बांसुरी भगवान कृष्‍ण को अति प्रिय क्यों है।।

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Bansuri and Krishna
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बांसुरी भगवान श्री कृष्‍ण को अति प्रिय क्यों है।। Bansuri and Krishna.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, बांसुरी भगवान श्री कृष्‍ण को अति प्रिय है। क्यों? क्योंकि इसके तीन गुण हमें जीवन की सीख देते हैं।।

पहला – बांसुरी में गांठ नहीं होती है, जो संकेत देती है कि अपने अंदर किसी भी प्रकार की कोई गांठ मत रखो अर्थात् अपने मन में बदले की भावना कभी मत रखो।।

दूसरा गुण- कि बिना बजाये ये बजती नहीं है। मानो ये बता रही हो कि जब तक आवश्यक न हो, ना बोलें। साथ ही बांसुरी का तीसरा गुण है, कि जब भी बजती है, मधुर ही बजती है। इसका अभिप्राय यह है, कि जब भी बोलो – मीठा ही बोलो।।

मित्रों, कौरवों कि सभा में जब द्रोपदी का चीर हरण होने लगा। द्रोपदी को पांडवों से सहायता की आशा न रही तो उसने कृष्ण से सहायता की गुहार लगाई। कृष्ण नहीं आए और न ही कोई चमत्कार हुआ।।

दूशासन आगे बढ़ कर साड़ी पकड़ने लगा तो भी द्रोपदी ने एक हाथ से साड़ी पकड कर और दूसरे हाथ को उठा कर कृष्ण को पुकारा फिर भी कोई चमत्कार नहीं हुआ।।

दुशासन ने साड़ी खिंचनी शुरू कि द्रोपदी को लगा अब वह निसहाय है। और केवल केशव ही उसे बचा सकते हैं। तब उसने साड़ी छोड़ दोनों हाथों को उपर उठा कर कृष्ण को पुकारा।।

तब चमत्कार हुआ साड़ी खिंचती रही खुलती रही लेकिन साड़ी का दूसरा पल्लू न निकला न ही दुशासन साड़ी खोल पाया। और न ही द्रोपदी निवस्त्र हुई। उस पर पूर्ण विश्वास तो करके देखो।।

इसलिये उपरोक्त बांसुरी के यह तीनों गुण यदि हमारे अंदर आ जाए। हमारे साथ भी द्रौपदी जैसा चमत्कार अवश्य ही होगा। आप बस मेरे कन्हैया पर विस्वास रखो।।

।। सदा सत्संग करें । सदाचारी और शाकाहारी बनें । सभी जीवों की रक्षा करें ।।

नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्।।

।। नमों नारायण ।।

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भागवत प्रवक्ता- स्वामी धनञ्जय जी महाराज "श्रीवैष्णव" परम्परा को परम्परागत और निःस्वार्थ भाव से निरन्तर विस्तारित करने में लगे हैं। श्रीवेंकटेश स्वामी मन्दिर, दादरा एवं नगर हवेली (यूनियन टेरेटरी) सिलवासा में स्थायी रूप से रहते हैं। वैष्णव धर्म के विस्तारार्थ "स्वामी धनञ्जय प्रपन्न रामानुज वैष्णव दास" के श्रीमुख से श्रीमद्भागवत जी की कथा का श्रवण करने हेतु संपर्क कर सकते हैं।।

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