गुरुपूर्णिमा को मुझे अपनी बुराइयाँ दे दो।।

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Gurupurnima Ki GuruDakshina
Gurupurnima Ki GuruDakshina

गुरुपूर्णिमा कि गुरुदक्षिणा में मुझे अपने जीवन कि बुराइयाँ दे दो।। Gurupurnima Ki GuruDakshina Me Aapaki Buraiyan Mujhe De Do.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, हर इन्सान के जीवन में बहुत सी गलत आदतें होती है । और ये गलत आदतें ही इन्सान को जीवन में दुःख-कष्ट-तकलीफों को लेकर आता है । अगर आप चाहते हैं, की आपके जीवन में कभी कोई कष्ट एवं दुःख ना आये, तो आप किसी भी प्रकार कि गलत आदतों को छोड़ने का प्रयास करें । क्योंकि अपने जिन्दगी से तकलीफों को दूर करने का इससे आसान तरीका और कोई है ही नहीं ।।

अगर आप अपना कल्याण चाहते हैं, तो अपने बाजू वाले को मत देखो । क्योंकि इस मतलबी दुनिया बहुतों को ध्यान, भजन और सत्संग से नहीं बल्कि धन, भोजन और राग-रंग से ही सिर्फ मतलब रखते हैं । कोई मिले तो औपचारिकता मात्र के लिये हाल-चाल पूछता है । असलियत में तो सभी घर, परिवार और व्यापार के बारे में ही जानना चाहते हैं । बिरला ही कोई पूछता होगा कि आपको भगवान से कितना प्यार है ।।

मित्रों, हमें हमारे जीवन में अपने संकल्प, साधना एवं अपने लक्ष्य से कभी भी गिरना नहीं चाहिये । हाँ अगर गिरना ही हो तो भगवान के श्री चरणों में गिरो जहाँ मात्र कल्याण ही है । क्योंकि गिरे हुये को उठाने का काम करता है मेरा परमात्मा । और जहां कोई उठाने वाला हो वहां ही गिरना चाहिए । लेकिन हम अपने स्वार्थ में कभी गिरे हुये नेताओं के पीछे भागते है तो कभी पैसे वालों के पीछे ।।

जो लोग स्वयं गिरे हुए हो वहां गिरना अंधों की बस्ती में सीसा बेचने जैसा ही है । हाँ ये सत्य है, कि उठने के लिये गिरना आवश्यक होता है तो भगवान के चरणों में गिरो ना । ईश्वर का स्मरण करो तो ऐसा करो कि फिर दूसरी बार उसे याद करना ही न पड़े । जब भी बैठो उसे याद करने तो अपने सारे काम भूल जाओ और पुरे मन से ईश्वर का स्मरण करो ।।

मित्रों, अन्तःकरण में परमात्मा को ऐसे बिठा लो और मन ही मन को उसके दर्शन में ऐसे लगा दो कि उसको भी याद करना भूल जाओ । क्योंकि यही सर्वोच्च श्रेणी का ईश्वर का स्मरण है । ये शत प्रतिशत सत्य है, कि भाग्वादाश्रय और भगवान् के नाम जप से हमारे पापों का समूल नाश हो जाता है । यह निश्चित है, कि समस्त संसार का एक ही ग्रास बनाकर यदि किसी बालक को खिला दिया जाये तो भी वह भूखा ही रहेगा ।।

जिसका मन खान पान और गहने कपड़ों में बसा है, उसकी स्थिति नरपशु अर्थात नर के रूप में भी पशु के समान है । पहने ओढने में सादगी रखना चाहिये शौकीनी और आडम्बर आदि से परे ही रहना चाहिये । लोग जब आपको “उन्मत’ और मस्त” पाखण्डी अथवा कुछ भी कहें अथवा निन्दा करें तब भी आपके आन्तरिक वृत्तियों में ईश्वर का गूढ़ तत्वज्ञान खिलखिलाता रहे ।।

मनुष्य का सच्चा कर्तव्य है ईश्वर से प्रीती जोड़ना । जब आपके मन में किसी से कोई लालच अथवा कुछ लेने की इच्छा नहीं रहेगी तब जैसा अमीर वैसा ही एक गरीब भी आपके लिये हो जायेगा । ये लोभ और लालच ही तो सभी पापों के मूल कारण हैं । गोस्वामी जी तो कहते हैं – मोह सकल व्याधिन्ह कर मूला । तिन्ह ते पुनि उपजहिं सब सूला ।।

मित्रों, आइये गुरुपूर्णिमा कि गुरुदक्षिणा में मुझे अपने जीवन के इन बुराइयों को दे दिजिये । ऐसी जितनी भी बुरी आदतें आपकी हैं सब मुझे दे दीजिए । आपके जिस बुराई के वजह से आपकी पत्नी को शर्मिंदगी उठानी पड़ती है । बच्चों को स्कूल में दूसरों के सामने नीचे देखना पड़ता है । तथा जिसके वजह से आप स्वयं भी इस समाज में शर्म महशुश करते हैं, दे दिजिये मुझे ।।

मेरे प्यारे दोस्तों मुझे आपके इन बुराइयों कि आवश्यकता है । क्योंकि मैं एक स्वच्छ एवं प्रेम से परिपूर्ण समाज का निर्माण चाहता हूँ । इसलिये मैं आपकी इन गलत धारणाओं को लेकर उसपर बुलडोजर चलाऊंगा । और उससे एक ऐसे पथ का निर्माण करूँगा जिससे एक निर्मल प्रेम से परिपूर्ण समाज का निर्माण हो सके । तो आज संकल्प लीजिये कि आज आप गुरुदक्षिणा में मुझे अपनी बुराइयों को देकर जायेंगे ।।

(गुरुपूर्णिमा पर स्वामी श्री धनञ्जय जी महाराज के प्रवचन के अंश)

।। सदा सत्संग करें । सदाचारी और शाकाहारी बनें । सभी जीवों की रक्षा करें ।।

नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्।।

।। नमों नारायण ।।

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