भगवान के स्वरुपों द्वारा प्रकृति का सन्देश।।

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Nature message through the forms of God
Nature message through God

भगवान के स्वरुपों द्वारा प्रकृति का सन्देश।। Bhagwan Ke Rupon Se Prakriti Ka Sandesh.

Nature;s message through the forms of God.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, हमारे वैदिक सनातन ग्रन्थों में जो भगवान के स्वरूपों का वर्णन मिलता है वह सम्पूर्ण विज्ञान है। भगवान के स्वरूप जो शास्त्रों में वर्णित है उससे हमें बहुत बड़ी शिक्षा भी मिलती है। इनके माध्यम से प्रकृति ने हमें बहुत ही स्पष्ट रूप से एक संदेश दिया है। साथ ही जीवन में अगर इस तरह की क्षमताओं को विकसित करोगे तो कभी कष्ट नहीं आएगा कभी कोई दुख नहीं होगा इसलिए हमें इश्वर के स्वरूप को समझना चाहिए।।

शान्ताकारम् भुजगशयनम् पद्मनाभम् सुरेशम्
विश्वाधारम् गगनसदृशम् मेघवर्णम् शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तम् कमलनयनम् योगिभिर्ध्यानगम्यम्
वन्दे विष्णुम् भवभयहरम् सर्वलोकैकनाथम्।।

मैं तो कभी-कभी विचार करता हूं तो मुझे भगवान के स्वरुप में भी विज्ञान नजर आता है। परन्तु उस विज्ञान को समझने के लिए समय और चिंतन की आवश्यकता होती है। जो गृहस्थ जीवन में रहकर अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने से समय मिले तो फिर इस तरह का कोई चिंतन किया जाए। लेकिन कभी-कभी भगवान से जब बातें करता हूं तो ऐसा आभास होता है कि भगवान नारायण के स्वरूप में जो मकराकृत कुंडल, किरीट, केयूर और वनमाला तथा शेषनाग सिर पर छत्र की तरह विराजमान रहते है। माता लक्ष्मी चरणों में बैठी है। देवता सब स्तुति करते रहते हैं।।

भगवान की चार भुजाएं पति-पत्नी दोनों की दो-दो भुजाओं का संकेत है। जिनके दाहिने के एक हाथ में गदा जो पराक्रम का प्रतिक है। दुसरे दाहिने हाथ में चक्र जो सतत गतिशीलता का सन्देश देता है। बायाँ एक हाथ जिसमें शंख स्त्रियों के लिये यह सन्देश देता है, कि मृदुभाषी बनें अथवा रहे। बायाँ जो दूसरा हाथ जिसमें कमल का पुष्प है, जो स्त्रियों को सदा पति के सुख-दुःख में साथ रहने और मुस्कुराते रहने का सन्देश देता है।।

मेरे चिंतन के अनुसार मुझे भगवान के प्रत्येक आयुधों एवं सम्पूर्ण स्वरुप में कुछ-न-कुछ विशिष्टता का सन्देश छिपा है। मुझे चिंतन के बाद अभिप्राय यह समझ में आता है, कि भगवान के जो स्वरूप में वर्णन है। उन सभी को अगर हम अपने जीवन में उतार लें तो लक्ष्मी के लिए हमें कहीं भटकना नहीं पड़ेगा। साथ ही और भी बहुत कुछ चीजें हैं, जिसके बारे में हमें कभी गहराई से बैठकर चिंतन करने की आवश्यकता है।।

अगर हम भगवान शिव का स्वरूप जो शास्त्रों में वर्णित है उसपर गहराई से चिंतन करें तो उससे हमें बहुत बड़ी शिक्षा भी मिलती है। इन सभी के माध्यम से प्रकृति ने हमें स्पष्ट रूप से एक संदेश दिया है, कि जीवन में अगर हम इस तरह की क्षमताओं को विकसित करेंगे तो कभी भी किसी प्रकार का भी कोई कष्ट नहीं आएगा। कभी कोई दुख नहीं होगा। इसलिए हमें शिव के स्वरूप को भी समझना चाहिए।।

कर्पूर गौरं करुणावतारं संसार सारं भुजगेन्द्र हारं।
सदा बसन्तम् हृदयारविन्दे भवं भवामि सहितं नमामि।।

एक समय एक तारक नाम का एक असुर हो गया और देवताओं को उसने बहुत परेशान किया। उनका घर-द्वार, स्वर्गादि सब कुछ अपने कब्जे में कर लिया। सभी देवता भगवान नारायण कि सलाह से, भगवान शिव के पास पहुंचे। परन्तु शिव जी तो समाधि में थे। पुनः भगवान के कहने पर कामदेव को लेकर शिव जी को जगाने पहुंचे। कामदेव ने बहुत परिश्रम किया, भगवान शिव जगे और काम का तांडव देखा। काम के इस प्रकार के ताण्डव को देखते ही गुस्से से तीसरा नेत्र बाबा का खुल गया और काम जलकर भस्म हो गया।।

रती के रोने-विलाप करने पर बाबा ने कहा। गोस्वामी जी के शब्दों में सुनिये:-

जब जदुबंस कृष्न अवतारा।
होइहि हरन महा महिभारा।।
कृष्न तनय होइहि पति तोरा।
बचनु अन्यथा होइ न मोरा।।

अर्थात:– जब पृथ्वी के बड़े भारी भार को उतारने के लिए यदुवंश में श्री कृष्ण का अवतार होगा। तब तेरा पति उनके पुत्र (प्रद्युम्न) के रूप में उत्पन्न होगा। मेरा यह वचन अन्यथा नहीं होगा।।

देवताओं ने कहा – लेकिन अभी क्या करें, अभी काम नहीं तो सृष्टि का ये अंतिम पीढ़ी होगा। बाबा ने कहा — हे रति! अब से तेरे स्वामी का नाम अनंग होगा। वह बिना ही शरीर के सबको व्यापेगा। कहने का तात्पर्य यह है, कि भगवान शिव के विषय में ये उपर का जो श्लोक है। कहता है, कि — जिनका रंग कर्पूर के समान गौर है, जो इस संसार के सार तत्व हैं। भुजंग अर्थात सर्प अर्थात कष्टों और परेशानियों को ही गले लगाये रहते हैं और हमें ये बताते हैं, कि तुम भी कष्टों को सहन करने कि शक्ति को जगाओं।।

जो सादा वेष को ही पसंद करते हैं, अर्थात दुःख में तड़पो नहीं, सुख में फूलो नहीं, हृदय में सदा अरविन्द अर्थात नारायण का स्मरण करते हुए ये संदेश देते हैं, कि अपने अन्नदाता को सदा याद रखो। ऐसे संसार के मालिक और सृष्टि स्वरूपा माता पार्वती दोनों को हम एक साथ नमन करते हैं। बात भी सत्य है, शिव जी ने कामदेव को जलाकर भस्म कर दिया, लेकिन कही भी उनको क्रोधावतार नहीं कहा गया बल्कि करुणावतार ही कहा गया है। ऐसे करुणावान भोले बाबा को मैं ह्रदय से नमन करता हूँ। साथ ही अपने सभी मित्रों के उपर भी करुण दृष्टि बनाये रखने कि प्रार्थना करता हूँ।।

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नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्।।

।। नमों नारायण ।।

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