सबकी एक दिन यही गति होगी।। Yahi Gati Hogi.

मैंने हर रोज जमाने को रंग बदलते देखा है।।
उम्र के साथ जिंदगी को ढंग बदलते देखा है।।

वो जो चलते थे तो शेर के चलने का गुमान होता था।।
उनको भी पाँव उठाने के लिए सहारे को तरसते देखा है।।

जिनकी नजरों की चमक देख सहम जाते थे लोग।।
उन नजरों को भी बरसात की तरह रोते देखा है।।

जिनके हाथों के जरा से इशारे से टूट जाते थे पत्थर।।
उन हाथों को भी पत्तों की तरह थर थर काँपते देखा है।।

जिनकी आवाज़ से कभी बिजली के कड़कने का भ्रम होता था।।
उन होठों पर भी जबरन चुप्पी का ताला लगा देखा है।।

ये जवानी! ये ताकत! ये दौलत! सब कुदरत की अमानत है।।
इनके रहते हुए भी इंसान को बेजान पड़ा हुआ देखा है।।

अपने आज पर इतना ना इतराना मेरे प्यारे दोस्त।।
वक्त की धारा में अच्छे अच्छों को भी मजबूर हुआ देखा है।।

कर सको तो प्यार से रह लो, किसी को खुश कर लो।।
दूसरों को दुःख देते तो हजारों को देखा है।।

। नारायण सभी का कल्याण करें ।।

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जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्।।

जय जय श्री राधे।।
जय श्रीमन्नारायण।।

आवश्यकता के अनुसार यंत्रों का प्रयोग एक वैदिक रीति!! Yantra Prayog Vidhi.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, जैसा की मैं पहले भी बता चूका हूँ, की कुछ नम्बर्स ऐसे होते हैं, जिनको सही जगह पर बिठाकर सही रूप देने पर, किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति हो सकती है! हमारे देश में कुछ अनुभवी व्यक्ति हुए, जिन्होंने इस प्रकार की अपनी अनुभूतियाँ हमें हमारे कल्याणार्थ प्रदान किया!!
 
अगर आप पुछेंगें की उस अनुभवी व्यक्ति का नाम क्या था, तो शायद ये, बताना मुश्किल होगा ! लेकिन इन अनुभूतियों को आज भी बहुत लोग हैं, जिन्होंने प्रयोग में लिया है, और सत्य प्रमाणित किया है! लेकिन केवल भगवान अथवा किसी यंत्र के भरोसे बैठ जाना, और ये सोंच लेना की हमने तो यंत्र पहन लिया अब मेरा तो काम हो ही जायेगा, मुर्खता होगी! क्योंकि – उद्योगिनं हि पुरुष सिंहमुपैती लक्ष्मी – उद्योगी अर्थात परिश्रमी व्यक्ति को हि लक्ष्मी भी वरण करती है, कायरों को वो भी नकार देती है!!
 
यंत्र प्रभावी होते हैं, लेकिन परिश्रमी पुरुष को हि ये भी सहायता करते हैं, अत: हमें मेहनत जी जान से करना है, और इन विद्याओं का भी सहारा लेना है, तभी हमें पूर्ण सफलता मिलेगी! इन विद्याओं को आध्यात्मिक व्यक्तियों द्वारा दबाया जाता है, क्योंकि लोग कभी-कभी इन विद्याओं का दुरुपयोग करने लगते हैं!!
 
लेकिन आप कभी-भी इन विद्याओं का सही समय एवं सही जगह पर नेक नियत से प्रयोग करेंगें, तो सफलता निश्चित ही आपके कदम चूमेगी!!
 
वैसे ये यंत्र सफलता प्राप्ति यंत्र है, अगर आपको किसी सेवा क्षेत्र के कार्य में, बार-बार असफलता मिलती है, तो आप इस यंत्र का निर्माण काली स्याही से, भोजपत्र पर, शनिवार के दिन!! ॐ क्लीं महाकाल्यै नम: मम कार्यं सिद्धं कुरु कुरु हूँ फट !! इस मन्त्र का जप करते हुए, एकांत स्थान में बैठकर निर्मित करें!!
 
यंत्र तैयार होने के बाद, इसकी पूजा षोडशोपचार से करें, और उपरोक्त मन्त्र का १००८ बार जप करें! फिर इस यंत्र को, ताबीज में भर कर, पुरुष अपने दाहिनी भुजा पर, एवं स्त्री अपनी बायीं भुजा पर, काले रंग के धागे में बांधे! और फिर किसी भी तरह की परीक्षा अथवा प्रतियोगिता में निश्चिन्त होकर बैठे! सफलता निश्चित रूप से उसकी कदम चूमेगी, इस यंत्र के प्रभाव से!!
 
इन यंत्रों का कोई पूर्ण प्रमाण तो नहीं मिलता, लेकिन यह गुरु-शिष्य की श्रवण परंपरा से, आदिकाल से चली आ रही है! तथा नियम पूर्वक सच्ची भावना से धारण करने पर, कारगर भी होती है!!
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!! नमों नारायणाय !!

देवदर्शन एवं प्रणाम करने की सही विधि।। Dev Darshan Ki Vidhi.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, आपको सुख हो या दुख, हर पल भगवान का ध्यान करने पर अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। इस प्रकार किया गया भगवान का चिंतन हमारे कई जन्मों पापों को नष्ट कर देता है।।

आजकल की भागती-दौड़ती जिंदगी में बहुत कम लोग हैं, जिन्हें विधिवत भगवान की पूजा-आराधना का समय मिलता होगा। वैसे तो पुण्यार्जन हेतु लगभग सभी लोग भगवान की पूजा के लिए मन्दिर जाते हैं । परन्तु कुछ लोग केवल हाथ जोड़कर प्रार्थना भर कर लेते हैं।।

जबकि भगवान के सामने साष्टांग प्रणाम करने पर आश्चर्यजनक शुभ फल कि प्राप्ति होती है। भगवान को साष्टांग प्रणाम करना केवल एक परंपरा या बंधन मात्र नहीं है। इस परंपरा के पीछे बहुत ही गहरा विज्ञान भी है जो हमारे शारीरिक, मानसिक और वैचारिक विकास से जुड़ा हुआ है।।

साष्टांग प्रणाम का सबसे बड़ा फायदा यह है, कि इससे हमारे शरीर का व्यायाम हो जाता है। साष्टांग प्रणाम की विधि यह है, कि आप भगवान के सामने बैठ जायें और फिर धीरे-धीरे पेट के बल जमीन पर लेट जायें। दोनों हाथों को सिर के आगे ले जाकर उन्हें जोड़कर नमस्कार करें। इस प्रणाम से हमारे सारे जोड़ थोड़ी देर के लिए तन जाते हैं।।

इससे स्ट्रेस (तनाव) दूर होता है इसके अलावा झुकने से सिर में रक्त प्रवाह बढ़ता है। ये रक्त प्रवाह स्वास्थ्य और आंखों के लिए अत्यन्त लाभप्रद होता है। प्रणाम करने की यही विधि सबसे ज्यादा फायदेमंद है। इसका धार्मिक महत्व काफी गहरा है, ऐसा माना जाता है, कि इससे हमारा अहंकार कम होता है।।

भगवान के प्रति हमारे मन में समर्पण का भाव आता है। अहंकार स्वत: ही धीरे-धीरे खत्म हो जाता है। जब भी हम भगवान के समक्ष तन और मन से समर्पण कर देते हैं। फिर यही अवस्था निश्चित ही हमारे मन को असीम शान्ति प्रदान करती हैं। इसके अलावा इस प्रकार प्रणाम करने से हमारे जीवन की कई समस्यायें स्वत: ही समाप्त हो जाती हैं।।

।। नारायण सभी का कल्याण करें ।।

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जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्।।

जय जय श्री राधे।।
जय श्रीमन्नारायण।।

कर्मफल का भोग टलता नहीं। Karm Fal Ka Bhog talta Nahi.
जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, भागवत में लिखा है- 
नाभुक्तं क्षीयते कर्म जन्म कोटिशतैरपि।
अवश्यमेव भुक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।।

अर्थात:- अपने किए कर्मों का फल भुगतना ही पड़ता है, फिर चाहे आज या फिर कल। एक बड़ा ही धर्मात्मा, न्यायप्रिय और भगवद्भक्त राजा था। उसने ठाकुरजी का मंदिर बनवाया और एक ब्राह्मण को उसका पुजारी नियुक्त किया। वह ब्राह्मण भी बड़ा सदाचारी, धर्मात्मा और संतोषी था। वह राजा से कभी कोई याचना नहीं करता था, राजा भी उसके स्वभाव पर बहुत प्रसन्न था।।

उसे राजा के मंदिर में पूजा करते हुए बीस वर्ष गुजर गये। उसने कभी भी राजा से किसी प्रकार का कोई प्रश्न नहीं किया। राजा के यहाँ एक लड़का पैदा हुआ। राजा ने उसे पढ़ा लिखाकर विद्वान बनाया और बड़ा होने पर उसकी शादी एक सुंदर राजकन्या के साथ करा दी। शादी करके जिस दिन राजकन्या को अपने राजमहल में लाये उस रात्रि में राजकुमारी को नींद न आयी। वह इधर-उधर घूमने लगी जब अपने पति के पलंग के पास आयी तो क्या देखती है कि हीरे जवाहरात जड़ित मूठेवाली एक तलवार पड़ी है।।

जब उस राजकन्या ने देखने के लिए वह तलवार म्यान में से बाहर निकाली, तब तीक्ष्ण धारवाली और बिजली के समान प्रकाशवाली तलवार देखकर वह डर गयी एवं डर के मारे उसके हाथ से तलवार गिर पड़ी और राजकुमार की गर्दन पर जा लगी। राजकुमार का सिर कट गया और वह मर गया। राजकन्या पति के मरने का बहुत शोक करने लगी।।

उस राजकन्या ने परमेश्वर से प्रार्थना की कि ‘हे प्रभु ! मुझसे अचानक यह पाप कैसे हो गया? पति की मृत्यु मेरे ही हाथों हो गयी। आप तो जानते ही हैं। परंतु सभा में मैं सत्य नहीं कह सकूँगी। क्योंकि इससे मेरे माता-पिता और सास-ससुर सभी को कलंक लगेगा। साथ ही इस बात पर कोई विश्वास भी नहीं करेगा।।’

प्रातःकाल में जब पुजारी कुएँ पर स्नान करने आया तो राजकन्या ने उसको देखकर विलाप करना शुरु किया और इस प्रकार कहने लगीः “मेरे पति को कोई मार गया।” लोग इकट्ठे हो गये और राजा साहब आकर पूछने लगेः “किसने मारा है?” कन्या ने कहा – “मैं जानती तो नहीं कि कौन था। परंतु उसे ठाकुरजी के मंदिर में जाते देखा था” राजा समेत सब लोग ठाकुरजी के मंदिर में आये तो ब्राह्मण को पूजा करते हुए देखा।।

फिर क्या था, पुजारी को पकड़ लिया गया और पूछा गया, कि “आपने राजकुमार को क्यों मारा?” ब्राह्मण ने कहाः “मैंने राजकुमार को नहीं मारा। मैंने तो उनका राजमहल भी नहीं देखा है। इसमें ईश्वर साक्षी हैं। बिना देखे किसी पर अपराध का दोष लगाना ठीक नहीं।” ब्राह्मण की तो कोई बात ही नहीं सुनता था। कोई कुछ कहता था तो कोई कुछ…. राजा के दिल में बार-बार विचार आता था कि यह ब्राह्मण निर्दोष है परंतु बहुतों के कहने पर राजा विचार करने लगा।।

बहुत देर विचार करने के बाद राजा ने ब्राह्मण से कहाः- “मैं तुम्हें प्राणदण्ड तो नहीं दे सकता, लेकिन जिस हाथ से तुमने मेरे पुत्र को तलवार से मारा है, तेरा वह हाथ काटने का आदेश देता हूँ।” ऐसा कहकर राजा ने उसका हाथ कटवा दिया। इस पर ब्राह्मण बड़ा दुःखी हुआ और राजा को अधर्मी जान उस देश को छोड़कर विदेश में चला गया। वहाँ वह खोज करने लगा कि कोई विद्वान ज्योतिषी मिले तो बिना किसी अपराध हाथ कटने का कारण उससे पूछूँ।।

किसी ने उसे बताया कि काशी में एक विद्वान ज्योतिषी रहते हैं। तब वह उनके घर पर पहुँचा। ज्योतिषी कहीं बाहर गये थे, उसने उनकी धर्मपत्नी से पूछाः “माताजी! आपके पति ज्योतिषीजी महाराज कहाँ गये हैं?” तब उस स्त्री ने अपने मुख से अयोग्य, असह्य दुर्वचन कहे, जिनको सुनकर वह ब्राह्मण हैरान हुआ और मन ही मन कहने लगा कि “मैं तो अपना हाथ कटने का कारण पूछने आया था, परंतु अब इनका ही हाल पहले पूछूँगा।।”

इतने में ज्योतिषी जी आ गये। घर में प्रवेश करते ही ब्राह्मणी ने अनेक दुर्वचन कहकर उनका तिरस्कार किया। परंतु ज्योतिषीजी चुप रहे और अपनी स्त्री को कुछ भी नहीं कहा। तदनंतर वे अपनी गद्दी पर आ बैठे। ब्राह्मण को देखकर ज्योतिषी ने उनसे कहाः “कहिये, ब्राह्मण देवता! कैसे आना हुआ?”

ब्राह्मण ने कहा- आया तो था अपने बारे में पूछने के लिए परंतु पहले आप अपना हाल बताइये कि आपकी पत्नी अपनी जुबान से आपका इतना तिरस्कार क्यों करती है? जो किसी से भी नहीं सहा जाता और आप सहन कर लेते हैं, इसका क्या कारण है? ज्योतिषी जी ने कहा- यह मेरी पत्नी नहीं, मेरा कर्म है। दुनिया में जिसको भी देखते हो अर्थात् भाई, पुत्र, शिष्य, पिता, गुरु, सम्बंधी- जो कुछ भी है, सब अपना कर्म ही है । यह पत्नी नहीं, मेरा किया हुआ पूर्व का कर्म ही है और यह भोगे बिना कटेगा नहीं।।

अपना किया हुआ जो भी कुछ शुभ-अशुभ कर्म है, वह अवश्य ही भोगना पड़ता है। बिना भोगे तो सैंकड़ों-करोड़ों कल्पों के गुजरने पर भी कर्म नहीं टल सकता।’ इसलिए मैं अपने कर्म खुशी से भोग रहा हूँ और अपनी स्त्री की ताड़ना भी नहीं करता, ताकि आगे इस कर्म का फल न भोगना पड़े। महाराज! आपने क्या कर्म किया था?।।

ज्योतिषी जी ने कहा- सुनिये, पूर्वजन्म में मैं कौआ था और मेरी पत्नी गधी थी। इसकी पीठ पर फोड़ा था, फोड़े की पीड़ा से यह बड़ी दुःखी और कमजोर भी हो गयी थी। फोड़े में  कीड़े पड़ गये जिन्हें खाने के लिये  मैं इसके फोड़े में चोंच मारता और कीड़ों को खाता था। इससे जब दर्द के कारण यह कूदती थी आखिर त्रस्त होकर यह गाँव से दस-बारह मील दूर जंगल में चली गयी। वहाँ भी इसे देखते ही मैं इसकी पीठ पर जोर से चोंच मारी तो मेरी चोंच इसकी हड्डी में चुभ गयी। इस पर इसने अनेक प्रयास किये, फिर भी चोंच न छूटी।।

मैंने भी चोंच निकालने का बड़ा प्रयत्न किया मगर न निकली। फिर यह गंगाजी मे प्रवेश कर गयी ऐसा सोंचकर कि पानी के भय से ही यह दुष्ट मुझे छोड़ देगा। परंतु वहाँ भी मैं अपनी चोंच निकाल न पाया। आखिर में यह बड़े प्रवाह में प्रवेश कर गयी। गंगा का प्रवाह तेज होने के कारण हम दोनों बह गये और बीच में ही मर गये। तब गंगा जी के प्रभाव से यह तो ब्राह्मणी बनी और मैं बड़ा भारी ज्योतिषी बना। अब वही मेरी पत्नी बनी है।।

जो कुछ दिनों और अपने मुख से गाली निकालकर मुझे दुःख देगी, लेकिन मैंने चोंच इसको दर्द पहुंचाने के लिये नहीं मारी थी। अतः इसकी समझ भी ठीक होगी और मैं भी अपने पूर्वकर्मों का फल समझकर सहन करता रहूँगा। इसका दोष नहीं मानता क्योंकि यह किये हुए कर्मों का ही फल है। इसलिए मैं शांत रहता हूँ और प्रतिक्षा में हूँ कि कभी तो इसका स्वभाव अच्छा होगा। अब अपना प्रश्न पूछो?।।

ब्राह्मण ने अपना सब समाचार सुनाया और पूछाः- अधर्मी पापी राजा ने मुझ निरपराध का हाथ क्यों कटवाया? ज्योतिषी जी ने कहा- राजा ने आपका हाथ नहीं कटवाया, आपके कर्म ने ही आपका हाथ कटवाया है। ब्राह्मण ने पूछ किस प्रकार का कौन सा कर्म? ज्योतिषी जी ने कहा- पूर्वजन्म में आप एक तपस्वी थे और राजकन्या गौ थी तथा राजकुमार कसाई था। वह कसाई जब गौ को मारने लगा, तब गौ बेचारी जान बचाकर आपके सामने से जंगल में भाग गयी। पीछे से कसाई आया और आप से पूछा कि “इधर कोई गाय तो नहीं गई है?”

आपने जिस तरफ गौ गयी थी, उस तरफ अपने हाथ से इशारा किया तो उस कसाई ने जाकर गौ को मार डाला। इतने में  जंगल से शेर आया और गौ एवं कसाई दोनों को खा गया।  कसाई को राजकुमार और गौ को राजकन्या का जन्म मिला एवं पूर्वजन्म के किये हुए उस कर्म ने एक रात्रि के लिए उन दोनों को इकट्ठा किया। क्योंकि कसाई ने गौ को गड़ासे से मारा था, इसी कारण राजकन्या के हाथों अनायास ही तलवार गिरने से राजकुमार का सिर कट गया और वह मर गया।।

इस तरह अपना फल देकर कर्म निवृत्त हो गया। तुमने जो हाथ का इशारा रूप कर्म किया था, उस पापकर्म ने तुम्हारा हाथ कटवा दिया है। इसमें तुम्हारा ही दोष है किसी अन्य का नहीं, ऐसा निश्चय कर सुखपूर्वक रहो। कितना सहज है ज्ञान संयुक्त जीवन! यदि हम इस कर्म सिद्धान्त को मान और जान लें तो पूर्वकृत घोर से घोर कर्म का फल भोगते हुए भी हम दुःखी नहीं होंगे। बल्कि अपने चित्त की समता बनाये रखने में सफल होंगे।।

Shrimad Bhagwat Katha 
।। नारायण सभी का कल्याण करें ।।
 
 
जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम् ।।
 
जय जय श्री राधे ।।
जय श्रीमन्नारायण ।।

कर्ता भाव हटाइए होगा चमत्कार।। Karta Bhav Hatao Unnati Hoga.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, हमारी आदत है, किसी भी कर्म में अपने कर्ता भाव का प्रदर्शन करने की। परन्तु कर्म करते समय ही अपने कर्ता भाव को हटाइए, फिर देखिए कैसा चमत्कार होता है आपके जीवन। चमत्कार आपके लिए कोई दूसरा नहीं कर सकता।।

उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्‌ ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ।।


अर्थ:- अपने आप के द्वारा इस संसार-समुद्र से स्वयं का उद्धार हम कर सकते हैं एवं स्वयं अपने को हम अधोगति में भी ड़ाल सकते हैं। क्योंकि हम मनुष्य स्वयं ही तो अपना मित्र हैं और स्वयं ही अपना शत्रु भी हैं।।5।।(गी. अ. 6, श्लो. 5.)

मित्रों, एक पुरानी कहानी है, कि एक पण्डित जी ने अपनी पत्नी की आदत बना दी थी कि घर में रोटी खाने से पहले कहना है कि “कृष्णार्पण” बोलो फिर रोटी खाओ। अगर पानी पीना हो तो पहले कहना है कि “कृष्णार्पण”। उस औरत की इतनी आदत पक्की हो गई, कि जो भी काम करती पहले मन में यह कहती कि “कृष्णार्पण” “कृष्णार्पण”। फिर वह काम करती।।

एक दिन उसने घर का कूड़ा इकट्ठा किया और फेंकते हुए कहा कि “कृष्णार्पण” “कृष्णार्पण”। वहीँ पास से नारद मुनि जा रहे थे। नारद मुनि ने जब यह सुना तो उस औरत को थप्पड़ मारा कि विष्णु जी को कूड़ा अर्पण कर रही है। फेंक कूड़ा रही है और कह रही है कि “कृष्णार्पण”। वह औरत विष्णु जी के प्रेम में रंगी हुई थी। कहने लगी नारद मुनि तुमने जो थप्पड़ मारा है वो थप्पड़ भी “कृष्णार्पण”।।


अब नारद जी ने दूसरे गाल पर थप्पड़ मारते हुए कहा कि बेवकूफ़ औरत तू थप्पड़ को भी “कृष्णार्पण” कह रही है। उस औरत ने फिर यही कहा आपका मारा यह थप्पड़ भी “कृष्णार्पण”। इसके बाद जब नारद वैकुंठ में गए तो क्या देखते है, कि भगवान विष्णु के दोनों गालों पर उँगलियों के निशान बने हुए थे। नारद पूछने लगे कि “भगवन यह क्या हो गया”? आप के चेहरे पर यह निशान कैसे पड़े”?

भगवान विष्णु कहने लगे कि “नारद मुनि थप्पड़ मारे भी तू और पूछे भी तू”। नारद जी कहने लगे कि “मैं आपको थप्पड़ कैसे मार सकता हूँ”? भगवान विष्णु कहने लगे, “नारद मुनि जिस औरत ने कूड़ा फेंकते हुए यह कहा था, “कृष्णार्पण” और तूने उसको थप्पड़ मारा था तो वह थप्पड़ सीधे मेरे को ही लगा था, क्योकि वह मुझे अर्पण था”।।

मित्रों, जब हम कर्म करते समय कर्ता का भाव को निकाल लेते हैं और अपने हर काम में मैं, मेरी, मेरा की भावना हटा कर अपने इष्ट या सद्गुरु को आगे रखते हैं तो कर्मों का बोझ भी नहीं बढ़ता और वो काम आप से भी अच्छे तरीके से हो जाता है।।


मानस मे गोस्वामी जी रामजी से कहलवाते हैं:- मैं अरु मोर तोर तैं माया। जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया।।1।। अर्थ:- (श्री रामजी कहते हैं) हे तात! मैं थोड़े ही में सब समझाकर कहे देता हूँ। तुम मन, चित्त और बुद्धि लगाकर सुनो! मैं और मेरा, तू और तेरा- यही माया है, जिसने समस्त जीवों को वश में कर रखा है।।
              

।। नारायण सभी का कल्याण करें ।।
 
 
जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम् ।।
 
जय जय श्री राधे ।।
जय श्रीमन्नारायण ।।

जया एकादशी व्रत पूजा विधि एवं कथा सहित हिन्दी में ।। Jaya Ekadashi Vrat Vidhi And Katha in Hindi.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, एक समय की बात है, कि धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से माघ शुक्ल एकादशी के विषय में पूछा । युधिष्ठिर बोले – हे भगवन्! आपने माघ के कृष्ण पक्ष की षटतिला एकादशी का अत्यन्त सुंदर वर्णन किया । आप स्वदेज, अंडज, उद्भिज और जरायुज चारों प्रकार के जीवों के उत्पत्ति, पालन तथा संहार करने वाले हैं । अब आप कृपा करके माघ शुक्ल एकादशी का वर्णन कीजिए । इसका क्या नाम है, इसके व्रत की क्या विधि है तथा इसमें कौन से देवता का पूजन किया जाता है ?।।

भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे, कि हे राजन्! इस एकादशी का नाम “जया एकादशी” है । इसका व्रत करने से मनुष्य ब्रह्म हत्यादि तक के पापों से छूट कर मोक्ष को प्राप्त हो जाता है । इसके प्रभाव से भूत, पिशाच आदि योनियों से भी सहज ही मुक्ति प्राप्त हो जाती है । इस व्रत को विधिपूर्वक करना चाहिए । अब मैं आपको पद्मपुराण में वर्णित इस एकादशी की महिमा का जो वर्णन है, उस कथा का वर्णन करता हूँ ।।

स्वर्ग के राजा देवराज इंद्र स्वर्ग में राज करते थे और अन्य सब देवगण सुखपूर्वक स्वर्ग में निवास करते थे । एक समय देवराज इंद्र अपनी इच्छानुसार नंदन वन में अप्सराओं के साथ विहार कर रहे थे और वहाँ गंधर्व गान कर रहे थे । उन गंधर्वों में प्रसिद्ध पुष्पदंत तथा उसकी कन्या पुष्पवती और चित्रसेन तथा उसकी स्त्री मालिनी भी वहाँ उपस्थित थे । साथ ही मालिनी का पुत्र पुष्पवान और उसका पुत्र माल्यवान भी उपस्थित थे ।।

गंधर्व कन्या पुष्पवती गंधर्व माल्यवान को देखकर उस पर मोहित हो गई और माल्यवान पर काम-बाण चलाने लगी । उसने अपने रूप लावण्य और हावभाव से माल्यवान को वश में कर लिया । हे राजन्! वह पुष्पवती अत्यन्त सुन्दरी थी । अब वे इंद्र को प्रसन्न करने के लिए गान करने लगे परंतु परस्पर मोहित हो जाने के कारण उनका चित्त भ्रमित हो गया था ।।

इनके ठीक प्रकार न गाने तथा स्वर ताल ठीक नहीं होने के कारण देवराज इंद्र इनके प्रेम को समझ गए । देवराज ने इसमें अपना अपमान समझ लिया और उनको शाप दे दिया । इंद्र ने कहा अरे मूर्खों ! तुमने मेरी आज्ञा का उल्लंघन किया है, इसलिए तुम्हें धिक्कार है । अब तुम दोनों अपनी इस उदंडता के वजह से स्त्री-पुरुष के रूप में मृत्यु लोक में जाकर पिशाच रूप धारण करो और अपने कर्म का फल भोगो ।।

इंद्र का ऐसा शाप सुनकर वे दोनों अत्यन्त दु:खी हुए और वहाँ से निकलकर सीधा हिमालय पर्वत पर चले गए । परन्तु वहाँ ये अपना जीवन दु:खपूर्वक व्यतीत करने लगे । उन्हें गंध, रस तथा स्पर्श आदि का कुछ भी ज्ञान नहीं रहा । परन्तु फिर भी वहाँ उनको महान दु:ख ही मिल रहे थे । रात्रि में भी उन्हें एक क्षण के लिए भी निद्रा नहीं आती थी ।।

वहाँ अत्यन्त शीत था, जिससे उनके रोंगटे खड़े रहते और मारे शीत के दाँत भी सदैव बजते रहते थे । एक दिन पिशाच ने अपनी स्त्री से कहा, कि पिछले जन्म में हमने ऐसे कौन-से पाप किए थे, जिससे हमको यह दु:खदायी पिशाच योनि प्राप्त हुई । इस पिशाच योनि से तो नर्क का दु:ख सहना ही उत्तम होता । अत: हमें अब किसी प्रकार का पाप नहीं करना चाहिए । इस प्रकार विचार करते हुए वे अपने दिन व्यतीत कर रहे थे ।।

दैवयोग से तभी एक दिन माघ मास के शुक्ल पक्ष की जया नामकी एकादशी आई । उस दिन उन दोनों ने कुछ भी भोजन नहीं किया और न ही कोई पाप कर्म ही किया । उस दिन उन दोनों ने केवल फल-फूल खाकर ही दिन व्यतीत किया और सायंकाल के समय कष्टमय स्थिति में ही पीपल के वृक्ष के नीचे बैठ गए । उस समय सूर्य भगवान अस्त हो रहे थे । उस रात को अत्यन्त ठंड थी, इस कारण वे दोनों शीत के मारे अति दु:खी होकर मृतक के समान आपस में चिपटे हुए पड़े रहे । उस रात्रि को उनको निद्रा भी नहीं आई ।।

हे राजन् ! जया एकादशी के उपवास और रात्रि के जागरण से दूसरे दिन प्रभात होते ही उनकी पिशाच योनि छूट गई । एकादशी व्रत के प्रभाव से अत्यन्त सुंदर गंधर्व और अप्सरा का शरीर धारण कर सुंदर वस्त्राभूषणों से अलंकृत होकर दोनों ने स्वर्गलोक को प्रस्थान किया । उस समय आकाश में देवता लोग भी उनकी स्तुति करते हुए पुष्पवर्षा करने लगे । स्वर्गलोक में जाकर इन दोनों ने देवराज इंद्र को प्रणाम किया ।।

देवराज इंद्र इनको पूर्व स्वरूप में देखकर अत्यन्त आश्चर्यचकित हुये और पूछने लगे, कि तुमने अपनी पिशाच योनि से किस तरह छुटकारा पाया, सो सब बतालाओ। माल्यवान बोले कि हे देवेन्द्र! भगवान विष्णु की कृपा और जया एकादशी के व्रत के प्रभाव से ही हमारी पिशाच शरीर छूटी है। तब इंद्र बोले कि हे माल्यवान! भगवान की कृपा और एकादशी का व्रत करने से न केवल तुम्हारी पिशाच योनि छूट गई, वरन् हम लोगों के भी वंदनीय हो गए हो।।

देवराज इन्द्र ने कहा, तुम हमारे भी बन्दनीय इसलिये हो गए, क्योंकि भगवान विष्णु और भगवान शिव के भक्त हम देवताओं के वंदनीय होते हैं। अत: आप धन्य है और अब आप पुष्पवती के साथ जाकर विहार करो। भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे धर्मराज युधिष्ठिर ! इस जया एकादशी व्रत के प्रभाव से बुरी से बुरी योनि भी छूट जाती है।।

यदुकुल श्रेष्ठ भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, कि राजन ! जिस मनुष्य ने इस जया नाम के एकादशी का व्रत किया है उसने मानो सभी प्रकार के यज्ञ, जप, तप एवं दान आदि कर लिए हैं । जो मनुष्य जया एकादशी का व्रत करते हैं वे अवश्य ही हजार वर्ष तक स्वर्ग में वास करते हैं ।।

 

।। नारायण सभी का कल्याण करें ।।
जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम् ।।
जय जय श्री राधे ।।
जय श्रीमन्नारायण ।।

 

षट्तिला एकादशी व्रत पूजा विधि एवं कथा सहित हिन्दी में।। Shat-Tila Ekadashi Vrat Vidhi And Katha in Hindi.


जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, एक समय दालभ्य ऋषि ने पुलस्त्य ऋषि से पूछा कि हे महाराज! पृथ्वी लोक में मनुष्य ब्रह्महत्यादि महान पाप करते हैं। पराए धन की चोरी तथा दूसरे की उन्नति देखकर ईर्ष्या करते हैं । साथ ही अनेक प्रकार के व्यसनों में फँसे रहते हैं। फिर भी उनको नर्क प्राप्त नहीं होता, इसका क्या कारण है?।।

वे न जाने कौन-सा दान-पुण्य करते हैं जिससे उनके पाप नष्ट हो जाते हैं। कृपा करके आप मुझे विस्तार पूर्वक बतायें। पुलस्त्य मुनि कहने लगे, कि हे महाभाग! आपने मुझसे अत्यंत गंभीर प्रश्न पूछा है। इससे संसार के जीवों का बहुत ही भला होगा। इस रहस्य को ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र तथा इंद्र आदि भी नहीं जानते परंतु मैं आपको यह गुप्त रहस्य बताता हूँ।।

shat tila ekadashi vrat

पुलस्त्य ऋषि ने कहा कि माघ स्नान में शुद्ध हुई इंद्रियों को वश में करके काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईर्ष्या तथा द्वेष आदि का त्याग कर भगवान का स्मरण करना चाहिए। पुष्य नक्षत्र में गोबर, कपास, तिल मिलाकर उनके कंडे बनाना चाहिए। उन कंडों से 108 बार हवन करना चाहिए। यह कार्य मूल नक्षत्र में करना चाहिये साथ ही अगर एकादशी तिथि हो तो अच्छे पुण्य देने वाले होते हैं।।

स्नानादि नित्य क्रिया से निवृत्त होकर सब देवताओं के देव श्री भगवान नारायण का पूजन करें और एकादशी व्रत धारण करें। रात्रि को जागरण करना चाहिए। उसके दूसरे दिन धूप-दीप, नैवेद्य आदि से भगवान का पूजन करके खिचड़ी का भोग लगाएँ। तत्पश्चात पेठा, नारियल, सीताफल या सुपारी का अर्घ्य देकर स्तुति करनी चाहिए। हे भगवन! आप दीनों को शरण देने वाले हैं, इस संसार सागर में फँसे हुए जीवों का उद्धार करने वाले हैं।।

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हे पुंडरीकाक्ष! हे विश्वभावन! हे सुब्रह्मण्य! हे पूर्वज! हे जगत्पते! आप लक्ष्मीजी सहित इस तुच्छ अर्घ्य को ग्रहण करें। इसके पश्चात जल से भरा कुंभ (घड़ा) ब्राह्मण को दान करें तथा ब्राह्मण को श्यामा गौ और तिल पात्र दान करना भी उत्तम होता है। तिल स्नान और भोजन दोनों ही श्रेष्ठ माना गया हैं। इस प्रकार जो मनुष्य जितने अधिक तिलों का दान करता है, उतने ही हजार वर्ष स्वर्ग में वास करता है।।

1. तिल स्नान, 2. तिल का उबटन, 3. तिल का हवन, 4. तिल का तर्पण, 5 तिल का भोजन और 6. तिलों का दान- ये तिल के 6 प्रकार हैं । इनके प्रयोग के कारण यह षटतिला एकादशी कहलाती है । इस व्रत के करने से अनेक प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं । इतना कहकर पुलस्त्य ऋषि कहने लगे, कि अब मैं तुमसे इस एकादशी की कथा बतलाता हूँ।।

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एक समय नारदजी ने भगवान श्रीविष्णु से यही प्रश्न किया था और भगवान ने जो षटतिला एकादशी का माहात्म्य नारदजी से कहा- सो मैं तुमसे कहता हूँ। भगवान ने नारदजी से कहा कि हे नारद! मैं तुमसे सत्य घटना कहता हूँ। ध्यानपूर्वक सुनो। प्राचीनकाल में मृत्युलोक में एक ब्राह्मणी रहती थी। वह सदैव व्रत किया करती थी। एक समय वह एक मास तक व्रत करती रही। इससे उसका शरीर अत्यंत दुर्बल हो गया।।

यद्यपि वह अत्यंत बुद्धिमान थी तथापि उसने कभी देवताअओं या ब्राह्मणों के निमित्त अन्न या धन का दान नहीं किया था। इससे मैंने सोचा कि ब्राह्मणी ने व्रत आदि से अपना शरीर शुद्ध कर लिया है, अब इसे विष्णुलोक तो मिल ही जाएगा। परंतु इसने कभी अन्न का दान नहीं किया, इससे इसकी तृप्ति होना कठिन है। भगवान ने आगे कहा- ऐसा सोचकर मैं भिखारी के वेश में मृत्युलोक में उस ब्राह्मणी के पास गया और उससे भिक्षा माँगी।।

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वह ब्राह्मणी बोली- महाराज किसलिए आए हो? मैंने कहा- मुझे भिक्षा चाहिए। इस पर उसने एक मिट्टी का ढेला मेरे भिक्षापात्र में डाल दिया। मैं उसे लेकर स्वर्ग में लौट आया। कुछ समय बाद ब्राह्मणी भी शरीर त्याग कर स्वर्ग में आ गई। उस ब्राह्मणी को मिट्टी का दान करने से स्वर्ग में सुंदर महल मिला, परंतु उसने अपने घर को अन्नादि सब सामग्रियों से शून्य पाया।।

घबराकर वह मेरे पास आई और कहने लगी कि भगवन् मैंने अनेक व्रत आदि से आपकी पूजा की परंतु फिर भी मेरा घर अन्नादि सब वस्तुओं से शून्य है। इसका क्या कारण है? इस पर मैंने कहा- पहले तुम अपने घर जाओ। देवस्त्रियाँ आएँगी तुम्हें देखने के लिए। पहले उनसे षटतिला एकादशी का पुण्य और विधि सुन लो, तब द्वार खोलना। मेरे ऐसे वचन सुनकर वह अपने घर गई। जब देवस्त्रियाँ आईं और द्वार खोलने को कहा तो ब्राह्मणी बोली- आप मुझे देखने आई हैं तो षटतिला एकादशी का माहात्म्य मुझसे कहो।।

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उनमें से एक देवस्त्री कहने लगी कि मैं कहती हूँ। जब ब्राह्मणी ने षटतिला एकादशी का माहात्म्य सुना तब द्वार खोल दिया। देवांगनाओं ने उसको देखा कि न तो वह गांधर्वी है और न आसुरी है वरन पहले जैसी मानुषी है। उस ब्राह्मणी ने उनके कथनानुसार षटतिला एकादशी का व्रत किया। इसके प्रभाव से वह सुंदर और रूपवती हो गई तथा उसका घर अन्नादि समस्त सामग्रियों से युक्त हो गया।।

अत: मनुष्यों को मूर्खता त्यागकर षटतिला एकादशी का व्रत और लोभ न करके तिलादि का दान करना चाहिए। इससे दुर्भाग्य, दरिद्रता तथा अनेक प्रकार के कष्ट दूर होकर मोक्ष की प्राप्ति होती है।।

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।। नारायण सभी का कल्याण करें ।।
जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम् ।।
जय जय श्री राधे ।।
जय श्रीमन्नारायण ।।

पुत्रदा एकादशी व्रत पूजा विधि एवं कथा सहित हिन्दी में ।। Putrada Ekadashi Vrat Vidhi And Katha in Hindi.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, एक बार की बात है, महाराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा- हे भगवन्! कृपा करके यह बतलाइए, कि पौष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है ? उसकी विधि क्या है और उसमें किस देवता का पूजन किया जाता है ।।

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा:- हे राजन! इस एकादशी का नाम पुत्रदा एकादशी है । इसमें भी भगवान नारायण की पूजा की जाती है । इस चर-अचर संसार में पुत्रदा एकादशी के व्रत के समान दूसरा कोई व्रत नहीं है । इसके पुण्य से मनुष्य तपस्वी, विद्वान और लक्ष्मीवान होता है । इसके विषय में मैं एक कथा आपको बताता हूं, सो तुम ध्यानपूर्वक सुनो ।।

राजन! भद्रावती नामक नगरी में सुकेतुमान नाम का एक राजा राज्य करता था । उसके कोई पुत्र नहीं था, उसकी पत्नी का नाम शैव्या था । वह पुत्रहीन होने के कारण सदैव चिंतित रहा करती थी । राजा के पितर भी रो-रोकर पिंड लिया करते थे और सोचा करते थे, कि इसके बाद हमको कौन पिंड देगा । राजा को भाई, बांधव, धन, हाथी, घोड़े, राज्य और मंत्री इन सबमें से किसी से भी संतोष नहीं होता था ।।

वह सदैव यही विचार करता था, कि मेरे मरने के बाद मुझको कौन पिंडदान करेगा । बिना पुत्र के पितरों और देवताओं का ऋण मैं कैसे चुका सकूंगा । जिस घर में पुत्र न हो उस घर में सदैव अंधेरा ही रहता है । इसलिए पुत्र उत्पत्ति के लिए मुझे कोई प्रयत्न करना चाहिए । जिस मनुष्य ने पुत्र का मुख देखा है, वह धन्य है । उसको इस लोक में यश और परलोक में शांति मिलती है अर्थात उनके दोनों लोक सुधर जाते हैं ।।

पूर्व जन्म के कर्म से ही इस जन्म में पुत्र, धन आदि प्राप्त होते हैं । राजा इसी प्रकार रात-दिन चिंता में लगा रहता था । एक समय तो राजा ने अपने शरीर को त्याग देने का निश्चय किया परंतु आत्मघात को महान पाप समझकर उसने ऐसा नहीं किया । एक दिन राजा ऐसा ही विचार करता हुआ अपने घोड़े पर चढ़कर वन को चल दिया तथा पक्षियों और वृक्षों को देखने लगा । उसने देखा कि वन में मृग, व्याघ्र, सूअर, सिंह, बंदर, सर्प आदि सब भ्रमण कर रहे हैं।।

देखा कि एक हाथी अपने बच्चों और हथिनियों के बीच घूम रहा है । इस वन में कहीं तो गीदड़ अपने कर्कश स्वर में बोल रहे हैं, कहीं उल्लू ध्वनि कर रहे हैं । वन के दृश्यों को देखकर राजा सोच-विचार में लग गया । इसी प्रकार आधा दिन बीत गया । वह सोचने लगा, कि मैंने कई यज्ञ किए, ब्राह्मणों को स्वादिष्ट भोजन से तृप्त किया फिर भी मुझको दुख प्राप्त हुआ, क्यों?।।

राजा प्यास के मारे अत्यंत दुखी हो गया और पानी की तलाश में इधर-उधर घूमने लगा । थोड़ी दूरी पर राजा ने एक सरोवर देखा । उस सरोवर में कमल खिले थे तथा सारस, हंस, मगरमच्छ आदि विहार कर रहे थे । उस सरोवर के चारों तरफ मुनियों के आश्रम बने हुए थे । उसी समय राजा के दाहिने अंग फड़कने लगे । राजा शुभ शकुन समझकर घोड़े से उतरकर मुनियों को दंडवत प्रणाम करके बैठ गया।।

राजा को देखकर मुनियों ने कहा- हे राजन! हम तुमसे अत्यंत प्रसन्न हैं । तुम्हारी क्या इच्छा है, सो कहो । राजा ने पूछा- महाराज आप कौन हैं और किसलिए यहां आए हैं । कृपा करके बताइए । मुनि कहने लगे, कि हे राजन! आज संतान देने वाली पुत्रदा एकादशी है । हम लोग विश्वदेव हैं और इस सरोवर में स्नान करने के लिए आए हैं । यह सुनकर राजा कहने लगा कि महाराज मेरे भी कोई संतान नहीं है, यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो एक पुत्र का वरदान दीजिए।।

मुनिजन बोले- हे राजन! आज पुत्रदा एकादशी है । आप इस व्रत का पालन करें, भगवान की कृपा से अवश्य ही आपके घर में पुत्र होगा । मुनियों के वचनों को सुनकर राजा ने उसी दिन एकादशी का व्रत किया और द्वादशी को विधि अनुसार उसका पारण किया । इसके पश्चात मुनियों को प्रणाम करके महल में वापस आ गया । कुछ समय बीतने के बाद रानी ने गर्भ धारण किया और नौ महीने के पश्चात उनके एक पुत्र हुआ ।।

वह राजकुमार अत्यंत शूरवीर, यशस्वी और प्रजापालक हुआ । भगवान श्रीकृष्ण बोले- हे राजन! पुत्र की प्राप्ति के लिए पुत्रदा एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए । जो व्यक्ति मनुष्य इस माहात्म्य को पढ़ता या सुनता है उसे अंत में स्वर्ग की प्राप्ति होती है ।।

 

।। नारायण सभी का कल्याण करें ।।
जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम् ।।
जय जय श्री राधे ।।
जय श्रीमन्नारायण ।।

सफला एकादशी व्रत कथा एवं पूजा विधि सहित हिन्दी में ।। Safala Ekadashi Vrat Katha And Vidhi in Hindi.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, पौष मास के कृष्णपक्ष की एकादशी को सफला एकादशी कहते हैं । वैदिक ग्रंथों के अनुसार, इस व्रत को करने से भगवान श्रीकृष्ण प्रसन्नता प्राप्त होती है । इस एकादशी के देवता भगवान श्रीमन्नारायण हैं । प्रत्येक व्यक्ति को श्रद्धा और विधिपूर्वक इस व्रत को करना चाहिए ।।

जिस प्रकार नागों में शेषनाग, पक्षियों में गरूड़, सब ग्रहों में चंद्रमा, यज्ञों में अश्वमेध और देवताओं में भगवान विष्णु श्रेष्ठ हैं । उसी तरह सब व्रतों में एकादशी का व्रत श्रेष्ठ है । भगवान कहते हैं, कि जो मनुष्य सदैव एकादशी का व्रत करते हैं, वे मुझे परम प्रिय हैं ।।


सफला एकादशी व्रत की विधि ।। Safala Ekadashi Vrat Ki Vidhi.

मित्रों, एकादशी के दिन सुबह स्नान आदि करने के बाद साफ एवं स्वच्छ कपड़े पहनें । इसके बाद माथे पर चंदन का तिलक लगाकर कमल अथवा अन्य फूल, फल, गंगा जल, पंचामृत एवं धूप-दीप से भगवान लक्ष्मीनारायण की पूजा और आरती करें ।।

उसके उपरान्त भगवान श्रीहरि के विभिन्न नाम-मंत्रों को बोलते हुए भोग लगाएं । पूरे दिन निराहार (बिना कुछ खाए-पिए) व्रत रहें । शाम को दीपदान के बाद फलाहार कर सकते हैं । रात्रि में वैष्णवों के साथ भगवान श्रीहरि का नाम-संकीर्तन करते हुए जागरण करें ।।

सफला एकादशी व्रत माहात्म्य ।। Safala Ekadashi Vrat Mahatmya.


सफला एकादशी की रात जागरण करने से जो फल प्राप्त होता है, वह हजारों वर्ष तक तपस्या करने पर भी नहीं मिलता, ऐसा धर्मग्रंथों में लिखा है । द्वादशी को भगवान की पूजा के बाद ब्राह्मणों को भोजन करवा कर जनेऊ एवं दक्षिणा देकर विदा करने के बाद ही स्वयं पारण (भोजन) करें । इस प्रकार सफला एकादशी का व्रत करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं ।।

सफला एकादशी व्रत कथा ।। Safala Ekadashi Vrat Katha.

मित्रों, चम्पावती नाम के एक नगर का राजा महिष्मत था, उसके पाँच पुत्र थे । महिष्मत का बड़ा बेटा लुम्भक हमेशा बुरे कामों में लगा रहता था । उसकी इस प्रकार की हरकतें देखकर राजा महिष्मत ने उसे अपने राज्य से बाहर निकाल दिया । लुम्भक वन में चला गया और चोरी करने लगा । एक दिन जब वह रात में चोरी करने के लिए नगर में आया तो सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया किन्तु जब उसने अपने को राजा महिष्मत का पुत्र बतलाया तो सिपाहियों ने उसे छोड़ दिया ।।


फिर वह वन में लौट आया और वृक्षों के फल खाकर जीवन निर्वाह करने लगा । वह एक पुराने पीपल के वृक्ष के नीचे रहता था । एक बार अंजाने में ही उसने पौष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का व्रत कर लिया । उसने पौष मास में कृष्णपक्ष की दशमी के दिन वृक्षों के फल खाये और वस्त्रहीन होने के कारण रातभर ठंढ़ में कॉपता रहा ।।

सूर्योदय होने पर भी उसको होश नहीं आया । एकादशी के दिन भी लुम्भक बेहोश पड़ा रहा । दोपहर होने पर उसे होश आया । उठकर वह वन में गया और बहुत से फल लेकर जब तक विश्राम स्थल पर लौटा, तब तक सूर्यास्त हो चुका था । तब उसने पीपल के वृक्ष की जड़ में बहुत से फल निवेदन करते हुए कहा- इन फलों से लक्ष्मीपति भगवान विष्णु संतुष्ट हों ।।

ऐसा कहकर लुम्भक रातभर सोया भी नहीं । इस प्रकार अनायास ही उसने सफला एकादशी व्रत के नियमों का पालन कर लिया । उसी समय आकाशवाणी हुई -राजकुमार लुम्भक! सफला एकादशी व्रत के प्रभाव से तुम राज्य और पुत्र प्राप्त करोगे । आकाशवाणी के बाद लुम्भक का रूप दिव्य हो गया । तबसे उसकी बुद्धि भी उत्तम हो गयी और भगवान विष्णु के भजन में लग गयी ।।


उसने पंद्रह वर्षों तक सफलतापूर्वक राज्य का संचालन किया । उसको मनोज्ञ नामक पुत्र उत्पन्न हुआ । जब वह बड़ा हुआ तो लुम्भक ने राज्य अपने पुत्र को सौंप दिया और वह स्वयं भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में रम गया । अंत में सफला एकादशी के व्रत के प्रभाव से उसने भगवान विष्णु के दिब्य लोक को प्राप्त किया ।।

इस सफला एकादशी के महत्व का वर्णन भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं धर्मराज युधिष्ठिर को बताया है । पद्मपुराण के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, कि- बड़े-बड़े यज्ञों से भी मुझे उतना संतोष नहीं होता, जितना सफला एकादशी व्रत के अनुष्ठान से होता है । सफला एकादशी का व्रत अपने नाम के अनुसार सभी कामों में मनोवांछित सफलता प्रदान करता है ।।


इस एकादशी के व्रत से व्यक्ति को जीवन में उत्तम फल की प्राप्ति होती है । वह जीवन का सुख भोगकर मृत्यु पश्चात भगवान विष्णु के उत्तम लोक को प्राप्त होता है । यह व्रत अति मंगलकारी और पुण्यदायी है । जो भक्त सफला एकादशी का व्रत रखते हैं एवं रात्रि में जागरण तथा भजन कीर्तन करते हैं उन्हें श्रेष्ठ यज्ञों से जो पुण्य मिलता उससे कहीं बढ़कर शुभ फलों की प्राप्ति होती है ।।

।। नारायण सभी का कल्याण करें ।।
जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम् ।।
जय जय श्री राधे ।।
जय श्रीमन्नारायण ।।

उसकी किस्मत में मेरी भी जान लिख दे ।। Usaki Kismat Me Meri Bhi Jaan Likh De.

जय श्रीमन्नारायण,

मेरे प्यारे कन्हैया जी, मेरे प्रियतम कान्हा जी !

प्यारे ! तेरी आरजू में हम दीवाने हो गए ।
तुझे अपना बनाते बनाते खुद ही बेगाने हो गए ।।
कर ले सिर्फ एक बार मुझे याद अपने दिल से ।
तेरे दिल की आवाज़ सुने मुझको ज़माने हो गए ।।
 
उम्मीदें जुड़ी हैं तुझसे टूटने मत देना ।
मेरा दिल एक मोम है पिघलने मत देना ।।
दिल ने चाहा है गहराइयों से आज पता चला ।
इस दिल की धड़कन को कभी बंद होने मत देना ।।
 
चलते-चलते मेरे कदम हमेशा यही सोचते हैं ।
कि किस ओर जाऊं जो मुझे तूं मिल जाये ।।
हर एक नखरा तेरा मेरे दिल में आबाद हो जाये ।
तुझे मैं इतना देखूं कि तूं मेरा सदा के लिए हो जाये ।।
 
तकदीर लिखने वाले एक एहसान लिख दे ।
मेरे प्यारे की तकदीर में सिर्फ मुस्कान लिख दे ।।
ना हो कभी उदास जिंदगी में चेहरा उसका ।
भले ही उसकी किस्मत में मेरी जान भी लिख दे ।।
 

कभी तो आ भी जाओ प्रियतम ! क्योंकि प्यारे !

 
आपके बिना हमारा कोई आस्तित्व ही नहीं बचता ।।
 
।। नारायण सभी का कल्याण करें ।।
 
 
जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम् ।।
 
जय जय श्री राधे ।।
जय श्रीमन्नारायण ।।