अथ श्रीरूद्राष्टकम: शिव आराधना का श्रेष्ठ स्तोत्र।। Shri Rudra Ashtakam.

जय श्रीमन्नारायण,

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं। विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं॥
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं। चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहं || १ ||

अर्थ:-हे मोक्षस्वरूप, विभु, व्यापक, ब्रह्म और वेदस्वरूप, ईशान दिशा के ईश्वर तथा सबके स्वामी श्री शिवजी मैं आपको नमस्कार करता हूँ। निजस्वरूप में स्थित (अर्थात्‌ मायादिरहित), (मायिक) गुणों से रहित, भेदरहित, इच्छारहित, चेतन आकाश रूप एवं आकाश को ही वस्त्र रूप में धारण करने वाले दिगम्बर (अथवा आकाश को भी आच्छादित करने वाले) आपको मैं भजता हूँ || १ ||

निराकारमोंकारमूलं तुरीयं। गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं ||
करालं महाकाल कालं कृपालं। गुणागार संसारपारं नतोऽहं || २ ||

अर्थ:-निराकार, ओंकार के मूल, तुरीय (तीनों गुणों से अतीत), वाणी, ज्ञान और इन्द्रियों से परे, कैलासपति, विकराल, महाकाल के भी काल, कृपालु, गुणों के धाम, संसार से परे आप परमेश्वर को मैं नमस्कार करता हूँ || २ ||

तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं। मनोभूत कोटि प्रभा श्रीशरीरं |
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा। लसद्भालबालेन्दु कंठे भुजंगा || ३ ||

अर्थ:-जो हिमाचल के समान गौरवर्ण तथा गंभीर हैं, जिनके शरीर में करोड़ों कामदेवों की ज्योति एवं शोभा है, जिनके सिर पर सुंदर नदी गंगाजी विराजमान हैं, जिनके ललाट पर द्वितीया का चंद्रमा और गले में सर्प सुशोभित है || ३ ||

चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं। प्रसन्नाननं नीलकंठं दयालं |
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं । प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि || ४ ||

अर्थ:-जिनके कानों में कुण्डल हिल रहे हैं, सुंदर भ्रुकुटी और विशाल नेत्र हैं, जो प्रसन्नमुख, नीलकण्ठ और दयालु हैं, सिंह चर्म का वस्त्र धारण किए और मुण्डमाला पहने हैं, उन सबके प्यारे और सबके नाथ (कल्याण करने वाले) श्री शंकरजी को मैं भजता हूँ || ४ ||

प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं। अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशं |
त्रयः शूल निर्मूलनं शूलपाणिं। भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यं || ५ ||

अर्थ:-प्रचण्ड (रुद्ररूप), श्रेष्ठ, तेजस्वी, परमेश्वर, अखण्ड, अजन्मे, करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाश वाले, तीनों प्रकार के शूलों (दुःखों) को निर्मूल करने वाले, हाथ में त्रिशूल धारण किए, भाव (प्रेम) के द्वारा प्राप्त होने वाले भवानी के पति श्री शंकरजी को मैं भजता हूँ || ५ ||

कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी। सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी |
चिदानंद संदोह मोहापहारी। प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी || ६ ||

अर्थ:-कलाओं से परे, कल्याणस्वरूप, कल्प का अंत (प्रलय) करने वाले, सज्जनों को सदा आनंद देने वाले, त्रिपुर के शत्रु, सच्चिदानंदघन, मोह को हरने वाले, मन को मथ डालने वाले कामदेव के शत्रु, हे प्रभो! प्रसन्न होइए, प्रसन्न होइए || ६ ||

न यावद् उमानाथ पादारविंदं। भजंतीह लोके परे वा नराणां |
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं। प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं || ७ ||

अर्थ:-जब तक पार्वती के पति आपके चरणकमलों को मनुष्य नहीं भजते, तब तक उन्हें न तो इहलोक और परलोक में सुख-शांति मिलती है और न उनके तापों का नाश होता है। अतः हे समस्त जीवों के अंदर (हृदय में) निवास करने वाले हे प्रभो! प्रसन्न होइए || ७ ||

न जानामि योगं जपं नैव पूजां। नतोऽहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं |
जरा जन्म दुःखोद्य तातप्यमानं॥ प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो || ८ ||

अर्थ:-मैं न तो योग जानता हूँ, न जप और न पूजा ही। हे शम्भो! मैं तो सदा-सर्वदा आपको ही नमस्कार करता हूँ। हे प्रभो! बुढ़ापा तथा जन्म (मृत्यु) के दुःख समूहों से जलते हुए मुझ दुःखी की दुःख से रक्षा कीजिए। हे ईश्वर! हे शम्भो! मैं आपको नमस्कार करता हूँ || ८ ||

श्लोक : रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये |
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति || ९ ||

अर्थ:-भगवान्‌ रुद्र की स्तुति का यह अष्टक उन शंकरजी की तुष्टि (प्रसन्नता) के लिए ब्राह्मण द्वारा कहा गया। जो मनुष्य इसे भक्तिपूर्वक पढ़ते हैं, उन पर भगवान्‌ शम्भु प्रसन्न होते हैं || ९ ||

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नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्।।

।। नमों नारायण ।।

मूर्ति पूजा के बहिष्कारकों को जबाब।। Murtipujak Hun Garv Hai.

जय श्रीमन्नारायण,

लाडली अपने चरणों में रख लो मुझे… इस पतित का भी उद्धार हो जायेगा।
तेरे दर की गुलामी मेरी आरजू, सांवरे का भी दीदार हो जायेगा।।

तेरी करुणा पे मुझ को बड़ा नाज़ है.. इक नज़र से बेडा पार हो जायेगा।।

श्री राधे करुणामयी कहाती है… शरण आये को उर लगाती है।।
जिसका कोई नहीं ज़माने में.. अपना कह कर उसे बुलाती है।।

करती दोषों को क्षमा.. रखे निज हाथ थमा।।
कृपा दृष्टि की निधि बहाती है… मेरी श्यामा करुणामयी कहाती है।।
जिसको ठोकर लगी हो दर दर से.. उसे निज गोद में बिठाती है।।
श्यमा राधे करुणामयी कहाती है।।

लाडली अपने चरणों में रख लो मुझे… इस पतित का भी उद्धार हो जायेगा।
तेरे दर की गुलामी मेरी आरजू, सांवरे का भी दीदार हो जायेगा।।

तेरी करुणा पे मुझ को बड़ा नाज़ है.. इक नज़र से बेडा पार हो जायेगा।।

मित्रों, उपर की उक्तियाँ तो किसी मूर्ति पूजक की ही लगती है। आजकल खूब मूर्ति पूजा के बहिष्कारक नजर आ रहे हैं। लेकिन इनको ये कहाँ पता की जिस दिल में जो जैसे जिस रूप में समां जाय, वो उसे अपने प्राणों से भी प्यारा लगने लगता है। और हमारे पूर्वज कितने विद्वान् रहे होंगें, जिन्होंने समाज के कल्याण का कितना ध्यान रखा।।

कहीं-कहीं प्रतिबन्ध लगाया भी तो ऐसे जगहों पर जहाँ एक से अधिक जान के खतरे की संभावना लगी। वरना कैसा भगवान अच्छा लगता है, ठीक है, वही भगवान सबसे बड़ा है, बाकि सब उसके चाकर हैं, ठीक है? ऐसा क्यों किया गया? क्योंकि किसी की भावनाओं को ठेस न लगे। और ये हमारी उदारता ही है, की आज भी समाज में ऐसे असामाजिक तत्व अपना फन उठाये घूम रहे हैं, वरना आज भी वो दम हैं, कि उनका फन आसानी से कुचला जा सके।।

इस रचना में कितनी गहराई और दर्द तथा भक्ति छुपा है। इस बात का एहसास किसी नकारात्मक सोंच वालो कि हो ही नहीं सकती। आज खुलेआम किसी कि भावनाओं को ठेस पहुंचाना, कितना बड़ा अन्याय है। हम किसी के बारे में जब नहीं बोलते, लोग हमारे पीछे क्यों पड़े रहते हैं। और जब हम अपने धर्म रक्षण के लिए शास्त्र उठायें तो असामाजिक तत्वों में गिनती शुरू हो जाती है।।

शास्त्रों के शब्दों का दुरुपयोग करके समाज में भ्रांतियां फैलाकर हमारे समाज को तोड़ने का प्रयास कोई और करे, ये सम्भव नहीं है। कुछ जैनी साधू ऐसे हैं, जो अपने समाज का नाम लेकर, खुद पाखंड और जड़ता को बढ़ावा देते हैं, और हमारा उपहास उड़ाते हैं। और ये आर्य कहे जाने वाले हमारे समाज में जोंक कि तरह हैं। जो समाज को इतना नुकसान पहुंचा रहे हैं, कि समाज इनका कहा तो मानता नहीं, उल्टे हमारे प्रति भी समाज का संदेह मन में पनप जाता है।।

मैंने सबसे बातें करने का प्रयास किया, कि हमारी संस्कृति पर हो रहे विदेशी धर्मों के दुष्प्रभाव को रोकने के लिए एकजुटता जरुरी है। लेकिन सबको अपने अहम ने घेर रखा है, और प्रवचन करते हैं, जैसे भगवान ही इनका गुलाम हो। मैं तो कहता हूँ, कि भगवान ही नहीं है, तुम अपनी बात करो ना। किसी भगवान और मुक्ति कि बात ही क्यों करते हो। अरे मूर्खों भगवान से मिलने से ज्यादा जरुरी इन्सान को इन्सान से मिलने में है।।

किस साधना के चक्कर में पड़कर किसी इन्सान को ही मुर्ख बनाकर अपने बड़प्पन को प्रमाणित करने में लग रहे हो। मैं तो जितने ऐसे असामाजिक तत्व हैं, जिन्हें वैदिक सनातन धर्म में खोट नजर आता है, उन्हें मैं खुलेआम चैलेन्ज करता हूँ। दम है, तो मुझसे बात करो और अपना आदर्श प्रस्तुत करो कि किस दृष्टिकोण से तुम्हारा थिंक सही है, और हमारे में खोट।।

अंत में तो हमारे जैसे ही लोग यह कहने का दुस्साहस करते हैं, कि भगवान सबका कल्याण करे। ये बातें जनहित के लिए, कुछ असामाजिक तत्वों के लिए लिखा गया है। लेकिन दिल में समाज हित के आलावा और कुछ नहीं है। सुबह से शाम तक भगवान के सम्मुख बैठकर यही प्रार्थना करने में निकल जाता है, कि प्रभु मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो। लेकिन विश्व का कल्याण करो, सबको सुखी रखना हे परमात्मा, भले ही सबका दुःख मुझे दे देना।।

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जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्।।

।। नमों नारायण ।।

मनुष्य का मन एक प्रेत है।। Manav Man Ek Bhut Hai.

जय श्रीमन्नारायण,

एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः।
कुरु कर्मैव तस्मात्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्‌॥ (गीता.अ.४.श्लोक.१५.)

अर्थ:- पूर्वकाल में मुमुक्षुओं ने भी इस प्रकार जानकर ही कर्म किए हैं, इसलिए तू भी पूर्वजों द्वारा सदा से किए जाने वाले कर्मों को ही कर।।१५।।

अर्थ:- सत्य ये है, कि परमात्मा पत्थर कि मूर्ति में नहीं होता। कोई जरूरी नहीं है, कि कर्मकांड पूजा-पाठ आदि से परमात्मा प्राप्त हो जाय। बड़े से बड़े यज्ञादि से भी कोई आवश्यक नहीं है, कि परमात्म प्राप्ति हो ही जाय। और ये भी अकाट्य सत्य हो सकता है, कि ये सब कुछ परमात्मा कि मर्जी के विपरीत किसी चतुर ब्राह्मण कि चाल रही हो, कि आने वाली पीढ़ी बैठकर ऐसो आराम के साथ जीवन बिताये, इसलिए शायद कर्मकांड आदि कि रचना कि गयी हो।।

अगर ये सबकुछ सत्य है, तो ये तो समाज के साथ सचमुच बहुत बड़ा अन्याय है। इस पाखण्ड से दूर रहना ही चाहिए, क्योंकि उपरोक्त बातें यदि सत्य है, तो इससे कोई लाभ होने वाला नहीं है।।

लेकिन मानव मन कि विकृति को साहब क्या कहें, इस मन को उलझाए रखने के लिए, कुछ न कुछ चाहिए। क्योंकि हे समय यह बिना कुछ किये रह ही नहीं सकता। कृष्ण कहते हैं —

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्‌।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥

अर्थ:- निःसंदेह कोई भी मनुष्य किसी भी काल में क्षणमात्र भी बिना कर्म किए नहीं रहता क्योंकि सारा मनुष्य समुदाय प्रकृति जनित गुणों द्वारा परवश हुआ कर्म करने के लिए बाध्य किया जाता है।।१५।।

एक छोटा सा वाकया सुनाता हूँ, — एक राजा के बाजार में ऐसा नियम था, कि जो कुछ भी सामान बिकने को आएगा, न बिकने पर राजा के द्वारा खरीद लिया जायेगा। एक दिन एक सरफिरा भुत यानि कि प्रेत बेचने आ गया। राजा के पियादे पहुंचे, पूछा क्या ऐसा लेकर आये हो, जो दिन भर में भी नहीं बिका। उस सरफिरे ने कहा – महानुभाव, हम भुत बेच रहे हैं। स्वभावतः भुत का नाम सुनते ही डर कर भागने लगे, लेकिन नियमानुसार उन्हें खरीदना ही था। पियादों ने पूछा – कीमत? सरफिरे ने कहा – भुत का कीमत भुत ही बताएगा। पियादों ने पूछा – भुत जी आपका कीमत ? भुत ने कहा – मेरा कीमत है, कि मुझे हर समय काम चाहिए। पियादों ने सोंचा, राजा के यहाँ काम तो बहुत ही रहता है, चलो अच्छा ही हुआ। तब भुत ने कहा – इसके अलावे एक शर्त भी है, मेरा, कि अगर मुझे काम नहीं मिला, तो मैं तुम्हारे राजा को खा जाऊँगा। पियादों ने कहा उसकी नौबत नहीं आएगी, काम कि कमी नहीं है, चलो।।

ले गए, अब जाते ही उसने कहा – काम। राजा ने कहा – फलां काम कर के आ, कह कर राजा पीछे मुड़ा, तो भुत बोला काम। राजा ने कहा – जो बताया वो किया? बोला हाँ साहब। राजा ने दूसरा काम बताया, फिर तीसरा, चौथा, पांचवा इसी तरह दोपहर हो गया, राजा परेशान, समय ही नहीं दे रहा है, कि कुछ अन्य सोंचे।।

राजा के मरने कि स्थिति आ पहुंची, न पानी पीने का समय न खाना खाने का। और भुत तैयार बैठा है, कि खा जाऊंगा काम दो वरना। अब राजा करे तो क्या करे, कुछ निर्णय नहीं कर पा रहा था। इतने में एक बुद्धिमान मंत्री आया, और उसने एक उपाय बताया। कहा भुत को काम चाहिए, चाहे कैसा भी काम क्यों न हो। राजा ने कहा हाँ – तो क्या बस, भुत को कहो कि जब तक दूसरा काम न बताऊँ, तब तक इस खम्भे पर उपर निचे उतरता चढ़ता रह।।

भुत ने कहा ठीक है, उसे तो काम चाहिए, चाहे कैसा भी काम क्यों न हो। अब उस भुत का आजतक उसी खम्भे पर उतरना चढ़ना लगा है।।

अब आप अपने मन में सोंचिये, बात क्या है ? मैं बताता हूँ, बात क्या है। बात ये है, कि आप-हम वो राजा हैं, पियादे – हमारे आगे-पीछे घूमने वाले चमचे हैं, हमारा मन ही भुत है, और ब्राह्मण, गुरु, शास्त्र और ज्ञानीजन ही बुद्धिमान मंत्री हैं।।

इस मन को हर समय कोई न कोई काम चाहिए, ये हर समय मनुष्य को परेशान करके रखता है, अकारण। तो पूर्वज ऋषियों ने शास्त्रों में अनेक प्रकार से इस मन रूपी भुत को स्थिर रखने हेतु धर्म-कर्म (सत्कर्म) रूपी खम्भा दिया, जिसपर मन अगर लग जाय तो हमारा कल्याण हो जाय।।

और कौन कहता है, कि मंदिर जाने से शांति नहीं मिलती, कौन कहता है, कि कर्मकांड से फायदा नहीं होता। प्रत्यक्ष को प्रमाण कि आवश्यकता नहीं होती, और इसके प्रमाण हम खुद हैं। हमने अपने इन्हीं हाथों से अर्थात इसी शरीर से अनेकों का कल्याण करावा दिया है।।

हाँ मैं मानता हूँ, कि पाखंड होता है, लेकिन पाखंड में भी कहीं न कहीं धर्म छिपा होता है। और पाखंड कहाँ नहीं है, हमारे शरीर से लेकर, हमारे किस कार्य में पाखंड नहीं है। यह शरीर बना ही है, पाखंड से, अथवा यूँ कहें की संसार या समूची सृष्टि ही पाखंड है।

वेद सत्य ज्ञान , ईश्वर कृत अथवा अपौरुषेय कहा जाता है। लेकिन थोडा समझने में जटिल है,सबके समझ से परे है। और शास्त्र समझने में आसन एवं सरल ज्ञान को प्रदर्शित करते हैं। इसीलिए बुद्धिजीवियों ने वेदों का ही सरलीकरण शास्त्र के रूप में हमें उपलब्ध कराया है। एकम सद विप्रा बहुधा वदन्ति (ऋग्वेद) सत्य अथवा परमात्मा एक ही है, लेकिन उस तक जो जैसे पहुंचा, वैसा ही ज्ञान समाज को दिया।।

दूसरी बात – किसी भी संस्था को जीवित या संचालित रखने हेतु कुछ ज्ञानियों की आवश्यकता होती है। तो इस सद्ज्ञान को, की परमात्मा ही एकमात्र सत्य है, और उसे प्राप्त करना ही मानव का एकमात्र लक्ष्य या कर्म है, एक वैदिक सनातन व्यवस्था बनाई गयी। जिसे बाद में लोगों ने काफी विकृत कर दिया, और सत्य सूत्रों का दुरुपयोग करने लगे। जिसके लिए कोई अकेला नहीं, वरन सारा समाज जिम्मेवार है।।

लेकिन कर्मकांड वगैरह जो क्रियाएं बनाई गयी हैं, वो केवल और केवल परोपकार की दृष्टि से ही बनाई गयी है, इसमें कोई पाखंड नहीं है। पाखंडी कोई व्यक्ति विशेष के रूप में हो सकता है, लेकिन सम्पूर्ण सिद्धांत गलत हैं, और सब पाखंडी हैं, ये कहने वाले से बड़ा कोई दूसरा पाखंडी नहीं हो सकता, वो खुद बहुत बड़ा पाखंडी है।।

और इस सत्य का ज्ञान किसी को हो भी जाय, तो कृष्ण कहते हैं, की उसे भी वैसे ही वर्ताव या आचरण करने चाहिएं, जैसा आचरण एक आम इंसानों के लिए शास्त्रों में निर्धारित किया गया है। क्योंकि – कर्म न करने से अच्छा कुछ न कुछ करना है – इस विषय में कृष्ण का विचार है —

नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः॥

अर्थ:- तू शास्त्रविहित कर्तव्यकर्म कर क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करने से तेरा शरीर-निर्वाह भी नहीं सिद्ध होगा।।१८।।

इसी सन्दर्भ में उपर का श्लोक है, कि जनकादि महापुरुषों ने भी, उस परम ज्ञान को जानकर ही, लोकशिक्षा हेतु साधारण कर्म किया करते थे। यथा – कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः। राम तो परमात्मा थे, कृष्ण को तो पूर्णावतार कहा जाता है, फिर उन्होंने भी साधारण जन कि तरह आचरण करते हुए अनेकों लीलाएं की।।

इसीलिए — एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः।
कुरु कर्मैव तस्मात्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्‌॥ (गीता.अ.४.श्लोक.१५.)

अर्थ:- पूर्वकाल में मुमुक्षुओं ने भी इस प्रकार जानकर ही कर्म किए हैं, इसलिए तू भी पूर्वजों द्वारा सदा से किए जाने वाले कर्मों को ही कर।।१५।।

कहने वालों को कहने दे, हे मानव तू अपने कर्तब्य कर्म से विमुख ना हो। क्योंकि जैसा कर्म करेगा वैसा फल देगा भगवान – अत: सोंच-समझकर कर्म कर। सत्संग कर, मंदिर जाकर भगवद्दर्शन कर, बड़े से बड़े अनुष्ठान का आयोजन करा, बड़े से बड़े सत्संग का आयोजन करा, फिर देख तेरा कल्याण कैसे नहीं होता। तत्क्षण कल्याण हो जायेगा।।

आप सभी अपने मित्रों को फेसबुक पेज को लाइक करने और संत्संग से उनके विचारों को धर्म के प्रति श्रद्धावान बनाने का प्रयत्न अवश्य करें।।

नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्।।

।। नमों नारायण ।।

श्रेष्ठजनों का आचरण ही प्रमाण होता है।। Acharan Hi Praman Hai.

जय श्रीमन्नारायण, Conduct is the proof

यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते॥ (गीता अ.३.श्लोक.१७.)

अर्थ:- परन्तु जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करने वाला और आत्मा में ही तृप्त तथा आत्मा में ही सन्तुष्ट हो, उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है।।१७।।

अर्थ:- आत्मा में रमण का अर्थ है, सबकुछ परमात्मा पर छोड़ देना। सबकुछ अर्थात सबकुछ – मतलब अगर दुःख आये, तो उसे धैर्य पूर्वक सहन करना। तथा सुख आये तो बिना अहंकार के उसका उपभोग करना। ऐसे व्यक्ति के लिए कोई भी कर्तब्य कर्म शेष नहीं रह जाता। यथा – नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन।।

फिर भी ऐसे लोगों को भी भगवान हिदायत देते हैं, कि इनको भी आसक्ति से रहित होकर सांसारिक कर्म सतत करते रहना चाहिए। यथा- तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर। क्योंकि — कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः। अर्थात – कर्म करते हुए ही राजा जनक जैसे महापुरुषों ने भी सिद्धि प्राप्त की जिससे भगवान को भी चलकर आना पड़ा।।

दूसरा पक्ष ये है, कि – लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि। अर्थात – अगर अपनी कामनाओं या आवश्यकताओं कि पूर्ति कि भी बात हो, तो भी कर्म करना ही श्रेयस्कर सिद्ध होता है। हाँ मध्य काल में कुछ ऐसे विचारक हुए इस देश और इस संस्कृति में, कि इस संस्कृति कि जड़ को ही हिला दिया अर्थात खोखला कर दिया। उसका नतीजा आज के समाज को भुगतना पड़ रहा है। चौतरफा हमला सहन करना पड़ रहा है।।

आपलोग समझ ही गए होंगें, मैं किसकी बात कर रहा हूँ। छोडिये किसी कि भावनाओं को ठेस पहुँचाना हमारा उद्देश्य नहीं है। लेकिन जो भी हों – राजा जनक, अष्टावक्र, महर्षि बसिष्ठ, गर्गादी महापुरुष तथा विश्वामित्र जैसों से बड़े ज्ञानी तो शायद ये आजकल के तथाकथित ज्ञानी लोग नहीं रहे होंगें। क्योंकि हमारे ऋषियों ने तो अपने योग बल, भाव बल, तपबल और कर्मबल के माध्यम से परमात्मा को पृथ्वी पर उतार कर दिखाया, अथवा परमात्मा को भी आना पड़ा।।

ये बातें जो मैं कह रहा हूँ, ये मेरे शब्द नहीं हैं, ये मैं गीता के आधार पर कह रहा हूँ। और इसके अलावे कारण भी है, क्या कारण है, कारण ये है, कि ऐसे लोगों पर समाज कि बहुत बड़ी जिम्मेवारी होती है। कृष्ण को प्रमाण मानकर देखिये, कहते हैं, कि –

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥

अर्थ:- श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, अन्य पुरुष भी वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण छोड़कर जाता है, समस्त मनुष्य-समुदाय उसी के अनुसार बरतने लग जाता है।।२१।।

अब आप इस श्लोक के अनुसार सोंचिये – विचार करिए।।

ये सत्य है, कि पत्थर में भगवान नहीं होता – लेकिन वहां गगनचुम्बी ध्वजाएं आकाश में उड़ती सकारात्मक उर्जा को उतार कर मंदिर में लाती है, और धरती से मूर्ति जो जुड़ा रहता है, तो धरती कि शीतलता बनी रहती है। जहाँ प्रवेश करते ही हमारा सारा तनाव दूर हो जाता है, और शांति का आभास होता है।।

दूसरी बात ये है, कि – मंदिर ऐसे ही लोगों का होता है, जो महापुरुष हुए हैं। अर्थात जिन्होंने कुछ ऐसे कार्य किए है, जिनमें साधारण मानव के लिए केवल शिक्षा ही शिक्षा है। अब कोई केवल बुराई ही देखने पर उतर जाय, तो साक्षात् परमात्मा भी जब इस धरती पर सगुन रूप में आता है, तो कुछ अवगुणों को स्वीकार करके ही आता है, क्योंकि यहाँ कोई पूर्ण निष्पन्न रह ही नहीं सकता।।

बातें तो बहुत है, लिखने से जी नहीं उब रहा है, लेकिन उँगलियों में झनझनाहट जरुर होने लगती है। कोई बात नहीं फिर अगले पोस्ट के साथ मिलेंगें, तबतक के लिए आप सभी कि मंगल कामना (भगवान के सम्मुख बैठकर कर सकूं) के लिए आज्ञा चाहता हूँ।।

आप सभी के उपर कोई आपत्ति विपत्ति न आये, भगवान वेंकटेश आप सभी को ढेर सारी खुशियाँ इस होली के साथ प्रदान करें, होली कि हार्दिक बधाई के साथ आप सभी के लिए मंगलकामना।।

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जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्।।

।। नमों नारायण ।।

आपका कर्म ही आपका भाग्य निर्धारित करता है।। Apaka Karm Hi Apaka Bhagya Hai.

जय श्रीमन्नारायण,

त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति सः॥ (गीता – अ.४.श्लोक.२०.)

अर्थ-: जो पुरुष समस्त कर्मों में और उनके फल में आसक्ति का सर्वथा त्याग करके संसार के आश्रय से रहित हो गया है और परमात्मा में नित्य तृप्त है, वह कर्मों में भलीभाँति बर्तता हुआ भी वास्तव में कुछ भी नहीं करता।।२०।।

भावार्थ:– ये बातें खासकर ज्ञानयोग की चर्चा करने वालों के लिए है। जो लोग परमात्मा की चर्चा करते हैं, कि – कोई कहता है, परमात्मा प्रेम से प्राप्त होता है, तो कोई कहता है, कि भक्ति ही उससे मिलने का आसान मार्ग है, तो कोई कहता है, कि योग, ध्यान, साधना, उपासना आदि-आदि से प्राप्त होता है।।

ठीक है, अच्छी बात है, लेकिन मैं ऐसे लोगों से पूछता हूँ, कि अगर वो अपने घर के मालिक हैं, तो अपने परिवार के सदस्यों से कैसे खुश रहते हैं? अगर उनके परिवार के लोग उनके सामने बैठकर ध्यान, योग, साधना, उनकी उपासना अथवा मीठी-मीठी बातें करें तो वो प्रसन्न रहेंगें।।

अगर हाँ तो घर कि नैया डूबी समझो। और अगर ना तो क्यों? क्योंकि घर का अन्य कार्य कौन करेगा? और अगर नहीं करेगा तो घर कि बाकि व्यवस्था अथवा खर्च कैसे निकलेगा? ये सब फुर्सत के समय में करना चाहिए, मुख्य तो अपना कर्तब्य कर्म है।।

अब कर्म कि परिभाषा आप क्या करते हैं, ये आपके उपर है। आप मदिरालय में जाते हैं, ये भी आपका कर्म ही है। आप अपनी कमाई को वेश्याओं को लुटाते हैं, ये भी आपका ही कर्म है। अथवा आप मंदिर चल कर जाते हैं, ये भी आपका कर्म है, तथा अपनी कमाई में से कुछ सत्पुरुषों को दान करते हैं, ये भी आपका ही कर्म है।।

अब आप उपरोक्त दोंनों प्रकार के कर्मों का विश्लेषण करें। कर्म दोंनों है, लेकिन दोनों में आगे एक और शब्द जुड़ जाता है — वो है, पहले के आगे दुष्कर्म और दुसरे के आगे सत्कर्म। दुष्कर्म आगे चलकर आपके दुर्भाग्य को निर्मित करता है, और सत्कर्म आपके सद्भाग्य को उजागर करता है।।

सद्भाग्य और दुर्भाग्य का चयन आपके अपने हाथों में हैं — जैसा कर्म करेगा वैसा फल देगा भगवान।।

उपरोक्त श्लोक में भी भगवान कृष्ण यही स्पष्ट करना चाहते हैं। कैसे? वो ऐसे – कि जो पहले वाला कर्म है, वो आपकी आसक्ति को दर्शाता है, अथवा स्पष्ट करता है। तथा दूसरा जो कर्म है, वो आपकी कर्म फल के त्याग को स्पष्ट करता है।।

इस बात कि स्पष्टता यह है, कि – जो व्यक्ति कर्म फल कि ओर ध्यान दिए बिना अपना कर्तब्य कर्म करता है, और जो मिला उसी से (परमात्मा के भरोसे अथवा चिंतन से) संतुष्ट रहता है, तथा किसी (संसार) कि उम्मीद या सहारे पर निर्भर नहीं रहता, वह सबकुछ करके भी कुछ नहीं करता, अर्थात संसार में रहकर भी राजा जनक की तरह बन जाता है।।

जय श्रीमन्नारायण!! वेंकटेश स्वामी आप सभी की रक्षा नित्य करते रहें, तथा आप सभी को आयु, धन, यश, कीर्ति तथा पुत्र-पौत्रादि से सम्पन्न बनायें।।

आप सभी अपने मित्रों को फेसबुक पेज को लाइक करने और संत्संग से उनके विचारों को धर्म के प्रति श्रद्धावान बनाने का प्रयत्न अवश्य करें।।

नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्।।

।। नमों नारायण ।।

कर्म की परिभाषा तथा कर्म और ज्ञान में अंतर।। Karma Ki Paribhasha Aur Gyan.

जय श्रीमन्नारायण,

यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पंडितं बुधाः॥ (गीता अ.४.श्लोक.१९.)

अर्थ:- जिसके सम्पूर्ण शास्त्रसम्मत कर्म बिना कामना और संकल्प के होते हैं। तथा जिसके समस्त कर्म ज्ञानरूप अग्नि द्वारा भस्म हो गए हैं। उस महापुरुष को ज्ञानीजन भी पंडित कहते हैं।।१९।।

गीता के इस श्लोक में भगवान आखिर बताना क्या चाहते हैं? वैसे यह बात तो पूर्ण सत्य है। लेकिन समझने वाली बात यह है, कि जिसके कर्म बिना कामना और संकल्प के होते हैं। अब प्रश्न यह उठता है, कि कैसे कर्म? उत्तर है – शास्त्र सम्मत कर्म। दूसरी बात यह है, जिसके समस्त कर्म ज्ञान रूपी अग्नि में जलकर भस्म हो चुके हों। भाई जी ज्ञान रूपी अग्नि और समस्त कर्म जलकर भस्म हो जाय, ये कुछ अंदर नहीं बैठ रहा है – जरा स्पष्ट करें।।

यहाँ सबसे पहले हमें कर्म की परिभाषा को जानने की आवश्यकता है। हिंदी व्याकरण में तीसरी या चौथी कक्षा में पढ़ाई जाती थी। आप सभी को पता ही होगा कर्म किसे कहते हैं? चलिए मैं बता देता हूँ, कर्म की परिभाषा यह है, कि किसी भी कर्ता के द्वारा किसी भी कार्य को संपादित किया जाए, उसे कर्म कहते हैं। अब यहाँ स्पष्ट है, कि किसी भी कर्ता अर्थात कर्ता कोई भी हो सकता है। आप, हम या समाज में जितने भी लोग हैं। सभी कोई ना कोई कार्य करते हैं।।

इस प्रकार ऐसे लोग कर्ता हुए। इसी तरह कार्य कोई भी हो सकता है। जैसे सुबह बिस्तर से जगना और वहां से लेकर दिनभर रात्रि शयन पर्यंत जो कुछ भी कार्य करते हैं। वह सारे कृत्य कर्म के अंतर्गत आते हैं। आजकल कुछ लोग कर्म की परिभाषा इतना ही करते हैं, कि किसी भी तरह अर्थात येन केन प्रकारेण पैसा कमा लिया जाए उसको ही कर्म समझते हैं। परंतु यह बहुत बड़ा भ्रम है। कर्म की परिभाषा इतनी ही नहीं है। कर्म का मतलब सब कुछ होता है।।

कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः॥ (गीता अ.४.श्लोक.१७.)

अर्थ:- कर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए और अकर्मण का स्वरूप भी जानना चाहिए तथा विकर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए क्योंकि कर्म की गति गहन है।।

गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कर्म की बहुत विस्तृत व्याख्या करी है। कर्माऽकर्मविकर्मेति वेदवादो न लौकिक: अर्थात भगवान ने कहा है, कि कर्म अकर्म और विकर्म ये कई प्रकार के होते हैं। सुबह उठना, नहा धोकर किसी भी मंदिर में जाकर किसी भगवान का दर्शन करना। यह भी एक कर्म है। साथ ही देवालय जाना भी एक कर्म है। वही सुबह उठकर मदिरालय जाना भी एक कर्म है। परंतु दोनों में अंतर क्या है? एक सत्कर्म है तो दूसरा दुष्कर्म है।।

अब समझना हमें है, कि शास्त्रानुसार सत्कर्म का परिणाम सद्भाग्य होता है तथा दुष्कर्म का परिणाम दुर्भाग्य होता है। केवल सुबह जग कर पैसे कमाने के लिए आप भागते हैं यही सम्पूर्ण कर्म नहीं है। कुछ लोग कहते हैं, कि महाराज हम तो किसी का कुछ बिगड़ते नहीं है। बस अपना कर्म करते हैं और किसी के विषय में गलत सोचते भी नहीं है। परंतु प्रकृति ने सब को एक दूसरे को जोड़ कर रखा हुआ है। आप कुछ करो या न करो आपसे अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के कर्म निश्चित रुप से होते ही हैं।।

अब आप अपना काम करने के लिए अर्थात पैसा कमाने के लिए घर से निकलते हो। ऑफिस जाते हो। आप के चलने में भी आपके पैरों के नीचे न जाने कितने प्रकार के कीटाणु दबकर मर जाते हैं। उनके लिए आपने क्या किया? इस प्रकृति पर जितना हक आपका है उतना ही हक उस जीवाणु का भी है। जो निर्दोष था और आपके अपने कमाने खाने और बाल बच्चों के पोषण हेतु जाने में आपके पैरों के नीचे दबकर मर गया। उसका क्या कसूर था? आप दोषी हुए कि नहीं हुए निर्णय आपका है।।

आपने इस कर्म के बदले प्रकृति को क्या दिया? आप किसी फैक्ट्री में काम करते हैं, बहुत अच्छी बात है। लेकिन फैक्ट्री के मालिक ने एक फैक्ट्री बनाई उसमें कुछ पूंजी लगाया। आपको भी सैलरी पर रखा। इसलिए नहीं कि आप आओ और ड्यूटी बजा कर चले जाओ। इसलिए कि आपके ड्यूटी के बदले उसको भी कुछ मिले। उसको भी कुछ फायदा हो। अगर उसको फायदा नहीं होगा तो आपको रखने का कोई मतलब नहीं होगा। उसी तरह ईश्वर ने प्रकृति बनाई और इसमें ऑक्सीजन का एक भंडार दिया। आप सुबह जगते हो दिनभर 24 घंटे यह धौंकनी चलती रहती है।।

यह जो मुफ्त में ऑक्सीजन मिल रही है इसके बदले आपने प्रकृति को क्या दिया? अगर एक दिन ऐसा आएगा जब प्रकृति के इस ऑक्सीजन का भंडार खाली हो जाएगा तब आप क्या करोगे? कहां जाओगे? किसी भी विस्तार का एक नियम होता है। उस नियम का उल्लंघन करोगे तो निश्चित रूप से दंड के पात्र बनोगे। सरकार भी है तो उसके भी संविधान है। उसी तरह प्रकृति का भी एक नियम एक सिद्धांत है।।

उन सिद्धांतों का उल्लंघन करके जीवन में आप कब तक सुखी रह पाओगे? इसलिए सुखी रहना है तो प्रकृति के नियमों का पालन करना ही होगा। शास्त्रों के सिद्धांतों को मानना ही पड़ेगा। केवल इह लोक अथवा लौकिक नजरिए से ही नहीं अपितु अलौकिक तथा पारलौकिक सुख की प्राप्ति हेतु भी यह करना अनिवार्य है। हमारे शास्त्रों में तो पारलौकिक सिद्धान्तों को मानकर हमारे पूर्वज ऋषियों ने ईश्वर का साक्षात्कार तक किया है।।

अब ये विषय तो स्पष्ट ही है, समस्त कर्म अर्थात कोई भी कर्म। मतलब सुबह से शाम तक, सोने से खाने तक, लैट्रिन से लेकर बाथरूम तक, फैक्टरी कि नौकरी से लेकर श्रीमती जी के आज्ञा पालन तक। अर्थात कोई भी कर्म मतलब कोई भी कर्म। सब कुछ शास्त्रसम्मत हो मतलब जिस कर्म कि इजाजत शास्त्र नहीं देते वो कर्म नहीं करना यही ज्ञान है। और ये ज्ञान रूपी अग्नि जिसके अंदर समा जाय अर्थात आ जाय। फिर इस अग्नि से सम्पूर्ण कर्तब्य कर्म जलकर भस्म हो जाते हैं।।

फिर वो पुरुष नहीं रह जाता — बल्कि — महापुरुष — हो जाता है। और फिर बड़े से बड़ा ज्ञानी भी उसके सन्मुख नतमस्तक हो जाते हैं। अर्थात ऐसा व्यक्ति भगवत्स्वरूप हो जाता है।।

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कर्म और पाखण्ड में क्या भेद है।। Karm Aur Pakhand Me Bhed.

जय श्रीमन्नारायण,

न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते॥ (गीता – अ.४/श्लोक.१४.)

अर्थ-: कर्मों के फल में मेरी स्पृहा नहीं है, इसलिए मुझे कर्म लिप्त नहीं करते- इस प्रकार जो मुझे तत्व से जान लेता है, वह भी कर्मों से नहीं बँधता॥14॥

यहाँ प्रश्न यह उठता है, कि भगवान यहाँ जिस तत्वज्ञान की बात करते हैं, वो तत्वज्ञान है, क्या? लोग कहते हैं, की फलां व्यक्ति बहुत बड़ा ज्ञानी है। ज्ञानी होना बहुत गर्व का विषय है, इसमें कोई संसय नहीं। लेकिन मुझे लगता है, कि परमात्मा को जानने से पहले उसके द्वारा दर्शाए गए आचरणों को समझना होगा।।

आचरण क्या है? मूलत: जो हम करते हैं, उसे ही आचरण कहा जाता है। तो परमात्मा करता क्या है – यहाँ के विषयानुसार – न मां कर्माणि लिम्पन्ति – कर्म मुझे लिप्त अर्थात बांधते नहीं, और न में कर्मफले स्पृहा। अर्थात- ये करूँगा तो वो मिल जायेगा, वो करूँगा तो वो मिल जायेगा, ऐसा कभी मैं सोंचता नहीं।।

Karm Aur Pakhand Me Bhed

तो ये है, परमात्मा का आचरण। अब हम भी अगर इसे जानकर और इसी प्रकार अपने जीवन में उतार लेते हैं, तो परमात्मा को तत्व से जानने के अधिकारी हो जाते हैं। और तब हम कर्म करते हुए भी कर्मासक्ति से बंधते नहीं और कर्म का फल देने देवता स्वयं चलकर आते हैं।।

लेकिन अगर हम चाहते हैं धन और बातें करते हैं, सन्यासियों वाली, तो हम पाखंडी हैं। और पाखंड का अंत दुर्दशा से होता है। तथा ठीक इसके विपरीत अगर हम चाहते मोक्ष हैं, और कर्मयोग को अपनाकर अपना जीवन यापन करते हैं, तो ये सन्यास है, और मुक्ति उसके चरणों कि दासी। अगर आपको धन कि इच्छा है, तो कोई बुराई नहीं है। आप देव पूजन करके अतुलनीय धन प्राप्त कर सकते हैं। और ये रास्ता आपके कल्याण का भी है।।

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भगवान नारायण की स्तुति एवं दस अवतार।। Bhagwan Vishnu Stutiyan.

यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुत: स्तुन्वन्ति दिव्यै: स्तवै-
र्वेदै: साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगा:।
ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो-
यस्यान्तं न विदु: सुरासुरगणा देवाय तस्मै नम:।।

अर्थ:- ब्रह्मा, वरुण, इन्द्र, रुद्र और मरुद्‍गण दिव्य स्तोत्रों द्वारा जिनकी स्तुति करते हैं, सामवेद के गाने वाले अंग, पद, क्रम और उपनिषदों के सहित वेदों द्वारा जिनका गान करते हैं, योगीजन ध्यान में स्थित तद्‍गत हुए मन से जिनका दर्शन करते हैं, देवता और असुर गण (कोई भी) जिनके अन्त को नहीं जानते, उन (परमपुरुष नारायण) देव के लिए मेरा नमस्कार है।

शान्ताकारम भुजगशयनम पद्मनाभम सुरेशं।
विश्वधारम गगन सदृशं मेघवर्णम शुभान्गम।।
लक्ष्मिकानतम कमलनयनम योगभिरध्यानगम्यम्।
वंदे विष्णुँ भवभयहरम सर्वलोकैकनाथम।।

अर्थ:- जिस भगवान श्री हरि का रूप अति शांत मय है। जो शेषनाग की शय्या पर शयन करते हैं। जिनकी नाभि से कमल का पुष्प निकल रहा है। वह समस्त जगत के आधार जो भगवान श्री हरि गगन के समान हर जगह व्याप्त हैं। जो नील बादलों के रंग के समान रंग वाले हैं तथा जो योगियों के द्वारा ध्यान करने पर भी नहीं मिल पाते। जो समस्त जगत के स्वामी हैं। जो भय का नाश करने वाले तथा धन की देवी लक्ष्मी जी के पति हैं। ऐसे प्रभु श्रीमन्नारायण को मैं शीश झुका कर प्रणाम करता हूं।।

वैदिक हिन्दू मान्यतानुसार भगवान का पृथ्वी पर अवतरण (जन्म लेना) अथवा उतरना ही ‘अवतार’ कहलाता है। हिन्दुओं का विश्वास है, कि ईश्वर यद्यपि सर्वव्यापी, सर्वदा सर्वत्र वर्तमान है। तथापि समय-समय पर आवश्यकतानुसार पृथ्वी पर विशिष्ट रूपों में स्वयं अपनी योगमाया से उत्पन्न होता है।।

भगवान विष्णु के दस अवतार इस प्रकार हैं। हिन्दू धर्म में सर्वोच्च माने गये भगवान विष्णु के दस अवतारों का पुराणों में अत्यंन्त कलात्मक और कथात्मक चित्रण हुआ है। उनके दस अवतार निम्नलिखित हैं-

01.मत्स्य अवतार।।
02.वराह अवतार।।
03.कूर्म अवतार।।
04.नृसिंह अवतार।।
05.वामन अवतार।।
06.परशुराम अवतार।।
07.राम अवतार।।
08.कृष्ण अवतार।।
09.बुद्ध अवतार।।
10.कल्कि अवतार।।

‘कल्कि अवतार’ अभी होना शेष है।।

उन श्रीमन्नारायण से मेरी ये हार्दिक प्रार्थना है, कि मेरे सभी मित्रों का नित्य कल्याण करें।।

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।। नमों नारायण ।।