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क्या सिर्फ भारत में ही जाति व्यवस्था थी?।। Jati Vyavastha Ka Jahar.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, यह लेख बहुत ही बड़ा है। आप धैर्य के साथ एक बार अवश्य पढ़ें। साथ ही इसे अपनों के साथ शेयर भी करें। हमारे यहाँ एक शब्द अक्सर बोला जाता है “कास्ट” क्या आप जानते हैं, कास्ट और जाती में क्या अंतर है तथा यह शब्द कहाँ से और क्यों लाया गया है? मैं बताता हूँ। कुछ समय पहले की बात है, रोम साम्राज्य में एक नियम था की छोटी कास्ट वाले लोगों को कोई भी कंकड़ फेंक कर मार सकता था।।

ऐसे लोग वहाँ पर सार्वजनिक रूप से स्नान नहीं कर सकते थे। मतलब कि जिन नदियों और कुओं से आम जनता जल का उपयोग करती थी, वहां पर यह लोग नहीं जा सकते थे। हम भारतीयों के साथ एक समस्या रही है अंग्रेजों के आने के बाद से। हम लोग स्वभाव से खोजी नहीं रह गए हैं। हम चाहते हैं, कि हमें कोई बैठे-बैठे तथ्य बताएं और उन तथ्यों को हम घोट कर पी जायें।।

लगभग विगत 100 वर्षों से भारतवर्ष के साथ एक बड़ा ही अमानवीय व्यवहार किया गया है। भारत के अंदर जाति व्यवस्था को कलंक बताकर भारत को पिछड़ा हुआ साबित करने की कोशिश की जाती रही है। आज भी विदेशी मीडिया में हर हफ्ते कोई ना कोई ऐसा समाचार छपता रहता है, जिसमें किसी भारतीय दलित के साथ अमानवीय व्यवहार का वर्णन होता है। साथ ही हमारे भारतीय जाति व्यवस्था को दोष दिया जाता है।।

लेकिन क्या 7000 वर्ष पुराना हमारा भारतीय समाज इतना भी सक्षम नहीं था, कि वह जाति व्यवस्था जैसी कुरीति को अपने भीतर से निकाल कर सके? इस विषय पर हमने अलग से विस्तृत लेख लिख रखा है। आप हमारे वेबसाईट पर पढ़ सकते हैं। खैर आज के इस लेख का यह विषय नहीं है इस कारण आज के मुख्य विषय पर ही हम इस लेख में बात करेंगे।।

हमारे भारतीय समाज में अंग्रेजों के साथ ही इस कुकृत्य का आरम्भ हुआ था, जो कि निंदनीय है। परन्तु भारतवर्ष के साथ-साथ यह कुरीति जिसे जाति व्यवस्था कहते हैं, पूरे विश्व में फैली हुई थी। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हमारे पास उपलब्ध है। किंतु केवल भारतीय समाज को ही ही जाति व्यवस्था के कलंक से दूषित किया जाता रहा है। आपने सुना होगा, कि जब भी आप किसी सरकारी नौकरी के लिए आवेदन करते हैं, तब अक्सर आपको आरक्षण देने के लिए पूछा जाता है, कि आप की कास्ट क्या है?

हम भारतीय कास्ट का अर्थ जाति से लेते हैं। और अब यह दोनों एक दूसरे के पर्यायवाची बन चुके हैं। लेकिन जाति और कास्ट दोनों शब्दों के अभिप्राय में जमीन और आसमान जितना अंतर है। सबसे पहले यह देखते हैं, कि इन दोनों शब्दों में अंतर क्यों है? अंग्रेजी वर्णमाला का अक्षर “कास्ट” पुर्तगाली शब्द “कस्टा” से लिया गया है। इस शब्द का इस्तेमाल स्पेनिश लोग उन लोगों के लिए करते थे जिनको वह जीत लेते थे। और उन्हें अपने दास अथवा गुलामों की तरह उपयोग करते थे।।

17वीं और 18वीं शताब्दी में अमेरिका और फिलीपींस के जिन इलाकों पर स्पेन का नियंत्रण था, उन सभी इलाकों के लोगों को “सोसाइडा डी कास्टों” कहा जाता था। अगर हिंदी में कहें तो इन शब्दों का अर्थ “नीच” होता है। भारतवर्ष में जो जाति शब्द था उसका अर्थ उनके कामों अर्थात उसके कार्यक्षेत्र से लिया जाता था। आज भी जब आपसे कोई पूछता है, कि आपकी जाति क्या है? तो आप कहते हैं कुम्हार (उदहारण के लिये)।।

इसका मतलबहै, कि आपके पूर्वजों का जो कार्य था उसने आपकी जाति निर्धारित की। लेकिन कास्ट शब्द की उत्पत्ति ही दूसरों को नीचा देखने के उद्देश्य से किया गया था। यह एक बहुत ही बड़ा अंतर है और स्पष्ट है। लेकिन आश्चर्य है, कि हम भारतीय यह स्पष्ट अंतर भी समझ नहीं पाते। अब दूसरे विषय पर चर्चा करते हैं। भारत में क्या सच में जाति व्यवस्था दुनिया की सबसे खराब व्यवस्था थी? यह प्रश्न है।।

मित्रों, कम से कम अमेरिकन लोग तो यही मानते हैं। आपको हैरानी होगी इस बात का प्रमाण अमेरिका के हाई स्कूल के एक पाठ्यपुस्तक है, जिसका नाम “वर्ल्ड सिविलाइजेशन: ग्लोबल एक्सपीरियंस” उसमें भारतीय जाति व्यवस्था का इस प्रकार वर्णन किया गया है। उसके पाठ्यक्रम इस प्रकार हैं। “भारतीय जाति व्यवस्था एक प्रकार का ऐसा सामाजिक संगठन है, जो आधुनिक पश्चिमी समाज के सर्वाधिक महत्वपूर्ण सिद्धांतों का उल्लंघन करता है” ।।

स्पष्ट है, यह लोग भारत को पश्चिमी सिद्धांतों के आधार पर ढालना चाहते हैं। जिन तथ्यों पर भारत उन्हें अलग दिखता है, उसको वह या तो असामाजिक घोषित कर देते हैं या फिर अमानवीय। हम भारतीय लोग उनके पालतू जानवर बनकर हर एक बात को स्वीकार कर लेते हैं। गोरी चमड़ी वालों का भारतीयों पर ऐसा असर हुआ है, कि हम भारतीयों ने जाति व्यवस्था की यूरोप में बनाई हुई अवधारणा को स्वीकार कर लिया है।।

लेकिन क्या कभी आपने स्वयं से यह प्रश्न किया है? यूरोप के उच्च नागरिकों के शौचालय से जो लोग मानव मल को खाली करते थे उनके साथ कैसा व्यवहार किया जाता था? जो लोग मानव के शवों और और पशुओं के शवों को ठिकाने लगाते थे उनके साथ कैसा व्यवहार किया जाता था? क्या यूरोप के समृद्ध लोग इन लोगों को अपने साथ बैठाते थे? या फिर इन लोगों के साथ वैवाहिक संबंध बनाए जाते थे? उत्तर है, नहीं। कदापि नहीं।।

स्पष्ट रूप से किसी भी समाज में ऐसे लोग जरूर होते हैं जो मृत देह उठाने का कार्य करते हों। सातवीं शताब्दी में कैथी स्टीवर्ट ने अपनी पुस्तक में यूरोप में रह रहे इस तरह के समूह का वर्णन कर चुके हैं। लेकिन यह तो 300 साल पहले की बात है। आप कह सकते हैं, कि भारत में तो जाती व्यवस्था बहुत साल पुरानी हैं। अगर आप ऐसा सोच रहे हैं तो निम्नांकित पंक्तियाँ आप के लिए हैं।।

मित्रों, अधिकतर यूरोप वासी अपने आप को रोमन साम्राज्य का वंशज बताते हैं। रोमन साम्राज्य में एक प्रथा थी जिसका नाम “उनएयरलिक्काइट था। इसमें उन लोगों को बड़ा अपमान का सामना करना होता था। जो चमड़े का काम किया करते थे, जिन्हें जल्लाद कहा जाता था। जो लोग मानव मल साफ किया करते थे या फिर कोई भी ऐसा काम करते थे जो सभ्य मानव नहीं करना चाहेगा।।

आपको जानकर आश्चर्य होगा, कि जिस रोम साम्राज्य की महानता का वर्णन यूरोप वासी करते हुए नहीं थकते। उस रोम साम्राज्य में नियम था, कि छोटी कास्ट वाले लोगों को कोई भी कंकड़ फेंक कर मार सकता था। यह लोग सार्वजनिक रूप से स्नान नहीं कर सकते थे। मतलब कि जिन नदियों और कुओं से आम जनता जल का उपयोग करती थी वहां पर यह लोग नहीं जा सकते थे।।

यहाँ तक की यह लोग अपने मृत परिजनों का भी गुपचुप तरीके से अन्त्येष्टि क्रिया करने के लिए बाध्य होते थे। कब्रिस्तान में भी इन्हें जगह नहीं दी जाती थी। ये लोग शराब भी नहीं पी सकते थे। यदि कोई उच्च कुल का व्यक्ति इनके संपर्क में आ जाय तो उसका भी बहिष्कार कर दिया जाता था। यहाँ तक की उसकी राजनीतिक, व्यापारिक और आर्थिक अधिकार भी छीन लिए जाते थे।।

इस प्रकार यह तय कर दिया गया था, कि जो नीच लोग हैं, वह नीच ही बने रहे। यह व्यवस्था पुरे यूरोप में बड़े लंबे समय तक चलती रही। आपको एक घटना बताता हूं। 1680 के दशक में उत्तरी जर्मन शहर में एक नीच कुल की औरत प्रसव पीड़ा से तड़प रही थी। दाई जिसे यूरोप में मिडवाइफ कहा जाता है उसने यह कहकर उस घर में प्रवेश करने से मना कर दिया, कि ऐसा करके उसके ऊंचे कुल को ठेस पहुंचेगी और अन्ततः वह औरत मर गई।।

बीसवीं शताब्दी तक ऐसे लोग यूरोप में मानव मल मूत्र को भी अपने हाथ से ही साफ़ किया करते थे। भारत में ऐसे काम करने वालों को भंगी कहा जाता है। यूरोप में उन्हें गोंगो फार्मर्स कहा जाता था। अब जरा भारत और यूरोप में एक ही प्रकार के काम करने वाले लोगों की स्थिति देखिए। यूरोप में “गोग फार्मर्स” केवल रात में ही आ या जा सकते थे। इसलिए इन्हें नाइटमैन भी कहा जाता था।।

रात को यह लोग उच्च वर्गों के लोगों के घरों में आते उनके शौचालय को हाथ से साफ करते और शहर से दूर ले जाकर वह मल मूत्र डाल देते। वे केवल शहर के बाहर ही रह सकते थे और दिन के समय उनका शहर में प्रवेश वर्जित था। यदि किसी नाइटमैन को शहर में शहर में घूमता पाया जाता तो उसके खिलाफ दंडात्मक कार्यवाही की जाती थी।।

युरोप में 1920 में एक पुस्तक प्रकाशित की गई जिसका नाम “प्रिंसिपल ऑफ सोशियोलॉजी” था। इस पुस्तक में यूरोप के अंदर कठोर और सख्त कास्ट व्यवस्था का विस्तृत वर्णन किया गया है। इसमें लिखा गया है, कि हर वह व्यक्ति जो छोटे काम करता था जैसे अनाज काटना, उस अनाज को भंडार गृह तक पहुंचाना, ब्रेड बनाना, कसाई, सूअर पालने वाला, शराब विक्रेता, सार्वजनिक स्नानघर की भट्ठियों में कोयला डालने वाला आदि-आदि इन लोगों को पीढ़ी दर पीढ़ी एक ही काम करने के लिए विवश किया जाता था।।

अगर ऐसे लोग शाही फरमान भी हासिल कर लें, तब भी इनकी कास्ट नहीं बदली जा सकती थी। जो कार्य पिता करते थे, वही कार्य करने के लिए इन्हें विवश किया जाता था। चर्च भी इन्हें इनकी दासता से मुक्त नहीं करा सकता था। यूरोपियन लोग रक्त की शुद्धता का बहुत ध्यान रखते थे। इस कारण वैवाहिक संबंध केवल उन्हीं लोगों से बनाए जा सकते थे जो लोग उन्हीं के जैसे हो।।

लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी की भारतीय लोगों ने पहली बार अलग-अलग वर्गों का अनुभव तब किया जब भारत की जनगणना में अंग्रेजों द्वारा जाति को आधार बनाया गया। हर किसी व्यक्ति को रोक-रोककर बताया गया, कि वह फलां जाति का है। भारत में जाति का अर्थ कार्य से लिया जाता था। भारतीय व्यवस्था के अनुसार व्यक्ति का कार्य बदलते ही उसकी जाति बदल जाती थी। जैसे संत रविदास जो चमार से ब्राह्मण बन गए थे। चोखमला कनकदास जैसे महान संत भी इसी श्रेणी में आते हैं।।

आज भी भारतीय समाज इन लोगों का एक ब्राह्मण की भांति सम्मान प्राप्त है। महाराष्ट्र के मराठा पेशवा ब्राह्मण थे जो बाद में क्षत्रिय बन गए। चंद्रगुप्त मौर्य जिन्हें अखण्ड भारत का महान सम्राट माना जाता है वह भी छोटी जाति से आते थे। भारत में जातियों कि कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं थी। यह कार्य पर आधारित थी। आपने देखा होगा, कि एक क्षेत्र में कोई उपनाम किसी और जाति को संबोधित करता है और दूसरे क्षेत्र में वही उपनाम किसी अन्य जाति को।।

जैसे लखनऊ क्षेत्र में उपाध्याय वे लोग सरनेम के रूप में लगाते हैं जो फसल और बाग बगीचों का कार्य करते हैं। दिल्ली के आसपास के क्षेत्रों में उपाध्याय वे लोग अपने सरनेम के रूप में लगाते हैं जो एक प्रकार का ब्राह्मण का कार्य करते हैं। यह एक स्पष्ट उदाहरण है, कि भारत में जातियां किस प्रकार असंतुलित थी जिसका कोई बड़ा प्रभाव भारतवर्ष पर नहीं पड़ता था।।

इसके उलट यूरोप में धन के आधार पर वर्गों का बंटवारा किया गया था। जबकि भारत में सबसे अधिक सम्मानजनक वर्ग ब्राह्मणों को माना जाता है, जो भारत में सबसे गरीब होते थे। भारतवर्ष में अधिकतर भूमि अथवा जमीन शुदों, क्षत्रियों और वैश्यों के नियंत्रण में थी। यूरोप में कोई भी छोटे कुल का व्यक्ति आपके साथ ना तो बैठ सकता था और ना ही उस घर में प्रवेश कर सकता था जिस घर में आप रहते हों।।

शिक्षा की बात तो छोड़ ही दीजिए। जबकि भारत में 18वीं शताब्दी में कई ऐसे विद्यालय थे जहां पर शुद्र बच्चे ब्राह्मणों से अधिक संख्या में पढ़ते थे। इसका स्पष्ट विवरण “द ब्यूटीफुल ट्री” नाम की पुस्तक में दिया गया है। यहाँ तो कुछ लोग कर्ण और द्रोणाचार्य के राजनैतिक प्रसंग को ही मुख्य आधार के रूप में प्रस्तुत करते नहीं थकते। आप सोचिए अट्ठारह सौ शताब्दी में भी भारत जाति व्यवस्था को कितना स्पष्ट रूप से देखता था।।

इसी समय यूरोप का सिस्टम कितना कठोर बन चुका था। जबकि भारतीय संस्कृति में किसी भी बड़े-से-बड़े ब्राह्मण के घर भी बिना शूद्रों के प्रवेश के विवाह की विधि संपन्न नहीं हो सकती ठ या आज भी है। परन्तु जब भारतीय जनगणना अंग्रेजों द्वारा की गई तब जाति का आधार मुख्य रखा गया। साथ ही यह तय किया गया, कि हर व्यक्ति को यह पता चले, कि वह किस जाति का है। अंग्रेजों के लिए भारतीय समाज को तोड़ना इससे आसान हो गया था।।

इसका परिणाम आज हमारे सामने है। आज हम भारतीय जाति व्यवस्था को बड़ा कठोर बना चुके हैं। दलित लोग स्वयं किए गए अत्याचारों की कहानियां बताते फिरते हैं। ऊंचे लोग खुद को बहादुर वीर बताते हुए घूमते हैं। वे दोनों ही नहीं जानते, कि भारतीय समाज में केवल 200 वर्ष पहले ही उनकी स्थिति किस प्रकार की थी? भारतीय समाज के साथ एक बहुत बड़ा दुष्कर्म किया गया है। जिसके फलस्वरूप ऐसी सोच पैदा हुई है, कि हम एक भारतीय एकजुट नहीं हो पाते। बल्कि जातियों के तौर पर अलग-अलग बटें हुए हैं।।

परन्तु यूरोपियन लोग चलाक थे, जब उन्हें महसूस हुआ, कि इस प्रकार एक निश्चित वर्ग का शोषण करना अब संभव नहीं हो पाएगा। तभी वह आधुनिकिकरण की बीन बजाने लगे। भारतीयों को क्योंकि शुरू में ऐसी मानसिकता में डाला गया, कि वे कमजोर और पिछड़े हुए हैं। और फिर 1947 के बाद भारत में शिक्षा का प्रचार प्रसार इतने गंदे तरीके से किया गया, कि भारतीय लोग आधुनिकिकरण को स्वीकार ही नहीं कर पाए।।

इसका नतीजा यह है, कि भारत में प्रत्येक वर्ष आंतरिक तौर पर या धर्म के आधार पर या फिर किसी जाति के आधार पर संघर्ष होता रहता है। पश्चिमी देश ये जानते थे कि जिसका बीज वो 300 साल पहले वो बो देंगे उसी की फसल ये भारतीय पीढ़ी-दर-पीढ़ी काटेंगे। हम भारतीय स्वयं को एक अलग ही नजरिए से देखते हैं। बल्कि आज तो अचानक से ऐसे लोगों की बाढ़ आ गई है, जो स्वयं को को दलित चिंतक बताते हैं और दलितों पर हो रहे अत्याचारों की कहानियां पेश करते हैं।।

मैं आशा करता हूं, कि इस लेख को पढने वाले कभी-न-कभी कोई-न-कोई हमारे दलित भाई जरूर होंगे। अगर ऐसा है, तो मैं आपसे पूछता हूँ, क्या आपको कभी किसी मंदिर में प्रवेश से रोका गया है? क्या आपको कभी जाति आधार पर भोजन देने से रोका गया है?

यह सच है, कि आज भारत में जातियों के आधार पर भेदभाव होता है, परन्तु ऐसे अब बहुत कम लोग बचें हैं। ऐसे जो लोग बचें भी हैं, उसमें क्या उनका दोष है? क्या हमने कभी खुद यह पता करने की कोशिश की है, कि आखिर यह भेदभाव कहां से शुरू हुआ?

Bhagwat Pravakta Swami Dhananjay Maharaj

source:

BOOK THE BEAUTIFUL TREE
BOOK WORLD CIVILIZATION: GLOBAL EXPERIANCE
BOOK डीफाइल्ड ट्रेड एंड सोशल आउटकास्ट- ऑनर एंड रिचुअल पॉल्यूसन
BOOK PRINCIPAL OF SOCIOLOGY

नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

 
 
जय जय श्री राधे ।।
जय श्रीमन्नारायण ।। 
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