अथ श्री कुञ्जविहारी अष्टकम् भाग-१।।

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Kunj Bihari Ashtakam Part1

अथ श्री कुञ्जविहारी अष्टकम् भाग-१ ।। Kunj Bihari Ashtakam Part1

इन्द्रनीलमणिमञ्जुलवर्णः फुल्लनीपकुसुमाञ्चितकर्णः ।
कृष्णलाभिरकृशोरसिहारी सुन्दरो जयति कुञ्जविहारी ॥ १॥

राधिकावदनचन्द्रचकोरः सर्ववल्लववधूधृतिचोरः ।
चर्चरीचतुरताञ्चितचारी चारुतो जयति कुञ्जविहारी ॥ २॥

सर्वताः प्रतिथकौलिकपर्वध्वंसनेन हृतवासवगर्वः ।
गोष्ठरक्षणकृते गिरिधारी लीलया जयति कुञ्जविहारी ॥ ३॥

रागमण्डलविभूषितवंशी विभ्रमेणमदनोत्सवशंसी-
स्तूयमानचरितः शुकशारिश्रोणिभिर्जयति कुञ्जविहारी ॥ ४॥

शातकुम्भरुचिहारिदुकूलः केकिचन्द्रकविराजितचूडः ।
नव्ययौवनलसद्व्रजनारीरञ्जनो जयति कुञ्जविहारी ॥ ५॥

स्थासकीकृतसुगन्धिपटीरः स्वर्णकाञ्चिपरिशोभिकटीरः ।
राधिकोन्नतपयोधरवारीकुञ्जारो जयति कुञ्जविहारी ॥ ६॥

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गौरधातुतिलकोज्ज्वलफालः केलिचञ्चलितचम्पकमालः ।
अद्रिकन्दरगृहेष्वभिसारी सुभ्रुवां जयति कुञ्जविहारी ॥ ७॥

विभ्रमोच्चलदृगञ्चलनृत्यक्षिप्तगोपललनाखिलकृत्यः ।
प्रेममत्तवृषभानुकुमारीनागरो जयति कुञ्जविहारी ॥ ८॥

अष्टकं मधुरकुञ्जविहारी क्रीडया पठति यः किल हारी ।
स प्रयाति विलसत्परभागं तस्य पादकमलार्चनरागम् ॥ ९॥

इति कुञ्जविहार्यष्टकं १ समाप्तम् ॥

।। सदा सत्संग करें । सदाचारी और शाकाहारी बनें । सभी जीवों की रक्षा करें ।।

नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्।।

।। नमों नारायण ।।

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भागवत प्रवक्ता- स्वामी धनञ्जय जी महाराज "श्रीवैष्णव" परम्परा को परम्परागत और निःस्वार्थ भाव से निरन्तर विस्तारित करने में लगे हैं। श्रीवेंकटेश स्वामी मन्दिर, दादरा एवं नगर हवेली (यूनियन टेरेटरी) सिलवासा में स्थायी रूप से रहते हैं। वैष्णव धर्म के विस्तारार्थ "स्वामी धनञ्जय प्रपन्न रामानुज वैष्णव दास" के श्रीमुख से श्रीमद्भागवत जी की कथा का श्रवण करने हेतु संपर्क कर सकते हैं।।

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