वास्तविकता में धर्म किसे कहते हैं? Vastvik Dharm Kya Hai.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, असल में धर्म है क्या? आइये आज इस विषय पर चर्चा करते हैं। शास्त्र कहता है, कि “जीवनं वर्धनम् चापि धृयते सः धर्मः = जीवन एवं वर्धन को जो धारण करता है उसे ही धर्म कहते हैं।। Bhagwat Pravakta – Swami Dhananjay Maharaj. #What is the Actual religion

मित्रों, प्रकृति के वे नियम एवं सिद्धान्त जिनके आधार पर यह प्रकृति उत्पन्न हुई एवं चलती है। उन्ही नियमों ने प्रकृति को धारण कर रखा है। उसे ही हमारी संस्कृति एवं सभ्यता में ”धर्म” कहा गया है। ”धृ” धातु से उत्पन्न इस शब्द का अर्थ है = जो धारण करता है अब प्रश्न है, कि किसको? उत्तर है: जो हमारे अस्तित्व को धारण करे उसको।।

“जीवनं वर्धनम् चापि धृयते सः धर्मः” = जीवन एवं वर्धन को जो धारण करता है उसे ही धर्म कहते हैं। यह कभी अनेक नहीं होता, यह सार्वभौमिक, शाश्वत एवं सनातन है। पृथ्वी पर मनुष्य के समूहों ने इसे नाना नाम दिए या नहीं दिए। पर भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता ने इसे ‘धर्म’ कहा। यह जीवन का सनातन सत्य भी है और सबसे बड़ा विज्ञान भी यही है साथ ही यह मनुष्य -निर्मित नहीं है।।

Vastvik Dharm Kya Hai

यदि मनुष्य इस धर्म के अनुसार अपना जीवन-यापन करता है, तो उसका अस्तित्व सुरक्षित रहता है। साथ ही प्रतिपल प्रत्येक जीव का उत्थान एवं विकास होता है। इस पृथ्वी पर आजतक ऐसा कोई जीव नहीं हुआ जिसने, जाने या अनजाने या किसी भी प्रकार से ”धर्म” का उल्लंघन कर के कभी विकास किया हो। मनुष्य सहित समस्त जीव एवं अजैविक पदार्थ भी भाँति-भाँति के हैं। परन्तु प्रत्येक को अपने सिद्धान्तों के अनुसार इसका पालन करना ही होता है।। #What is the Actual religion

यह प्रकृति स्वभाव से ही विविधताओं को जन्म देती है। इस प्रकृति में आजतक एक समान किन्ही दो चीजों की सृष्टि नहीं हुई। सृष्टि का मूल “एक” है। पर सृष्टि “अनेक” है। “एक” ने “अनेक” रूप धारण किए हैं। जैविक विविधताएँ ही जीवन का आधार हैं। शत-प्रतिशत एकरूपता एवं सदृश्यता प्रकृति में सम्भव नहीं है।।

प्रकृति एवं जीवन सिखाते हैं:- प्रेम, सहयोग, पारस्परिकता एवं एकसूत्रता। इसका कम सभी विविधताओं को स्वीकारते हुए, सभी का सम्मान करते हुए एवं जिसको जैसा पोषण चाहिए उसको वैसा पोषण उपलब्ध कराते हुए आगे बढ़ते रहना है। जो अशक्त है उन्हें सशक्त करना है। एक-दूसरे का सहारा बनकर वृद्धि के पथ पर हमें आगे चलना है।।

Vastvik Dharm Kya Hai

कोई वंचित न हो और कोई शोषित न हो, यही धर्म का मार्ग है। यही “सनातन धर्म” है। सकल सृष्टि के लिए, इसे हम कुछ भी नाम दे सकते हैं या नाम नहीं भी दे सकते है। अतः हमें शास्त्रानुसार तपस्या और साधना करनी चाहिए। दानादि श्रेष्ठ कर्मों का आचरण करना चाहिए। उसके बाद सूत्र जो बचता है, उसका नाम “इंतजार” है।। #What is the Actual religion

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नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्।।

।। नमों नारायण ।।

श्रेष्ठ अथवा आर्य किसे कहा जा सकता है।। Arya Kise Kahte Hai.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, सहज भाषा में कहें तो जो लोग दूसरों का अभ्युदय देखकर प्रसन्न होते हैं। साथ ही जो लोग सदा हरिनाम परायण में ही लगे रहते हैं। ऐसे लोग ही श्रेष्ठ अथवा आर्य कहे जाते हैं। भगवान कि लीलामयी मूर्ति अत्यंत ही कीर्तनीय होती है। इसीलिए सन्तजन कहते हैं, कि जिसकी भी बुद्धि उन लीलामयी मूर्ति में लग जाती है, उनके सारे पाप एवं ताप स्वयं दूर हो जाते है।।

अत: जो कोई भी भगवान की मंगलमयी मंजुलकथा को भक्ति भाव से सुनता या सुनाता है। तथा जो लोग अनन्य भाव से भगवद्भजन-कीर्तन करते हैं, वो निश्चित ही परम भागवत होते हैं। श्रीमद भागवत जी कि कथा का श्रवण जो लोग सहज भाव से करते हैं उन्हें तो वे अंर्तमयी परम दयालु परमात्मा अपना परम पद ही दे देते हैं।।

संसार में पशुओं को छोड़कर अपने पुरूषार्थ का सार जानने वाला ऐसा कौन सा पुरूष होगा? जो संसार के सम्पूर्ण सुखों को देने वाले भागवत जी की अमृतमयी कथाओं में से किसी एक कथा का भी अपने कर्णपुटों से एक बार रसपान करके फिर उनकी ओर से अपना मन हटा ले, अर्थात् ऐसा कोई नहीं होगा। जो लोग दूसरों का अभ्युदय देखकर प्रसन्न होते हैं एवं सदा हरिनाम परायण में ही लगे रहते हैं। ऐसे ही लोग श्रेष्ठ अथवा आर्य कहे जाते हैं।।

Arya Kise Kahte Hai

जिन्होंने भगवान कि लीलाओं के गुणगान तथा श्रवण को ही, अपने कर्म का सार तथा अपने जीवन का रस मान लिया है। वे ही श्रेष्ठ भगवत भक्त होते हैं। यह एक और विचारणीय प्रश्न है, कि पृथ्वी कैसे लोगों के भार से पीडि़त रहती है? इस बात को भागवत जी में पृथ्वी देवी स्वयं ब्रम्हा जी से कहती है, कि जो भगवान नारायण की भक्ति से विमुख है तथा जो श्री भगवान के भक्तों की निंदा करते हैं। उन महापातक मनुष्यों का भार वहन करने में मैं सदा सर्वदा असमर्थ हूँ।।

जो व्यक्ति अपने धर्म व आचार से रहित तथा नित्य कर्म से भी हीन होता है। जिनकी बुद्धि में श्रद्धा के लिए कोई स्थान नहीं होता है। माता पृथ्वी कहती है, मैं उनके भार से सदा पीडि़त रहती हूं। जो लोग अपने माता-पिता गुरू, पत्नी, पुत्र एवं आश्रित वर्ग का पालन-पोषण नहीं करते हैं। उनका भी भार वहन करने में पृथ्वी सर्वथा असमर्थ होती है।।

जिनके मन में लेश मात्र भी दया नहीं होती एवं सदाचरण का भाव भी जिनके मन में नहीं होते। जो सदा ही गुरूजनों और देवताओं की निंदा करते हैं, जो मित्रद्रोही होते हैं और जो विश्वासघाती होते हैं। ऐसे लोगों के भार से भी पृथ्वी कहती हैं, मैं सदा पीडि़त रहती हूँ। जो लोग सदा ही जीवों की हिंसा करने वाले होते हैं। लोभी, गुरूद्रोही, मूढ मनुष्य देव पूजन को तथा यज्ञों को भंग करने वाले होते हैं। ऐसे व्यक्तियों के भार से भी पृथ्वी सदा ही पीडि़त रहती है।।

Arya Kise Kahte Hai

संसार के जो पापी लोग सदैव गौ-ब्राम्हण, देवता, वैष्णव, श्री हरिकथा और श्रीहरि भक्ति से द्वेश करते हैं, उनके भार से भी पृथ्वी सदा ही आक्रान्त रहती है। इसलिए एक सद्गृहस्थ मनुष्य को चाहिए कि प्रभू चिंतन तथा शास्त्राज्ञानुसार सत्कर्म करते हुए, दुष्टों से तथा दुष्टों के द्वारा खड़े किए जाने वाले उत्पातों और परेशानियों से निपटने के लिए हर वक्त तैयार रहें।।

हमें संतों, ब्राह्मणों, धर्म एवं धर्म पालकों तथा लाचारों की सेवा हेतु तत्पर रहें। हमें शास्त्रानुसार तपस्या और साधना करनी चाहिए दानादि श्रेष्ठ कर्मों का आचरण करना चाहिए। उसके बाद सूत्र जो बचता है “उसका नाम” इंतजार है। इसी इन्तजार के बाद जो फल प्राप्त होता है, उसे ही मुक्ति अथवा मोक्ष कहते हैं और यही मोक्ष का सहज मार्ग है।।

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जय जय श्री राधे ।।
जय श्रीमन्नारायण ।। 

भगवान कपिल द्वारा भक्ति का विवेचन।। Bhagwan Kapil Dwara Bhakti Ka Vivechan.

जय श्रीमन्नारायण, Shrimad Bhagwat Katha.

मित्रों, जैसा की आप सभी जानते हैं, कि माता देवहूति के प्रश्न और भगवान कपिल के द्वारा दिए गए उत्तर के विषय पर चर्चा चल रही है। तो आइये इस चर्चा को कुछ और आगे बढायें।।

श्रीमद्भागवत महापुराण – स्कन्ध तृतीय – अध्याय – २५ वाँ।।

माता देवहुति ने पूछा – देवहूतिरुवाच:-

काचित्त्वय्युचिता भक्तिः कीदृशी मम गोचरा।।
यया पदं ते निर्वाणमञ्जसान्वाश्नवा अहम्।।२८।।

अर्थात:- देवहुति ने कहा- भगवन्! आपकी समुचित भक्ति का स्वरूप क्या है? और मेरी जैसी अबलाओं के लिए कैसी भक्ति ठीक है, जिससे कि मैं सहज में ही आपके निर्वाण पद को प्राप्त कर सकूँ?।।२८।।

निर्वाणस्वरूप प्रभो! जिसके द्वारा तत्वज्ञान होता है और जो लक्ष्य को बेधनेवाले बाण के समान भगवान कि प्राप्ति करवाने वाला है, वह आपका कहा हुआ योग कैसा है और उसके कितने अंग हैं?। हे हरे! यह सब आप मुझे इस प्रकार समझाइये जिससे कि आपकी कृपा से मैं मन्दमति स्त्रीजाति भी इस दुर्बोध विषय को सुगमता से समझ सकूँ।।

भगवान मैत्रेय जी महात्मा विदुर जी से कहते हैं, विदुर जी! जिसके शरीर से उन्होंने स्वयं जन्म लिया था, उस अपनी माता का ऐसा अभिप्राय जानकर कपिलजी के ह्रदय में स्नेह उमड़ आया और उन्होंने प्रकृति आदि तत्वों का निरूपण करनेवाले शास्त्र का, जिसे सांख्य कहते हैं, उपदेश किया। साथ ही भक्ति के स्वरूप का विस्तार एवं योग का भी वर्णन किया।।

Bhakti Ka vivechan

श्रीभगवानुवाच:-
देवानां गुणलिङ्गानामानुश्रविककर्मणाम्।।
सत्त्व एवैकमनसो वृत्तिः स्वाभाविकी तु या।।३२।।

अर्थात:- श्री भगवान ने कहा- माता! जिसका चित्त एकमात्र भगवान में ही लग गया है, ऐसे मनुष्य की वेदविहित कर्मों में लगी हुई तथा विषयों का ज्ञान करवाने वाली इन्द्रियाँ (कर्मेन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियाँ – दोनों प्रकार की) की जो सत्वमुर्ती श्रीहरी के प्रति स्वाभाविकी प्रवृत्ति है, वही भगवान की अहैतुकी भक्ति है। यह मुक्ति से भी बढ़कर है, क्योंकि जठरानल जिस प्रकार से खाए हुए अन्न को पचाता है, उसी प्रकार यह भी कर्मसंस्कारों के भण्डार स्वरूप लिंग शरीर को तत्काल भस्म कर देती है।।

मेरी ही प्रशन्नता के लिए समस्त कार्य करनेवाले कितने ही बड़भागी भक्त, जो एक दुसरे से मिलकर प्रेमपूर्वक मेरे ही पराक्रमों की चर्चा किया करते हैं, मेरे साथ एकीभाव (सायुज्य मोक्ष) की भी इच्छा नहीं करते।।३४।।

कुछ लोग कहते हैं, की कहाँ लिखा है, की मूर्ति पूजन श्रेयस्कर होता है? तो ऐसे लोगों को भागवत जी का ये श्लोक जो स्वयं भगवान कपिल के द्वारा कही गयी है – देखना चाहिए।।

पश्यन्ति ते मे रुचिराण्यम्ब सन्तः प्रसन्नवक्त्रारुणलोचनानि।।
रूपाणि दिव्यानि वरप्रदानि साकं वाचं स्पृहणीयां वदन्ति।।३५।।

अर्थात:- हे माँ! वे साधुजन अरुण-नयन एवं मनोहर मुखारविन्द से युक्त मेरे परम सुन्दर और वरदायक दिब्य रूपों की झाँकी करते हैं और उनके साथ संभाषण भी करते हैं, जिसके लिए बड़े-बड़े तपस्वी भी लालायित रहते हैं।।३५।।

इस श्लोक का भावार्थ यही है, की भगवान की प्रतिमा को जिनका पूजन, अर्चन और वंदन करते हुए नित्य निहारा करो। क्योंकि ऐसा मेरे परम भक्तजन किया करते हैं, दुष्टजन ऐसा नहीं करते।।

और आगे कहते हैं, कि दर्शनीय अंग-प्रत्यंग, उदार हास-विलास, मनोहर चितवन और सुमधुर वाणी से युक्त मेरे उन रूपों की माधुरी में उनका मन और उनकी इन्द्रियाँ फँस जाती है। ऐसी मेरी भक्ति न चाहने पर भी उन्हें परमपद की प्राप्ति करा देती है।।

अविद्या की निवृत्ति हो जाने पर यद्यपि वे मुझ मायापति के सत्यादि लोकों की भोग संपत्ति, भक्ति की प्रवृत्ति के पश्चात् स्वयं प्राप्त होनेवाली अष्टसिद्धि अथवा वैकुण्ठ लोक के भगवदीय ऐश्वर्य की भी इच्छा नहीं करते, तथापि मेरे धाम में पहुँचने पर उन्हें ये सब विभूतियाँ स्वयं ही प्राप्त हो जाती है।।

Bhakti Ka vivechan

न कर्हिचिन्मत्पराः शान्तरूपे नङ्क्ष्यन्ति नो मेऽनिमिषो लेढि हेतिः।।
येषामहं प्रिय आत्मा सुतश्च सखा गुरुः सुहृदो दैवमिष्टम्।।३८।।

अर्थात:- जिनका एकमात्र मैं ही प्रिय, आत्मा, पुत्र, मित्र, गुरु सुहृद और इष्टदेव हूँ – वे मेरे ही आश्रय में रहनेवाले भक्तजन शान्तिमय वैकुण्ठधाम में पहुंचकर किसी प्रकार की इन दिब्य भोगों से रहित नहीं होते और न ही उन्हें मेरा कालचक्र ही ग्रस सकता है।।

माताजी! जो लोग इहलोक, परलोक और इन दोनों लोकों में साथ जानेवाले वासनामय लिंगदेह को तथा शरीर से सम्बन्ध रखनेवाले जो धन, पशु एवं गृह आदि पदार्थ हैं, उन सबको और अन्याय संग्रहों को भी छोड़कर अनन्य भक्ति से सब प्रकार से मेरा ही भजन करते हैं। उन्हें मैं मृत्युरूप संसार सागर से सहजता से पार कर देता हूँ।।

ये उपर के सारे व्याख्यान भगवान कपिल ने माता देवहुति को भक्ति के स्वरूप का वर्णन करते हुए दिया है। अब आप इस विषय को आसानी एवं सरलता से यहाँ श्री रामचरितमानस के अयोध्याकाण्ड में श्री राम-वाल्मीकि सम्वाद में देख सकते हैं:-

जिन्ह के श्रवन समुद्र समाना। कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना॥
भरहिं निरंतर होहिं न पूरे। तिन्ह के हिय तुम्ह कहुँ गुह रूरे॥
लोचन चातक जिन्ह करि राखे। रहहिं दरस जलधर अभिलाषे॥

निदरहिं सरित सिंधु सर भारी। रूप बिंदु जल होहिं सुखारी॥
तिन्ह कें हृदय सदन सुखदायक। बसहु बंधु सिय सह रघुनायक॥

जसु तुम्हार मानस बिमल हंसिनि जीहा जासु।
मुकताहल गुन गन चुनइ राम बसहु हियँ तासु॥

प्रभु प्रसाद सुचि सुभग सुबासा। सादर जासु लहइ नित नासा॥
तुम्हहि निबेदित भोजन करहीं। प्रभु प्रसाद पट भूषन धरहीं॥

सीस नवहिं सुर गुरु द्विज देखी। प्रीति सहित करि बिनय बिसेषी॥
कर नित करहिं राम पद पूजा। राम भरोस हृदयँ नहिं दूजा॥

चरन राम तीरथ चलि जाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं॥
मंत्रराजु नित जपहिं तुम्हारा। पूजहिं तुम्हहि सहित परिवारा॥

तरपन होम करहिं बिधि नाना। बिप्र जेवाँइ देहिं बहु दाना॥
तुम्ह तें अधिक गुरहि जियँ जानी। सकल भायँ सेवहिं सनमानी॥

सबु करि मागहिं एक फलु राम चरन रति होउ।
तिन्ह कें मन मंदिर बसहु सिय रघुनंदन दोउ॥

काम कोह मद मान न मोहा। लोभ न छोभ न राग न द्रोहा॥
जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया। तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया॥
सब के प्रिय सब के हितकारी। दुख सुख सरिस प्रसंसा गारी॥
कहहिं सत्य प्रिय बचन बिचारी। जागत सोवत सरन तुम्हारी॥
तुम्हहि छाड़ि गति दूसरि नाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं॥
जननी सम जानहिं परनारी। धनु पराव बिष तें बिष भारी॥
जे हरषहिं पर संपति देखी। दुखित होहिं पर बिपति बिसेषी॥
जिन्हहि राम तुम्ह प्रान पिआरे। तिन्ह के मन सुभ सदन तुम्हारे॥

स्वामि सखा पितु मातु गुर जिन्ह के सब तुम्ह तात।
मन मंदिर तिन्ह कें बसहु सीय सहित दोउ भ्रात॥

अवगुन तजि सब के गुन गहहीं। बिप्र धेनु हित संकट सहहीं॥
नीति निपुन जिन्ह कइ जग लीका। घर तुम्हार तिन्ह कर मनु नीका॥
गुन तुम्हार समुझइ निज दोसा। जेहि सब भाँति तुम्हार भरोसा॥
राम भगत प्रिय लागहिं जेही। तेहि उर बसहु सहित बैदेही॥
जाति पाँति धनु धरमु बड़ाई। प्रिय परिवार सदन सुखदाई॥
सब तजि तुम्हहि रहइ उर लाई। तेहि के हृदयँ रहहु रघुराई॥
सरगु नरकु अपबरगु समाना। जहँ तहँ देख धरें धनु बाना॥
करम बचन मन राउर चेरा। राम करहु तेहि कें उर डेरा॥

Bhakti Ka vivechan

आगे भगवान कपिल कहते हैं:-
नान्यत्र मद्भगवतः प्रधानपुरुषेश्वरात्।।
आत्मनः सर्वभूतानां भयं तीव्रं निवर्तते।।४१।।

अर्थात:- मैं साक्षात् भगवान हूँ, प्रकृति और पुरुष का भी प्रभु हूँ तथा समस्त प्राणियों की आत्मा हूँ। मेरे सिवा और किसी का आश्रय लेने से मनुष्य मृत्युरूप महाभय से छुटकारा नहीं पा सकता।।४१।।

मेरे भय से यह वायु चलती है, मेरे भय से ही सूर्य तप रहा है। मेरे भय से इन्द्र वर्षा करता है और अग्नि जलाती है तथा मेरे ही भय से मृत्यु अपने कार्य में प्रवृत्त होता है। योगीजन ज्ञान-वैराग्य युक्त भक्तियोग के द्वारा शान्ति प्राप्त करने के लिए मेरे निर्भय चरण कमलों का ही आश्रय लेते हैं।।

एतावानेव लोकेऽस्मिन्पुंसां निःश्रेयसोदयः।।
तीव्रेण भक्तियोगेन मनो मय्यर्पितं स्थिरम्।।४४।।

अर्थात:- संसार में मनुष्य के लिए सबसे बड़ी कल्याण प्राप्ति यही है, कि उसका चित्त तीव्र भक्तियोग के द्वारा मुझमें लगकर स्थिर हो जाय।।४४।।

इस उपर वाले श्लोक को इस दोहा से मिलाकर देखिये सेम टू सेम कॉपी है इस श्लोक का:-

दोहा:- जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु।।
बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु।।131।।

अर्थात:- जिसको कभी कुछ भी नहीं चाहिए और जिसका आपसे स्वाभाविक प्रेम है, आप उसके मन में निरंतर निवास कीजिए, वह आपका अपना घर है।।131।।

तो अब आज के लिए इतना ही, और मैं अपने अगले अंक में आप सभी मित्रों को उस ओर ले चलने का प्रयास करूँगा और भी कुछ अनूठी ज्ञान से भी अवगत करवायेंगे भगवान कपिल और मेरा प्रयास रहेगा की मैं उस विषय को सहज एवं सरल शब्दों में आपलोगों के सम्मुख रख सकूं।।

Bhakti Ka vivechan

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जय जय श्री राधे ।।
जय श्रीमन्नारायण ।। 

विजया एकादशी व्रत कथा एवं विधि।। Vijaya Ekadashi Vrat Katha in Hindi.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, एकादशी व्रत का माहात्म्य सुनने में अर्जुन को अपार हर्ष की अनुभूति हो रही थी। जया एकादशी की कथा श्रवण करने के बाद अर्जुन ने कहा- “हे पुण्डरीकाक्ष! फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है? तथा उसके व्रत का क्या विधान है? कृपा करके मुझे इसके सम्बंध में भी विस्तारपूर्वक बताएं।।”

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- “हे अर्जुन! फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम विजया है। इसके व्रत के प्रभाव से मनुष्य को विजयश्री मिलती है। इस विजया एकादशी के माहात्म्य के श्रवण एवं पठन से सभी पापों का अंत हो जाता है। एक बार देवर्षि नारद ने जगत पिता ब्रह्माजी से कहा- “हे ब्रह्माजी! आप मुझे फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की विजया एकादशी व्रत का माहात्म्य एवं उस व्रत की विधि बताने की कृपा करें।।”

नारद जी का यह प्रश्न सुनकर ब्रह्माजी ने कहा- “हे पुत्र! विजया एकादशी व्रत का उपवास पूर्व कृत पाप तथा वर्तमान के सभी पापों को नष्ट करने वाला है। इस एकादशी का विधान मैंने आज तक किसी से नहीं कहा परंतु तुम्हें बताता हूँ। यह उपवास करने वाले सभी मनुष्यों को विजयश्री प्रदान करती है। अब श्रद्धापूर्वक कथा का श्रवण करो।।

विजया एकादशी व्रत कथा।। Vijaya Ekadashi Vrat Katha in Hindi.

ब्रह्माजी ने कहा – भगवान श्रीराम को जब चौदह वर्ष का वनवास मिला। तब वह अपने भ्राता लक्ष्मण तथा माता सीता सहित पंचवटी में निवास करने लगे। उस समय महापापी रावण ने माता सीता का हरण कर लिया। इस दुःखद घटना से श्रीरामजी तथा लक्ष्मणजी अत्यंत दुखी हुए और सीताजी की खोज में वन-वन भटकने लगे।।

जंगल-जंगल घूमते हुए, वे मरणासन्न जटायु के पास जा पहुंचे। जटायु ने उन्हें माता सीता के हरण का पूरा वृत्तांत सुनाया। फिर भगवान श्रीराम की गोद में प्राण त्यागकर स्वर्ग की तरफ प्रस्थान किया। कुछ आगे चलकर श्रीराम एवं लक्ष्मण की सुग्रीव के साथ मित्रता हो गई और वहां उन्होंने बालि का वध किया। श्रीराम भक्त हनुमानजी ने लंका में जाकर माता सीता का पता लगाया और माता से श्रीरामजी तथा महाराज सुग्रीव की मित्रता का वर्णन सुनाया।।

वहां से लौटकर हनुमानजी श्रीरामचंद्रजी के पास आए और अशोक वाटिका का सारा वृत्तांत कह सुनाया। सब हाल जानने के बाद श्रीरामचंद्रजी ने सुग्रीव की सहमति से वानरों तथा भालुओं की सेना सहित लंका की तरफ प्रस्थान किया। समुद्र किनारे पहुंचने पर श्रीरामजी ने विशाल समुद्र को घड़ियालों से भरा देखकर लक्ष्मणजी से कहा- “हे लक्ष्मण! अनेक मगरमच्छों और जीवों से भरे इस विशाल समुद्र को कैसे पार करेंगे?”

प्रभु श्रीराम की बात सुनकर लक्ष्मणजी ने कहा- भ्राताश्री! आप पुराण पुरुषोत्तम आदिपुरुष हैं। आपसे कुछ भी विलुप्त नहीं है। यहां से आधा योजन दूर कुमारी द्वीप में वकदाल्भ्य मुनि का आश्रम है। वे अनेक शास्त्रों के ज्ञाता हैं। वे ही आपकी विजय का उपाय बता सकते हैं। अपने छोटे भाई लक्ष्मणजी के इन वचनों को सुनकर श्रीरामजी वकदाल्भ्य ऋषि के आश्रम में गए और उन्हें प्रणाम कर एक ओर बैठ गए।।

अपने आश्रम में श्रीराम को आया देख महर्षि वकदाल्भ्य ने पूछा- हे श्रीराम! आपने किस प्रयोजन से मेरी कुटिया को पवित्र किया है? कृपा कर अपना प्रयोजन कहें प्रभु! मुनि के मधुर वचनों को सुन श्रीरामजी ने कहा- हे ऋषिवर! मैं सेना सहित यहां आया हूँ और राक्षसराज रावण को जीतने की इच्छा से लंका जा रहा हूं। कृपा कर आप समुद्र को पार करने का कोई उपाय बताएं। आपके पास आने का मेरा यही प्रयोजन है।।

महर्षि वकदाल्भ्य ने कहा- हे राम! मैं आपको एक अति उत्तम व्रत बतलाता हूं। जिसको करने से आपको विजयश्री अवश्य ही प्राप्त होगी। भगवान श्रीराम ने पूछा – यह कैसा व्रत है मुनिश्रेष्ठ! जिसे करने से समस्त क्षेत्रों में विजय की प्राप्ति होती है? जिज्ञासु हो श्रीराम ने जब पूछा तो इस पर महर्षि वकदाल्भ्य ने कहा- हे श्रीराम! फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की विजया एकादशी का उपवास करने से आप अवश्य ही समुद्र को पार कर लेंगे और युद्ध में भी आपकी विजय होगी।।

विजया एकादशी व्रत की विधि।। Vijaya Ekadashi Vrat Vidhi in Hindi.

हे मर्यादा पुरुषोत्तम! इस एकादशी व्रत के उपवास के लिए दशमी के दिन स्वर्ण, चांदी, तांबे या मिट्टी का एक कलश बनाएं। उस कलश को जल से भरकर तथा उस पर पंच पल्लव रखकर उसे वेदिका पर स्थापित करें। उस कलश के नीचे सतनजा अर्थात मिले हुए सात अनाज और ऊपर जौ रखें। उसके उपर भगवान विष्णु की स्वर्ण की प्रतिमा स्थापित करें।।

अगले दिन एकादशी को स्नानादि से निवृत्त होकर धूप, दीप, नैवेद्य, नारियल आदि से भगवान श्रीहरि का पूजन करें। वह सारा दिन भक्तिपूर्वक कलश के सम्मुख ही व्यतीत करें। रात्रि में भी उसी तरह बैठे रहकर जागरण करें। द्वादशी के दिन किसी नदी या तलाब के किनारे स्नान आदि से निवृत्त होकर उस कलश को ब्राह्मण को दे दें।।

हे दशरथनंदन! यदि आप इस व्रत को सेनापतियों के साथ करेंगे तो अवश्य ही विजयश्री आपका वरण करेगी। मुनि के इन वचनों को सुनकर भगवान श्रीरामचंद्रजी ने विधिपूर्वक विजया एकादशी का व्रत किया। इसी व्रत के प्रभाव से भगवान श्रीराम ने राक्षसों के ऊपर विजय प्राप्त की। हे अर्जुन! जो मनुष्य इस व्रत को विधि-विधान के साथ पूर्ण करेगा, उसकी दोनों’ लोकों में विजय होगी। श्री ब्रह्माजी ने नारदजी से कहा था- जो इस व्रत का माहात्म्य श्रवण करता है या पढ़ता है उसे वाजपेय यज्ञ के फल की प्राप्ति होती है।।”

Vijaya Ekadashi Vrat Katha

विजया एकादशी व्रत का माहात्म्य।। Vijaya Ekadashi Vrat Mahatmya in Hindi.

भगवान विष्णु का किसी भी रूप में पूजन मानव मात्र की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करता है। श्रीराम हालांकि स्वयं विष्णु के अवतार थे, अपितु अपनी लीलाओं से समस्त प्राणियों को सन्मार्ग दिखाने के लिए ही उन्होंने विष्णु भगवान के निमित्त इस व्रत को किया। विजय की इच्छा रखने वाला इस उपवास को करके अनंत फल का भागी बन सकता है।।

।। नारायण सभी का कल्याण करें ।।
जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम् ।।
जय जय श्री राधे ।।
जय श्रीमन्नारायण ।।

क्या सिर्फ भारत में ही जाति व्यवस्था थी?।। Jati Vyavastha Ka Jahar.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, यह लेख बहुत ही बड़ा है। आप धैर्य के साथ एक बार अवश्य पढ़ें। साथ ही इसे अपनों के साथ शेयर भी करें। हमारे यहाँ एक शब्द अक्सर बोला जाता है “कास्ट” क्या आप जानते हैं, कास्ट और जाती में क्या अंतर है तथा यह शब्द कहाँ से और क्यों लाया गया है? मैं बताता हूँ। कुछ समय पहले की बात है, रोम साम्राज्य में एक नियम था की छोटी कास्ट वाले लोगों को कोई भी कंकड़ फेंक कर मार सकता था।।

ऐसे लोग वहाँ पर सार्वजनिक रूप से स्नान नहीं कर सकते थे। मतलब कि जिन नदियों और कुओं से आम जनता जल का उपयोग करती थी, वहां पर यह लोग नहीं जा सकते थे। हम भारतीयों के साथ एक समस्या रही है अंग्रेजों के आने के बाद से। हम लोग स्वभाव से खोजी नहीं रह गए हैं। हम चाहते हैं, कि हमें कोई बैठे-बैठे तथ्य बताएं और उन तथ्यों को हम घोट कर पी जायें।।

लगभग विगत 100 वर्षों से भारतवर्ष के साथ एक बड़ा ही अमानवीय व्यवहार किया गया है। भारत के अंदर जाति व्यवस्था को कलंक बताकर भारत को पिछड़ा हुआ साबित करने की कोशिश की जाती रही है। आज भी विदेशी मीडिया में हर हफ्ते कोई ना कोई ऐसा समाचार छपता रहता है, जिसमें किसी भारतीय दलित के साथ अमानवीय व्यवहार का वर्णन होता है। साथ ही हमारे भारतीय जाति व्यवस्था को दोष दिया जाता है।।

लेकिन क्या 7000 वर्ष पुराना हमारा भारतीय समाज इतना भी सक्षम नहीं था, कि वह जाति व्यवस्था जैसी कुरीति को अपने भीतर से निकाल कर सके? इस विषय पर हमने अलग से विस्तृत लेख लिख रखा है। आप हमारे वेबसाईट पर पढ़ सकते हैं। खैर आज के इस लेख का यह विषय नहीं है इस कारण आज के मुख्य विषय पर ही हम इस लेख में बात करेंगे।।

हमारे भारतीय समाज में अंग्रेजों के साथ ही इस कुकृत्य का आरम्भ हुआ था, जो कि निंदनीय है। परन्तु भारतवर्ष के साथ-साथ यह कुरीति जिसे जाति व्यवस्था कहते हैं, पूरे विश्व में फैली हुई थी। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हमारे पास उपलब्ध है। किंतु केवल भारतीय समाज को ही ही जाति व्यवस्था के कलंक से दूषित किया जाता रहा है। आपने सुना होगा, कि जब भी आप किसी सरकारी नौकरी के लिए आवेदन करते हैं, तब अक्सर आपको आरक्षण देने के लिए पूछा जाता है, कि आप की कास्ट क्या है?

हम भारतीय कास्ट का अर्थ जाति से लेते हैं। और अब यह दोनों एक दूसरे के पर्यायवाची बन चुके हैं। लेकिन जाति और कास्ट दोनों शब्दों के अभिप्राय में जमीन और आसमान जितना अंतर है। सबसे पहले यह देखते हैं, कि इन दोनों शब्दों में अंतर क्यों है? अंग्रेजी वर्णमाला का अक्षर “कास्ट” पुर्तगाली शब्द “कस्टा” से लिया गया है। इस शब्द का इस्तेमाल स्पेनिश लोग उन लोगों के लिए करते थे जिनको वह जीत लेते थे। और उन्हें अपने दास अथवा गुलामों की तरह उपयोग करते थे।।

17वीं और 18वीं शताब्दी में अमेरिका और फिलीपींस के जिन इलाकों पर स्पेन का नियंत्रण था, उन सभी इलाकों के लोगों को “सोसाइडा डी कास्टों” कहा जाता था। अगर हिंदी में कहें तो इन शब्दों का अर्थ “नीच” होता है। भारतवर्ष में जो जाति शब्द था उसका अर्थ उनके कामों अर्थात उसके कार्यक्षेत्र से लिया जाता था। आज भी जब आपसे कोई पूछता है, कि आपकी जाति क्या है? तो आप कहते हैं कुम्हार (उदहारण के लिये)।।

इसका मतलबहै, कि आपके पूर्वजों का जो कार्य था उसने आपकी जाति निर्धारित की। लेकिन कास्ट शब्द की उत्पत्ति ही दूसरों को नीचा देखने के उद्देश्य से किया गया था। यह एक बहुत ही बड़ा अंतर है और स्पष्ट है। लेकिन आश्चर्य है, कि हम भारतीय यह स्पष्ट अंतर भी समझ नहीं पाते। अब दूसरे विषय पर चर्चा करते हैं। भारत में क्या सच में जाति व्यवस्था दुनिया की सबसे खराब व्यवस्था थी? यह प्रश्न है।।

मित्रों, कम से कम अमेरिकन लोग तो यही मानते हैं। आपको हैरानी होगी इस बात का प्रमाण अमेरिका के हाई स्कूल के एक पाठ्यपुस्तक है, जिसका नाम “वर्ल्ड सिविलाइजेशन: ग्लोबल एक्सपीरियंस” उसमें भारतीय जाति व्यवस्था का इस प्रकार वर्णन किया गया है। उसके पाठ्यक्रम इस प्रकार हैं। “भारतीय जाति व्यवस्था एक प्रकार का ऐसा सामाजिक संगठन है, जो आधुनिक पश्चिमी समाज के सर्वाधिक महत्वपूर्ण सिद्धांतों का उल्लंघन करता है” ।।

स्पष्ट है, यह लोग भारत को पश्चिमी सिद्धांतों के आधार पर ढालना चाहते हैं। जिन तथ्यों पर भारत उन्हें अलग दिखता है, उसको वह या तो असामाजिक घोषित कर देते हैं या फिर अमानवीय। हम भारतीय लोग उनके पालतू जानवर बनकर हर एक बात को स्वीकार कर लेते हैं। गोरी चमड़ी वालों का भारतीयों पर ऐसा असर हुआ है, कि हम भारतीयों ने जाति व्यवस्था की यूरोप में बनाई हुई अवधारणा को स्वीकार कर लिया है।।

लेकिन क्या कभी आपने स्वयं से यह प्रश्न किया है? यूरोप के उच्च नागरिकों के शौचालय से जो लोग मानव मल को खाली करते थे उनके साथ कैसा व्यवहार किया जाता था? जो लोग मानव के शवों और और पशुओं के शवों को ठिकाने लगाते थे उनके साथ कैसा व्यवहार किया जाता था? क्या यूरोप के समृद्ध लोग इन लोगों को अपने साथ बैठाते थे? या फिर इन लोगों के साथ वैवाहिक संबंध बनाए जाते थे? उत्तर है, नहीं। कदापि नहीं।।

स्पष्ट रूप से किसी भी समाज में ऐसे लोग जरूर होते हैं जो मृत देह उठाने का कार्य करते हों। सातवीं शताब्दी में कैथी स्टीवर्ट ने अपनी पुस्तक में यूरोप में रह रहे इस तरह के समूह का वर्णन कर चुके हैं। लेकिन यह तो 300 साल पहले की बात है। आप कह सकते हैं, कि भारत में तो जाती व्यवस्था बहुत साल पुरानी हैं। अगर आप ऐसा सोच रहे हैं तो निम्नांकित पंक्तियाँ आप के लिए हैं।।

मित्रों, अधिकतर यूरोप वासी अपने आप को रोमन साम्राज्य का वंशज बताते हैं। रोमन साम्राज्य में एक प्रथा थी जिसका नाम “उनएयरलिक्काइट था। इसमें उन लोगों को बड़ा अपमान का सामना करना होता था। जो चमड़े का काम किया करते थे, जिन्हें जल्लाद कहा जाता था। जो लोग मानव मल साफ किया करते थे या फिर कोई भी ऐसा काम करते थे जो सभ्य मानव नहीं करना चाहेगा।।

आपको जानकर आश्चर्य होगा, कि जिस रोम साम्राज्य की महानता का वर्णन यूरोप वासी करते हुए नहीं थकते। उस रोम साम्राज्य में नियम था, कि छोटी कास्ट वाले लोगों को कोई भी कंकड़ फेंक कर मार सकता था। यह लोग सार्वजनिक रूप से स्नान नहीं कर सकते थे। मतलब कि जिन नदियों और कुओं से आम जनता जल का उपयोग करती थी वहां पर यह लोग नहीं जा सकते थे।।

यहाँ तक की यह लोग अपने मृत परिजनों का भी गुपचुप तरीके से अन्त्येष्टि क्रिया करने के लिए बाध्य होते थे। कब्रिस्तान में भी इन्हें जगह नहीं दी जाती थी। ये लोग शराब भी नहीं पी सकते थे। यदि कोई उच्च कुल का व्यक्ति इनके संपर्क में आ जाय तो उसका भी बहिष्कार कर दिया जाता था। यहाँ तक की उसकी राजनीतिक, व्यापारिक और आर्थिक अधिकार भी छीन लिए जाते थे।।

इस प्रकार यह तय कर दिया गया था, कि जो नीच लोग हैं, वह नीच ही बने रहे। यह व्यवस्था पुरे यूरोप में बड़े लंबे समय तक चलती रही। आपको एक घटना बताता हूं। 1680 के दशक में उत्तरी जर्मन शहर में एक नीच कुल की औरत प्रसव पीड़ा से तड़प रही थी। दाई जिसे यूरोप में मिडवाइफ कहा जाता है उसने यह कहकर उस घर में प्रवेश करने से मना कर दिया, कि ऐसा करके उसके ऊंचे कुल को ठेस पहुंचेगी और अन्ततः वह औरत मर गई।।

बीसवीं शताब्दी तक ऐसे लोग यूरोप में मानव मल मूत्र को भी अपने हाथ से ही साफ़ किया करते थे। भारत में ऐसे काम करने वालों को भंगी कहा जाता है। यूरोप में उन्हें गोंगो फार्मर्स कहा जाता था। अब जरा भारत और यूरोप में एक ही प्रकार के काम करने वाले लोगों की स्थिति देखिए। यूरोप में “गोग फार्मर्स” केवल रात में ही आ या जा सकते थे। इसलिए इन्हें नाइटमैन भी कहा जाता था।।

रात को यह लोग उच्च वर्गों के लोगों के घरों में आते उनके शौचालय को हाथ से साफ करते और शहर से दूर ले जाकर वह मल मूत्र डाल देते। वे केवल शहर के बाहर ही रह सकते थे और दिन के समय उनका शहर में प्रवेश वर्जित था। यदि किसी नाइटमैन को शहर में शहर में घूमता पाया जाता तो उसके खिलाफ दंडात्मक कार्यवाही की जाती थी।।

युरोप में 1920 में एक पुस्तक प्रकाशित की गई जिसका नाम “प्रिंसिपल ऑफ सोशियोलॉजी” था। इस पुस्तक में यूरोप के अंदर कठोर और सख्त कास्ट व्यवस्था का विस्तृत वर्णन किया गया है। इसमें लिखा गया है, कि हर वह व्यक्ति जो छोटे काम करता था जैसे अनाज काटना, उस अनाज को भंडार गृह तक पहुंचाना, ब्रेड बनाना, कसाई, सूअर पालने वाला, शराब विक्रेता, सार्वजनिक स्नानघर की भट्ठियों में कोयला डालने वाला आदि-आदि इन लोगों को पीढ़ी दर पीढ़ी एक ही काम करने के लिए विवश किया जाता था।।

अगर ऐसे लोग शाही फरमान भी हासिल कर लें, तब भी इनकी कास्ट नहीं बदली जा सकती थी। जो कार्य पिता करते थे, वही कार्य करने के लिए इन्हें विवश किया जाता था। चर्च भी इन्हें इनकी दासता से मुक्त नहीं करा सकता था। यूरोपियन लोग रक्त की शुद्धता का बहुत ध्यान रखते थे। इस कारण वैवाहिक संबंध केवल उन्हीं लोगों से बनाए जा सकते थे जो लोग उन्हीं के जैसे हो।।

लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी की भारतीय लोगों ने पहली बार अलग-अलग वर्गों का अनुभव तब किया जब भारत की जनगणना में अंग्रेजों द्वारा जाति को आधार बनाया गया। हर किसी व्यक्ति को रोक-रोककर बताया गया, कि वह फलां जाति का है। भारत में जाति का अर्थ कार्य से लिया जाता था। भारतीय व्यवस्था के अनुसार व्यक्ति का कार्य बदलते ही उसकी जाति बदल जाती थी। जैसे संत रविदास जो चमार से ब्राह्मण बन गए थे। चोखमला कनकदास जैसे महान संत भी इसी श्रेणी में आते हैं।।

आज भी भारतीय समाज इन लोगों का एक ब्राह्मण की भांति सम्मान प्राप्त है। महाराष्ट्र के मराठा पेशवा ब्राह्मण थे जो बाद में क्षत्रिय बन गए। चंद्रगुप्त मौर्य जिन्हें अखण्ड भारत का महान सम्राट माना जाता है वह भी छोटी जाति से आते थे। भारत में जातियों कि कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं थी। यह कार्य पर आधारित थी। आपने देखा होगा, कि एक क्षेत्र में कोई उपनाम किसी और जाति को संबोधित करता है और दूसरे क्षेत्र में वही उपनाम किसी अन्य जाति को।।

जैसे लखनऊ क्षेत्र में उपाध्याय वे लोग सरनेम के रूप में लगाते हैं जो फसल और बाग बगीचों का कार्य करते हैं। दिल्ली के आसपास के क्षेत्रों में उपाध्याय वे लोग अपने सरनेम के रूप में लगाते हैं जो एक प्रकार का ब्राह्मण का कार्य करते हैं। यह एक स्पष्ट उदाहरण है, कि भारत में जातियां किस प्रकार असंतुलित थी जिसका कोई बड़ा प्रभाव भारतवर्ष पर नहीं पड़ता था।।

इसके उलट यूरोप में धन के आधार पर वर्गों का बंटवारा किया गया था। जबकि भारत में सबसे अधिक सम्मानजनक वर्ग ब्राह्मणों को माना जाता है, जो भारत में सबसे गरीब होते थे। भारतवर्ष में अधिकतर भूमि अथवा जमीन शुदों, क्षत्रियों और वैश्यों के नियंत्रण में थी। यूरोप में कोई भी छोटे कुल का व्यक्ति आपके साथ ना तो बैठ सकता था और ना ही उस घर में प्रवेश कर सकता था जिस घर में आप रहते हों।।

शिक्षा की बात तो छोड़ ही दीजिए। जबकि भारत में 18वीं शताब्दी में कई ऐसे विद्यालय थे जहां पर शुद्र बच्चे ब्राह्मणों से अधिक संख्या में पढ़ते थे। इसका स्पष्ट विवरण “द ब्यूटीफुल ट्री” नाम की पुस्तक में दिया गया है। यहाँ तो कुछ लोग कर्ण और द्रोणाचार्य के राजनैतिक प्रसंग को ही मुख्य आधार के रूप में प्रस्तुत करते नहीं थकते। आप सोचिए अट्ठारह सौ शताब्दी में भी भारत जाति व्यवस्था को कितना स्पष्ट रूप से देखता था।।

इसी समय यूरोप का सिस्टम कितना कठोर बन चुका था। जबकि भारतीय संस्कृति में किसी भी बड़े-से-बड़े ब्राह्मण के घर भी बिना शूद्रों के प्रवेश के विवाह की विधि संपन्न नहीं हो सकती ठ या आज भी है। परन्तु जब भारतीय जनगणना अंग्रेजों द्वारा की गई तब जाति का आधार मुख्य रखा गया। साथ ही यह तय किया गया, कि हर व्यक्ति को यह पता चले, कि वह किस जाति का है। अंग्रेजों के लिए भारतीय समाज को तोड़ना इससे आसान हो गया था।।

इसका परिणाम आज हमारे सामने है। आज हम भारतीय जाति व्यवस्था को बड़ा कठोर बना चुके हैं। दलित लोग स्वयं किए गए अत्याचारों की कहानियां बताते फिरते हैं। ऊंचे लोग खुद को बहादुर वीर बताते हुए घूमते हैं। वे दोनों ही नहीं जानते, कि भारतीय समाज में केवल 200 वर्ष पहले ही उनकी स्थिति किस प्रकार की थी? भारतीय समाज के साथ एक बहुत बड़ा दुष्कर्म किया गया है। जिसके फलस्वरूप ऐसी सोच पैदा हुई है, कि हम एक भारतीय एकजुट नहीं हो पाते। बल्कि जातियों के तौर पर अलग-अलग बटें हुए हैं।।

परन्तु यूरोपियन लोग चलाक थे, जब उन्हें महसूस हुआ, कि इस प्रकार एक निश्चित वर्ग का शोषण करना अब संभव नहीं हो पाएगा। तभी वह आधुनिकिकरण की बीन बजाने लगे। भारतीयों को क्योंकि शुरू में ऐसी मानसिकता में डाला गया, कि वे कमजोर और पिछड़े हुए हैं। और फिर 1947 के बाद भारत में शिक्षा का प्रचार प्रसार इतने गंदे तरीके से किया गया, कि भारतीय लोग आधुनिकिकरण को स्वीकार ही नहीं कर पाए।।

इसका नतीजा यह है, कि भारत में प्रत्येक वर्ष आंतरिक तौर पर या धर्म के आधार पर या फिर किसी जाति के आधार पर संघर्ष होता रहता है। पश्चिमी देश ये जानते थे कि जिसका बीज वो 300 साल पहले वो बो देंगे उसी की फसल ये भारतीय पीढ़ी-दर-पीढ़ी काटेंगे। हम भारतीय स्वयं को एक अलग ही नजरिए से देखते हैं। बल्कि आज तो अचानक से ऐसे लोगों की बाढ़ आ गई है, जो स्वयं को को दलित चिंतक बताते हैं और दलितों पर हो रहे अत्याचारों की कहानियां पेश करते हैं।।

मैं आशा करता हूं, कि इस लेख को पढने वाले कभी-न-कभी कोई-न-कोई हमारे दलित भाई जरूर होंगे। अगर ऐसा है, तो मैं आपसे पूछता हूँ, क्या आपको कभी किसी मंदिर में प्रवेश से रोका गया है? क्या आपको कभी जाति आधार पर भोजन देने से रोका गया है?

यह सच है, कि आज भारत में जातियों के आधार पर भेदभाव होता है, परन्तु ऐसे अब बहुत कम लोग बचें हैं। ऐसे जो लोग बचें भी हैं, उसमें क्या उनका दोष है? क्या हमने कभी खुद यह पता करने की कोशिश की है, कि आखिर यह भेदभाव कहां से शुरू हुआ?

Bhagwat Pravakta Swami Dhananjay Maharaj

source:

BOOK THE BEAUTIFUL TREE
BOOK WORLD CIVILIZATION: GLOBAL EXPERIANCE
BOOK डीफाइल्ड ट्रेड एंड सोशल आउटकास्ट- ऑनर एंड रिचुअल पॉल्यूसन
BOOK PRINCIPAL OF SOCIOLOGY

नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

 
 
जय जय श्री राधे ।।
जय श्रीमन्नारायण ।। 

राजा भोज का कालीदास से दस सवाल।। Das Mahatvapurn Prashn.

मित्रों, पहले के राजा-महाराजा लोग अपने मंत्रियों से कभी-कभी बहुत गहरे ज्ञान की चर्चा किया करते थे। इसी प्रकार की एक चर्चा राजा भोज ने अपने समय के महान बुद्धिमान एवं महान कवि तथा अपने नवरत्नों में से एक महाकवि कालिदास जी से किया था। एक समय राजा भोज ने बहुत ही महत्वपूर्ण 10 प्रश्न पूछे थे।।

आइए आज हम उन 10 प्रश्नों की चर्चा करते हैं, जिसके उत्तर में महाकवि कालिदास जी ने राजा भोज को क्या उत्तर दिया था? उसके विषय में चर्चा करते हैं।।

राजा भोज का प्रथम प्रश्न:- संसार में भगवान की “सर्वश्रेष्ठ रचना” क्या है?
महाकवि कालिदास जी का उत्तर:- दुनिया में भगवान की सर्वश्रेष्ठ रचना ”मां” है।।

राजा भोज का द्वितीय प्रश्न:- संसार का सर्वश्रेष्ठ फूल कौन सा है?
महाकवि कालिदास जी का उत्तर:- संसार का सर्वश्रेष्ठ फूल “कपास का फूल” है।।

राजा भोज का तृतीय प्रश्न:- संसार का सर्वश्र॓ष्ठ सुगंध या इत्र (Perfume) कौन सी है?
महाकवि कालिदास जी का उत्तर:- संसार का सर्वश्र॓ष्ठ सुगंध वर्षा से भीगी मिट्टी की सुगंध है।।

राजा भोज का चतुर्थ प्रश्न:- संसार की सर्वश्र॓ष्ठ मिठास कौन सी है?
महाकवि कालिदास जी का उत्तर:- संसार की सर्वश्रेष्ठ मिठास “वाणी की” मिठास होती है।।

राजा भोज का पञ्चम प्रश्न:- संसार का सर्वश्रेष्ठ दूध किसका होता है?
महाकवि कालिदास जी का उत्तर:- संसार का सर्वश्रेष्ठ दूध “मां का” दूध होता है।।

राजा भोज का षष्ठ प्रश्न:- संसार में सबसे काला क्या होता है?
महाकवि कालिदास जी का उत्तर:- संसार में सबसे काला “कलंक” होता है।।

राजा भोज का सप्तम प्रश्न:- संसार में सबसे भारी क्या होता है?
महाकवि कालिदास जी का उत्तर:- संसार में सबसे भारी “पाप” होता है।।

राजा भोज का अष्टम प्रश्न:- संसार में सबसे सस्ता क्या है?
महाकवि कालिदास जी का उत्तर:- संसार में सबसे सस्ता “सलाह” है।।

राजा भोज का नवम् प्रश्न:- संसार में सबसे महंगा क्या है?
महाकवि कालिदास जी का उत्तर:- संसार में सबसे महंगा “सहयोग” है।।

राजा भोज का दशम प्रश्न:- संसार में सबसे “कड़वा” क्या होता है?
महाकवि कालिदास जी का उत्तर:- संसार में सबसे कड़वा “सत्य” होता है।।

महाकवि कालिदास जी के इन उत्तरों को सुनकर के राजा भोज अत्यन्त गदगद हो गए और अपने सिंहासन से उठकर गले से लगा लिया। और गर्व से कहने लगे कि सचमुच आप महान हैं। हम आपके जैसे विद्वान की छत्रछाया में अत्यंत सुरक्षित हैं। इसमें कोई संशय नहीं है।।

नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

 
 
जय जय श्री राधे ।।
जय श्रीमन्नारायण ।। 

सबकी एक दिन यही गति होगी।। Yahi Gati Hogi.

मैंने हर रोज जमाने को रंग बदलते देखा है।।
उम्र के साथ जिंदगी को ढंग बदलते देखा है।।

वो जो चलते थे तो शेर के चलने का गुमान होता था।।
उनको भी पाँव उठाने के लिए सहारे को तरसते देखा है।।

जिनकी नजरों की चमक देख सहम जाते थे लोग।।
उन नजरों को भी बरसात की तरह रोते देखा है।।

जिनके हाथों के जरा से इशारे से टूट जाते थे पत्थर।।
उन हाथों को भी पत्तों की तरह थर थर काँपते देखा है।।

जिनकी आवाज़ से कभी बिजली के कड़कने का भ्रम होता था।।
उन होठों पर भी जबरन चुप्पी का ताला लगा देखा है।।

ये जवानी! ये ताकत! ये दौलत! सब कुदरत की अमानत है।।
इनके रहते हुए भी इंसान को बेजान पड़ा हुआ देखा है।।

अपने आज पर इतना ना इतराना मेरे प्यारे दोस्त।।
वक्त की धारा में अच्छे अच्छों को भी मजबूर हुआ देखा है।।

कर सको तो प्यार से रह लो, किसी को खुश कर लो।।
दूसरों को दुःख देते तो हजारों को देखा है।।

। नारायण सभी का कल्याण करें ।।

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जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्।।

जय जय श्री राधे।।
जय श्रीमन्नारायण।।

आवश्यकता के अनुसार यंत्रों का प्रयोग एक वैदिक रीति!! Yantra Prayog Vidhi.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, जैसा की मैं पहले भी बता चूका हूँ, की कुछ नम्बर्स ऐसे होते हैं, जिनको सही जगह पर बिठाकर सही रूप देने पर, किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति हो सकती है! हमारे देश में कुछ अनुभवी व्यक्ति हुए, जिन्होंने इस प्रकार की अपनी अनुभूतियाँ हमें हमारे कल्याणार्थ प्रदान किया!!
 
अगर आप पुछेंगें की उस अनुभवी व्यक्ति का नाम क्या था, तो शायद ये, बताना मुश्किल होगा ! लेकिन इन अनुभूतियों को आज भी बहुत लोग हैं, जिन्होंने प्रयोग में लिया है, और सत्य प्रमाणित किया है! लेकिन केवल भगवान अथवा किसी यंत्र के भरोसे बैठ जाना, और ये सोंच लेना की हमने तो यंत्र पहन लिया अब मेरा तो काम हो ही जायेगा, मुर्खता होगी! क्योंकि – उद्योगिनं हि पुरुष सिंहमुपैती लक्ष्मी – उद्योगी अर्थात परिश्रमी व्यक्ति को हि लक्ष्मी भी वरण करती है, कायरों को वो भी नकार देती है!!
 
यंत्र प्रभावी होते हैं, लेकिन परिश्रमी पुरुष को हि ये भी सहायता करते हैं, अत: हमें मेहनत जी जान से करना है, और इन विद्याओं का भी सहारा लेना है, तभी हमें पूर्ण सफलता मिलेगी! इन विद्याओं को आध्यात्मिक व्यक्तियों द्वारा दबाया जाता है, क्योंकि लोग कभी-कभी इन विद्याओं का दुरुपयोग करने लगते हैं!!
 
लेकिन आप कभी-भी इन विद्याओं का सही समय एवं सही जगह पर नेक नियत से प्रयोग करेंगें, तो सफलता निश्चित ही आपके कदम चूमेगी!!
 
वैसे ये यंत्र सफलता प्राप्ति यंत्र है, अगर आपको किसी सेवा क्षेत्र के कार्य में, बार-बार असफलता मिलती है, तो आप इस यंत्र का निर्माण काली स्याही से, भोजपत्र पर, शनिवार के दिन!! ॐ क्लीं महाकाल्यै नम: मम कार्यं सिद्धं कुरु कुरु हूँ फट !! इस मन्त्र का जप करते हुए, एकांत स्थान में बैठकर निर्मित करें!!
 
यंत्र तैयार होने के बाद, इसकी पूजा षोडशोपचार से करें, और उपरोक्त मन्त्र का १००८ बार जप करें! फिर इस यंत्र को, ताबीज में भर कर, पुरुष अपने दाहिनी भुजा पर, एवं स्त्री अपनी बायीं भुजा पर, काले रंग के धागे में बांधे! और फिर किसी भी तरह की परीक्षा अथवा प्रतियोगिता में निश्चिन्त होकर बैठे! सफलता निश्चित रूप से उसकी कदम चूमेगी, इस यंत्र के प्रभाव से!!
 
इन यंत्रों का कोई पूर्ण प्रमाण तो नहीं मिलता, लेकिन यह गुरु-शिष्य की श्रवण परंपरा से, आदिकाल से चली आ रही है! तथा नियम पूर्वक सच्ची भावना से धारण करने पर, कारगर भी होती है!!
आप मेरे साथ जुड़ने के लिए, मेरी वेबसाईट पर आयें – Sevashra Sansthan 
मेरे पेज पर भी आप मेरे साथ जुड़ सकते हैं, तथा इस प्रकार की या किसी भी तरह की अन्य जानकारी ले सकते हैं ! इसलिए मेरे पेज पर आयें – Swami Ji Maharaj
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!! नमों नारायणाय !!

देवदर्शन एवं प्रणाम करने की सही विधि।। Dev Darshan Ki Vidhi.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, आपको सुख हो या दुख, हर पल भगवान का ध्यान करने पर अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। इस प्रकार किया गया भगवान का चिंतन हमारे कई जन्मों पापों को नष्ट कर देता है।।

आजकल की भागती-दौड़ती जिंदगी में बहुत कम लोग हैं, जिन्हें विधिवत भगवान की पूजा-आराधना का समय मिलता होगा। वैसे तो पुण्यार्जन हेतु लगभग सभी लोग भगवान की पूजा के लिए मन्दिर जाते हैं । परन्तु कुछ लोग केवल हाथ जोड़कर प्रार्थना भर कर लेते हैं।।

जबकि भगवान के सामने साष्टांग प्रणाम करने पर आश्चर्यजनक शुभ फल कि प्राप्ति होती है। भगवान को साष्टांग प्रणाम करना केवल एक परंपरा या बंधन मात्र नहीं है। इस परंपरा के पीछे बहुत ही गहरा विज्ञान भी है जो हमारे शारीरिक, मानसिक और वैचारिक विकास से जुड़ा हुआ है।।

साष्टांग प्रणाम का सबसे बड़ा फायदा यह है, कि इससे हमारे शरीर का व्यायाम हो जाता है। साष्टांग प्रणाम की विधि यह है, कि आप भगवान के सामने बैठ जायें और फिर धीरे-धीरे पेट के बल जमीन पर लेट जायें। दोनों हाथों को सिर के आगे ले जाकर उन्हें जोड़कर नमस्कार करें। इस प्रणाम से हमारे सारे जोड़ थोड़ी देर के लिए तन जाते हैं।।

इससे स्ट्रेस (तनाव) दूर होता है इसके अलावा झुकने से सिर में रक्त प्रवाह बढ़ता है। ये रक्त प्रवाह स्वास्थ्य और आंखों के लिए अत्यन्त लाभप्रद होता है। प्रणाम करने की यही विधि सबसे ज्यादा फायदेमंद है। इसका धार्मिक महत्व काफी गहरा है, ऐसा माना जाता है, कि इससे हमारा अहंकार कम होता है।।

भगवान के प्रति हमारे मन में समर्पण का भाव आता है। अहंकार स्वत: ही धीरे-धीरे खत्म हो जाता है। जब भी हम भगवान के समक्ष तन और मन से समर्पण कर देते हैं। फिर यही अवस्था निश्चित ही हमारे मन को असीम शान्ति प्रदान करती हैं। इसके अलावा इस प्रकार प्रणाम करने से हमारे जीवन की कई समस्यायें स्वत: ही समाप्त हो जाती हैं।।

।। नारायण सभी का कल्याण करें ।।

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जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्।।

जय जय श्री राधे।।
जय श्रीमन्नारायण।।

कर्मफल का भोग टलता नहीं। Karm Fal Ka Bhog talta Nahi.
जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, भागवत में लिखा है- 
नाभुक्तं क्षीयते कर्म जन्म कोटिशतैरपि।
अवश्यमेव भुक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।।

अर्थात:- अपने किए कर्मों का फल भुगतना ही पड़ता है, फिर चाहे आज या फिर कल। एक बड़ा ही धर्मात्मा, न्यायप्रिय और भगवद्भक्त राजा था। उसने ठाकुरजी का मंदिर बनवाया और एक ब्राह्मण को उसका पुजारी नियुक्त किया। वह ब्राह्मण भी बड़ा सदाचारी, धर्मात्मा और संतोषी था। वह राजा से कभी कोई याचना नहीं करता था, राजा भी उसके स्वभाव पर बहुत प्रसन्न था।।

उसे राजा के मंदिर में पूजा करते हुए बीस वर्ष गुजर गये। उसने कभी भी राजा से किसी प्रकार का कोई प्रश्न नहीं किया। राजा के यहाँ एक लड़का पैदा हुआ। राजा ने उसे पढ़ा लिखाकर विद्वान बनाया और बड़ा होने पर उसकी शादी एक सुंदर राजकन्या के साथ करा दी। शादी करके जिस दिन राजकन्या को अपने राजमहल में लाये उस रात्रि में राजकुमारी को नींद न आयी। वह इधर-उधर घूमने लगी जब अपने पति के पलंग के पास आयी तो क्या देखती है कि हीरे जवाहरात जड़ित मूठेवाली एक तलवार पड़ी है।।

जब उस राजकन्या ने देखने के लिए वह तलवार म्यान में से बाहर निकाली, तब तीक्ष्ण धारवाली और बिजली के समान प्रकाशवाली तलवार देखकर वह डर गयी एवं डर के मारे उसके हाथ से तलवार गिर पड़ी और राजकुमार की गर्दन पर जा लगी। राजकुमार का सिर कट गया और वह मर गया। राजकन्या पति के मरने का बहुत शोक करने लगी।।

उस राजकन्या ने परमेश्वर से प्रार्थना की कि ‘हे प्रभु ! मुझसे अचानक यह पाप कैसे हो गया? पति की मृत्यु मेरे ही हाथों हो गयी। आप तो जानते ही हैं। परंतु सभा में मैं सत्य नहीं कह सकूँगी। क्योंकि इससे मेरे माता-पिता और सास-ससुर सभी को कलंक लगेगा। साथ ही इस बात पर कोई विश्वास भी नहीं करेगा।।’

प्रातःकाल में जब पुजारी कुएँ पर स्नान करने आया तो राजकन्या ने उसको देखकर विलाप करना शुरु किया और इस प्रकार कहने लगीः “मेरे पति को कोई मार गया।” लोग इकट्ठे हो गये और राजा साहब आकर पूछने लगेः “किसने मारा है?” कन्या ने कहा – “मैं जानती तो नहीं कि कौन था। परंतु उसे ठाकुरजी के मंदिर में जाते देखा था” राजा समेत सब लोग ठाकुरजी के मंदिर में आये तो ब्राह्मण को पूजा करते हुए देखा।।

फिर क्या था, पुजारी को पकड़ लिया गया और पूछा गया, कि “आपने राजकुमार को क्यों मारा?” ब्राह्मण ने कहाः “मैंने राजकुमार को नहीं मारा। मैंने तो उनका राजमहल भी नहीं देखा है। इसमें ईश्वर साक्षी हैं। बिना देखे किसी पर अपराध का दोष लगाना ठीक नहीं।” ब्राह्मण की तो कोई बात ही नहीं सुनता था। कोई कुछ कहता था तो कोई कुछ…. राजा के दिल में बार-बार विचार आता था कि यह ब्राह्मण निर्दोष है परंतु बहुतों के कहने पर राजा विचार करने लगा।।

बहुत देर विचार करने के बाद राजा ने ब्राह्मण से कहाः- “मैं तुम्हें प्राणदण्ड तो नहीं दे सकता, लेकिन जिस हाथ से तुमने मेरे पुत्र को तलवार से मारा है, तेरा वह हाथ काटने का आदेश देता हूँ।” ऐसा कहकर राजा ने उसका हाथ कटवा दिया। इस पर ब्राह्मण बड़ा दुःखी हुआ और राजा को अधर्मी जान उस देश को छोड़कर विदेश में चला गया। वहाँ वह खोज करने लगा कि कोई विद्वान ज्योतिषी मिले तो बिना किसी अपराध हाथ कटने का कारण उससे पूछूँ।।

किसी ने उसे बताया कि काशी में एक विद्वान ज्योतिषी रहते हैं। तब वह उनके घर पर पहुँचा। ज्योतिषी कहीं बाहर गये थे, उसने उनकी धर्मपत्नी से पूछाः “माताजी! आपके पति ज्योतिषीजी महाराज कहाँ गये हैं?” तब उस स्त्री ने अपने मुख से अयोग्य, असह्य दुर्वचन कहे, जिनको सुनकर वह ब्राह्मण हैरान हुआ और मन ही मन कहने लगा कि “मैं तो अपना हाथ कटने का कारण पूछने आया था, परंतु अब इनका ही हाल पहले पूछूँगा।।”

इतने में ज्योतिषी जी आ गये। घर में प्रवेश करते ही ब्राह्मणी ने अनेक दुर्वचन कहकर उनका तिरस्कार किया। परंतु ज्योतिषीजी चुप रहे और अपनी स्त्री को कुछ भी नहीं कहा। तदनंतर वे अपनी गद्दी पर आ बैठे। ब्राह्मण को देखकर ज्योतिषी ने उनसे कहाः “कहिये, ब्राह्मण देवता! कैसे आना हुआ?”

ब्राह्मण ने कहा- आया तो था अपने बारे में पूछने के लिए परंतु पहले आप अपना हाल बताइये कि आपकी पत्नी अपनी जुबान से आपका इतना तिरस्कार क्यों करती है? जो किसी से भी नहीं सहा जाता और आप सहन कर लेते हैं, इसका क्या कारण है? ज्योतिषी जी ने कहा- यह मेरी पत्नी नहीं, मेरा कर्म है। दुनिया में जिसको भी देखते हो अर्थात् भाई, पुत्र, शिष्य, पिता, गुरु, सम्बंधी- जो कुछ भी है, सब अपना कर्म ही है । यह पत्नी नहीं, मेरा किया हुआ पूर्व का कर्म ही है और यह भोगे बिना कटेगा नहीं।।

अपना किया हुआ जो भी कुछ शुभ-अशुभ कर्म है, वह अवश्य ही भोगना पड़ता है। बिना भोगे तो सैंकड़ों-करोड़ों कल्पों के गुजरने पर भी कर्म नहीं टल सकता।’ इसलिए मैं अपने कर्म खुशी से भोग रहा हूँ और अपनी स्त्री की ताड़ना भी नहीं करता, ताकि आगे इस कर्म का फल न भोगना पड़े। महाराज! आपने क्या कर्म किया था?।।

ज्योतिषी जी ने कहा- सुनिये, पूर्वजन्म में मैं कौआ था और मेरी पत्नी गधी थी। इसकी पीठ पर फोड़ा था, फोड़े की पीड़ा से यह बड़ी दुःखी और कमजोर भी हो गयी थी। फोड़े में  कीड़े पड़ गये जिन्हें खाने के लिये  मैं इसके फोड़े में चोंच मारता और कीड़ों को खाता था। इससे जब दर्द के कारण यह कूदती थी आखिर त्रस्त होकर यह गाँव से दस-बारह मील दूर जंगल में चली गयी। वहाँ भी इसे देखते ही मैं इसकी पीठ पर जोर से चोंच मारी तो मेरी चोंच इसकी हड्डी में चुभ गयी। इस पर इसने अनेक प्रयास किये, फिर भी चोंच न छूटी।।

मैंने भी चोंच निकालने का बड़ा प्रयत्न किया मगर न निकली। फिर यह गंगाजी मे प्रवेश कर गयी ऐसा सोंचकर कि पानी के भय से ही यह दुष्ट मुझे छोड़ देगा। परंतु वहाँ भी मैं अपनी चोंच निकाल न पाया। आखिर में यह बड़े प्रवाह में प्रवेश कर गयी। गंगा का प्रवाह तेज होने के कारण हम दोनों बह गये और बीच में ही मर गये। तब गंगा जी के प्रभाव से यह तो ब्राह्मणी बनी और मैं बड़ा भारी ज्योतिषी बना। अब वही मेरी पत्नी बनी है।।

जो कुछ दिनों और अपने मुख से गाली निकालकर मुझे दुःख देगी, लेकिन मैंने चोंच इसको दर्द पहुंचाने के लिये नहीं मारी थी। अतः इसकी समझ भी ठीक होगी और मैं भी अपने पूर्वकर्मों का फल समझकर सहन करता रहूँगा। इसका दोष नहीं मानता क्योंकि यह किये हुए कर्मों का ही फल है। इसलिए मैं शांत रहता हूँ और प्रतिक्षा में हूँ कि कभी तो इसका स्वभाव अच्छा होगा। अब अपना प्रश्न पूछो?।।

ब्राह्मण ने अपना सब समाचार सुनाया और पूछाः- अधर्मी पापी राजा ने मुझ निरपराध का हाथ क्यों कटवाया? ज्योतिषी जी ने कहा- राजा ने आपका हाथ नहीं कटवाया, आपके कर्म ने ही आपका हाथ कटवाया है। ब्राह्मण ने पूछ किस प्रकार का कौन सा कर्म? ज्योतिषी जी ने कहा- पूर्वजन्म में आप एक तपस्वी थे और राजकन्या गौ थी तथा राजकुमार कसाई था। वह कसाई जब गौ को मारने लगा, तब गौ बेचारी जान बचाकर आपके सामने से जंगल में भाग गयी। पीछे से कसाई आया और आप से पूछा कि “इधर कोई गाय तो नहीं गई है?”

आपने जिस तरफ गौ गयी थी, उस तरफ अपने हाथ से इशारा किया तो उस कसाई ने जाकर गौ को मार डाला। इतने में  जंगल से शेर आया और गौ एवं कसाई दोनों को खा गया।  कसाई को राजकुमार और गौ को राजकन्या का जन्म मिला एवं पूर्वजन्म के किये हुए उस कर्म ने एक रात्रि के लिए उन दोनों को इकट्ठा किया। क्योंकि कसाई ने गौ को गड़ासे से मारा था, इसी कारण राजकन्या के हाथों अनायास ही तलवार गिरने से राजकुमार का सिर कट गया और वह मर गया।।

इस तरह अपना फल देकर कर्म निवृत्त हो गया। तुमने जो हाथ का इशारा रूप कर्म किया था, उस पापकर्म ने तुम्हारा हाथ कटवा दिया है। इसमें तुम्हारा ही दोष है किसी अन्य का नहीं, ऐसा निश्चय कर सुखपूर्वक रहो। कितना सहज है ज्ञान संयुक्त जीवन! यदि हम इस कर्म सिद्धान्त को मान और जान लें तो पूर्वकृत घोर से घोर कर्म का फल भोगते हुए भी हम दुःखी नहीं होंगे। बल्कि अपने चित्त की समता बनाये रखने में सफल होंगे।।

Shrimad Bhagwat Katha 
।। नारायण सभी का कल्याण करें ।।
 
 
जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम् ।।
 
जय जय श्री राधे ।।
जय श्रीमन्नारायण ।।