छोटा या बड़ा नहीं सिर्फ आशीर्वाद समझें।।

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Chhota-Bada Nahi Sirf Ashirvad
Chhota-Bada Nahi Sirf Ashirvad

तुच्छ और श्रेष्ठ नहीं भगवान का आशीर्वाद समझकर ग्रहण करें, फिर देखें ।। Chhota-Bada Nahi Sirf Ashirvad.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, परमात्मा हमें कब, कहाँ और किस रूप में मिल जाय ये हम नहीं जानते। अथवा परमात्मा की कृपा हमें कब, कहाँ और किस रूप में मिल जाय ये भी हम नहीं जानते। तुलसी यह संसार में सबसे मिलिये धाय। ना जाने किस रूप में नारायण मिल जाय। तुलसीदास जी की यह वाणी सम्पूर्ण सत्य है। एक और रहिमनदास जी की वाणी है – रहिमन देखि बड़ेन को लघु न दीजै डारी। जहाँ काम आवै सुई कहा करै तरवारी।।

इसीलिये हमारे संतों और शास्त्रों ने बताया है, कि सबका सम्मान करना सीखो। छोटा-बड़ा, अमीर-गरीब, जात-पात के आधार पर किसी को तुच्छ और किसी को श्रेष्ठ मत समझो। माता-पिता, (देवता-गुरु और ब्राह्मणों-सन्तों) का सदैव सम्मान करो। क्योंकि ना जाने किस रूप में नारायण मिल जाय। माता-पिता और भगवान कभी किसी को कभी भी कम नहीं देते।।

हाँ यदि एक बार को देने वाली वस्तु कम दिखे तो भी उसमें उनकी कृपा और आशीर्वाद गूढ़ रूप में छिपी होती है। जो दुनियाँ के सभी सम्पदाओं से भी बड़ी होती है। किसी ने एक कहानी भेजी थी मुझे काफी इन बातों से मेल खाती हुई है। आपलोगों को भी सुनाता हूँ, सुने और विचार करें। एक गरीब व्यक्ति जिनके दो पुत्र थे। जब वो वृद्ध हो गये और उनकी अंतिम साँसे चलने लगी।।

तब दरवाजे में बैठे हुये थे तो किसी ने उन्हें एक आम का फल जो मीठा और रसदार भी था, दिया। अब उस वृद्ध पिता के पास अपने अंतिम समय में दो बेटों को देने के लिए मात्र वही एक आम था। पिताजी आशीर्वाद स्वरूप दोनों को वही आम देना चाहते थे। किंतु बड़े भाई ने हठपूर्वक उस आम को ले लिया। उसने उस आम का रस चूस लिया। छिलका अपनी गाय को खिला दी और गुठली छोटे भाई के आँगन में फेंकते हुए कहा- ये लो पिताजी का तुम्हारे लिए आशीर्वाद है।।

छोटा भाई थोड़ा धार्मिक एवं श्रद्धालु प्रवृत्ति का था। उसने ब़ड़ी श्रद्धापूर्वक गुठली को अपने पिता का आशीर्वाद समझकर उस गुठली को अपने सर-आँखों से लगाकर एक गमले में गाड़ दिया। उसकी पत्नी भी धार्मिक प्रवृत्ति की थी सुबह पूजा के बाद बचे हुये जल को उसी गमले में डाल देती थी। कुछ समय बाद आम का पौधा उग आया, जो देखते ही देखते बढ़ने लगा।।

छोटे भाई ने उसे गमले से निकालकर अपने आँगन में लगा दिया। कुछ वर्षों बाद उसने वृक्ष का रूप ले लिया। वृक्ष के वजह से बिना छपरे के घर की धूप से रक्षा होने लगी और साथ ही प्राकृतिक सुन्दरता भी बढ़ गयी। सुबह-सुबह शीतल मन्द सुगन्धित वायु के साथ-साथ बसंत में कोयल की मधुर कूक सुनाई देने लगी। उसके बच्चे उस वृक्ष की छाँव में किलकारियाँ भरकर खेलने लगे।।

पेड़ की शाखा से झूला बाँधकर झूलने लगे। पेड़ की छोटी-छोटी लकड़ियाँ हवन करने एवं मोटी शाखायें घर के दरवाजे-खिड़कियाँ बनाने में भी काम आने लगीं। धीरे-धीरे वृक्ष में फलियाँ लग गईं उनसे आचार व मुरब्बा बनाया गया। आम के रस से घर-परिवार के सदस्य रस-विभोर हो गए। तब बाकि के आम बाजार में बेच दिया गया। उन आमों के अच्छे दाम मिलने से उसकी आर्थिक स्थिति मजबूत हो गई।।

रस से पाप़ड़ भी बनाए गये जो पूरे वर्ष मेहमानों एवं घरवालों को आम रस की याद दिलाते रहते। ब़ड़े बेटे को आम फल का सुख क्षणिक ही मिला तो छोटे बेटे को पिता का आशीर्वाद दीर्घकालिक एवं सुख-समृद्धिदायक मिला। हमारा भी हाल कुछ ऐसा ही है। हमारा परमात्मा हमें सब कुछ देता है। लेकिन हम उसका सही उपयोग नहीं करते और दोष परमात्मा और किस्मत को देते हैं।।

अगर हम छोटी-से-छोटी वस्तुओं की उपयोगिता समझकर उसको भगवान की कृपा समझकर ग्रहण करें तो निश्चित ही हमें उम्मीद से ज्यादा हासिल हो सकता है।।

नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

।। सदा सत्संग करें । सदाचारी और शाकाहारी बनें । सभी जीवों की रक्षा करें ।।

नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्।।

।। नमों नारायण ।।

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