मानव जीवन और उनकी संस्कृति।।

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human Life and culture
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मानव जीवन और उनकी संस्कृति।। human Life and culture.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, हमारे वैदिक सनातन शास्त्रों में एक शब्द है “धैर्य” जिसे संयम भी कहते हैं। इसके बिना सत्ताधारी एवं सर्वोच्च पदस्थ व्यक्ति के जीवन का भी विकास सम्भव नहीं होता। परन्तु मित्रों, संयम एक ऐसा शब्द है, जिससे साधारण से साधारण जीवन का भी सर्वोच्च विकास सहजता से सम्भव हो जाता है। और होता ही है इसमें कोई संसय नहीं है। जीवन के सितार पर हृदय लोक में मधुर संगीत उसी समय गूँजता है। जब उसके तार नियम तथा संयम में बँधे होते हैं।।

जिस घोड़े की लगाम सवार के हाथ में नहीं होती। उसपर सवारी करना खतरे से खाली नहीं होता है। संयम की बागडोर लगाकर ही घोड़ा निश्चित मार्ग पर चलाया जा सकता है। ठीक यही दशा मानव के मन रूपी अश्व की भी होती है। विवेक तथा संयम द्वारा इंद्रियों को अधीन करने से ही जीवन-यात्रा आनंद पूर्वक चलती है। आजकल मैं देखता हूँ, हमारे कुछ उच्छृंखल युवक जो पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में आकर कभी-कभी मानसिक, सामाजिक और राष्ट्रीय बंधनों को तोड़ देना चाहते हैं।।

इन्हें पता नहीं होता है, कि ये उनकी कितनी बड़ी भूल है। जीवन में जोश के साथ होश की उसी प्रकार आवश्यकता है जैसे अर्जुन के साथ श्रीकृष्ण की। यही बुद्धि स्थिर करने का एकमात्र उपाय है। अपनी संस्कृति का परित्याग करके कोई भी जब भटक जाता है तो उसकी ठीक वही दशा होती है जो जंगल में अपने समूह से बिछड़ी हुई हिरणी का होता है। फिर न तो वो इधर का होता है न उधर का।।

मित्रों, हमारा वैदिक सनातन धर्म संस्कारों पर ही आधारित है। जैसे घर में कैसे रहना है? माता-पिता से कैसा व्यवहार करना है? भाई के साथ किस तरह का व्यवहार करना है? पड़ोसियों के साथ किस तरह का व्यवहार करना है? समाज में अपनी उन्नति कैसे करनी है? तथा संसार के सभी प्राणियों के साथ किस प्रकार का व्यवहार करना है? क्योंकि हमारे यहां संपूर्ण चराचर जीव परमात्मा का ही अंश माना जाता है।।

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उस परमात्मा से प्रेम अर्थात सभी जीवो से प्रेम करना होता है। अगर आप किसी भी ईश्वर में मानते हैं। तो आप को संपूर्ण चराचर जीवो से प्रेम करना ही पड़ेगा। चाहे आपका धर्म कोई भी हो। अगर आप किसी भी तरह के ईश्वर में विश्वास रखते हैं तो आपको संसार के संपूर्ण प्राणियों से प्रेम करना पड़ेगा। अपने निजी स्वार्थ का परित्याग करके, दूसरों के कल्याण के विषय में सोचना पड़ेगा। तभी आप परमात्मा के सच्चे भक्त बन पाएंगे।।

यह हमारे वैदिक सनातन धर्म का स्पष्ट संदेश है। जो भी इसे नहीं मानता वह किसी भी प्रकार के धर्म को मानने वाला नहीं हो सकता। क्योंकि संसार में धर्म शब्द जहां भी आ जाता है वहां इसकी उतनी ही आवश्यकता हो जाती है। क्योंकि अगर आप संसार के संपूर्ण चराचर जीवों से प्रेम नहीं करते हैं तो आप किसी भी तरह के परमात्मा के की कृपा के पात्र नहीं बन सकते हैं। बल्कि भगवान के कोप भाजन होने के ही अधिकारी हैं।।

इसलिए ईश्वर से प्रेम का अर्थ है ईश्वर की बनाई हुई इस प्रकृति से प्रेम करना। संपूर्ण चराचर जगत से प्रेम करना। सभी जीवो से प्रेम करना यही संस्कार है। यही संस्कृति है और यही धर्म है। इसके अलावा न कोई संस्कार है न कोई संस्कृति है और ना ही कोई धर्म है।।

।। सदा सत्संग करें । सदाचारी और शाकाहारी बनें । सभी जीवों की रक्षा करें ।।

नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्।।

।। नमों नारायण ।।

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भागवत प्रवक्ता- स्वामी धनञ्जय जी महाराज "श्रीवैष्णव" परम्परा को परम्परागत और निःस्वार्थ भाव से निरन्तर विस्तारित करने में लगे हैं। श्रीवेंकटेश स्वामी मन्दिर, दादरा एवं नगर हवेली (यूनियन टेरेटरी) सिलवासा में स्थायी रूप से रहते हैं। वैष्णव धर्म के विस्तारार्थ "स्वामी धनञ्जय प्रपन्न रामानुज वैष्णव दास" के श्रीमुख से श्रीमद्भागवत जी की कथा का श्रवण करने हेतु संपर्क कर सकते हैं।।

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