Chanakya Neeti

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Sadbhav Se Sabko Vash Me Karo
Sadbhav Se Sabko Vash Me Karo

चाणक्यनीति :–


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“कान्तावियोगः स्वजनापमानो रणस्य शेषः कुनृपस्य सेवा।
दरिद्रभावो विषमा सभा च विनाग्निमेते प्रवहन्ति कायम्।।”
(चाणक्यनीति–2.14)

अर्थः—युद्ध से बचा शत्रु , स्त्री का विरह, अपने जनों का अनादर, दुष्ट राजा की सेवा, ये विना आग के ही शरीर को जलाते हैं।

यथासम्भव इनसे बचना चाहिए।

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भागवत प्रवक्ता- स्वामी धनञ्जय जी महाराज "श्रीवैष्णव" परम्परा को परम्परागत और निःस्वार्थ भाव से निरन्तर विस्तारित करने में लगे हैं। श्रीवेंकटेश स्वामी मन्दिर, दादरा एवं नगर हवेली (यूनियन टेरेटरी) सिलवासा में स्थायी रूप से रहते हैं। वैष्णव धर्म के विस्तारार्थ "स्वामी धनञ्जय प्रपन्न रामानुज वैष्णव दास" के श्रीमुख से श्रीमद्भागवत जी की कथा का श्रवण करने हेतु संपर्क कर सकते हैं।।

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