गंगा दशहरा का माहात्म्य एवं कथा।।

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Ganga Dashahara Mahatmya
Ganga Dashahara Mahatmya

गंगा दशहरा का माहात्म्य एवं कथा।। Ganga Dashahara Mahatmya.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, गंगा दशहरा पर्व सनातन संस्कृति का एक पवित्र त्योहार है। मान्यता के अनुसार कहा जाता है, कि इस दिन मां गंगा का धरती पर अवतरण हुआ था। गंगा दशहरा के दिन पवित्र गंगाजी में स्नान करने से मनुष्य अपने हर प्रकार के पापों से मुक्त हो जाता है। स्नान के साथ-साथ इस दिन दान-पुण्य करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। आइए जानते हैं गंगा दशहरा पर्व और इस खास पर्व का महत्व।।

ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को हस्त नक्षत्र में श्रेष्ठ नदी माता “गंगा” स्वर्ग से अवतरित हुई थीं। माता गंगा के पृथ्वी पर अवतरण के पर्व को गंगा दशहरा के रूप में मनाया जाता है। गंगा मैया हम भारतवासियों के लिए देवलोक का महाप्रसाद हैं। मां गंगा हम भारतीयों को राष्ट्रीय एकता के सूत्र में पिरोती हैं। हमारे यहां मृत्यु से ठीक पूर्व गंगा जल की कुछ बूंदें मुंह में डालना मोक्ष का पर्याय माना जाता है। इसके जल में स्नान करने से जीवन के सभी संतापों से मुक्ति मिलती हैं।।

गंगा दशहरा तन के साथ-साथ मन की शुद्धि का पर्व भी है। इसलिए इस दिन गंगा जी में खड़े होकर अपनी पूर्व में की हुई गलतियों के लिए क्षमा मांगनी चाहिए और भविष्य में कोई भी बुरा कार्य नहीं करने का संकल्प लेना चाहिए। आइए गंगा दशहरा के पावन पर्व पर पढें गंगा के अवतरण की पौराणिक कथा।।

माता गंगा के अवतरण की कथा।। Ganga Avataran Ki Katha.

मित्रों, प्राचीन काल में अयोध्या में सगर नाम के महाप्रतापी राजा राज्य करते थे। उन्होंने सातों समुद्रों को जीतकर अपने राज्य का विस्तार किया। उनकी केशिनी तथा सुमति नामक दो रानियां थीं। पहली रानी के एक पुत्र असमंजस का उल्लेख मिलता है। साथ ही दूसरी रानी सुमति के साठ हजार पुत्र थे। एक बार राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ किया और यज्ञ पूर्ति के लिए एक घोड़ा छोड़ा।।

देवराज इंद्र ने उस यज्ञ को भंग करने के लिए यज्ञीय अश्व का अपहरण कर लिया। अपहरण करके उसे कपिल मुनि के आश्रम में बांध आए। राजा ने उसे खोजने के लिए अपने साठ हजार पुत्रों को भेजा। उन साठ हजार सगर पुत्रों ने सारा भूमंडल छान मारा, फिर भी अश्व नहीं मिला। फिर अश्व को खोजते-खोजते जब वे कपिल मुनि के आश्रम में पहुंचे तो वहां उन्होंने महर्षि कपिल को तपस्या करते देखा। उन्हीं के पास महाराज सगर का अश्व घास चर रहा है।।

सगर के पुत्र उन्हें देखकर चोर-चोर चिल्लाने लगे। इससे महर्षि कपिल की समाधि टूट गई। ज्यों ही महर्षि ने अपने नेत्र खोले, त्यों ही सब जलकर भस्म हो गए। अपने पितृव्य चरणों को खोजता हुआ राजा सगर का पौत्र अंशुमान जब मुनि के आश्रम में पहुंचा तो महात्मा गरुड़ ने भस्म होने का सारा वृत्तांत सुनाया। गरुड़ जी ने यह भी बताया, यदि इन सबकी मुक्ति चाहते हो तो गंगाजी को स्वर्ग से धरती पर लाना पड़ेगा।।

परानु उससे भी पहले इस समय इस अश्व को ले जाकर अपने पितामह के यज्ञ को पूर्ण कराओ, उसके बाद यह कार्य करना। अंशुमान ने घोड़े सहित यज्ञमंडप पर पहुंचकर अपने पितामह राजा सगर से सारा वृत्तांत कह सुनाया। महाराज सगर की मृत्यु के उपरांत अंशुमान और उनके पुत्र दिलीप जीवन पर्यंत तपस्या करके भी गंगाजी को मृत्युलोक में ला न सके।।

सगर के वंश में अनेक राजा हुए, सभी ने साठ हजार पूर्वजों की भस्मी के पहाड़ को गंगा के प्रवाह के द्वारा पवित्र करने का प्रयत्न किया, किंतु वे सफल न हुए। अंत में महाराज दिलीप के पुत्र भगीरथ ने गंगाजी को इस लोक में लाने के लिए गोकर्ण तीर्थ में जाकर कठोर तपस्या की। इस प्रकार तपस्या करते-करते कई वर्ष बीत गए। उनके तप से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने वर मांगने को कहा तो भागीरथ ने माता “गंगा” की मांग की।।

भागीरथ के गंगा मांगने पर ब्रह्माजी ने कहा, राजन! तुम गंगा को पृथ्वी पर तो ले जाना चाहते हो, परंतु गंगाजी के वेग को संभालने की शक्ति केवल भगवान शिव में ही है। इसलिए उचित यही होगा कि गंगा का भार एवं वेग संभालने के लिए पहले भगवान शिव का अनुग्रह प्राप्त कर लो। महाराज भगीरथ ने वैसा ही किया। भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में धारण किया। राजा भगीरथ की गंगा को पृथ्वी पर लाने की कोशिशों के कारण माता गंगा का एक नाम भागीरथी भी है।।

गंगा दशहरा का माहात्म्य।। Ganga Dashahara Mahatmya.

शास्त्रों के अनुसार, गंगा मां की आराधना करने से व्यक्ति को दस प्रकार के पापों से मुक्ति मिलती है। गंगा ध्यान एवं स्नान से प्राणी काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, ईर्ष्या, ब्रह्महत्या, छल, कपट, परनिंदा जैसे पापों से मुक्त हो जाता है। गंगा दशहरा के दिन भक्तों को मां गंगा की पूजा-अर्चना के साथ दान-पुण्य भी करना चाहिए। गंगा दशहरा के दिन सत्तू, मटका और हाथ का पंखा आदि दान करने से कई गुना फल की प्राप्ति होती है।।

अग्नि पुराण में कहा गया हैं कि- जैसे मंत्रों में ॐ कार, धर्मो में अहिंसा, कामनाओं में लक्ष्मी का कामना, नारियों में माता महागौरी उत्तम हैं। ठीक वैसे ही तीर्थों में सर्वश्रेष्ठ गंगा जी हैं। अगर गंगा दशहरा के दिन कोई भी मनुष्य अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति की इच्छा से गंगा जी में 21, 51 या 108 की संख्या में डुबकी लगाकर स्नान करने के बाद शुद्ध सफेद वस्त्रों को धारण कर गंगा किनारे बैठकर इस मन्त्र का जप करना चाहिये।।

ऊँ ह्रीं गंगादेव्यै नमः ।। इस मंत्र का 1008 बार जप करने से माँ गंगा प्रसन्न होकर सभी मनोकामनाओं की पूर्ण करती है। इस दिन अगर कोई अपने पूर्वज पितरों की मुक्ति के निमित्त- गुड, गाय का घी और तिल शहद के साथ बनी खीर गंगा जी में डालते हैं, तो डालने वालों के पितर सौ वर्षों तक तृप्त और प्रसन्न होकर अपनी संतानों को मनोवांछित फल प्रदान करते हैं।।

।। सदा सत्संग करें । सदाचारी और शाकाहारी बनें । सभी जीवों की रक्षा करें ।।

नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्।।

।। नमों नारायण ।।

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