कामना पूर्ति का एक अकाट्य साधन यज्ञ।।

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Ichchapurti Ka Sadhan Yagya
Ichchapurti Ka Sadhan Yagya

कामना पूर्ति का एक अकाट्य साधन यज्ञ।। Ichchapurti Ka Sadhan Yagya.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, मन्त्रों में अनेक शक्ति के स्रोत छुपे हुये हैं। जिस प्रकार अमुक स्वर-विन्यास से युक्त शब्दों की रचना करने से अनेक राग-रागनियाँ बजती हैं। साथ ही उनका प्रभाव सुनने वालों पर विभिन्न प्रकार का होता है। ठीक उसी प्रकार मंत्रोच्चारण से भी एक विशिष्ट प्रकार की ध्वनि तरंगें निकलती हैं। और उनका प्रभाव विश्वव्यापी प्रकृति पर, सूक्ष्म जगत् पर तथा प्राणियों के स्थूल एवं सूक्ष्म शरीरों पर भी पड़ता है।।

यज्ञों के द्वारा जो शक्तिशाली तत्त्व वायुमण्डल में फैलते हैं। उनसे हवा में घूमते असंख्यों रोगों के कीटाणु सहज ही नष्ट हो जाते हैं। डी.डी.टी. फिनायल आदि छिड़कने, बीमारियों से बचाव करने वाली दवाएँ या इंजेक्शन आदि लेने से भी कहीं अधिक कारगर उपाय यज्ञ करना है। साधारण रोगों एवं महामारियों से बचने का हमारे पूर्वज ऋषियों द्वारा संशोधित यज्ञ एक सामूहिक उपाय है।।

मित्रों, दवाओं में सीमित स्थान एवं सीमित व्यक्तियों को ही बीमारियों से बचाने की शक्ति है। परन्तु यज्ञ की वायु तो सर्वत्र ही पहुँचती है। यहाँ तक की यज्ञ न करने वाले प्राणियों की भी सुरक्षा करती है। मनुष्य की ही नहीं अपितु पशु-पक्षियों, कीटाणुओं एवं वृक्ष-वनस्पतियों के आरोग्य की भी साधना यज्ञ से हो जाती है। यज्ञ की ऊष्मा मनुष्य के अंतःकरण में देवत्व जागृत करती है। जहाँ यज्ञ होते हैं, वह भूमि एवं प्रदेश सुसंस्कारों को अपने अन्दर धारण कर लेता है।।

यहाँ तक की वहाँ आने-जाने वालों पर भी दीर्घकाल तक यह ऊष्मा प्रभाव डालता रहता है। आज के सभी तीर्थ लगभग वहीं बने हैं जहाँ प्राचीनकाल में बड़े-बड़े यज्ञ हुए थे। आज भी जिन घरों अथवा स्थानों में यज्ञ होते हैं, वह भी एक प्रकार का तीर्थ बन जाता है। ऐसे स्थानों में जिनका रहना होता है, उनकी मन:स्थिति उच्च, सुविकसित एवं सुसंस्कृत होती ही हैं। महिलाएँ, छोटे बालक एवं गर्भस्थ बालक विशेष रूप से यज्ञ शक्ति से अनुप्राणित होते हैं।।

बच्चों को सुसंस्कारी बनाने के लिए यज्ञीय वातावरण की समीपता बड़ी उपयोगी सिद्ध होती है। साथ ही समाजिक कुबुद्धि, कुविचार, दुर्गुण एवं दुष्कर्मों से विकृत मनोदशा में भी यज्ञ के माध्यम से भारी मात्रा में सुधार होता है। इसलिए यज्ञ को पापनाशक कहा गया है। यज्ञीय प्रभाव से सुसंस्कृत हुई विवेकपूर्ण मन:स्थिति का प्रतिफल जीवन के प्रत्येक क्षण को स्वर्ग जैसे आनन्द से भर देता है। यही कारण है, कि यज्ञ को स्वर्ग देने वाला कहा गया है।।

मित्रों, यज्ञीय कार्यों या प्रक्रियाओं में भाग लेने से भी आत्मा पर चढ़े हुए मल-विक्षेप दूर हो जाते हैं। जिसके फलस्वरूप तेजी से उसमें ईश्वरीय प्रकाश जगता है। यज्ञ से आत्मा में ब्राह्मणत्त्व, ऋषि तत्त्व की वृद्धि दिनानु-दिन होती है। यही नहीं आत्मा को परमात्मा से मिलाने का परम लक्ष्य भी बहुत सरल हो जाता है। आत्मा और परमात्मा को जोड़ देने का, बाँध देने का कार्य यज्ञाग्नि द्वारा ऐसे ही होता है, जैसे लोहे के टूटे हुए टुकड़ों को वेल्डिंग की अग्नि जोड़ देती है।।

ब्राह्मणत्व यज्ञ के द्वारा प्राप्त होता है। इसलिए ब्राह्मणत्व प्राप्त करने के लिए एक तिहाई जीवन यज्ञ कर्म के लिए अर्पित करना चाहिये। लोगों के अंतःकरण में अन्त्यज वृत्ति घटे और ब्राह्मण वृत्ति बढ़े, इसके लिए वातावरण में यज्ञीय प्रभाव की शक्ति का पूर्ण रहना आवश्यक है। विधि-विधान से किये गये यज्ञ इतने प्रभावशाली होते हैं, कि इसके द्वारा मानसिक दोष एवं समस्त दुर्गुणों का निष्कासन तथा सद्भावों का अभिवर्धन नितान्त संभव है।।

काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, ईर्ष्या, द्वेष, कायरता, कामुकता, आलस्य, आवेश, संशय आदि मानसिक उद्वेगों की चिकित्सा के लिए भी यज्ञ एक विश्वस्त पद्धति है। शरीर के असाध्य रोगों तक का निवारण यज्ञ से हो सकता है। इतना ही नहीं, अग्निहोत्र के भौतिक लाभ भी हैं। वायु को हम मल, मूत्र, श्वास तथा कल-कारखानों के धुआँ आदि से गन्दा करते हैं। इस प्रकार की गन्दी वायु रोगों का कारण बनती है।।

वायु को जितना गन्दा करें, उतना ही उसे शुद्ध भी करना आवश्यक होता है। यह स्वयं सिद्ध एवं अकाट्य तथ्य है, कि यज्ञों से वायुमण्डल शुद्ध होती है। इस प्रकार यज्ञों के माध्यम से सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुरक्षा का भी एक बड़ा प्रयोजन सिद्ध हो जाता है। यज्ञकुण्ड से निकलने वाला धुँआ आकाश में बादलों में जाकर खाद बनकर मिल जाता है। फिर वर्षा के जल के साथ जब वह पृथ्वी पर आता है। जिससे परिपुष्ट अन्न, घास तथा वनस्पतियाँ उत्पन्न होती हैं।।

मित्रों, उन वनस्पतियों आदि के सेवन से मनुष्य तथा पशु-पक्षी सभी परिपुष्ट होते हैं। यज्ञाग्नि के माध्यम से वहाँ उपस्थित जीव शक्तिशाली बनता है। साथ ही मन्त्रोच्चार के ध्वनि कम्पन, सुदूर क्षेत्रों में बिखरकर लोगों का मानसिक परिष्कार करते हैं। यज्ञों के फलस्वरूप स्थूल शरीरों की तरह ही मानसिक स्वास्थ्य भी बढ़ता है। अनेक प्रयोजनों के लिए तथा अनेक कामनाओं की पूर्ति के लिए, अनेक विधानों के साथ, अनेक विशिष्ट यज्ञ भी किये जाते रहे हैं।।

जैसे राजा दशरथ ने पुत्रेष्टि यज्ञ करके चार उत्कृष्ट सन्तानें प्राप्त की थीं। अग्निपुराण में तथा उपनिषदों में वर्णित पंचाग्नि विद्या में ये रहस्य बहुत ही विस्तारपूर्वक बताये गये हैं। महर्षि विश्वामित्र आदि ऋषि प्राचीनकाल में असुरता निवारण के लिए बड़े-बड़े यज्ञों का आश्रय लिया करते थे। राम-लक्ष्मण को ऐसे ही एक यज्ञ की रक्षा के लिए स्वयं जाना पड़ा था। लंका युद्ध के बाद राम ने दस अश्वमेध यज्ञ किये थे।।

महाभारत काल में भी भगवान श्रीकृष्ण ने पाण्डवों से एक राजसूय महायज्ञ करवाया था। उनका उद्देश्य युद्धजन्य विक्षोभ से क्षुब्ध वातावरण की अशुद्धि का समाधान करना ही था। जब कभी आकाश के वातावरण में असुरता की मात्रा बढ़ जाए, तो उसका उपचार यज्ञ प्रयोजनों से बढ़कर और कुछ हो ही नहीं सकता। आज हर जगह खून-खराबे बढ़ जाने के कारण जनसाधारण में स्वार्थपरता की मात्रा अधिक बढ़ गयी है। जिससे वातावरण में वैसा ही विक्षोभ फिर उत्पन्न हो गया है। उसके समाधान के लिए यज्ञीय प्रक्रिया को पुनर्जीवित करना आज की स्थिति में और भी अधिक आवश्यक हो गया है।।

नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

।। सदा सत्संग करें । सदाचारी और शाकाहारी बनें । सभी जीवों की रक्षा करें ।।

नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्।।

।। नमों नारायण ।।

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भागवत प्रवक्ता- स्वामी धनञ्जय जी महाराज "श्रीवैष्णव" परम्परा को परम्परागत और निःस्वार्थ भाव से निरन्तर विस्तारित करने में लगे हैं। श्रीवेंकटेश स्वामी मन्दिर, दादरा एवं नगर हवेली (यूनियन टेरेटरी) सिलवासा में स्थायी रूप से रहते हैं। वैष्णव धर्म के विस्तारार्थ "स्वामी धनञ्जय प्रपन्न रामानुज वैष्णव दास" के श्रीमुख से श्रीमद्भागवत जी की कथा का श्रवण करने हेतु संपर्क कर सकते हैं।।

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