी कुरुवंशियों में ही हुआ था। किंतु कुरु कौन थे? एवं उनका जन्म किसके द्वारा और कैसे हुआ था? वेदव्यास जी ने इस पर महाभारत में प्रकाश में प्रकाश डाला है। आज हम भी उस कथा को आपके सामने रख रहे हैं जी की बहुत ही प्रेरणादायिनी है।।

हस्तिनापुर में एक प्रतापी राजा हुए। उस राजा का नाम सवरण था। वह सूर्य के समान तेजवान एवं प्रजा के पालक थे। वे स्वयं कष्ट उठा लेते थे पर प्राण देकर भी प्रजा के कष्टों को दूर करते थे। राजा सवरण भगवान सूर्यदेव के अनन्य भक्त थे। वह प्रतिदिन बड़ी ही श्रद्धा के साथ सूर्यदेव की उपासना किया करते थे। वे जब तक सूर्यदेव की उपासना नहीं कर लेते थे। तबतक वे जल का एक घूंट भी कंठ के नीचे नहीं उतारते थे।।

एक दिन राजा सवरण एक पर्वत पर आखेट के लिए गये। जब वह हाथ में धनुष-बाण लेकर पर्वत के ऊपर आखेट के लिए भ्रमण कर रहे थे। तभी उसे एक अतीव सुंदर युवती दिखाई पड़ी। वह युवती सुंदरता के सांचे में ढली हुई थी। उसके प्रत्येक अंग को विधाता ने बड़ी ही रुचि के साथ संवार-संवार कर बनाया था। सवरण ने आज तक ऐसी स्त्री देखने की कौन कहे, कल्पना तक नहीं की थी। राजा सवरण उस स्त्री पर आक्स्त हो गये और सबकुछ भूलकर अपने आपको उस पर निछावर कर दिया।।

वह उसके पास जाकर, तृषित नेत्रों से उसकी ओर देखता हुआ बोला, तन्वंगी, तुम कौन हो? तुम देवी हो, गंधर्व हो या किन्नरी हो? तुम्हें देखकर मेरा चित चंचल हो उठा। तुम मेरे साथ गंधर्व विवाह करके सुखोपभोग करो। पर युवती ने राजा सवरण की बातों का कुछ भी उत्तर नहीं दिया। वह कुछ क्षणों तक राजा सवरण की ओर देखती रही, फिर अदृश्य हो गई। युवती के अदृश्य हो जाने पर राजा सवरण अत्यधिक आकुल हो गये।।

वे धनुष-बाण फेंककर उन्मतों की भांति विलाप करने लगे। हे सुंदरी! तुम कहां चली गईं? जिस प्रकार सूर्य के बिना कमल मुरझा जाता है। और जिस प्रकार पानी के बिना पौधा सूख जाता है। उसी प्रकार मैं तुम्हारे बिना मैं जीवित नहीं रह सकता। तुम्हारे सौंदर्य ने मेरे मन को चुरा लिया है। तुम प्रकट होकर मुझे बताओ, कि तुम कौन हो और मैं तुम्हें किस प्रकार पा सकता हूं?।।

युवती पुन: प्रकट हुई। वह सवरण की ओर देखती हुई बोली, राजन! मैं स्वयं आप पर मुग्ध हूं। पर मैं अपने पिता की आज्ञा के वश में हूं। मैं सूर्यदेव की छोटी पुत्री हूं। मेरा नाम तप्ती है। जब तक मेरे पिता आज्ञा नहीं देंगे, मैं आपके साथ विवाह नहीं कर सकती। यदि आपको मुझे पाना है तो मेरे पिता को प्रसन्न कीजिए। युवती अपने कथन को समाप्त करके पुन: अदृश्य हो गई। राजा सवरण पुन: उन्मत्तों की भांति विलाप करने लगे।।

वे आकुल होकर पृथ्वी पर गिर पड़े और तप्ती-तप्ती की पुकार से पर्वत को ध्वनित करने लगे। राजा सवरण तप्ती को पुकारते-पुकारते धरती पर गिर पड़े और बेहोश हो गये। परन्तु जब उन्हें होश आया, तो पुन: तप्ती याद आ गयी और याद आया उसका कथन। यदि मुझे पाना चाहते हैं, तो मेरे पिता सूर्यदेव को प्रसन्न कीजिए। उनकी आज्ञा के बिना मैं आपसे विवाह नहीं कर सकती।।

राजा सवरण की रगों में विद्युत की तरंग-सी दौड़ उठी। वह मन ही मन सोचते रहे। वे तप्ती को पाने के लिए सूर्यदेव की आराधना करने लगे। उन्हें प्रसन्न करने में सबकुछ भूल गए। राजा सवरण सूर्यदेव की आराधना करने लगे। धीरे-धीरे सालों बीत गए और राजा तप करता रहा। आखिर सूर्यदेव के मन में सवरण की परीक्षा लेने का विचार उत्पन्न हुआ। रात का समय था चारों ओर सन्नाटा छाया हुआ था। सवरण आंखें बंद किए हुए ध्यानमग्न बैठे थे।।

सहसा उसके कानों में किसी की आवाज आयी, कि राजन! तूं यहां तप में संलग्न है। तेरी राजधानी आग में जल रही है। राजा फिर भी चुपचाप अपनी जगह पर बैठे रहे। उसके मन में रंचमात्र भी दुख पैदा नहीं हुआ। उसके कानों में पुन: दूसरी आवाज पड़ी, राजन! तेरे कुटुंब के सभी लोग आग में जलकर मर गए। किंतु फिर भी वह हिमालय-सा दृढ़ होकर अपनी जगह पर बैठा रहा। उसके कानों में पुन: तीसरी बार कड़क स्वर पड़ा, अरे मुर्ख! तेरी प्रजा अकाल की आग में जलकर भस्म हो रही है।।

तेरे नाम पर लोग थू-थू कर रहे हैं। फिर भी राजा दृढतापूर्वक तप में लगा रहा। उसकी दृढ़ता पर सूर्यदेव प्रसन्न हो गए और उन्होंने प्रकट होकर कहा। सवरण! मैं तुम्हारी दृढ़ता पर मुग्ध हूं। बोलो, तुम्हें क्या चाहिए? सवरण सूर्यदेव को प्रणाम करते हुए बोले! देव ! मुझे आपकी पुत्री तप्ती को छोड़कर और कुछ नहीं चाहिए। कृपा करके मुझे तप्ती को देकर मेरे जीवन को कृतार्थ कीजिए।।

सूर्यदेव ने प्रसन्नता की मुद्रा में उत्तर दिया, राजन! मैं सबकुछ जानता हूं। तप्ती भी तुमसे प्रेम करती है। तप्ती तुम्हारी है। सूर्यदेव ने अपनी पुत्री तप्ती का सवरण के साथ विधिवत विवाह कर दिया। सवरण तप्ती को लेकर उसी पर्वत पर रहने लगे। और राग-रंग में अपनी प्रजा को भी भूल गये। उधर राजा सवरण के राज्य में भीषण अकाल पद गया। धरती सूख गई, कुएं, तालाब और पेड़-पौधे भी सुख गए। प्रजा भूखों मरने लगी। लोग राज्य को छोड़कर दूसरे देशों में जाने लगे।।

किसी देश का राजा जब राग रंग में डूब जाता है, तो उसकी प्रजा का यही हाल होता है। सवरण का मंत्री बड़ा बुद्धिमान और उदार हृदय का था। वह राजा का पता लगाने के लिए निकला। वह घूमता हुआ उसी पर्वत पर पहुंचा। जिस पर राजा सवरण तप्ती के साथ निवास कर रहे थे। राजा सवरण के साथ तप्ती को देखकर बुद्धिमान मंत्री समझ गया कि उसका राजा स्त्री के सौंदर्य जाल में फंसा हुआ है। मंत्री ने बड़ी ही बुद्धिमानी के साथ काम लिया।।

मंत्री ने राजा सवरण को वासना के जाल से छुड़ाने के लिए अकाल की आग में जलते हुए मनुष्यों के चित्र बनवाए। वह उन चित्रों को लेकर राजा के सामने उपस्थित हुआ। उसने राजा सवरण से कहा, महाराज! मैं आपको चित्रों की एक पुस्तक भेंट करना चाहता हूं। मंत्री ने चित्रों की वह पुस्तक राजा की ओर बढ़ा दी। सवरण पुस्तक के पन्ने उलट-पलट कर देखने लगा। किसी पन्ने में मनुष्य पेड़ों की पत्तियां खा रहे थे। किसी पन्ने में माताएं अपने बच्चों को कुएं में फेंक रही थीं।।

साथ ही पुस्तक के किसी पन्ने में भूखे मनुष्य जानवरों को कच्चा मांस खा रहे थे। और किसी पन्ने में प्यासे मनुष्य हाथों में कीचड़ लेकर चाट रहे थे। राजा सवरण चित्रों को देखकर गंभीरता के साथ बोला, यह किस राजा के राज्य की प्रजा का दृश्य है? मंत्री ने बहुत ही धीमे और प्रभावपूर्वक स्वर में उत्तर दिया, उस राजा का नाम सवरण है। यह सुनकर राजा चकित हो गया। वह विस्मय भरी दृष्टि से मंत्री की ओर देखने लगा।।

मंत्री पुन: अपने ढंग से बोला, मैं सच कह रहा हूं महाराज! यह आपकी ही प्रजा का दृश्य है। प्रजा भूखों से मर रही है। चारों ओर हाहाकार मचा है। राज्य में न अन्न है, न पानी है। धरती की छाती फट गई है। महाराज! वृक्ष भी आपको पुकारते-पुकारते सूख गए हैं। यह सुनकर सवरण का हृदय कांप उठा। वह उठकर खड़ा हो गया और बोला, मेरी प्रजा का यह हाल है और मैं यहां मद में पड़ा हुआ हूं। मुझे धिक्कार है। मंत्री जी! मैं आपका कृतज्ञ हूं, आपने मुझे जगाकर बहुत अच्छा किया।।

सवरण तप्ती के साथ अपनी राजधानी पहुंचा। उसके राजधानी में पहुंचते ही जोरों की वर्षा हुई। सूखी हुई पृथ्वी हरियाली से ढक गई। अकाल दूर हो गया। प्रजा सुख और शांति के साथ जीवन व्यतीत करने लगी। वह राजा सवरण को परमात्मा और तप्ती को देवी मानकर दोनों की पूजा करने लगी। सवरण और तप्ती से ही कुरु का जन्म हुआ था। कुरु भी अपने माता-पिता के समान ही प्रतापी और पुण्यात्मा थे। युगों बीत गए हैं, किंतु आज भी घर-घर में कुरु एवं कुरुवंश को लोग जानते हैं।।

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जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्।।

।। नमों नारायण ।।

सत्संग ऐसे जीवन बदलता है।। Satsang Se Jivan Badal Jata Hai.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, किसी नगर में एक बूढ़ा चोर रहता था। सोलह वर्षीय उसका एक लड़का भी था। चोर जब ज्यादा बूढ़ा हो गया तो अपने बेटे को चोरी की विद्या सिखाने लगा। कुछ ही दिनों में वह लड़का चोरी विद्या में प्रवीण हो गया। दोनों बाप बेटा चोरी करते और आराम से जीवन व्यतीत करने लगे।।

एक दिन चोर ने अपने बेटे से कहा- देखो बेटा, साधु-संतों की बात कभी नहीं सुननी चाहिए। अगर कहीं कोई महात्मा उपदेश देता हो तो अपने कानों में उंगली डालकर वहां से भाग जाना, समझे। बेटे ने कहा- हां बापू, समझ गया। एक दिन लड़के ने सोचा, क्यों न आज राजा के घर पर ही हाथ साफ कर लूँ। ऐसा सोचकर उधर ही चल पड़ा।।

थोड़ी दूर जाने के बाद उसने देखा कि रास्ते में बगल में कुछ लोग एकत्र होकर खड़े हैं। उसने एक आते हुए व्यक्ति से पूछा, उस स्थान पर इतने लोग क्यों एकत्र हुए हैं? उस आदमी ने उत्तर दिया- वहां एक महात्मा उपदेश दे रहे हैं। यह सुनकर उसका माथा ठनका। इसका उपदेश नहीं सुनूंगा। ऐसा सोचकर अपने कानों में उंगली डालकर वह वहां से भागने लगा।।

जैसे ही वह भीड़ के निकट पहुंचा एक पत्थर से ठोकर लगी और वह गिर गया। उस समय महात्मा जी कह रहे थे। “कभी झूठ नहीं बोलना चाहिए। जिसका नमक खाएं उसका कभी बुरा नहीं सोचना चाहिए। ऐसा करने वाले को भगवान सदा सुखी बनाए रखते हैं।” ये दो बातें उसके कान में पड़ीं। वह झटपट उठा और कान बंद कर राजा के महल की ओर चल दिया।।

वहां पहुंचकर जैसे ही अंदर जाना चाहा कि उसे वहां बैठे पहरेदार ने टोका। अरे भाई कहां जा रहे हो? तथा तुम कौन हो? उसे महात्मा का उपदेश याद आया। “झूठ नहीं बोलना चाहिए।” चोर ने सोचा, आज सच ही बोल कर देखें। उसने उत्तर दिया- “मैं चोर हूं, चोरी करने जा रहा हूं। पहरेदार बोला- अच्छा जाओ। उसने सोचा राजमहल का नौकर होगा! मजाक कर रहा है।।

चोर सच बोलकर राजमहल में प्रवेश कर गया। एक कमरे में घुसा। वहां ढेर सारा पैसा तथा जेवर देख उसका मन खुशी से भर गया। एक थैले में सब धन भर लिया और दूसरे कमरे में घुसा। वहां रसोई घर था। अनेक प्रकार का भोजन वहां रखा था। वह खाना खाने लगा। खाना खाने के बाद वह थैला उठाकर चलने लगा कि तभी फिर महात्मा का उपदेश याद आया, ‘जिसका नमक खाओ, उसका बुरा मत सोचो।।

उसने अपने मन में कहा, खाना खाया उसमें नमक भी था। इसका बुरा नहीं सोचना चाहिए। इतना सोचकर, थैला वहीं रख वह वापस चल पड़ा। पहरेदार ने फिर पूछा- क्या हुआ, चोरी क्यों नहीं की? देखिए जिसका नमक खाया है, उसका बुरा नहीं सोचना चाहिए। मैंने राजा का नमक खाया है, इसलिए चोरी का माल नहीं लाया। वहीं रसोई घर में छोड़ आया। इतना कहकर वह वहां से चल पड़ा।।

उधर रसोइये ने शोर मचाया- पकड़ो, पकड़ों चोर भागा जा रहा है। पहरेदार ने चोर को पकड़कर दरबार में उपस्थित किया। राजा के पूछने पर उसने बताया कि एक महात्मा के द्धारा दिए गए उपदेश के मुताबिक मैंने पहरेदार के पूछने पर अपने को चोर बताया क्योंकि मैं चोरी करने आया था।।

राजन! मैंने आपका धन भी चुराया और आपका खाना भी खाया। जिसमें आपका नमक मिला हुआ था। इसीलिए आपके प्रति बुरा व्यवहार नहीं किया और धन छोड़कर जा रहा था। उसके उत्तर पर राजा बहुत खुश हुआ और उसे अपने दरबार में नौकरी दे दी। वह दो-चार दिन घर नहीं गया तो उसके बाप को चिंता हुई कि लगता है, बेटा राजा के यहाँ पकड़ा गया।।

लेकिन चार दिन के बाद लड़का आया तो बाप अचंभित रह गया। अपने बेटे को अच्छे वस्त्रों में देखकर। लड़का बोला- बापू, आप तो कहते थे कि किसी साधु संत की बात मत सुनो। लेकिन मैंने एक महात्मा के दो शब्द सुने और उसी के मुताबिक काम किया तो देखिए सच्चाई का फल। सच्चे संत की वाणी से अमृत बरसता है, आवश्यकता है तो सिर्फ आचरण में उतारने की है।।

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।। नमों नारायण ।।

सौ हाथ से कमा हजार हाथ से दान करें।। Daan Ki Mahima.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, अथर्ववेद में दान की बहुत बड़ी महिमा बतायी गयी है। कहा गया है, कि अगर आप सैकड़ों हाथों से धन कमाते हैं तो आपको सहस्रों हाथों से उदार मन से उसे दान करना चाहिये।।

शतहस्त समाहार सहस्त्रहस्त सं किर:।
कृतस्य कार्यस्य चहे स्फार्ति समायह।।

अर्थ:- हे मनुष्य! तू सौ हाथों वाला होकर धनार्जन कर और हजार हाथ वाला बनकर दान करते हुए समाज का उद्धार कर। समाज में समरसता बनाये रखने के लिये यह आवश्यक है। शक्तिशाली तथा समृद्ध वर्ग कमतर श्रेणी के लोगों की सहायता करें। परन्तु अब तो समाज कल्याण सरकार का विषय बना दिया गया है।।

जिससे लोग अब सारा दायित्व सरकार का मानने लगे हैं। धनी, शिक्षित तथा शक्तिशाली वर्ग यह मानने लगा है, कि अपनी रक्षा करना ही एक तरह से समाज की रक्षा है। इतना ही नहीं यह वर्ग मानता है, कि वह अपने लिये जो कर रहा है उससे ही समाज बचा हुआ है।।

जब धर्म की बात आती है तो सभी उसकी रक्षा की बात करते हैं। पर लालची लोगों का ध्येय केवल अपनी समृद्धि, शक्ति तथा प्रतिष्ठा को बचाना रह जाता है। कहने का अभिप्राय यह है, कि हमें केवल धर्म का विस्तार करनेवाले को ही श्रेष्ठ मानकर उसे ही दान करना चाहिये। साथ ही आचरण के आधार पर भी धार्मिकता पर हम अपनी राय बना सकते हैं।।

हमारा समाज त्याग पर आधारित सिद्धांत को मानता है। जबकि लालची लोग केवल इस सिद्धांत की दुहाई देते हैं पर चलते नहीं। समाज की सेवा भी अनेक लोगों का पारिवारिक व्यापार जैसा हो गया है। यही कारण है, कि वह अपनी संस्थाओं का पूरा नियंत्रण परिवार के सदस्यों को ही सौंपते हैं।।

साथ ही ऐसे लोग दावा यह करते हैं, कि पूरे समाज का हम पर विश्वास है। यह भी दिखाते हैं, कि उनका समाज में परिवार के बाहर किसी दूसरे पर उनका विश्वास नहीं है। हम जाति, धर्म, शिक्षा, क्षेत्र तथा कला में ऐसे लालची लोगों की सक्रियता पर दृष्टिपात करें तो पायेंगे कि उनका ढोंग वास्तव में समूचे समाज को बदनाम करनेवाला हैं।।

बहरहाल हमें अपने आचरण पर ध्यान रखना चाहिये। जहां तक हो सके धर्म, जाति, भाषा, कला, राज्यकर्म तथा क्षेत्र के नाम पर समाज को समूहों में बांटने वाले लोगों की लालची प्रवृत्ति देखते हुए उनसे दूरी बनाने के साथ ही अपना सहज कर्म करते रहना चाहिये।।

ऐसे एन.जी.ओ. आदि जो लोक कल्याण के नाम पर अरबों में दान लेते हैं और बिलकुल अन्यथा कार्य करते हैं। ऐसे लोगों से हमें सावधान रहने एवं सोंच-समझकर दान करने की आवश्यकता है। क्योंकि धर्म से ही समाज का कल्याण संभव है। फिर समाज रहेगा तभी तो हम राजनीति भी करेंगे।।

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।। नमों नारायण ।।

कामदा एकादशी व्रत कथा एवं विधि।। Kamda Ekadashi Vrat Katha And Vidhi.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, एक समय भगवान श्रीकृष्ण आनन्द से बैठे थे। तभी धर्मराज युधिष्ठिर आये और बड़े प्रेम से पूछा! हे भगवन्! मैं आपको कोटि-कोटि नमस्कार करता हूँ। अब आप कृपा करके चैत्र शुक्ल एकादशी के विषय में विस्तार से बताने की कृपा करें। भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे, कि हे धर्मराज! यही प्रश्न एक समय राजा दिलीप ने गुरु वशिष्ठजी से किया था। जो बात उन्होंने उस समय उनसे बताया था, वो सब मैं तुमसे कहता हूँ।।

राजन! प्राचीनकाल में भोगीपुर नामक एक नगर था। वहाँ पर अनेक ऐश्वर्यों से युक्त पुण्डरीक नाम का एक राजा राज्य करता था। भोगीपुर नगर में अनेक अप्सरा, किन्नर तथा गन्धर्व निवास करते थे। उनमें से एक जगह ललिता और ललित नाम के दो स्त्री-पुरुष अत्यंत वैभवशाली घर में निवास करते थे। उन दोनों में अत्यंत स्नेह था, यहाँ तक कि अलग-अलग हो जाने पर दोनों व्याकुल हो जाते थे।।

एक समय पुण्डरीक की सभा में अन्य गंधर्वों सहित ललित भी गान कर रहा था। गाते-गाते उसको अपनी प्रिय ललिता का ध्यान आ गया और उसका स्वर भंग होने के कारण गाने का स्वरूप बिगड़ गया। ललित के मन के भाव जानकर कार्कोट नामक नाग ने पद भंग होने का कारण राजा से कह दिया। तब पुण्डरीक ने क्रोधपूर्वक कहा कि तू मेरे सामने गाता हुआ अपनी स्त्री का स्मरण कर रहा है। अत: तू कच्चा माँस और मनुष्यों को खाने वाला राक्षस बनकर अपने किए कर्म का फल भोग।।

पुण्डरीक के श्राप से ललित उसी क्षण महाकाय विशाल राक्षस बन गया। उसका मुख अत्यंत भयंकर, नेत्र सूर्य-चंद्रमा की तरह प्रदीप्त तथा मुख से अग्नि निकलने लगी। उसकी नाक पर्वत की कंदरा के समान विशाल हो गई और गर्दन पर्वत के समान दिखने लगी। सिर के बाल पर्वतों पर खड़े वृक्षों के समान लगने लगे तथा भुजाएँ अत्यंत लंबी हो गईं। कुल मिलाकर उसका शरीर आठ योजन के विस्तार में हो गया। इस प्रकार राक्षस होकर वह अनेक प्रकार के दुःख भोगने लगा।।

जब उसकी प्रियतमा ललिता को यह वृत्तान्त मालूम हुआ तो उसे अत्यंत खेद हुआ और वह अपने पति के उद्धार का यत्न सोचने लगी। वह राक्षस अनेक प्रकार के घोर दुःख सहता हुआ घने वनों में रहने लगा। उसकी स्त्री उसके पीछे-पीछे जाती और विलाप करती रहती। एक बार ललिता अपने पति के पीछे घूमती-घूमती विन्ध्याचल पर्वत पर पहुँच गई, जहाँ पर श्रृंगी ऋषि का आश्रम था। ललिता शीघ्र ही श्रृंगी ऋषि के आश्रम में गई और वहाँ जाकर विनीत भाव से प्रार्थना करने लगी।।

उसे देखकर श्रृंगी ऋषि बोले कि हे सुभगे! तुम कौन हो और यहाँ किस लिए आई हो? ललिता बोली कि हे मुने! मेरा नाम ललिता है। मेरा पति राजा पुण्डरीक के श्राप से विशालकाय राक्षस हो गया है। इसका मुझको महान दुःख है। उसके उद्धार का कोई उपाय बतलाइए। श्रृंगी ऋषि बोले हे गंधर्व कन्या! अभी चैत्र शुक्ल एकादशी आने वाली है, जिसका नाम कामदा एकादशी है। इसका व्रत करने से मनुष्य के सब कार्य सिद्ध होते हैं।।

यदि तू कामदा एकादशी का व्रत कर उसके पुण्य का फल अपने पति को दो तो वह शीघ्र ही राक्षस योनि से मुक्त हो जाएगा। और राजा का श्राप भी अवश्यमेव शांत हो जाएगा। मुनि के ऐसे वचन सुनकर ललिता ने चैत्र शुक्ल एकादशी आने पर उसका व्रत किया और द्वादशी को ब्राह्मणों के सामने अपने व्रत का फल अपने पति को देती हुई भगवान से इस प्रकार प्रार्थना करने लगी – हे प्रभो! मैंने जो यह व्रत किया है इसका फल मेरे पतिदेव को प्राप्त हो जाए जिससे वह राक्षस योनि से मुक्त हो जाए।।

एकादशी का फल देते ही उसका पति राक्षस योनि से मुक्त होकर अपने पुराने स्वरूप को प्राप्त हुआ। फिर अनेक सुंदर वस्त्राभूषणों से युक्त होकर ललिता के साथ विहार करने लगा। उसके पश्चात वे दोनों विमान में बैठकर स्वर्गलोक को चले गए। वशिष्ठ मुनि कहने लगे कि हे राजन्! इस व्रत को विधिपूर्वक करने से समस्त पापों का नाश हो जाता है तथा राक्षस आदि की योनि भी छूट जाती है। संसार में इसके बराबर कोई और दूसरा व्रत नहीं है। इसकी कथा पढ़ने या सुनने से वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त होता है।।

कामदा एकादशी व्रत की विधि:- दशमी को एक समय ही भोजन करना चाहिये। हो सके तो अगले दिन एकादशी को निर्जला व्रत करे। नहीं तो एक वक्त फलाहार करके भी व्रत कर सकते हैं। सुबह स्नान करके सफ़ेद पवित्र वस्त्र पहनें और विष्णु देव की पूजा करें। भगवान विष्णु को पीले फूल, आम या खरबूजा, तिल, दूध और पेड़ा चढ़ाएं। ॐ नमो भगवते वासुदेवाये का जाप करें। हो सके तो रात्रि जागरण करे एवं रात्रि भर भजन कीर्तन करें। अगले दिन द्वादशी को किसी श्रेष्ठ वैष्णव ब्राह्मण को भोजन करवाकर दक्षिणा दें। तदुपरान्त स्वयं भोजन ग्रहण करे।।

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उषाकाल में जागना स्वास्थ्यवर्द्धक-सामवेद।। Pratah Jagne Ka Labh-Samveda.

मित्रों, सामवेद का स्पष्ट संदेश है, कि उषाकाल में जागना स्वास्थ्यवर्द्धक होता है। सामवेद के अनुसार “उस्त्रा देव वसूनां कर्तस्य दिव्यवसः।”अर्थात – उषा वह देवता है जिससे रक्षा के तरीके सीखे जा सकते हैं। “ते चित्यन्तः पर्वणापर्वणा वयम्।”अर्थात – हम प्रत्येक पर्व में तेरा चिंत्न करें। प्रातः काल उठने से न केवल विकार दूर होते हैं वरन् जीवन में कर्म करने के प्रति उत्साह भी पैदा होता है।।

अगर हम आत्ममंथन करें तो पायेंगे कि हमारे अंदर शारीरिक और मानसिक विकारों का सबसे बड़ा कारण ही सूर्योदय के बाद नींद से उठना है। हमारी समस्या यह नहीं है, कि हमें कहीं सही इलाज नहीं मिलता। बल्कि सच बात यह है, कि अपने अंदर विकारों के आगमन का द्वार सुबह देर से जगकर स्वयं ही खोलते हैं। बेहतर है, कि हम सुबह सैर करें या योगसाधना करें। व्यायाम करना भी बहुत अच्छा होता है।।

अच्छा काम करने के लिये सत्य ही शस्त्र होता है। एक अंग्रेज जिसका नाम जार्ज बर्नाड शॉ है, के अनुसार बिना बेईमानी के कोई भी धनी नहीं हो सकता। हमारे देश में अंग्रेजी राज व्यवस्था, भाषा, साहित्य, संस्कृति तथा संस्कारों ने जड़ तक अपनी स्थापना कर ली है। जिसमें छद्म रूप की प्रधानता हो गयी है। इसलिये अब यहां भी कहा जाने लगा है, कि सत्य, ईमानदारी, तथा कर्तव्यनिष्ठा से कोई काम नहीं बन सकता।।

Pratah Jagne Ka Labh-Samveda

दरअसल हमारे यहां समाज कल्याण अब राज्य का विषय वस्तु बन गया है। इसलिये धनिक लोगों ने इससे मुंह मोड़ लिया है। लोकतंत्र में राजपुरुष के लिये यह अनिवार्य है, कि वह लोगों में अपनी छवि बनाये रखें। इसलिये वह समाज में अपने आपको एक सेवक के रूप में प्रस्तुत कर कल्याण के ने नारे लगाते हैं। वह राज्य से प्रजा को सुख दिलाने का सपना दिखाते हैं। योजनायें बनती हैं, पैसा व्यय होता है पर नतीजा फिर भी वही ढाक के तीन पात रहता है।।

इसके अलावा गरीब, बेसहारा, बुजुर्ग, तथा बीमारों के लिये भारी व्यय होता है। जिसके लिये बजट में राशि जुटाने के लिये तमाम तरह के कर लगाये जाते हैं। इन करों से बचने के लिये धनिक राज्य व्यवस्था में अपने ही लोग स्थापित कर अपना आर्थिक साम्राज्य बढ़ात जाते हैं। उनका पूरा समय धन संग्रह और उसकी रक्षा करना हो गया है। इसलिये धर्म और दान उनके लिये महत्वहीन हो गया है।।

सामवेद में लिखा है, कि “ऋतावृधो ऋतस्पृशौ बहृन्तं क्रतुं ऋतेन आशाये।” अर्थात – सत्य प्रसारक तथा सत्य को स्पर्श करने वाला कोई भी महान कार्य सत्य से ही करते हैं। सत्य सुकर्म करने वाला शस्त्र है। “वार्च वर्थय।” अर्थात – सत्य वचनों का विस्तार करना चाहिए। तथा “वाचस्पतिर्मरवस्यत विश्वस्येशान ओजसः।” अर्थात – विद्वान तेज हो तो पूज्य होता है। कहने का अभिप्राय है, कि हमारे देश में सत्य की बजाय भ्रम और नारों के सहारे ही आर्थिक, राजकीय तथा सामाजिक व्यवस्था चल रही है।।

राज्य ही समाज का भला करेगा यह असत्य है। एक मनुष्य का भला दूसरे मनुष्य के प्रत्यक्ष प्रयास से ही होना संभव है। पर लोकतांत्रिक प्रणाली में राज्य शब्द निराकार शब्द बन गया है। करते लोग हैं, पर कहा जाता है, कि राज्य कर रहा है। अच्छा करे तो लोग श्रेय लेते हैं और बुरा हो तो राज्य के खाते में डाल देते हैं। इस एक तरह से छद्म रूप से ही हम अपने कल्याण की अपेक्षा करते हैं, जो कि अप्रकट है।।

Pratah Jagne Ka Labh-Samveda

भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान से समाज के परे होने के साथ ही विद्वानों का राजकीयकरण हो गया है। ऐसे में असत्य और कल्पित रचनाकारों को राजकीय सम्मान मिलता है और समाज की स्थिति यह है, कि सत्य बोलने वाले विद्वानों से पहले लोकप्रियता का प्रमाणपत्र मांगा जाता है। हम इस समय समाज की दुर्दशा देख रहे हैं। वह असत्य के मार्ग पर चलने के कारण ही है।।

परन्तु सत्य एक ऐसा शस्त्र है, जिससे सुकर्म किये जा सकते हैं। जिन लोगों को असत्य मार्ग सहज लगता है उनके लिये यह समझना मुश्किल है। पर तत्व ज्ञानी जानते हैं, कि क्षणिक सम्मान से कुछ नहीं होता। इसलिये वह सत्य के प्रचार में लगे रहते है। और कालांतर में इतिहास उनको अपने पृष्ठों में उनका नाम समेट ही लेता है।।

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जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्।।

।। नमों नारायण ।।

ब्रह्मादी देवो द्वारा स्तुति।। – रामचरितमानस।। Bhagwan Ki Stuti Devon Dwara.

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं,
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णम् शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तम् कमलनयनं योगिभिध्यार्नगम्यम्,
वंदे विष्णुम् भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।।

जय जय सुरनायक जन सुखदायक प्रनतपाल भगवंता,
गो द्विज हितकारी जय असुरारी सिंधुसुता प्रिय कंता।
पालन सुर धरनी अद्भुत करनी मरम न जानइ कोइ,
जो सहज कृपाला दीनदयाला करउ अनुग्रह सोइ।।

Bhagwan Ki Stuti Devon Dwara

जय जय अबिनासी सब घट बासी ब्यापक परमानंदा,
अबिगत गोतीतं चरित पुनीतं मायारहित मुकुंदा।
जेहि लागि बिरागी अति अनुरागी बिगत मोह मुनिबृंदा,
निसि बासर ध्यावहिं गुनगन गावहिं जयति सच्चिदानंदा।।

जेहिं सृष्टि उपाई त्रिबिध बनाई संग सहाय न दूजा,
सो करउ अघारी चिंत हमारी जानिअ भगति न पूजा।
जो भव भय भंजन मुनि मन रंजन गंजन बिपति बरूथा,
मन बच क्रम बानी छाङि सयानी सरन सकल सूरजूथा।।

सारद श्रुति सेषा रिषय असेषा जा कहुँ कोउ नहिं जाना,
जेहिं दीन पिआरे बेद पुकारे द्रवहु सो श्रीभगवउाना।।
भव बारिधि मंदर सब बिधि सुंदर गुनमंदिर सुखपुंजा,
मुनि सिध्द सकल सुर परम भयातुर नमत नाथ पद कंजा।।

जानि सभय सुरभूमि सुनि बचन समेत सनेह।।
गगनगिरा गंभीर भइ हरनि सोक संदेह।।

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नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्।।

।। नमों नारायण ।।

कलियुगी ज्ञानवीरों से बचने का उपाय संकीर्तन।। Kaliyugi Guanveero Ka Samadhan.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, जिस प्रकार वर्षाऋतु मेँ संध्या समय वृक्षोँ की चोटी पर इधर-उधर अनेक जुगुनू (खद्योत) दिखायी देते हैँ। जो प्रकाशमान दीपकों की भाँति टिमटिमाते अवश्य हैँ। परन्तु आकाश के ज्योतिष्क अर्थात सूर्य, चन्द्रमा एवं तारे नहीँ दिखायी पड़ते। उसी प्रकार कलियुग मेँ नास्तिक या दुष्ट लोग सर्वत्र दिखायी देते हैं। किन्तु वास्तविक आध्यात्मिक उत्थान हेतु वैदिक नियमों का पालन करने वालोँ का अभाव हो जाता है।।

ठीक उसी प्रकार कलियुग की तुलना जीवोँ की मेघाच्छादित ऋतु से की गयी हैं। इस युग मेँ वास्तविक ज्ञान तो सभ्यता की भौतिक उन्नति के द्वारा आच्छादित रहता है। किन्तु शुष्क चिन्तक, नास्तिक एवं तथाकथित धर्मनिर्माता जुगुनुओँ की भाँति प्रगट होते रहते हैँ। जबकि वैदिक नियमोँ या शास्त्रोँ का पालन करने वाले व्यक्ति इस युग के बादलोँ से प्रच्छन्न हो जाते हैँ।।

लोँगो को आकाश के असली ज्योतिष्को सूर्य, चन्द्र एवं नक्षत्रों से प्रकाश ग्रहण करना सीखना चाहिए, न कि जुगुनुओँ से। वस्तुतः जुगुनू रात्रि के अंधकार मेँ प्रकाश नहीँ दे सकता। जिस प्रकार वर्षाऋतु मेँ कभी कभी सूर्य, चन्द्र तथा तारे दिखायी पड़ जाते है। उसी प्रकार कलियुग मेँ भी यत्र तत्र भगवान के नामोँ का संकीर्तन करने वाले सच्चे भक्त भी दिखायी पड़ ही जाते हैँ।।

“हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम, हरे राम, राम राम हरे हरे।।”

अतः जो वास्तविक प्रकाश की खोज में हैँ। उन्हेँ शुष्क चिन्तकोँ एवं नास्तिको के प्रकाश की बाट न जोहकर नाम संकीर्तन रूपी यज्ञ का आश्रय लेना चाहिए। सतत भगवान के नामों का कीर्तन करते रहना चाहिये। और शबरी की तरह गुरु के वचन में दृढ़ विश्वास रखना चाहिये, कि एक दिन वो अवश्य आएगा।।

नामसंकीर्तनं यस्‍य सर्वपापप्रणाशनम्।
प्रणामो दु:खशमनस्‍तं नमामि हरिं परम्।। (श्रीमद्भागवत महापुराण)

अर्थात:- जिनके नाम का सुमधुर संकीर्तन सर्व पापों को नाश करने वाला है। तथा जिनको प्रणाम करना सकल दु:खों को नाश करने वाला है। उन सर्वोत्‍तम श्रीहरि के पादपद्मों में मैं प्रणाम करता हूँ। कलियुग में नाम संकीर्तन के अलावा जीव के उद्धार का अन्य कोई भी उपाय नहीं है बृहन्नारदीय पुराण में आता है-

हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलं।
कलौ नास्त्यैव नास्त्यैव नास्त्यैव गतिरन्यथा।।

कलियुग में केवल हरिनाम, हरिनाम और हरिनाम से ही उद्धार हो सकता है। हरिनाम के अलावा कलियुग में उद्धार का अन्य कोई भी उपाय नहीं है! नहीं है! नहीं है। कृष्ण तथा कृष्ण नाम अभिन्न हैं। कलियुग में तो स्वयं कृष्ण ही हरिनाम के रूप में अवतार लेते हैं। केवल हरिनाम से ही सारे जगत का उद्धार संभव है-

कलि काले नाम रूपे कृष्ण अवतार।
नाम हइते सर्व जगत निस्तार।। (चै॰ च॰ १.१७.२२)

पद्मपुराण में कहा गया है-

नाम: चिंतामणि कृष्णश्चैतन्य रस विग्रह:।
पूर्ण शुद्धो नित्यमुक्तोSभिन्नत्वं नाम नामिनो:।।

हरिनाम उस चिंतामणि के समान है जो समस्त कामनाओं को पूर्ण सकता है। हरिनाम स्वयं रसस्वरूप कृष्ण ही हैं तथा चिन्मयत्त्व (दिव्यता) के आगार हैं। हरिनाम पूर्ण हैं, शुद्ध हैं, नित्यमुक्त हैं। नामी (हरि) तथा हरिनाम में कोई अंतर नहीं है। जो कृष्ण हैं, वही कृष्ण का नाम है। जो कृष्ण का नाम है, वही स्वयं श्रीकृष्ण हैं। कृष्ण के नाम का किसी भी प्रामाणिक स्त्रोत के श्रवण से भी उत्तम होता है। परन्तु शास्त्रों के अनुसार कलियुग में हरे कृष्ण महामंत्र ही बताया गया है।।

कलियुग में इस महामंत्र का संकीर्तन करने मात्र से प्राणी मुक्ति का अधिकारी बन जाता है। कलियुग में भगवान की प्राप्ति का सबसे सरल किंतु प्रबल साधन उनका नाम-जप ही बताया गया है। श्रीमद्भागवत (१२.३.५१) का कथन है- यद्यपि कलियुग दोषों का भंडार है। तथापि इसमें एक बहुत बडा सद्गुण यह है, कि सतयुग में भगवान के ध्यान (तप) द्वारा, त्रेतायुग में यज्ञ-अनुष्ठान के द्वारा, द्वापरयुग में पूजा-अर्चना से जो फल मिलता था। कलियुग में वही पुण्यफल श्रीहरि के नाम-संकीर्तन मात्र से ही प्राप्त हो जाता है।।

राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने।। (श्रीरामरक्षास्त्रोत्रम्)

भगवान शिव ने कहा, हे पार्वती! मैं निरंतर राम नाम के पवित्र नामों का जप करता हूँ। साथ ही सदैव ही इस दिव्य ध्वनि में आनंद लेता हूँ। रामचन्द्र का यह पवित्र नाम भगवान विष्णु के एक हजार पवित्र नामों (विष्णुसहस्त्रनाम) के तुल्य है।।

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।। नमों नारायण ।।

मुक्ति अर्थात आत्मकल्याण की अवस्था।। Mukti Ka Samay.

कौमार आचरेत्प्राज्ञो धर्मान् भागवतानिह।
दुर्लभं मानुषं जन्म तदप्यध्रुवमर्थदम्।।

मित्रों, इस संसार मेँ मानव जन्म अति दुर्लभ है। इसके सहारे परमात्मा की भी प्राप्ति हो सकती है। किन्तु कोई यह नहीँ जान पाता कि इसका अन्त कब आने वाला है। अतः बुद्धिमान पुरुषोँ को चाहिए कि यह यौवन और वृद्धावस्था का विश्वास न करे और बाल्यावस्था से ही प्रभु-प्राप्ति के लिए साधन करेँ। प्रह्लाद चरित्र भी हमेँ यही सिखाता है, कि बाल्यावस्था से ईश्वर भजन मेँ लीन हो जाना चाहिए।।

माता-पिता को चाहिए कि अपनी संतानो मेँ धार्मिक संस्कार उत्पन्न करेँ। वृद्धावस्थावस्था मेँ देह की सेवा तो हो सकती है, किन्तु देव सेवा नहीँ। मानव शरीर की प्राप्ति भोगोपभोग के लिए नहीँ हुई है। अपितु भगवद् भजन द्वारा प्रभु-प्राप्ति के लिए है। शरीर के नाशवान होने पर भी मनुष्य जन्म अत्यन्त दुर्लभ है। क्योँकि यह जन्म इच्छित वस्तु दे सकता है। इस अनित्य और नाशवान शरीर से नित्य वस्तु भगवान की प्राप्ति हो सकती है।।

इसलिये यह मानव शरीर बड़ा ही कीमती है। जन्म मरण की वेदना सहता हुआ जीव इस शरीर में आया है। ईश्वर नित्य एवं शरीर अनित्य है। किन्तु इसी अनित्य शरीर से ही नित्य ईश्वर की प्राप्ति हो सकती है। अतः मानवदेह की भी बड़ी भारी महिमा है। कहा जाता है, कि कभी मनुष्य की आयु सौ वर्ष की होती थी। आज तो आधी आयु निद्रावस्था मेँ, चौथाई आयु बाल्यावस्था और कुमारावस्था मेँ बीत जाती है।।

बाल्यावस्था अज्ञान मेँ, कुमारावस्था खेलकूद मेँ बीत जाती है। वृद्धावस्था के वर्ष भी निरर्थक होते हैँ। क्योँकि शारीरिक क्षीणता के कारण वृद्धावस्था मेँ कुछ भी काम नहीँ हो पाता। यौवन के वर्ष कामभोग मेँ गुजर जाते हैँ। ऐसे में अब कितने वर्ष शेष रहे? और इन शेष वर्षो मेँ आत्मकल्याण की साधना कब और कैसे होगी? अतः मनुष्य को सदैव आत्मकल्याण के लिए प्रयासरत रहना चाहिए।।

क्योँकि —
“यावत् स्वस्थमिदं कलेवरगृहं यावच्च दूरे जरा।
यावच्चेन्द्रियशक्तिरप्रतिहता यावत्क्षयो नायुषः।।
आत्मश्रेयसि तावदेव विदुषा कार्यः प्रयत्नो महान्।
प्रोद्दीप्ते भवने तु कूपखननं प्रत्युद्यमः कीदृशः।।”

अर्थ:- जब तक यह शरीररुपी गृह स्वस्थ है, जब तक वृद्धावस्था का आक्रमण नहीँ हो पाया है। जब तक इन्द्रियों की शक्ति भी क्षीण नहीं हुई है। आयुष्य का क्षय भी नहीँ हुआ है। विद्वान मनुष्य को चाहिए, कि तब तक वह अपने कल्याण का प्रयत्न कर ले। अन्यथा घर मेँ आग लगने पर कुँआ खोदने से क्या लाभ?।।

“ततो यतेत कुशलः क्षेमाय भयमाश्रितः।।
शरीरं पौरुषं यावन्न विपद्यते पुष्कलम् ।।”

अर्थात:- हमारे मस्तिष्क को कई प्रकार के भय घेरे रहते हैँ। अतः यह शरीर जो भगवत् प्राप्ति के लिए पर्याप्त है। रोगग्रस्त बनकर मृत्युवश हो जाए, उसके पहले ही आत्मकल्याण करने का प्रयत्न बुद्धिमानोँ को कर लेना चाहिए।।

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कालीयनाग के दमन का रहस्य।। Kaliya Daman Ka Rahasy.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, कालिया नाग का फन तो मर्यादित था, किन्तु हमारे तो हजारोँ है। हमारे संकल्प-विकल्प फन ही हैँ। भगवान से प्रार्थना करेँ “हे प्रभु! मेरे मन के कालीय नाग का दमन करो, उस पर अपने चरण पधराओ।” कालीय नाग के मुख मे विष था, किन्तु हमारी तो एक-एक इन्द्रिय मेँ और मन मे भी विष भरा पड़ा है।।

हमारे राग द्वेष, विषय विकार आदि ही विष हैँ। जब तक इन्द्रियाँ वासना रूपी विष से भरी है। और जब तक ऐसी स्थिति रहेगी तब तक भक्ति नही हो सकती। इन्द्रियों में भरे विष को नष्ट करने के लिए सत्संग करना पड़ेगा। कालीयनाग ही इन्द्रियाध्यास है। यमुना ही भक्ति है और इसमें इन्द्रियाध्यास आने पर शुद्ध भक्ति नही हो सकती।।

“भोग और भक्ति आपस में शत्रु है” भक्ति के बहाने इन्द्रियों को भोग की तरफ ले जाने वाला मन ही कालीयनाग है। इन्द्रियों के साथ मन से भी विषयोँ का त्याग करने से ही भक्ति सिद्ध होती है। भक्ति मेँ विलासिता रूपी विषधर घुस जाने पर भक्ति नष्ट हो जाती है।।

“भक्तिमार्ग के आचार्य बल्लभाचार्य, रामानुजाचार्य, चैतन्य महाप्रभु आदि सभी परिपूर्ण वैरागी थे। बिना पूर्ण वैराग्य के भक्ति नहीँ हो सकती। भक्ति, ज्ञान वैराग्य की जननी है।” हमें अपनी इन्द्रियों से विष को निचोड़कर अपने आप को सत्संग मण्डली में भेजना है। जैसे कालीय नाग को प्रभु ने रमणक द्वीप भेजा था।।

अतः विषरहित इन्द्रियों को रमणक द्वीप रुपी सत्संग में भेजना चाहिये। वहाँ उन्हें भक्ति रस प्राप्त होगा। इन्द्रियों को भोगरस नहीं भक्ति रस से पोषित करना होगा। भक्ति द्वारा इन्द्रियोँ को सत्संग में रमण कराना होगा। भक्तिमार्ग पर चलकर इन्द्रिय पुष्प को प्रभु के चरणोँ मे अर्पित करना है।।

भोग से इन्द्रियों का क्षय होता है, तथा भक्ति से पोषण। जो आनन्द, योगी जन समाधि में प्राप्त करते है, वही आनन्द वैष्णवोँ को कृष्ण कीर्तन में मिलता है। कीर्तन करते समय दृष्टि प्रभु के चरणों में लगा रहे, वाणी कीर्तन करती रहे, मन स्मरण करता रहे और आँखे प्रभु का दर्शन करती रहे तभी जप सफल होगी।।

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जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्।।

।। नमों नारायण ।।

इन्सान की अन्तिम इच्छा।। Insan Ki Antim Ichchha.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, दक्षिण में विजयनगर राज्य के बड़े ही प्रतापी राजा श्रीकृष्णदेवराय राज करते थे। उनका भरा-पूरा परिवार था। उनकी माताजी बड़ी ही धार्मिक एवं श्रद्धालु थी। समय के साथ-साथ राजा कॄष्णदेव राय की माता बहुत वॄद्ध हो गई। एक बार वह बहुत बीमार पड गई। उन्हें लगा कि अब वे शीघ्र ही मर जाएँगी। उन्हें आम से बहुत ही लगाव था, इसलिए जीवन के अन्तिम दिनों में वे आम दान करना चाहती थीं।।

सो उन्होंने राजा से ब्राह्म्णों को आमों को दान करने की इच्छा प्रकट की। उनकी भावना थी कि अपनी कोई अत्यंत प्रिय वस्तु का दान करने से उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति होगी। सो कुछ दिनों बाद राजा की माता अपनी अन्तिम इच्छा की पूर्ति किए बिना ही मॄत्यु को प्राप्त हो गईं। उनकी मॄत्यु के बाद राजा ने सभी विद्वान ब्राह्म्णों को बुलाया और अपनी माँ की अन्तिम अपूर्ण इच्छा के बारे में बताया।।

कुछ देर तक चुप रहने के पश्चात ब्राह्म्ण बोले, यह तो बहुत ही बुरा हुआ महाराज, अन्तिम इच्छा के पूरा न होने की दशा में तो उन्हें मुक्ति ही नहीं मिल सकती। वे प्रेत योनि में भटकती रहेंगी। महाराज आपको उनकी आत्मा की शान्ति का उपाय करना चाहिये। तब महाराज ने उनसे अपनी माता की अन्तिम इच्छा की पुर्ति का उपाय पूछा। ब्राह्म्ण बोले, उनकी आत्मा की शांति के लिये आपको उनकी पुण्यतिथि पर सोने के आमों का दान करना चाहिये।।

राजा श्रीकृष्णदेवराय भी बड़े श्रद्धालु थे। अतः राजा ने मॉ की पुण्यतिथि पर कुछ ब्राह्म्णों को भोजन के लिय बुलाया और प्रत्येक को सोने से बने आम दान में दिए। परन्तु जब तेनाली राम को यह पता चला, तो वह तुरन्त समझ गया कि ब्राह्मण लोग राजा की सरलता तथा भोलेपन का फायदा उठा रहे हैं। सो उसने उन ब्राह्म्णों को पाठ पढाने की एक योजना बनाई। अगले दिन तेनाली राम ने ब्राह्म्णों को निमंत्रण-पत्र भेजा।।

उसमें लिखा था कि तेनाली राम भी अपनी माता की पुण्यतिथि पर दान करना चाहते हैं। क्योंकि वह भी अपनी एक अधूरी इच्छा लेकर मरी थीं। जब से उसे पता चला है कि उसकी माँ की अन्तिम इच्छा पूरी न होने के कारण प्रेत-योनी में भटक रही होंगी, वह बहुत ही दुःखी हैं और चाहते हैं, कि जल्दी ही उसकी भी मॉ की आत्मा को शान्ति मिले। ब्राह्म्णों ने सोचा कि तेनाली राम के घर से भी बहुत अधिक दान मिलेगा, क्योंकि वह भी शाही सलाहकार है।।

सभी ब्राह्म्ण निश्चित दिन तेनाली राम के घर पहुँच गए। ब्राह्म्णों को स्वादिष्ट भोजन परोसा गया। भोजन करने के पश्चात् सभी दान मिलने की प्रतीक्षा करने लगे। तभी उन्होने देखा कि तेनाली राम लोहे के सलाखों को आग में गर्म कर रहा है। पूछने पर तेनाली राम बोला, मेरी माँ फोडों के दर्द् से परेशान थीं। मॄत्यु के समय उन्हें बहुत तेज दर्द हो रहा था। इससे पहले कि मैं गर्म सलाखों से उनकी सिकाई करता, वह मर चुकी थी।।

अब उनकी आत्मा की शान्ति के लिए मुझे आपके साथ वैसा ही करना पडेगा। जैसी कि उनकी अन्तिम इच्छा थी। यह सुनकर ब्राह्म्ण बौखला गए। वे वहॉ से तुरन्त चले जाना चाहते थे। वे गुस्से में तेनाली राम से बोले कि हमें गर्म सलाखों से दागने पर तुम्हारी मॉ की आत्मा को शान्ति मिलेगी? नहीं महाशय्, मैं झूठ नहीं बोल रहा। यदि सोने के आम दान में देने से महाराज की मॉ की आत्मा को स्वर्ग में शान्ति मिल सकती है तो मैं अपनी मॉ की अन्तिम इच्छा क्यों नहीं पूरी कर सकता?।।

यह सुनते ही सभी ब्राह्म्ण समझ गए की तेनाली राम क्या कहना चाहते हैं। ब्राह्मण बोले, तेनाली राम, हमें क्षमा करो। हम वे सोने के आम तुम्हें दे देते हैं। बस तुम हमें जाने दो। तेनाली राम ने सोने के आम लेकर ब्राह्म्णों को जाने दिया। परन्तु एक लालची ब्राह्म्ण ने सारी बात राजा को जाकर बता दी। यह सुनकर राजा क्रोधित हो गए और उन्होनें तेनाली राम को बुलाया। राज बोले! तेनाली राम यदि तुम्हे सोने के आम चाहिए थे, तो मुझसे मॉग लेते।।

तुम इतने लालची कैसे हो गए कि तुमने ब्राह्म्णों से सोने के आम ले लिए? रामा बोले, महाराज, मैं लालची नहीं हूँ। अपितु मैं तो उनकी लालच की प्रवॄत्ति को रोक रहा था। यदि वे आपकी मॉ की पुण्यतिथि पर सोने के आम ग्रहण कर सकते हैं, तो मेरी मॉ की पुण्यतिथि पर लोहे की गर्म सलाखें क्यों नहीं झेल सकते? राजा तेनाली राम की बातों का अर्थ समझ गए। उन्होंने ब्राह्म्णों को बुलाया और उन्हें भविष्य में लालच त्यागने को कहा।।

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नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्।।

।। नमों नारायण ।।