ज्ञान और मुक्ति के बीच का मार्ग कर्म ही है।।

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Gyan Mukti Aur Karma
Gyan Mukti Aur Karma

ज्ञान और मुक्ति के बीच का मार्ग कर्म ही है।। Gyan Mukti Aur Karma.

जय श्रीमन्नारायण,

यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम्।।
लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति।।

अर्थात् जिसके पास प्रज्ञा (विवेक, विचार) नहीं है। शास्त्र उसका क्या उपकार कर सकता है? जैसे नेत्रों से विहीन व्यक्ति का दर्पण भी क्या उपकार करेगा? नेत्रों को बंद करके मनुष्य प्रकाशित लैम्प से भी टकरा जाता है। दिन में भी भटक जाता है ! सच्चा बुद्धिजीवी कभी प्रज्ञा-नेत्र को मूँदकर नहीं बैठता है।।

मित्रों, किसी भी विषय पर विचार करने की क्षमता अथवा गहराई से चिंतन करने की क्षमता को ही विवेक कहते हैं। इसी को विचार मंथन भी कहते हैं। अगर आप किसी भी विषय को कहीं से अथवा किसी के मुख से सुन लेते हैं। किसी शास्त्र में पढ़ लेते हैं। लेकिन उस पर अगर आप स्वयं विचार नहीं करते। उसको समझने का प्रयत्न नहीं करते। उस पर मंथन नहीं करते तो वह शास्त्र का सर्वोच्च ज्ञान भी आपका कुछ भी भला नहीं कर सकता है।।

इसलिए हर एक इंसान को चाहिए, कि वह अपने जीवन में कहीं भी किसी के द्वारा भी सुनी हुई किसी भी बात के ऊपर स्वयं विचार करें। स्वयं चिंतन करें। किसी भी शास्त्र का पठन-पाठन करें तो वहां से मिले हुए ज्ञान के ऊपर स्वयं चिंतन करें। उसके पश्चात वह ज्ञानी कहा जाएगा। ज्ञानी का मतलब विद्याध्ययन से नहीं होता है। ज्ञानी का मतलब विचारशील होना चिंतनशील होना होता है।।

किसी भी विषय की गहराई को समझने का प्रयत्न करना। यही विचार है तथा यही मंथन है और यही सच्चा ज्ञान है। इसलिए हर एक इंसान को चिंतन करने की आदत डालनी चाहिए। जैसे वेदों का ज्ञान हमारे ऋषियों ने हमें सरलता से दे दिया। अब हम उसे मात्र कर्मकांड का विषय समझ कर और मंत्र बोलकर चंदन अक्षत पुष्प आदि चढ़ाते रहें जीवन पर्यंत। तो इसमें ऋषियों का क्या दोष?।।

हमने उन मंत्रों के अंदर के विज्ञान को समझना पड़ेगा। उसके ऊपर चिंतन करना पड़ेगा तदनुसार आचरण करना पड़ेगा। तभी हम सच्चे अर्थों में अपने वेदों को समझ पाएंगे। भगवान ने गीता में बहुत सी ऐसी बातें समझाई है। बताने का प्रयत्न किया है, कि मनुष्य जीवन में आचरण ही सर्वोच्च होता है। आचरण से बड़ा कुछ नहीं होता। अर्जुन ने इसी दुविधा को लेकर भगवान कृष्ण से प्रश्न भी किया है।।

ज्यायसी चेत् कर्मणस्ते मतां बुद्धिर्जनार्दन।।
तत् किं कर्मणी घोरे माम् नियोजयसि केशव।।(गी.अ.3.श्लो.1)

अर्थ:- जब आप स्वयं ही कह रहे हो कि ज्ञान कर्म से अधिक श्रेष्ठ है, तो फिर मूझे क्यों ऐसे भयंकर कर्म में धकेल रहे हो? यह सर्वाधिक सुयोग्य गुरु द्वारा प्रदत्त सर्वोच्च ज्ञान पर की गई शंका है। अगले श्लोक में तो अर्जुन स्पष्टता से अपने सम्भ्रम को मानता है और कृष्ण पर आरोप लगाता है, कि आपकी मिश्रित बातों के वजह से ही ये हो रहा है।।

अब आप सोंचिये, की अर्जुन के इस प्रश्न का उत्तर क्या दिया कृष्ण ने? अथवा ये सोंचिये उस उत्तर का परिणाम क्या हुआ? और जो हुआ, क्या वही सत्य है? और अगर सत्य नहीं है, तो भगवान का उपदेश अथवा भगवान का कथन क्या गलत है? और अगर भगवान का कथन गलत नहीं है, तो फिर हम आध्यात्मिक बातों से लोगों को क्यों भ्रमित कर रहे हैं?।।

मित्रों, भगवान ने जो उपदेश किया है वह कतई गलत नहीं है। ना ही उन उपदेशों को समझने वाला अर्जुन गलत है। मेरा अभिप्राय यह है, कि भगवान ने जो उपदेश दिया उसका परिणाम यह हुआ, कि अर्जुन उठ खड़ा हुआ और युद्ध किया। अपनों को मारने में भी संकोच नहीं किया। और विजयी भी हुआ। हम आज जो कुछ भी उपदेश करते हैं या अपने शास्त्रों के उपदेश को स्वयं समझते हैं अथवा लोगों को समझाते हैं।।

हमें यह देखना पड़ेगा कि कहीं हमारे उपदेशों का असर समाज पर गलत तो नहीं हो रहा है। क्योंकि इस देश में वर्षों पहले लुटेरे आए और उन्होंने हमारे भोले भाले हिंदुओं को सामने से तलवार से मार डाला। और एक सीधा-साधा हिंदू हाथ जोड़कर भगवान की प्रार्थना करता रहा। अगर यही सच है तो फिर अर्जुन को शस्त्र उठाने की आवश्यकता ही नहीं थी। क्योंकि उसके साथ तो स्वयं भगवान ही थे।।

परन्तु भगवान साथ में रहते हुए भी स्वयं उसे उपदेश किया और जगाया। उससे युद्ध करवाया। इसका उद्देश्य यही है, कि अगर हमारे पास स्वयं की प्रज्ञा नहीं है तो हम शास्त्रों के ज्ञान का भी अनर्थ कर लेते हैं। और स्वयं अपना नाश कर लेते हैं। इसलिए हमें समझना होगा, कि भगवान ने हमें हाथ और पैर दिए हैं। कर्म करने के लिए अपनी सुरक्षा करने के लिए।।

भगवान ने बुद्धि दी है, स्वयं की प्रज्ञा से विचार करके अपने लिए सुख-सुविधाएं जुटाने के लिए एवं स्वयं की रक्षा करने के लिए। इसलिए हमें शास्त्रों के ज्ञान को अपनी प्रज्ञा चक्षु से समझकर और तदनुसार आचरण करना पड़ेगा। तब जाकर हम कुशल ज्ञानी कहलाएंगे। साथ ही विश्व गुरु बनने के लायक होंगे अथवा बन पाएंगे।।

हाँ अगर आपको आध्यात्म की साधना करनी है, तो किसी सच्चे गुरु की देखरेख में जिज्ञासु शिष्य बनकर करें। क्योंकि जहाँ जिज्ञासु शिष्य और सच्चे गुरु का मिलन होगा तभी ज्ञान संभव है। ये गुरु एवं शिष्य के बिच का विषय है। अत: सर्वप्रथम कर्म प्रधान है, और कर्म से ही मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। इसलिए तन-मन-धन से हमें सत्कर्म करना चाहिए।।

जैसे मंदिर जाना, देवपूजन करना, ब्राह्मण एवं संतों की सेवा करना। मनोकामना पूर्ति हेतु यज्ञ-यागादी करना यही सर्वोत्तम कर्म है। इसे भूलकर हम कदापि सुखी नहीं रह सकते। और जब इस शरीर से हम सुखी नहीं रहेंगें तो मोक्ष की साधना क्या खाक करेंगें।।

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नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्।।

।। नमों नारायण ।।

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