इन्सान की अन्तिम इच्छा।। Insan Ki Antim Ichchha.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, दक्षिण में विजयनगर राज्य के बड़े ही प्रतापी राजा श्रीकृष्णदेवराय राज करते थे। उनका भरा-पूरा परिवार था। उनकी माताजी बड़ी ही धार्मिक एवं श्रद्धालु थी। समय के साथ-साथ राजा कॄष्णदेव राय की माता बहुत वॄद्ध हो गई। एक बार वह बहुत बीमार पड गई। उन्हें लगा कि अब वे शीघ्र ही मर जाएँगी। उन्हें आम से बहुत ही लगाव था, इसलिए जीवन के अन्तिम दिनों में वे आम दान करना चाहती थीं।।

सो उन्होंने राजा से ब्राह्म्णों को आमों को दान करने की इच्छा प्रकट की। उनकी भावना थी कि अपनी कोई अत्यंत प्रिय वस्तु का दान करने से उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति होगी। सो कुछ दिनों बाद राजा की माता अपनी अन्तिम इच्छा की पूर्ति किए बिना ही मॄत्यु को प्राप्त हो गईं। उनकी मॄत्यु के बाद राजा ने सभी विद्वान ब्राह्म्णों को बुलाया और अपनी माँ की अन्तिम अपूर्ण इच्छा के बारे में बताया।।

कुछ देर तक चुप रहने के पश्चात ब्राह्म्ण बोले, यह तो बहुत ही बुरा हुआ महाराज, अन्तिम इच्छा के पूरा न होने की दशा में तो उन्हें मुक्ति ही नहीं मिल सकती। वे प्रेत योनि में भटकती रहेंगी। महाराज आपको उनकी आत्मा की शान्ति का उपाय करना चाहिये। तब महाराज ने उनसे अपनी माता की अन्तिम इच्छा की पुर्ति का उपाय पूछा। ब्राह्म्ण बोले, उनकी आत्मा की शांति के लिये आपको उनकी पुण्यतिथि पर सोने के आमों का दान करना चाहिये।।

राजा श्रीकृष्णदेवराय भी बड़े श्रद्धालु थे। अतः राजा ने मॉ की पुण्यतिथि पर कुछ ब्राह्म्णों को भोजन के लिय बुलाया और प्रत्येक को सोने से बने आम दान में दिए। परन्तु जब तेनाली राम को यह पता चला, तो वह तुरन्त समझ गया कि ब्राह्मण लोग राजा की सरलता तथा भोलेपन का फायदा उठा रहे हैं। सो उसने उन ब्राह्म्णों को पाठ पढाने की एक योजना बनाई। अगले दिन तेनाली राम ने ब्राह्म्णों को निमंत्रण-पत्र भेजा।।

उसमें लिखा था कि तेनाली राम भी अपनी माता की पुण्यतिथि पर दान करना चाहते हैं। क्योंकि वह भी अपनी एक अधूरी इच्छा लेकर मरी थीं। जब से उसे पता चला है कि उसकी माँ की अन्तिम इच्छा पूरी न होने के कारण प्रेत-योनी में भटक रही होंगी, वह बहुत ही दुःखी हैं और चाहते हैं, कि जल्दी ही उसकी भी मॉ की आत्मा को शान्ति मिले। ब्राह्म्णों ने सोचा कि तेनाली राम के घर से भी बहुत अधिक दान मिलेगा, क्योंकि वह भी शाही सलाहकार है।।

सभी ब्राह्म्ण निश्चित दिन तेनाली राम के घर पहुँच गए। ब्राह्म्णों को स्वादिष्ट भोजन परोसा गया। भोजन करने के पश्चात् सभी दान मिलने की प्रतीक्षा करने लगे। तभी उन्होने देखा कि तेनाली राम लोहे के सलाखों को आग में गर्म कर रहा है। पूछने पर तेनाली राम बोला, मेरी माँ फोडों के दर्द् से परेशान थीं। मॄत्यु के समय उन्हें बहुत तेज दर्द हो रहा था। इससे पहले कि मैं गर्म सलाखों से उनकी सिकाई करता, वह मर चुकी थी।।

अब उनकी आत्मा की शान्ति के लिए मुझे आपके साथ वैसा ही करना पडेगा। जैसी कि उनकी अन्तिम इच्छा थी। यह सुनकर ब्राह्म्ण बौखला गए। वे वहॉ से तुरन्त चले जाना चाहते थे। वे गुस्से में तेनाली राम से बोले कि हमें गर्म सलाखों से दागने पर तुम्हारी मॉ की आत्मा को शान्ति मिलेगी? नहीं महाशय्, मैं झूठ नहीं बोल रहा। यदि सोने के आम दान में देने से महाराज की मॉ की आत्मा को स्वर्ग में शान्ति मिल सकती है तो मैं अपनी मॉ की अन्तिम इच्छा क्यों नहीं पूरी कर सकता?।।

यह सुनते ही सभी ब्राह्म्ण समझ गए की तेनाली राम क्या कहना चाहते हैं। ब्राह्मण बोले, तेनाली राम, हमें क्षमा करो। हम वे सोने के आम तुम्हें दे देते हैं। बस तुम हमें जाने दो। तेनाली राम ने सोने के आम लेकर ब्राह्म्णों को जाने दिया। परन्तु एक लालची ब्राह्म्ण ने सारी बात राजा को जाकर बता दी। यह सुनकर राजा क्रोधित हो गए और उन्होनें तेनाली राम को बुलाया। राज बोले! तेनाली राम यदि तुम्हे सोने के आम चाहिए थे, तो मुझसे मॉग लेते।।

तुम इतने लालची कैसे हो गए कि तुमने ब्राह्म्णों से सोने के आम ले लिए? रामा बोले, महाराज, मैं लालची नहीं हूँ। अपितु मैं तो उनकी लालच की प्रवॄत्ति को रोक रहा था। यदि वे आपकी मॉ की पुण्यतिथि पर सोने के आम ग्रहण कर सकते हैं, तो मेरी मॉ की पुण्यतिथि पर लोहे की गर्म सलाखें क्यों नहीं झेल सकते? राजा तेनाली राम की बातों का अर्थ समझ गए। उन्होंने ब्राह्म्णों को बुलाया और उन्हें भविष्य में लालच त्यागने को कहा।।

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नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्।।

।। नमों नारायण ।।

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