कामनायें ही मुक्ति का मार्ग दिखाती हैं।।

0
836
Kamna Hi Mukti Dilati Hai
Kamna Hi Mukti Dilati Hai

हमारी कामनायें ही हमारे मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करती हैं।। Kamna Hi Mukti Dilati Hai.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, मनुष्य एक बहुत ही विलक्षण प्राणी होता है। एक होती है कामना जो जीवमात्र में होती है। अर्थात लगभग सभी जीवों में कुछ न कुछ कामना होती ही हैं। जैसे खाने की, पीने की, भोग भोगने की और उन भोगों को संग्रह करने की आदि-आदि।।

उदहारण के लिए यदि किसी कुत्ते का जब पेट भर जाये तो वो भी कोई बढ़िया चीज मिलने पर उसे उठाकर ले जाता है। लेजाकर उसे कहीं गड्ढा खोदकर गाड़ देता है कि कल खायेंगे। ये संग्रह की प्रवृति है।।

मित्रों, इसी को कामना कहते हैं जैसे इंसानों का स्वाभाव है। जैसे कि पैसे तो अभी थोड़े से हैं परन्तु थोड़े से बैंक में भी होने चाहिए। ताकि जरुरत पड़ने पर काम आ सके। इसी को कामना, स्वार्थ या लालच कहते हैं।।

सच कहें तो पेड़-पौधों के मन में भी कामनायें होती है। मनुष्य की कामना और होती है। कुत्तों की कामना और होती है। इसी प्रकार कामना सभी जीवों की कामनाएं अपनी-अपनी आवश्यकता अनुसार होती है। परन्तु कामनायें अथवा संग्रह की इच्छायें सभी जीवों में और सदैव होती हैं।।

मित्रों, परन्तु मनुष्य में दो चीजें ऐसी होती हैं जो और जीवों में नहीं होतीं। मनुष्य में कामना के साथ लालसा भी होती है। साथ ही जिज्ञासा भी होती है और यह बहुत ऊँची चीज है।।

अगर हम मनुष्य अपनी बाकि बातों को भगवान पर छोड़ दे। तो देखते-देखते महान आत्मा एवं दिव्यात्मा बन जायेंगे। इसीलिए कहा जाता है, कि मनुष्य-जीवन देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।।

देवताओं में भी लालसा और जिज्ञासा होती है। परंतु स्वर्ग में इतनी सुविधा, इतना सुख-वैभव होता है, कि वे उसी में मशगूल हो जाते हैं। भक्ति जैसी बातों का फायदा उठाने से वंचित ही रह जाते हैं।।

परन्तु उनका भी जब पुण्य नष्ट हो जाता है। तब फिर उन्हें भी मनुष्य शरीर में आना ही पड़ता है। परंतु मनुष्य-जन्म में ये चीजें ज्यों-की-त्यों बरकरार रहती हैं। लालसा भगवान के दर्शन की और जिज्ञासा भगवान से मिलन की।।

किसी मनुष्य के पास कितना भी धन हो जाये। फिर भी अन्दर से व्यक्ति कुछ ढूंढते रहता हैं। अमीर-से-अमीर व्यक्ति भी पता नहीं किसकी तरफ भगते रहता है। अथवा कुछ-न-कुछ कमी महशुश करता ही रहता है।।

मित्रों, चाहे वो कोई भी हो भगवान की तरफ जाता ही है। अथवा किसी-न-किसी को मानता ही है। लगभग सभी लोग भगवान को मानते हैं। और जो नहीं मानते समझो उनकी मनुष्यता ही खो गयी।।

मनुष्य में यह लालसा रहती है, कि भगवत्सुख मिले। भगवत्प्रीति मिले, भगवद्दरश मिले। तथा अन्त में भगवदधाम भी मिले। हम लोग स्वर्ग, बिहिश्त, पैराडाइज अथवा कुछ भी बोल लें परन्तु भगवत्मिलन की कामना रहती ही है।।

मित्रों, ये जिसके अन्दर नहीं है निश्चित रूप से उसकी मनुष्यता या तो आर्थिकता और भौतिकता में खो गयी है या फिर मर चुकी है। उसे जगाने की व्यवस्था फिर ये प्रकृति स्वयं कर लेती है।।

।। सदा सत्संग करें । सदाचारी और शाकाहारी बनें । सभी जीवों की रक्षा करें ।।

नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्।।

।। नमों नारायण ।।

Previous articleसंतो के दर्शन और सत्संग का फल।।
Next articleजानने योग्य कुछ आवश्यक बातें।।
भागवत प्रवक्ता- स्वामी धनञ्जय जी महाराज "श्रीवैष्णव" परम्परा को परम्परागत और निःस्वार्थ भाव से निरन्तर विस्तारित करने में लगे हैं। श्रीवेंकटेश स्वामी मन्दिर, दादरा एवं नगर हवेली (यूनियन टेरेटरी) सिलवासा में स्थायी रूप से रहते हैं। वैष्णव धर्म के विस्तारार्थ "स्वामी धनञ्जय प्रपन्न रामानुज वैष्णव दास" के श्रीमुख से श्रीमद्भागवत जी की कथा का श्रवण करने हेतु संपर्क कर सकते हैं।।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here