मोक्षदा एकादशी व्रत कथा एवं पूजा विधि सहित हिन्दी में ।। Mokshda Ekadashi Vrat Katha And Vidhi in Hindi.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, महाराज युधिष्ठिर ने कहा- हे भगवन! आप तीनों लोकों के स्वामी, सबको सुख देने वाले और जगत के पति हैं । मैं आपको नमस्कार करता हूँ । हे देव! आप सबके हितैषी हैं अत: मेरे संशय को दूर करें और मुझे बतायें कि मार्गशीर्ष एकादशी का क्या नाम है?।।

उस दिन कौन से देवता का पूजन किया जाता है और उसकी क्या विधि है ? कृपया मुझे बताएँ । भक्तवत्सल भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे धर्मराज, तुमने बड़ा ही उत्तम प्रश्न किया है । जिसके श्रवण मात्र से ही तुम्हारा यश संसार में फैलेगा । मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी अनेक पापों को नष्ट करने वाली है । इसका नाम मोक्षदा एकादशी है ।।

इस दिन दामोदर भगवान श्रीमन्नारायण की धूप-दीप, नैवेद्य आदि से भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिए । मार्गशीर्ष शुक्ल दशमी से ही इस व्रत को आरंभ किया जाता है । दशमी को सायंकाल भोजन के बाद अच्छी प्रकार से दातुन करें ताकि अन्न का अंश भी मुँह में रह न जाए । हो सके तो दशमी की रात्रि को भोजन भी न करें तथा न अधिक बोलें ।।

एकादशी के दिन प्रात: काल उठकर सबसे पहले व्रत का संकल्प करें । इसके पश्चात शौच आदि से निवृत्त होकर शुद्ध जल से स्नान करें । व्रत करने वाले को किसी भी चोर, पाखंडी, परस्त्रीगामी, निंदक, मिथ्याभाषी तथा किसी भी प्रकार के पापी से बात नहीं करना चाहिये । स्नान के उपरान्त धूप, दीप, नैवेद्य आदि षोडश उपचारों से भगवान श्री दामोदर का पूजन करें ।।

किसी भी व्रत में रात्रि में स्त्री प्रसंग भूलकर भी नहीं करना चाहिए । हो सके तो रात्रि जागरण अर्थात रात में भजन-कीर्तन आदि करना चाहिए । जो कुछ पहले जाने-अनजाने में पाप हो गए हों, उनकी क्षमा याचना भी अवश्य करनी चाहिए । जो मनुष्य इस विधि के अनुसार एकादशी का व्रत करते हैं, उन्हें समस्त तीर्थ में स्नान करके भगवान के दर्शन करने से जो फल प्राप्त होता है, वह एकादशी व्रत के सोलहवें भाग के भी समान नहीं है ।।

हे धर्मराज! अब इस विषय में मैं एक पुराणों की कथा कहता हूँ । गोकुल नाम के नगर में वैखानस नाम का एक राजा राज्य करता था । उसके राज्य में चारों वेदों के ज्ञाता ब्राह्मण रहते थे । वह राजा अपनी प्रजा का पुत्रवत पालन करता था । एक बार रात्रि में राजा ने एक स्वप्न देखा कि उसके पिता नरक में हैं । उसे बड़ा आश्चर्य हुआ । प्रात: वह विद्वान ब्राह्मणों के पास गया और अपना स्वप्न सुनाया ।।

राजा ने विद्वानों से कहा- मैंने अपने पिता को नरक में कष्ट उठाते देखा है । उन्होंने मुझसे कहा कि हे पुत्र मैं नरक में पड़ा हूँ । यहाँ से तुम मुझे मुक्त करवाओ । जब से मैंने ये वचन सुने हैं तब से मैं बहुत बेचैन हूँ । चित्त में बड़ी अशांति हो रही है । मुझे इस राज्य, धन, पुत्र, स्त्री, हाथी, घोड़े आदि सब में कुछ भी सुख की प्रतीत नहीं होती मैं क्या करूँ?।।

राजा ने कहा- हे ब्राह्मण देवताओं! इस दु:ख के कारण मेरा सारा शरीर जल रहा है । अब आप कृपा करके कोई तप, दान, व्रत अथवा कोई ऐसा उपाय बताइए जिससे मेरे पिता को मुक्ति मिल जाए । उस पुत्र का जीवन व्यर्थ है जो अपने माता-पिता का उद्धार न कर सके । एक उत्तम पुत्र वही जो अपने माता-पिता तथा पूर्वजों का उद्धार करता है, वह हजार मुर्ख पुत्रों से अच्छा है । जैसे एक चंद्रमा सारे जगत में प्रकाश कर देता है, परंतु हजारों तारे नहीं कर सकते ।।

ब्राह्मणों ने कहा- हे राजन! यहाँ पास ही भूत, भविष्य, वर्तमान के ज्ञाता पर्वत ऋषि का आश्रम है । आपकी समस्या का हल वे जरूर करेंगे । ऐसा सुनकर राजा मुनि के आश्रम पर गया । उस आश्रम में अनेक शांत चित्त योगी और मुनि तपस्या कर रहे थे । उसी जगह पर्वत मुनि बैठे थे । राजा ने मुनि को साष्टांग दंडवत किया । मुनि ने राजा से सांगोपांग कुशल पूछी । राजा ने कहा कि महाराज आपकी कृपा से मेरे राज्य में सब कुशल हैं ।।

लेकिन अकस्मात मेरे चित्त में अत्यंत अशांति होने लगी है । ऐसा सुनकर पर्वत मुनि ने आँखें बंद की और भूत विचारने लगे । फिर बोले हे राजन! मैंने योग के बल से तुम्हारे पिता के कुकर्मों को जान लिया है । उन्होंने पूर्व जन्म में कामातुर होकर एक पत्नी को रति दी किंतु सौत के कहने पर दूसरे पत्नी को ऋतुदान माँगने पर भी नहीं दिया । उसी पापकर्म के कारण तुम्हारे पिता को नर्क में जाना पड़ा ।।

तब राजा ने बड़ी विनम्रता से पूछा – इसका कोई उपाय बताइए प्रभु । मुनि बोले- हे राजन! आप मार्गशीर्ष एकादशी का उपवास करें और उस उपवास के पुण्य को अपने पिता को संकल्प करके दे दें । इसके प्रभाव से आपके पिता की अवश्य नर्क से मुक्ति हो जायेगी । मुनि के ये वचन सुनकर राजा महल में आया और मुनि के कहने अनुसार कुटुम्ब सहित मोक्षदा एकादशी का व्रत किया ।।

व्रत के उपरान्त व्रत के उपवास का पुण्य उसने अपने पिता को अर्पण कर दिया । इसके प्रभाव से उसके पिता को मुक्ति मिल गई और स्वर्ग में जाते हुए वे पुत्र से कहने लगे- हे पुत्र तेरा कल्याण हो । यह कहकर स्वर्ग चले गए । मार्गशीर्ष मास की शुक्ल पक्ष की मोक्षदा एकादशी का जो व्रत करते हैं, उनके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं । इस व्रत से बढ़कर मोक्ष देने वाला और कोई व्रत नहीं है । इस कथा को पढ़ने या सुनने से वायपेय यज्ञ का फल मिलता है । यह व्रत मोक्ष देने वाला तथा चिंतामणि के समान सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला है ।।

 

।। नारायण सभी का कल्याण करें ।।
जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम् ।।
जय जय श्री राधे ।।
जय श्रीमन्नारायण ।।

उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा एवं पूजा विधि सहित हिन्दी में।। Utpanna Ekadashi Vrat Katha And Vidhi in Hindi.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, एक समय कि बात है, उत्पन्ना एकादशी के विषय में ऋषियों द्वारा पूछने पर सूतजी कहने लगे- हे ऋषियों! इस व्रत का वृत्तांत और उत्पत्ति प्राचीनकाल में भगवान कृष्ण ने युधिष्ठिर से कही थी । वही मैं तुमसे कहता हूँ। एक समय यु‍धिष्ठिर ने भगवान से पूछा था, उत्पन्ना नाम कि एकादशी व्रत किस विधि से किया जाता है और उसका क्या फल प्राप्त होता है।।

उपवास के दिन के भी सभी कृत्यों को भी कृपा करके बतायें। यह बात सुनकर भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे- हे युधिष्ठिर! मैं तुमसे एकादशी के व्रत का माहात्म्य कहता हूँ। सर्वप्रथम हेमंत ऋ‍तु में मार्गशीर्ष कृष्ण दशमी से इस व्रत को आरंभ किया जाता है । दशमी को सायंकाल भोजन के बाद अच्छी प्रकार से दातुन करें ताकि अन्न का अंश भी मुँह में रह न जाए।।

दशमी की रात्रि को भोजन भी न करें तथा न अधिक बोलें। एकादशी के दिन प्रात: 4 बजे उठकर सबसे पहले व्रत का संकल्प करें । इसके पश्चात शौच आदि से निवृत्त होकर शुद्ध जल से स्नान करें। व्रत करने वाला चोर, पाखंडी, परस्त्रीगामी, निंदक, मिथ्याभाषी तथा किसी भी प्रकार के पापी से बात न करे। स्नान के पश्चात धूप, दीप, नैवेद्य आदि षोडश उपचारों से भगवान का पूजन करें और रात को दीपदान करें।।

रात्रि में सोना या स्त्री प्रसंग भूलकर भी नहीं करना चाहिए। सारी रात भजन-कीर्तन आदि करना चाहिए। जो कुछ पहले जाने-अनजाने में पाप हो गए हों, उनकी क्षमा याचना भी अवश्य करनी चाहिए। धर्मात्मा पुरुषों को कृष्ण और शुक्ल दोनों पक्षों की एकादशियों को समान समझना चाहिए। जो मनुष्य ऊपर लिखी विधि के अनुसार एकादशी का व्रत करते हैं, उन्हें शंखोद्धार तीर्थ में स्नान करके भगवान के दर्शन करने से जो फल प्राप्त होता है, वह एकादशी व्रत के सोलहवें भाग के भी समान नहीं है।।

व्यतिपात के दिन दान देने का लाख गुना फल होता है । संक्रांति से चार लाख गुना तथा सूर्य-चंद्र ग्रहण में स्नान-दान से जो पुण्य प्राप्त होता है वही पुण्य एकादशी के दिन व्रत करने से मिलता है । अश्वमेध यज्ञ करने से सौ गुना तथा एक लाख तपस्वियों को साठ वर्ष तक भोजन कराने से दस गुना, दस ब्राह्मणों अथवा सौ ब्रह्मचारियों को भोजन कराने से हजार गुना पुण्य भूमिदान करने से प्राप्त होता है ।।

उससे भी हजार गुना पुण्य कन्यादान से प्राप्त होता है । इससे भी दस गुना पुण्य विद्यादान करने से होता है । विद्यादान से दस गुना पुण्य भूखे को भोजन कराने से होता है । अन्नदान के समान इस संसार में कोई ऐसा कार्य नहीं जिससे देवता और पितर दोनों तृप्त होते हों परंतु एकादशी के व्रत का पुण्य सबसे अधिक होता है । हजार यज्ञों से भी अधिक इसका फल होता है ।।

इस व्रत का प्रभाव देवताओं को भी दुर्लभ है । रात्रि को भोजन करने वाले को उपवास का आधा फल मिलता है । दिन में एक बार भोजन करने वाले को भी आधा ही फल प्राप्त होता है । जबकि निर्जल व्रत रखने वाले का माहात्म्य तो देवता भी वर्णन नहीं कर सकते । युधिष्ठिर ने पूछा कि हे भगवन! आपने हजारों यज्ञ और लाख गौदान को भी एकादशी व्रत के बराबर नहीं बताया । सो यह तिथि सब तिथियों से उत्तम कैसे हुई, बताइए ।।

भगवन कहने लगे- हे युधिष्ठिर! सतयुग में मुर नाम का दैत्य हुआ था । वह बड़ा बलवान और भयानक था । उस प्रचंड दैत्य ने इंद्र, आदित्य, वसु, वायु, अग्नि आदि सभी देवताओं को पराजित करके भगा दिया । तब इंद्र सहित सभी देवताओं ने भयभीत होकर भगवान शिव से सारा वृत्तांत कहा और बोले हे कैलाशपति! मुर दैत्य से भयभीत होकर सब देवता मृत्यु लोक में फिर रहे हैं ।।

तब भगवान शिव ने कहा- हे देवताओं! तीनों लोकों के स्वामी, भक्तों के दु:खों का नाश करने वाले भगवान विष्णु की शरण में जाओ । वे ही तुम्हारे दु:खों को दूर कर सकते हैं । शिवजी के ऐसे वचन सुनकर सभी देवता क्षीरसागर में पहुँचे । वहाँ भगवान को शयन करते देख हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करने लगे । देवताओं द्वारा स्तुति करने योग्य प्रभो! आपको बारम्बार नमस्कार है, देवताओं की रक्षा करने वाले मधुसूदन! आपको नमस्कार है।।

आप हमारी रक्षा करें । दैत्यों से भयभीत होकर हम सब आपकी शरण में आए हैं । आप इस संसार के कर्ता, माता-पिता, उत्पत्ति और पालनकर्ता तथा संहार भी करने वाले हैं । सबको शांति प्रदान करने वाले भी आप ही हैं । आकाश और पाताल भी आप ही हैं । सबके पितामह ब्रह्मा, सूर्य, चंद्र, अग्नि, सामग्री, होम, आहुति, मंत्र, तंत्र, जप, यजमान, यज्ञ, कर्म, कर्ता, भोक्ता भी आप ही हैं । आप सर्वव्यापक हैं और आपके सिवा तीनों लोकों में चर तथा अचर कुछ भी नहीं है।।

हे भगवन्! दैत्यों ने हमको जीतकर स्वर्ग से च्युत कर दिया है और हम सब देवता इधर-उधर भागे-भागे फिर रहे हैं, आप उन दैत्यों से हम सबकी रक्षा करें । इंद्र के ऐसे वचन सुनकर भगवान विष्णु कहने लगे कि हे इंद्र! ऐसा मायावी दैत्य कौन है जिसने सब देवताओं को जीत लिया है, उसका नाम क्या है, उसमें कितना बल है और किसके आश्रय में है तथा उसका स्थान कहाँ है? यह सब मुझसे कहो।।

भगवान के इस प्रकार पूछने पर देवराज इंद्र बोले- भगवन! प्राचीन समय में एक नाड़ीजंघ नामक राक्षस था । उसका एक महापराक्रमी और लोकविख्यात मुर नाम का एक पुत्र हुआ । उसकी चंद्रावती नाम की नगरी है । उसी ने सब देवताओं को स्वर्ग से निकालकर वहाँ अपना अधिकार जमा लिया है । उसने इंद्र, अग्नि, वरुण, यम, वायु, ईश, चंद्रमा, नैऋत आदि सबके स्थान पर अधिकार कर लिया है।।

सूर्य बनकर स्वयं ही प्रकाश करता है । स्वयं ही मेघ बन बैठा है और सबसे अजेय है । हे असुर निकंदन! उस दुष्ट को मारकर देवताओं को अजेय बनाइए । इन बातों को सुनकर भगवान ने कहा- हे देवताओं, मैं शीघ्र ही उसका संहार करूंगा । तुम चंद्रावती नगरी जाओ । इस प्रकार कहकर भगवान सहित सभी देवताओं ने चंद्रावती नगरी की ओर प्रस्थान किया । उस समय दैत्य मुर सेना सहित युद्ध भूमि में गरज रहा था ।।

उसकी भयानक गर्जना सुनकर सभी देवता भय के मारे चारों दिशाओं में भागने लगे । जब स्वयं भगवान रणभूमि में आए तो दैत्य उन पर भी अस्त्र, शस्त्र, आयुध लेकर दौड़े । भगवान ने उन्हें सर्प के समान अपने बाणों से बींध डाला । बहुत-से दैत्य मारे गए बस केवल मुर बचा रहा । वह अविचल भाव से भगवान के साथ युद्ध करता रहा । भगवान ने जो-जो भी तीक्ष्ण बाण चलाये वह उसके लिए पुष्प सिद्ध होता रहा ।।

उसका शरीर छिन्न‍-भिन्न हो गया किंतु वह लगातार युद्ध करता रहा । दोनों के बीच मल्लयुद्ध भी हुआ । यह युद्ध दस हजार वर्ष तक चलता रहा किंतु मुर नहीं हारा । थककर भगवान बद्रिकाश्रम चले गए । वहां हेमवती नामक सुंदर गुफा थी, उसमें विश्राम करने के लिए भगवान उसके अंदर प्रवेश कर गए । यह गुफा द्वादश योजन लंबी थी और उसका एक ही द्वार था । विष्णु भगवान वहां योगनिद्रा की गोद में सो गए ।।

मुर भी पीछे-पीछे आ गया और भगवान को सोया देखकर मारने को उद्यत हुआ तभी भगवान के शरीर से उज्ज्वल, कांतिमय रूप वाली देवी प्रकट हुई । देवी ने राक्षस मुर को ललकारा, युद्ध किया और उसे तत्काल मौत के घाट उतार दिया । भगवान श्री हरि जब योगनिद्रा की गोद से उठे, तो सब बातों को जानकर उस देवी से कहा कि आपका जन्म एकादशी के दिन हुआ है, अत: आप उत्पन्ना एकादशी के नाम से पूजित होंगी । आपके भक्त वही होंगे, जो मेरे भक्त हैं ।।

ऐसी इस उत्पन्ना नाम की एकादशी को जो मुर नामक दैत्य का हनन करनेवाली और भगवान श्रीहरि द्वारा सम्मानित हैं। ऐसी देवी इस व्रत से प्रशन्न होकर भगवान का सान्निध्य प्रदान कर देती हैं । इस लोक के समस्त सुखों को सहज ही प्रदान कर देती हैं। इसलिये पूरी श्रद्धा से उपरोक्त विधि के अनुसार इस एकादशी के व्रत को करना चाहिये।।

।। नारायण सभी का कल्याण करें ।।
जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम् ।।
जय जय श्री राधे ।।
जय श्रीमन्नारायण ।।

देवउठनी एकादशी व्रत कथा एवं पूजा विधि सहित हिन्दी में ।। Devuthani Ekadashi Vrat Katha And Vidhi in Hindi.

जय श्रीमन्नारायण,
मित्रों, कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवउठनी, देवोत्थान तथा प्रबोधिनी एकादशी कहा जाता है । आज से ही तुलसी विवाह आरम्भ किया जाता है और देवी लक्ष्मी एवं भगवान श्री विष्णु की पूजा की जाती है । देवउठनी एकादशी का व्रत रखने से व्यक्ति को स्वर्ग में स्थान मिलता है और व्यक्ति के सारे पाप भी नष्ट हो जाते हैं ।।
आज भगवान श्रीमन्नारायण श्रीविष्णु की विधि-विधान से पूजा पाठ करनी चाहिए । पूजा संपन्न होने के बाद एकादशी व्रत कथा पढ़नी चाहिए । आइए जानते हैं देवउठनी एकादशी की पौराणिक व्रत कथा ।।

देवउठनी एकादशी व्रत कथा ।। Devuthani Ekadashi Vrat Katha.

मित्रों, कथा के अनुसार एक राजा के राज्य में सभी लोग एकादशी का व्रत रखते थे । प्रजा तथा नौकर-चाकरों से लेकर पशुओं तक को एकादशी के दिन अन्न नहीं दिया जाता था । तभी एक दिन किसी दूसरे राज्य का एक व्यक्ति राजा के पास आया और खुद को उनके राज्य में नौकरी पर रखने के लिए बोला । उसके बाद राजा ने उस व्यक्ति के सामने एक शर्त रखी ।।
राजा ने कहा- प्रतिदिन तुम्हें खाने को सब कुछ मिलेगा, परन्तु एकादशी के दिन तुम्हें अन्न नहीं दिया जाएगा । उस व्यक्ति ने उस समय राजा की बात मान ली । परन्तु एकादशी के दिन जब उसे फलाहार का सामान दिया गया तो वह राजा के सामने जाकर गिड़गिड़ाने लगा और बोला महाराज इससे मेरा पेट नहीं भरेगा । मैं भूखा मर जाऊंगा, इसलिये कृपया मुझे अन्न दे दें ।।
राजा ने उसे शर्त की बात याद दिलाई उसके बाद भी वह नहीं माना । इसके बाद राजा ने उसे आटा-दाल-चावल आदि दे दिए । वह हर दिन की तरह नदी पर गया वहां स्नान कर भोजन पकाया और भगवान का आवाहन किया । भगवान विष्णु वहां प्रकट हुए और प्रेम से उसके साथ भोजन करने लगे । भोजनादि करके भगवान वहां से अंतर्धान हो गए और व्यक्ति अपने काम पर निकल गया ।।
पंद्रह दिन बाद अगली एकादशी को वह राजा से कहने लगा कि महाराज, मुझे दुगुना सामान दीजिए । उस दिन तो मैं भूखा ही रह गया था । राजा ने कारण पूछा तो उसने बताया कि हमारे साथ भगवान भी खाते हैं । इसीलिए हम दोनों के लिए ये सामान पूरा नहीं होता । यह सुनकर राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ । वह बोला- मैं नहीं मान सकता कि भगवान तुम्हारे साथ खाते हैं ।।
मैं तो इतना व्रत रखता हूं, पूजा करता हूं, पर भगवान ने मुझे कभी दर्शन नहीं दिए । राजा की बात सुनकर वह बोला- महाराज! यदि विश्वास न हो तो साथ चलकर देख लीजिये । राजा एक पेड़ के पीछे छिपकर बैठ गया । उस व्यक्ति ने भोजन बनाया तथा भगवान को शाम तक पुकारता रहा, परंतु भगवान न आए । अंत में उसने कहा- हे भगवान! यदि आप नहीं आए तो मैं नदी में कूदकर प्राण त्याग दूंगा ।।
लेकिन भगवान नहीं आए, तब वह प्राण त्यागने के उद्देश्य से नदी की तरफ बढ़ा । प्राण त्यागने का उसका दृढ़ इरादा जान शीघ्र ही भगवान ने प्रकट होकर उसे रोक लिया और साथ बैठकर भोजन करने लगे । खा-पीकर वे उसे अपने विमान में बिठाकर अपने धाम को ले गए ।।
यह देख राजा ने सोचा कि व्रत-उपवास से तब तक कोई फायदा नहीं होता, जब तक मन शुद्ध न हो । इससे राजा को ज्ञान मिला और वह भी मन से व्रत-उपवास करने लगा और अंत में स्वर्ग को प्राप्त हुआ । इसलिए सच्चे मन से एकादशी का व्रत करने से व्रती को स्वर्ग की प्राप्ति अवश्य ही होती है ।।
देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु का विशेष सामग्री से पूजन ।। Dev Uthani Ekadashi Par Vishesh Poojan.
देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु का यथाविधान पूजन करें और ये विशेष रूप से यह फुल और फल अर्पित करें । इससे वैकुण्ठ में अर्थात् विष्णु लोक में सर्वश्रेष्ठ स्थान मिलती है ।।
कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का बहुत महत्व होता है । आज भगवान विष्णु नींद से जगते हैं, इसलिए इसे देवउठनी एकादशी कहते हैं । कार्तिक मास की एकादशी को देवप्रबोधिनी एकादशी भी कहा जाता हैं । एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा कर उन्हें प्रसन्न किया जाता है वहीं देवउठनी एकादशी के दिन तुलसी विवाह भी किया जाता है ।।
आज से वैदिक सनातन धर्म में मांगलिक कार्यों की शुरुआत हो जाती है । वहीं आज कुछ लोग भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए कई उपाय भी करते हैं । आज आप भी अपनी मनोकामनाओं के अनुसार भगवान को प्रसन्न करने के लिये इन उपायों को सकते हैं । एकादशी के दिन अलग-अलग प्रकार के पुष्पों से भगवान विष्णु को प्रशन्न करना चाहिये । इससे व्यक्ति के जन्म-जन्मांतर के सभी पाप नष्‍ट हो जाते हैं और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है ।।
देवउठनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु को बेलपत्र अर्पित करने से मनुष्य को मुक्ति मिलती है, साथ ही उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं । इस एकादशी पर तुलसी विवाह भी किया जाता है और भगवान विष्णु के भोग में तुलसी जरुरी होती है । वहीं इस दिन भगवान विष्णु को तुलसी अर्पित करने से मनुष्य के 10,000 जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं ।।
देवउठनी एकादशी के दिन विष्णु जी को कदम्ब के फूल अर्पित करें, इससे व्यक्ति को कभी यमराज नहीं दिखते । प्रबोधिनी एकादशी के दिन जो भक्त श्री हरि को गुलाब के फूल अर्पित करते हैं, उन्हें सहज ही मुक्ति प्राप्त हो जाती है । देवउठनी एकादशी को जो मनुष्य सफेद या लाल कनेर के फूलों से भगवान का पूजन करते हैं, उन पर भगवान अत्यंत प्रसन्न होते हैं ।।
जो मनुष्य भगवान विष्णु पर आम की मंजरी चढ़ाते हैं, वे करोड़ों गायों के दान का फल प्राप्त करते हैं । प्रबोधिनी एकादशी के दिन जो व्यक्ति दुर्वांकुरों से भगवान की पूजा करते हैं, उन्हें 100 गुना ज्यादा पूण्य प्राप्त होता हैं । देवउठनी एकादशी के दिन जो भी व्यक्ति भगवान विष्णु को चंपा के पुष्पों से पूजन करते हैं, उनकी मुक्ति निश्चित ही हो जाती है तथा उन्हें संसार के दु:ष्कर्मों का फल नहीं भोगना पड़ता है ।।
पीले रक्त वर्ण के कमल पुष्पों से भगवान का पूजन करने वाले को विष्णु लोक में स्थान मिलता है । भगवान श्रीविष्णु को केतकी के फूल अर्पित करने से व्यक्ति के करोड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं । जो व्यक्ति बकुल और अशोक के पुष्पों को भगवान विष्णु को अर्पित करते हैं, उन्हें अपने जीवन में कभी किसी प्रकार का शोक का सामना नहीं करना पड़ता हैं ।।
जो व्यक्ति कार्तिक मास में तुलसी का रोपण करता है और रोपी गई तुलसी जितनी जड़ों का विस्तार करती है उतने ही हजार युगपर्यंत तुलसी रोपण करने वाले का वंश विस्तार होता है । देवउठनी एकादशी पर तुलसी दर्शन का अधिक महत्व माना गया है । तुलसी के पौधे को स्पर्श करने, कथा कहने, स्तुति करने, तुलसी रोपण और प्रतिदिन पूजन-सेवा आदि करने से हजार करोड़ युगपर्यंत विष्णुलोक में निवास करते हैं ।।
।। नारायण सभी का कल्याण करें ।।
जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम् ।।
जय जय श्री राधे ।।जय श्रीमन्नारायण ।।
रम्भा एकादशी व्रत विधि एवं कथा सहित हिन्दी में ।। Rambha Ekadashi Vrat Vidhi And Katha in Hindi.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, धर्मराज युधिष्ठिर कहने लगे कि हे भगवन् ! कार्तिक कृष्ण एकादशी का क्या नाम है ? इसकी विधि क्या है ? इसके करने से क्या फल मिलता है । सो आप विस्तारपूर्वक बताइए । भगवान श्रीकृष्ण बोले कि कार्तिक कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम रमा या रम्भा है । यह बड़े-बड़े पापों का नाश करने वाली है । इसका माहात्म्य मैं तुमसे कहता हूं, ध्यानपूर्वक सुनो ।।

हे राजन! प्राचीनकाल में मुचुकुंद नाम के एक राजा थे । उनकी इंद्र के साथ मित्रता थी और साथ ही यम, कुबेर, वरुण और विभीषण भी उसके मित्र थे । यह राजा बड़े ही धर्मात्मा, विष्णुभक्त और न्याय के साथ राज करते थे । उस राजा की एक कन्या थी, जिसका नाम चंद्रभागा था । उस कन्या का विवाह चंद्रसेन के पुत्र राजकुमार शोभन के साथ हुआ था । एक समय राजकुमार शोभन ससुराल आया । उन्हीं दिनों जल्दी ही पुण्यदायिनी रमा अथवा रम्भा एकादशी भी आने वाली थी ।।

जब व्रत का दिन समीप आ गया तो चंद्रभागा के मन में अत्यंत सोच उत्पन्न हुआ कि मेरे पति अत्यंत दुर्बल हैं और मेरे पिता की आज्ञा अति कठोर है । दशमी को राजा ने ढोल बजवाकर सारे राज्य में यह घोषणा करवा दी कि एकादशी को भोजन नहीं करना चाहिए । राजा की घोषणा सुनते ही शोभन को अत्यंत चिंता हुई और अपनी पत्नी से कहा कि हे प्रिये! अब क्या करना चाहिए ? मैं किसी प्रकार भी भूख सहन नहीं कर सकूंगा । ऐसा उपाय बतलाओ कि जिससे मेरे प्राण बच सकें, अन्यथा मेरे प्राण अवश्य चले जाएंगे ।।

चंद्रभागा कहने लगी कि हे स्वामी! मेरे पिता के राज में एकादशी के दिन कोई भी भोजन नहीं करता । हाथी, घोड़ा, ऊंट, बिल्ली, गौ आदि भी तृण, अन्न, जल आदि ग्रहण नहीं करते, फिर मनुष्य का तो कहना ही क्या है । यदि आप भोजन करना चाहते हैं तो किसी दूसरे स्थान पर चले जाइए, क्योंकि यदि आप यहीं रहना चाहते हैं तो आपको अवश्य व्रत करना पड़ेगा । ऐसा सुनकर शोभन कहने लगा कि हे प्रिये! मैं अवश्य व्रत करूंगा, जो भाग्य में होगा, वह देखा जाएगा ।।

इस प्रकार से विचार कर शोभन ने व्रत रख लिया और वह भूख एवं प्यास से अत्यंत पीडि़त हो गया । जब सूर्य नारायण अस्त हो गए और रात्रि को जागरण का समय आया जो वैष्णवों को अत्यंत हर्ष देने वाला था, परंतु शोभन के लिए अत्यंत दु:खदायी हुआ । प्रात:काल होते शोभन के प्राण निकल गए । तब राजा ने सुगंधित काष्ठ से उसका दाह संस्कार करवाया । परंतु चंद्रभागा ने अपने पिता की आज्ञा से अपने शरीर को दग्ध नहीं किया और शोभन की अंत्येष्टि क्रिया के बाद अपने पिता के घर में ही रहने लगी ।।

रमा एकादशी के प्रभाव से राजकुमार शोभन को मंदराचल पर्वत पर धन-धान्य से युक्त तथा शत्रुओं से रहित एक सुंदर देवपुर प्राप्त हुआ । वह अत्यंत सुंदर रत्न और वैदुर्यमणि जटित स्वर्ण के खंभों पर निर्मित अनेक प्रकार की स्फटिक मणियों से सुशोभित भवन में बहुमूल्य वस्त्राभूषणों तथा छत्र एवं चंवर से विभूषित, गंधर्व और अप्सराअओं से युक्त सिंहासन पर आरूढ़ ऐसा शोभायमान होता था मानो दूसरा इंद्र विराजमान हो ।।

एक समय मुचुकुंद नगर में रहने वाले एक सोम शर्मा नामक ब्राह्मण तीर्थयात्रा करता हुआ घूमता-घूमता उधर जा निकला और उसने शोभन को पहचान कर कि यह तो राजा का जमाई शोभन है, उसके निकट गया । शोभन भी उसे पहचान कर अपने आसन से उठकर उसके पास आया और प्रणामादि करके कुशल प्रश्न किया । ब्राह्मण ने कहा कि राजा मुचुकुंद और आपकी पत्नी कुशल से हैं । नगर में भी सब प्रकार से कुशल हैं, परंतु हे राजन! हमें आश्चर्य हो रहा है । आप अपना वृत्तांत कहिए कि ऐसा सुंदर नगर जो न कभी देखा, न सुना, आपको कैसे प्राप्त हुआ ।।

तब शोभन बोला कि कार्तिक कृष्ण की रमा अथवा रम्भा एकादशी का व्रत करने से मुझे यह नगर प्राप्त हुआ, परंतु यह अस्थिर है । यह स्थिर हो जाए ऐसा उपाय कीजिए । ब्राह्मण कहने लगा कि हे राजन! यह स्थिर क्यों नहीं है और कैसे स्थिर हो सकता है आप बताइए, फिर मैं अवश्यमेव वह उपाय करूंगा । मेरी इस बात को आप मिथ्या न समझिए । शोभन ने कहा कि मैंने इस व्रत को श्रद्धारहित होकर किया था । अत: यह सब कुछ अस्थिर है । यदि आप मुचुकुंद की कन्या चंद्रभागा को यह सब वृत्तांत कहें तो यह स्थिर हो सकता है ।।

ऐसा सुनकर उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने अपने नगर लौटकर चंद्रभागा से सब वृत्तांत कह सुनाया । ब्राह्मण के वचन सुनकर चंद्रभागा बड़ी प्रसन्नता से ब्राह्मण से कहने लगी कि हे ब्राह्मण! ये सब बातें आपने प्रत्यक्ष देखी हैं या स्वप्न की बातें कर रहे हैं । ब्राह्मण कहने लगा कि हे पुत्री! मैंने महावन में तुम्हारे पति को प्रत्यक्ष देखा है । साथ ही किसी से विजय न हो ऐसा देवताओं के नगर के समान उनका नगर भी देखा है । उन्होंने यह भी कहा कि यह स्थिर नहीं है । जिस प्रकार वह स्थिर रह सके सो उपाय करना चाहिए ।।

चंद्रभागा कहने लगी हे विप्र! तुम मुझे वहां ले चलो, मुझे पतिदेव के दर्शन की तीव्र लालसा है । मैं अपने किए हुए पुण्य से उस नगर को स्थिर बना दूंगी । आप ऐसा कार्य कीजिए जिससे उनका हमारा संयोग हो क्योंकि वियोगी को मिला देना महान पु्ण्य है । सोम शर्मा यह बात सुनकर चंद्रभागा को लेकर मंदराचल पर्वत के समीप वामदेव ऋषि के आश्रम पर गया । वामदेवजी ने सारी बात सुनकर वेद मंत्रों के उच्चारण से चंद्रभागा का अभिषेक कर दिया । तब ऋषि के मंत्र के प्रभाव और एकादशी के व्रत से चंद्रभागा का शरीर दिव्य हो गया और वह दिव्य गति को प्राप्त हुई ।।

इसके बाद बड़ी प्रसन्नता के साथ अपने पति के निकट गई । अपनी प्रिय पत्नी को आते देखकर शोभन अति प्रसन्न हुआ । और उसे बुलाकर अपनी बाईं तरफ बिठा लिया । चंद्रभागा कहने लगी कि हे प्राणनाथ! आप मेरे पुण्य को ग्रहण कीजिए । अपने पिता के घर जब मैं आठ वर्ष की थी तब से विधिपूर्वक एकादशी के व्रत को श्रद्धापूर्वक करती आ रही हूं । इस पुण्य के प्रताप से आपका यह नगर स्थिर हो जाएगा तथा समस्त कर्मों से युक्त होकर प्रलय के अंत तक रहेगा । इस प्रकार चंद्रभागा ने दिव्य आभू‍षणों और वस्त्रों से सुसज्जित होकर अपने पति के साथ आनंदपूर्वक रहने लगी ।।

हे राजन! यह मैंने रमा अथवा रम्भा एकादशी का माहात्म्य कहा है । जो मनुष्य इस व्रत को करते हैं, उनके ब्रह्म हत्यादि समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं । कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष दोनों की एका‍दशियां समान होती हैं, इनमें कोई भेदभाव नहीं है । दोनों समान फल देती हैं । जो मनुष्य इस माहात्म्य को पढ़ते अथवा सुनते हैं, वे समस्त पापों से छूटकर विष्णुलोक को प्राप्त होता हैं ।।

।। नारायण सभी का कल्याण करें ।।
जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम् ।।
जय जय श्री राधे ।।
जय श्रीमन्नारायण ।।
पापांकुशा एकादशी व्रत विधि एवं कथा सहित हिन्दी में ।। Papankusha Ekadashi Vrat Vidhi And Katha in Hindi.


जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पापांकुशा एकादशी कहते हैं । इस एकादशी पर मनोवांछित फल की प्राप्ति के लिए भगवान विष्णु की पूजा की जाती है । धर्म ग्रंथों के अनुसार, जो मनुष्य कठिन तपस्याओं के द्वारा फल प्राप्त करते हैं, वही फल इस एकादशी पर शेषनाग पर शयन करने वाले भगवान श्रीविष्णु को नमस्कार करने मात्र से ही मिल जाते हैं और मनुष्य को यमलोक के दु:ख नहीं भोगने पड़ते हैं ।।

इस एकादशी उपासक (व्रत करने वाले) के मातृपक्ष के दस और पितृपक्ष के दस पितरों को विष्णु लोक लेकर जाती है । पापाकुंशा एकादशी हजार अश्वमेघ और सौ सूर्ययज्ञ करने के समान फल प्रदान करने वाली होती है । इस एकादशी व्रत के समान अन्य कोई व्रत नहीं है । इसके अतिरिक्त जो व्यक्ति इस एकादशी की रात्रि में जागरण करता है वह वैकुण्ठ का भागी होता है । इस एकादशी के दिन दान करने से अनेक प्रकार के शुभ फलों की प्राप्ति होती है । श्रद्धालु भक्तों के लिए एकादशी के दिन व्रत करना प्रभु भक्ति के मार्ग में प्रगति करने का माध्यम माना जाता है ।।


पापाकुंशा एकादशी व्रत विधि ।। Papankusha Ekadashi Vrat Vidhi.

मित्रों, इस व्रत का पालन दशमी तिथि के दिन से ही करना चाहिए । दशमी तिथि पर सात धान्य अर्थात गेहूं, उड़द, मूंग, चना, जौ, चावल और मसूर की दाल नहीं खानी चाहिए, क्योंकि इन सातों धान्यों की पूजा एकादशी के दिन की जाती है । जहां तक संभव हो दशमी तिथि और एकादशी तिथि दोनों ही दिनों में कम से कम बोलना चाहिए । दशमी तिथि को भोजन में तामसिक वस्तुओं का सेवन नहीं करना चाहिए और पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए ।।

एकादशी तिथि पर सुबह उठकर स्नान आदि करने के बाद व्रत का संकल्प लेना चाहिए । संकल्प अपनी शक्ति के अनुसार ही लेना चाहिए यानी एक समय फलाहार का या फिर बिना भोजन का । संकल्प लेने के बाद घट स्थापना की जाती है और उसके ऊपर श्रीविष्णुजी की मूर्ति रखी जाती है । इसके साथ भगवान विष्णु का स्मरण एवं उनकी कथा का श्रवण किया जाना चाहिये । इस व्रत को करने वाले को विष्णु के सहस्रनाम का पाठ करना चाहिए । इस व्रत का समापन एकादशी तिथि में नहीं होता है, बल्कि द्वादशी तिथि की प्रात: में ब्राह्माणों को अन्न का दान और दक्षिणा देने के बाद ही यह व्रत समाप्त होता है ।।


पापांकुशा एकादशी व्रत कथा ।। Papankusha Ekadashi Vrat Katha.

धर्मराज युधिष्ठिर कहने लगे कि हे भगवान ! आश्विन शुक्ल एकादशी का क्या नाम है ? अब आप कृपा करके इसकी विधि तथा फल कहिए । भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे युधिष्ठिर ! पापों का नाश करने वाली इस एकादशी का नाम पापांकुशा एकादशी है । हे राजन! इस दिन मनुष्य को विधिपूर्वक भगवान पद्‍मनाभ की पूजा करनी चाहिए । यह एकादशी मनुष्य को मनवांछित फल देकर स्वर्ग को प्राप्त कराने वाली है ।।

जो मनुष्य वैष्णव होकर शिव की और शैव होकर विष्णु की निंदा करते हैं, वे अवश्य नरकवासी होते हैं । सहस्रों वाजपेय और अश्वमेध यज्ञों से जो फल प्राप्त होता है, वह एकादशी के व्रत के सोलहवें भाग के बराबर भी नहीं होता है। संसार में एकादशी के बराबर कोई पुण्य नहीं। इसके बराबर पवित्र तीनों लोकों में कुछ भी नहीं। इस एकादशी के बराबर कोई व्रत नहीं। जब तक मनुष्य पद्‍मनाभ की एकादशी का व्रत नहीं करते हैं, तब तक उनकी देह में पाप वास कर सकते हैं ।।


हे राजेन्द्र! यह एकादशी स्वर्ग, मोक्ष, आरोग्यता, सुंदर स्त्री तथा अन्न और धन की देने वाली है । एकादशी के व्रत के बराबर गंगा, गया, काशी, कुरुक्षेत्र और पुष्कर भी पुण्यवान नहीं हैं । हरिवासर तथा एकादशी का व्रत करने और जागरण करने से सहज ही में मनुष्य विष्णु पद को प्राप्त होता है । हे युधिष्ठिर! इस व्रत के करने वाले दस पीढ़ी मातृ पक्ष, दस पीढ़ी पितृ पक्ष, दस पीढ़ी स्त्री पक्ष तथा दस पीढ़ी मित्र पक्ष का उद्धार कर देते हैं । वे दिव्य देह धारण कर चतुर्भुज रूप हो, पीतांबर पहने और हाथ में माला लेकर गरुड़ पर चढ़कर विष्णुलोक को जाते हैं ।।

हे नृपोत्तम! बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था में इस व्रत को करने से पापी मनुष्य भी दुर्गति को प्राप्त न होकर सद्‍गति को प्राप्त होता है । आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की इस पापांकुशा एकादशी का व्रत जो मनुष्य करते हैं, वे अंत समय में हरिलोक को प्राप्त होते हैं तथा समस्त पापों से मुक्त हो जाते हैं । स्वर्ण, तिल, भूमि, गौ, अन्न, जल, छतरी तथा जूती दान करने से मनुष्य यमराज को नहीं देखता ।।

जो मनुष्य किसी प्रकार के पुण्य कर्म किए बिना जीवन के दिन व्यतीत करता है, वह लोहार की भट्टी की तरह साँस लेता हुआ निर्जीव के समान ही है । निर्धन मनुष्यों को भी अपनी शक्ति के अनुसार दान करना चाहिए तथा धनवालों को सरोवर, बाग, मकान आदि बनवाकर दान करना चाहिए । ऐसे मनुष्यों को यम का द्वार नहीं देखना पड़ता तथा संसार में दीर्घायु होकर धनाढ्‍य, कुलीन और रोगरहित रहते हैं ।।


भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- हे राजन! जो आपने मुझसे मुझसे पूछा वह सब मैंने आपको बतलाया । अब आपकी और क्या सुनने की इच्छा है ?युधिष्ठिर ने पूछा – भगवन् ! इस व्रत को सर्वप्रथम किसने किया था? तथा किसके कहने से किया था ? कृपा करके इस व्रत की कथा भी बतायें ।।

भगवान कृष्ण कहने लगे, कि राजन ! प्राचीन समय में विंध्य पर्वत पर क्रोधन नामक एक बहेलिया रहता था । वह बड़ा क्रूर था, उसका सारा जीवन पाप कर्मों में ही बीता । जब उसका अंत समय आया तो वह मृत्यु के भय से कांपता हुआ महर्षि अंगिरा के आश्रम में पहुंचकर याचना करने लगा- हे ऋषिवर! मैंने जीवन भर पाप कर्म ही किए हैं । कृपा करके मुझे कोई ऐसा उपाय बताएं, जिससे मेरे सारे पाप मिट जाएं और मोक्ष की प्राप्ति हो सके । उसके निवेदन पर महर्षि अंगिरा ने उसे पापांकुशा एकादशी का व्रत करके को कहा । महर्षि अंगिरा के कहे अनुसार उस बहेलिए ने पूर्ण श्रद्धा के साथ यह व्रत किया जिसके फलस्वरूप उसके किए गए सारे पापों से उसने छुटकारा पा लिया ।।


पापांकुशा एकादशी का महत्व ।। Papankusha Ekadashi Importance.

पापांकुशा एकादशी व्रत में यथासंभव दान व दक्षिणा देनी चाहिए। पूर्ण श्रद्धा के साथ यह व्रत करने से समस्त पापों से छुटकारा प्राप्त होता है। शास्त्रों में एकादशी के दिन की महत्ता को पूर्ण रुप से प्रतिपादित किया गया है। इस दिन उपवास रखने से पुण्य फलों की प्राप्ति होती है। जो लोग पूर्ण रूप से उपवास नहीं कर सकते उनके लिए मध्याह्न या संध्या काल में एक समय भोजन करके एकादशी व्रत करने की बात कही गई है।

एकादशी जीवों के परम लक्ष्य, भगवद भक्ति, को प्राप्त करने में सहायक होती है। यह दिन प्रभु की पूर्ण श्रद्धा से सेवा करने के लिए अति शुभकारी एवं फलदायक माना गया है। इस दिन व्यक्ति इच्छाओं से मुक्त हो कर यदि शुद्ध मन से भगवान की भक्तिमयी सेवा करता है तो वह अवश्य ही प्रभु की कृपापात्र बनता है ।।

जो इस पापांकुश एकादशी का व्रत रखता है, उसे अच्छा स्वास्थ्य, सुख, समृद्धि, ऐश्वर्य मिलता है । भगवान नारायण को मानने वालों के लिए, इस एकादशी का विशेष महत्व होता है । रीती रिवाजों के अनुसार इस दिन व्रत रखने वाले कृष्ण एवं राधा की पूजा अर्चना करते है । इस एकादशी के बारे में “ब्रह्मवैवर्त पुराण” में भी लिखा हुआ है, और इसे पाप से मुक्ति के लिए सबसे अधिक जरुरी माना गया है । इस पुराण के अनुसार महाराज युधिष्ठिर, भगवान् कृष्ण से इस व्रत के बारे में पूछते है, तब कृष्ण बताते है, कि हजारों वर्ष की तपस्या से जो फल नहीं मिलता, वो फल इस व्रत के करने से प्राप्त हो जाता है ।।


इससे अनजाने में किये मनुष्य के पाप भी क्षमा हो जाते है और उसे मुक्ति प्राप्त हो जाती है । भगवान कृष्ण बताते है, कि इस दिन दान का विशेष महत्व होता है । मनुष्य अगर अपनी इच्छा से अनाज, जूते-चप्पल, छाता, कपड़े, पशु, स्वर्ण आदि का दान करता है, तो इस व्रत का फल उसे पूर्णतः प्राप्त हो जाता है । उसे सांसारिक जीवन में सुख शांति, ऐश्वर्य, धन-दौलत, अच्छा परिवार मिलता है । भगवान कृष्ण ने बताया, कि इस व्रत को करने वाले मृत्यु के बाद नरक नहीं जाते और उन्हें यमराज का कभी नहीं होता है, बल्कि उसके लिये सीधे वैकुण्ठ का द्वार खुल जाता है ।।

।। नारायण सभी का कल्याण करें ।।


जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम् ।।

जय जय श्री राधे ।।
जय श्रीमन्नारायण ।।
इन्दिरा एकादशी व्रत विधि एवं कथा सहित हिन्दी में ।। Indira Ekadashi Vrat Vidhi And Katha in Hindi.


जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, पूरे वर्ष में कुल 24 एकादशी आती है इनमें एक एकादशी ऐसी है जो पितृपक्ष में आती है । इस एकादशी का नाम है इंदिरा एकादशी । पितृपक्ष की एकादशी होने के कारण यह एकादशी पितरों की मुक्ति के लिए उत्तम मानी गई । इस एकादशी की महिमा का उल्लेख ब्रह्मवैवर्त पुराण में मिलता है ।।

जो व्यक्ति इस एकादशी का व्रत रखकर भगवान हृषिकेश की पूजा करता है वह मृत्यु के बाद यमलोक जाने से बच जाता है । इतना ही नहीं अपितु जिनके पूर्वज यानी पितर किसी पाप के कारण यमलोक में यम की यातना सह रहे हैं उन्हें भी यम के कोप से मुक्ति मिल जाती है ।।

ऐसे पितर लोग भी स्वर्ग के अधिकारी बन जाते हैं । पितृपक्ष में इस एकादशी के आने का उद्देश्य भी यही है, कि जिनके पितर यम की यातना सह रहे हैं उन्हें भी मुक्ति मिल जाए ।।


एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण से पूछा, कि हे भगवन्! आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है ? इसकी विधि तथा फल क्या है यह भी कृपा करके बतायें । भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे, कि हे राजन! इस एकादशी का नाम इंदिरा एकादशी है ।।

यह एकादशी मनुष्य के समस्त पापों को नष्ट करने वाली तथा पितरों को अधोगति से मुक्ति देने वाली है । हे राजन! इस एकादशी कि कथा भी बहुत ही रोचक है, इसे ध्यानपूर्वक सुनो । क्योंकि इसके सुनने मात्र से ही मनुष्य को वायपेय यज्ञ करने का फल मिल जाता है ।।

प्राचीनकाल में सत्ययुग में महिष्मति नाम की एक नगरी में इंद्रसेन नाम का एक प्रतापी राजा था । वह धर्मपूर्वक अपनी प्रजा का पालन करते हुए शासन करता था । वह राजा पुत्र-पौत्र और धन-धान्य आदि से संपन्न था एवं भगवान विष्णु का परम भक्त था ।।


एक दिन जब राजा इन्द्रसेन सुखपूर्वक अपनी सभा में बैठा था तो आकाश मार्ग से महर्षि नारद उतरकर उसकी सभा में आए । राजा उन्हें देखते ही राजा हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और विधिपूर्वक आसन व अर्घ्य आदि देकर बिठाया ।।

सुखासन पर आनंदपूर्वक बैठकर देवर्षि ने राजा से पूछा, कि हे राजन! आपके सातों अंग कुशलपूर्वक तो हैं? तुम्हारी बुद्धि धर्म में और तुम्हारा मन विष्णु भक्ति में तो रहता है न ? देवर्षि नारद की ऐसी बातें सुनकर राजा ने कहा- हे महर्षि! आपकी कृपा से मेरे राज्य में सब कुशल है तथा मेरे यहाँ यज्ञ कर्मादि सुकृत हो रहे हैं ।।

आप कृपा करके अपने आगमन का कारण बतायें । तब ऋषि कहने लगे, कि हे राजन! आप आश्चर्य देने वाले मेरे वचनों को सुनो । मैं एक समय ब्रह्मलोक से यमलोक को गया, वहाँ श्रद्धापूर्वक यमराज से पूजित होकर मैंने धर्मशील और सत्यवान धर्मराज की प्रशंसा की ।।

उसी समय यमराज की सभा में महान ज्ञानी और धर्मात्मा तुम्हारे पिता को एकादशी का व्रत भंग होने के कारण देखा । उन्होंने संदेशा दिया सो मैं तुम्हें कहता हूँ । उन्होंने कहा कि पूर्व जन्म के किसी दोष के कारण मैं यमराज के निकट रह रहा हूँ ।।


सो हे पुत्र यदि तुम अश्विन कृष्ण पक्ष कि इंदिरा एकादशी का व्रत मेरे निमित्त करो तो मुझे स्वर्ग की प्राप्ति हो सकती है । इतना सुनकर राजा कहने लगा, कि हे महर्षि आप इस व्रत की विधि मुझे बतायें ।।

नारदजी कहने लगे- अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की दशमी के दिन प्रात:काल श्रद्धापूर्वक स्नानादि से निवृत्त होकर पुन: दोपहर को नदी आदि में जाकर स्नान करें । फिर श्रद्धापूर्व पितरों का श्राद्ध करें और एक बार भोजन करें ।।

प्रात:काल होने पर एकादशी के दिन दातून आदि करके स्नान करें, फिर व्रत के नियमों को भक्तिपूर्वक ग्रहण करता हुआ संकल्प करें, कि ‘मैं आज संपूर्ण भोगों को त्याग कर निराहार अथवा फलाहार एकादशी का व्रत करूँगा ।।

हे अच्युत! हे पुंडरीकाक्ष! मैं आपकी शरण में हूँ, आप मेरी रक्षा कीजिए । इस प्रकार नियमपूर्वक शालिग्राम की मूर्ति के आगे विधिपूर्वक श्राद्ध करके योग्य ब्राह्मणों को फलाहार का भोजन कराएँ और दक्षिणा दें ।।


पितरों के श्राद्ध से जो बच जाए उसको सूँघकर गौ को दे दें तथा ध़ूप, दीप, गंध, पुष्प, नैवेद्य आदि सब सामग्री से ऋषिकेश भगवान का पूजन करें । रात में भगवान के निकट जागरण करें । इसके पश्चात द्वादशी के दिन प्रात:काल होने पर भगवान का पूजन करके ब्राह्मणों को भोजन कराएँ ।।

भाई-बंधुओं, स्त्री और पुत्र सहित आप भी मौन होकर भोजन करें । नारदजी कहने लगे कि हे राजन! इस विधि से यदि तुम आलस्य रहित होकर इस एकादशी का व्रत करोगे तो तुम्हारे पिता अवश्य ही स्वर्गलोक को जाएँगे । इतना कहकर नारदजी अंतर्ध्यान हो गए ।।

नारदजी के कथनानुसार राजा ने अपने बाँधवों तथा दासों सहित व्रत किया जिसके उपरान्त आकाश से पुष्पवर्षा हुई । उस पूण्य के प्रभाव से राजा का पिता गरुड़ पर चढ़कर भगवान विष्णु के विष्णुलोक को चला गया ।।

राजा इंद्रसेन भी एकादशी के व्रत के प्रभाव से निष्कंटक राज्य करके अंत में अपने पुत्र को सिंहासन पर बैठाकर स्वर्गलोक को चले गये । हे युधिष्ठिर! यह इंदिरा एकादशी के व्रत का माहात्म्य मैंने तुमसे कहा ।।


इसके पढ़ने और सुनने से मनुष्य सब पापों से छूट जाता है और सब प्रकार के भोगों को भोगकर वैकुण्ठ लोक को प्राप्त होते हैं ।।

इंदिरा एकादशी व्रत विधि indira ekadashi vrat katha.

शास्त्रानुसार इंदिरा एकादशी का व्रत रखने वाले को एकादशी के दिन प्रात: स्नान करके भगवान विष्णु की प्रतिमा के सामने घी का दीपक जलाना चाहिए । मौसमी फलों एवं फूलों से भगवान की पूजा करके विष्णु भगवान के नाम का संकीर्तन करना चाहिए ।।


परिवार में जिन लोगों की मृत्यु हो चुकी है उनका नाम लेकर भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए, कि उन्हें सद्गति प्रदान करें । एकदशी के अगले दिन यानी द्वादशी तिथि के दिन ब्राह्मणों को भोजन करवाएं और दक्षिणा देकर प्रसन्न करें । इसके बाद स्वयं भोजन ग्रहण करें ।।

।। नारायण सभी का कल्याण करें ।।


जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम् ।।

जय जय श्री राधे ।।
जय श्रीमन्नारायण ।।

भक्त चक्रिक भील के भक्ति की पराकाष्ठा।। Bhakta Chakrik Bhil Ki Bhakti.

जय श्रीमन्नारायण,

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चान्येऽन्त्यजास्तथा ।
हरिभक्तिं प्रपन्ना ये ते कृतार्था: न संशयः ।।


अर्थ:- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा अन्य अन्त्यज लोगों में से जो भी हरि भक्ति द्वारा भगवान के शरणागत हुए । वे कृतार्थ हो गए, इसमें कोई संदेह नहीं ।।

मित्रों, यह बात सम्पूर्ण सत्य है, और इस विषय में अनेकों सत्य कथायें हैं । द्वापर युग में चक्रिक नामक एक भील वन में रहता था । भील होने पर भी वह सच्चा, मधुरभाषी, दयालु, प्राणियों की हिंसा से विमुख, क्रोध रहित और माता-पिता की सेवा करने वाला था ।।


उसने न तो कोई विद्या पढ़ी थी, न ही कोई शास्त्र सुने थे । किन्तु था वह भगवान का भक्त । वन में एक पुराना मन्दिर था, उसमें भगवान की एक मूर्ति थी । सरल हृदय चक्रिक को जब कोई अच्छा फल वन में मिलता, तब वह उसे चखकर देखता था ।।

यदि वह फल स्वादिष्ट लगा तो उसे लाकर वह भगवान को चढ़ा देता था । और यदि वह फल मीठा नहीं होता तो वह स्वयं खा लेता । उस भोले अनपढ़ को ”जूठे फल नहीं चढ़ाने चाहिए” यह उसे पता ही नहीं था ।।

एक दिन की बात है, कि उसे वन में एक पियाल वृक्ष पर एक पका फल मिला । फल तोड़कर उसने स्वाद जानने के लिए उसे अपने मुख में डाला । फल बहुत ही स्वादिष्ट था, पर मुख में रखते ही वह गले में सरक गया ।।


अब सबसे अच्छी वस्तु भगवान को देनी चाहिए यह चक्रिक की मान्यता थी । एक स्वादिष्ट फल उसे आज मिला तो वह भगवान का था । भगवान के हिस्से का फल वह स्वयं खा ले, यह तो बड़े दुख की बात थी ।।

ऐसे में उसने उस फल को गले से निकालने के लिए उसने अपने दाहिने हाथ से अपना गला दबाया । इसलिये कि वह फल उसके पेट में न चला जाय । मुख में अँगुली डालकर वमन किया, पर फल निकला नहीं ।।

“चक्रिक का सरल हृदय” सोंचा भगवान को देने योग्य फल स्वयं खा लिया और भगवान को नहीं दे पाया । वह भगवान की मूर्ति के पास गया और कुल्हाड़ी से अपना गला काटकर उसने फल निकालकर भगवान को अर्पण कर दिया ।।


इतना करने के बाद पीड़ा के कारण वह गिर पड़ा । सरल भक्त की निष्ठा से सर्वेश्वर भगवान जगन्नाथ रीझ गये । वे श्री हरि चतुर्भुज रूप से वहीं प्रकट हो गये और मन-ही-मन कहने लगे ।।

यथा भक्तिमतानेन सात्विकं कर्म वै कृतम् ।
यद्दत्त्वानृण्यमाप्नोमि तथा वस्तु किमस्ति मे ।।
ब्रह्मत्वं वा शिवत्वं वा विष्णुत्वं वापि  दीयते ।
तथाप्यानृण्यमेतस्य भक्तस्य न हि विद्यते ।।


अर्थ:- इस भक्तिमान् भील ने जैसा सात्विक कर्म किया है, मेरे पास ऐसी कौन सी वस्तु है, जिसे देकर मैं इसके ऋण से उऋण हो सकूं ? ब्रह्मा का पद, शिव का पद या विष्णु का पद भी दे दूँ तो भी इस भक्त के ऋण से मैं मुक्त नहीं हो सकता ।।

मित्रों, फिर भक्त वत्सल प्रभु ने चक्रिक के मस्तक पर अपना अभय करकमल रख दिया । भगवान के कर स्पर्श पाते ही चक्रिक का घाव मिट गया । उसकी पीड़ा चली गई । वह तत्काल स्वस्थ होकर उठ बैठा ।।


देवाधिदेव नारायण ने अपने पीताम्बर से उसके शरीर की धूलि इस प्रकार झाड़ी, जैसे एक पिता अपने पुत्र के शरीर की धूलि झाड़ता है । भगवान को सामने देख चक्रिक ने गद्गद होकर, दोनों हाथ जोड़कर सरल भाव से स्तुति करने लगा ।।

हे केशव ! हे गोविन्द ! हे जगदीश ! मैं मूर्ख भील हूँ । मुझे आपकी प्रार्थना करनी नहीं आती । इसलिए मुझे क्षमा करो ! मेरे स्वामी !  आप प्रसन्न हो जाओ । आपकी पूजा छोड़कर जो लोग दूसरे की पूजा करते हैं, वे महामूर्ख हैं ।।

भगवान ने वरदान माँगने को कहा । चक्रिक ने कहा- हे कृपामय ! जब मैंने आपके दर्शन कर लिये । तब अब और क्या पाना शेष रह गया ? मुझे तो कोई वरदान चाहिए नहीं । बस, मेरा चित्त निरन्तर आपमें ही लगा रहे, ऐसी कृपा बनाये रखें बस ।।


भक्तवत्सल भगवान उस भील को भक्ति का वरदान देकर चले गए। भगवद्दर्शन और भगवान से वरदान प्राप्त करके भक्त चक्रिक वहाँ से द्वारका चला गया और जीवन भर वहीं भगवद्भजन में लगा रहा।।

।। नारायण सभी का कल्याण करें ।।
 
 
जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम् ।।
 
जय जय श्री राधे ।।
जय श्रीमन्नारायण ।।

ऐसे में लोगों की प्रगति रुक जाती है।। Aapki Pragati Aise Rukati Hai.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, जब आप अपने जीवन में उबाऊ महशूस करने लगते हैं। भले ही वह नौकरी बदलने की बात हो, नई कला या कौशल सीखने का मौका हो या फिर घर या शहर बदलने का अवसर।।

जब भी आपको लगे कि अब आपको जंग सा लग रहा है तो बदलाव के लिए कोशिश करें।।


ऐसे में लोग पाते हैं कि वे एक ही जगह टिक से गए हैं और उन्होंने लंबे समय से कुछ नया नहीं सीखा । लेकिन फिर भी वे उसी जगह बने रहते हैं ।।

ऐसे में धीरे-धीरे जीवन में नएपन का उत्साह खत्म सा होने लगता है ।।

अगर आपको भी ऐसा लगता है कि आप वर्षों से एक ही जगह हैं और प्रगति रुक गई है तो आगे निकलने के बारे में आपको सोचना चाहिए ।।


अगर आप एक ही ढर्रे पर चल रहे तो जीवन ऊबाऊ होना ही है । इसलिए जीवन को थोड़ा उलटते-पलटते रहना जरूरी होता है ।।

अपने करियर में कुछ नए क्षेत्रों में हाथ आजमाना चाहिए । साधारण बदलावों के जरिए आप नई ऊर्जा पा सकते हैं ।।

जब आप छोटे या बड़े बदलाव करेंगे तो वे आपको नई चीजें सीखने का मौका देंगे ।।


यह स्वीकार करना कि अब आपने पिछले वर्षों में कुछ नहीं बदला आपको आगे बढ़ने में मदद अवश्य करेगा ।।

।। नारायण सभी का कल्याण करें ।।
 
 
जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम् ।।
 
जय जय श्री राधे ।।
जय श्रीमन्नारायण ।।

बेवफा मेरी ये ज़ुबान तुझसे इज़हार कर बैठा।। Bevafa Meri Ye Juban Izahar Kar Baitha.

      प्यारे कन्हैया, प्यारे कान्हा जी !
                  मैं तुम्हें इतने प्यार से बुलाता हूँ, कभी भूलकर ही सही “आ भी जाओ प्यारे” ।।
मेरे प्यारे कन्हैया! मेरे प्रियतम कान्हा जी!
कसूर तो था ही मेरी इन निगाहों का ।
जो चुपके से प्रियतम तेरा दीदार कर बैठा ।।
हमने तो खामोश रहने की ठानी ली थी ।

पर ये बेवफा मेरी ज़ुबान इज़हार कर बैठा ।।

Bevafa Meri Ye Juban

तू हमसफ़र, तू हम डगर, तू हमराज, नजर आता है।
मेरी अधूरी सी जिंदगी का.. ख्वाब नजर तूं आता है।।
कैसी उदास है जिंदगी प्रियतम तेरे बिन हर लम्हा।
मेरे हर लम्हे में सिर्फ तेरा ही अहसास नजर आता है।।

Bevafa Meri Ye Juban
प्यारे ! रह रह के मुझे इतना क्यूँ रुलाते हो ।
याद कर तो सकते नहीं तो याद क्यूँ आते हो ।।
 
।। नारायण सभी का कल्याण करें ।।
 
 
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जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम् ।।
 
।। नमों नारायण ।।
पद्मा (परिवर्तिनी) एकादशी व्रत विधि एवं कथा सहित हिन्दी में ।। Padma Ekadashi Vrat Vidhi And Katha in Hindi.


जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, एक बार कि बात है, कि सम्राट युधिष्ठिर ने भगवान से पूछा! भगवन्! भाद्रपद शुक्ल एकादशी का क्या नाम है? इसकी विधि तथा इसका माहात्म्य कृपा करके बतायें । तब भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि यह व्रत जो अतुलनीय पुण्य यहाँ तक कि स्वर्ग और मोक्ष तक को देने वाली तथा समस्त पापों का नाश करने वाली, इस उत्तम पद्मा एकादशी का माहात्म्य मैं आपसे कहता हूं आप ध्यानपूर्वक सुनिए ।।

यह पद्मा अथवा परिवर्तिनी एकादशी को जयंती एकादशी एवं वामन एकादशी भी कहते हैं । इस व्रत को करने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है । बड़े से बड़े पापियों के पापों का नाश करने के लिए इससे बढ़कर कोई अन्य उपाय नहीं । जो मनुष्य इस एकादशी के दिन भगवान के वामन रूप की पूजा करता है, वह तीनों लोकों में पूज्य होते हैं । अत: मोक्ष की इच्छा रखने वाले मनुष्य इस व्रत को अवश्य करें ।।

जो कमलनयन भगवान का कमल से पूजन करते हैं, वे अवश्य भगवान के समीप जाते हैं । जिसने भाद्रपद शुक्ल एकादशी को व्रत और पूजन किया, उसने ब्रह्मा, विष्णु सहित तीनों लोकों का पूजन कर लिया । अत: इस एकादशी के व्रत को अवश्य करना चाहिए । मान्यतानुसार इस दिन भगवान करवट लेते हैं, इसलिए इसको परिवर्तिनी एकादशी भी कहते हैं ।।


भगवान के इस वचन को सुनकर सम्राट युधिष्ठिर बोले कि भगवन्! मुझे संदेह इस बात का हो रहा है, कि भगवान किस प्रकार सोते और करवट लेते हैं । भगवान ने किस तरह राजा बलि को बांधा और वामन रूप में क्या-क्या लीलाएं कीं? साथ ही यह भी बतायें कि चातुर्मास के व्रत की क्या विधि है तथा आपके शयन करने पर मनुष्य का क्या कर्तव्य है । सो आप मुझसे विस्तार से बताइए ।।

भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे राजन! अब आप समस्त पापों को नष्ट करने वाली कथा सुनें । त्रेतायुग में बलि नामक एक दैत्य था । वह मेरा परम भक्त था । विविध प्रकार के वेद सूक्तों से मेरा पूजन किया करता था और नित्य ही ब्राह्मणों का पूजन तथा यज्ञ के आयोजन करता था । लेकिन इंद्र से द्वेष के कारण उसने इंद्रलोक तथा सभी देवताओं को जीत लिया ।।


इस कारण सभी देवता एकत्र होकर सोच-विचारकर भगवान के पास गए । बृहस्पति सहित इंद्रादिक देवता प्रभु के निकट जाकर और नतमस्तक होकर वेद मंत्रों द्वारा भगवान का पूजन और स्तुति करने लगे । अत: भगवान ने वामन रूप धारण करके पांचवां अवतार लिया और फिर अत्यंत तेजस्वी रूप से राजा बलि को जीत लिया ।।

इतनी बातें सुनकर राजा युधिष्ठिर बोले कि हे जनार्दन! भगवान ने वामन रूप धारण करके उस महाबली दैत्य को किस प्रकार जीता? भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे- वामन रूपधारी ब्रह्मचारी भगवान ने राजा बलि से तीन पग भूमि की याचना की और कहा- ये मुझको तीन लोकों के समान है और हे राजन यह आपको अवश्य ही देनी होगी ।।

राजा बलि ने इसे तुच्छ याचना समझकर तीन पग भूमि देने का संकल्प किया और भगवान ने अपने त्रिविक्रम रूप को बढ़ाकर यहां तक कि भूलोक में पद, भुवर्लोक में जंघा, स्वर्गलोक में कमर, मह:लोक में पेट, जनलोक में हृदय, यमलोक में कंठ की स्थापना कर सत्यलोक में मुख, उसके ऊपर मस्तक स्थापित कर दिया ।।


सूर्य, चंद्रमा आदि सब ग्रह गण, योग, नक्षत्र, इंद्रादिक देवता और शेष आदि सब नागगणों ने विविध प्रकार से वेद सूक्तों से प्रार्थना की । तब भगवान ने राजा बलि का हाथ पकड़कर कहा कि हे राजन! एक पद से पृथ्वी, दूसरे से स्वर्गलोक पूर्ण हो गए । अब तीसरा पग कहां रखूं?

तब राजा बलि ने अपना सिर झुका लिया और भगवान ने अपना पैर उसके मस्तक पर रख दिया । इसके बाद भक्त बलि पाताल को चले गये । फिर उसकी प्रार्थना और विनम्रता को देखकर भगवान ने कहा कि हे बलि! मैं सदैव तुम्हारे निकट ही रहूंगा । विरोचन पुत्र बलि से कहने पर भाद्रपद शुक्ल एकादशी के दिन बलि के आश्रम में भगवान की मूर्ति स्थापित हुई ।।

इसी प्रकार दूसरी घटना क्षीरसागर में शेषनाग के पृष्ठ पर हुई थी! हे राजन! इस एकादशी को भगवान शयन करते हुए करवट लेते हैं, इसलिए तीनों लोकों के स्वामी भगवान विष्णु का उस दिन पूजन करना चाहिए । इस दिन तांबा, चांदी, चावल और दही का दान करना उचित होता है । रात्रि को जागरण अवश्य करना चाहिए ।।


जो विधिपूर्वक इस एकादशी का व्रत करते हैं, वे समस्त पापों से मुक्त होकर स्वर्ग में जाकर चंद्रमा के समान प्रकाशित होते हैं और यश पाते हैं । जो इस पापनाशक कथा को पढ़ते या सुनते हैं, उनको हजार अश्वमेध यज्ञ करने का फल प्राप्त होता है ।।

नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।


जय जय श्री राधे ।।
जय श्रीमन्नारायण ।।