सौ हाथ से कमा हजार हाथ से दान करें।।

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Daan Ki Mahima
Daan Ki Mahima

सौ हाथ से कमा हजार हाथ से दान करें।। Daan Ki Mahima.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, अथर्ववेद में दान की बहुत बड़ी महिमा बतायी गयी है। कहा गया है, कि अगर आप सैकड़ों हाथों से धन कमाते हैं तो आपको सहस्रों हाथों से उदार मन से उसे दान करना चाहिये।।

शतहस्त समाहार सहस्त्रहस्त सं किर:।
कृतस्य कार्यस्य चहे स्फार्ति समायह।।

अर्थ:- हे मनुष्य! तू सौ हाथों वाला होकर धनार्जन कर और हजार हाथ वाला बनकर दान करते हुए समाज का उद्धार कर। समाज में समरसता बनाये रखने के लिये यह आवश्यक है। शक्तिशाली तथा समृद्ध वर्ग कमतर श्रेणी के लोगों की सहायता करें। परन्तु अब तो समाज कल्याण सरकार का विषय बना दिया गया है।।

जिससे लोग अब सारा दायित्व सरकार का मानने लगे हैं। धनी, शिक्षित तथा शक्तिशाली वर्ग यह मानने लगा है, कि अपनी रक्षा करना ही एक तरह से समाज की रक्षा है। इतना ही नहीं यह वर्ग मानता है, कि वह अपने लिये जो कर रहा है उससे ही समाज बचा हुआ है।।

जब धर्म की बात आती है तो सभी उसकी रक्षा की बात करते हैं। पर लालची लोगों का ध्येय केवल अपनी समृद्धि, शक्ति तथा प्रतिष्ठा को बचाना रह जाता है। कहने का अभिप्राय यह है, कि हमें केवल धर्म का विस्तार करनेवाले को ही श्रेष्ठ मानकर उसे ही दान करना चाहिये। साथ ही आचरण के आधार पर भी धार्मिकता पर हम अपनी राय बना सकते हैं।।

हमारा समाज त्याग पर आधारित सिद्धांत को मानता है। जबकि लालची लोग केवल इस सिद्धांत की दुहाई देते हैं पर चलते नहीं। समाज की सेवा भी अनेक लोगों का पारिवारिक व्यापार जैसा हो गया है। यही कारण है, कि वह अपनी संस्थाओं का पूरा नियंत्रण परिवार के सदस्यों को ही सौंपते हैं।।

साथ ही ऐसे लोग दावा यह करते हैं, कि पूरे समाज का हम पर विश्वास है। यह भी दिखाते हैं, कि उनका समाज में परिवार के बाहर किसी दूसरे पर उनका विश्वास नहीं है। हम जाति, धर्म, शिक्षा, क्षेत्र तथा कला में ऐसे लालची लोगों की सक्रियता पर दृष्टिपात करें तो पायेंगे कि उनका ढोंग वास्तव में समूचे समाज को बदनाम करनेवाला हैं।।

बहरहाल हमें अपने आचरण पर ध्यान रखना चाहिये। जहां तक हो सके धर्म, जाति, भाषा, कला, राज्यकर्म तथा क्षेत्र के नाम पर समाज को समूहों में बांटने वाले लोगों की लालची प्रवृत्ति देखते हुए उनसे दूरी बनाने के साथ ही अपना सहज कर्म करते रहना चाहिये।।

ऐसे एन.जी.ओ. आदि जो लोक कल्याण के नाम पर अरबों में दान लेते हैं और बिलकुल अन्यथा कार्य करते हैं। ऐसे लोगों से हमें सावधान रहने एवं सोंच-समझकर दान करने की आवश्यकता है। क्योंकि धर्म से ही समाज का कल्याण संभव है। फिर समाज रहेगा तभी तो हम राजनीति भी करेंगे।।

आप सभी अपने मित्रों को फेसबुक पेज को लाइक करने और संत्संग से उनके विचारों को धर्म के प्रति श्रद्धावान बनाने का प्रयत्न अवश्य करें।।

नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्।।

।। नमों नारायण ।।

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भागवत प्रवक्ता- स्वामी धनञ्जय जी महाराज "श्रीवैष्णव" परम्परा को परम्परागत और निःस्वार्थ भाव से निरन्तर विस्तारित करने में लगे हैं। श्रीवेंकटेश स्वामी मन्दिर, दादरा एवं नगर हवेली (यूनियन टेरेटरी) सिलवासा में स्थायी रूप से रहते हैं। वैष्णव धर्म के विस्तारार्थ "स्वामी धनञ्जय प्रपन्न रामानुज वैष्णव दास" के श्रीमुख से श्रीमद्भागवत जी की कथा का श्रवण करने हेतु संपर्क कर सकते हैं।।

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