कुरु का जन्म एवं कुरुवंश का विस्तार।।

0
57
Kuru Se Kuruvansh Ka Vistar
Kuru Se Kuruvansh Ka Vistar

कुरु का जन्म एवं कुरुवंश का विस्तार।। Kuru Se Kuruvansh Ka Vistar.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, कुरुवंश के प्रथम राजा का नाम कुरु था। कुरु बड़े प्रतापी और बड़े तेजस्वी राजा थे। उन्हीं के नाम पर कुरुवंश की शाखाएं निकलीं और विकसित हुईं। एक से एक प्रतापी और तेजस्वी वीर कुरुवंश में पैदा हो चुके हैं। पांडवों और कौरवों ने भी कुरुवंश में ही जन्म लिया था। महाभारत का युद्ध भी कुरुवंशियों में ही हुआ था। किंतु कुरु कौन थे? एवं उनका जन्म किसके द्वारा और कैसे हुआ था? वेदव्यास जी ने इस पर महाभारत में प्रकाश में प्रकाश डाला है। आज हम भी उस कथा को आपके सामने रख रहे हैं जी की बहुत ही प्रेरणादायिनी है।।

हस्तिनापुर में एक प्रतापी राजा हुए। उस राजा का नाम सवरण था। वह सूर्य के समान तेजवान एवं प्रजा के पालक थे। वे स्वयं कष्ट उठा लेते थे पर प्राण देकर भी प्रजा के कष्टों को दूर करते थे। राजा सवरण भगवान सूर्यदेव के अनन्य भक्त थे। वह प्रतिदिन बड़ी ही श्रद्धा के साथ सूर्यदेव की उपासना किया करते थे। वे जब तक सूर्यदेव की उपासना नहीं कर लेते थे। तबतक वे जल का एक घूंट भी कंठ के नीचे नहीं उतारते थे।।

एक दिन राजा सवरण एक पर्वत पर आखेट के लिए गये। जब वह हाथ में धनुष-बाण लेकर पर्वत के ऊपर आखेट के लिए भ्रमण कर रहे थे। तभी उसे एक अतीव सुंदर युवती दिखाई पड़ी। वह युवती सुंदरता के सांचे में ढली हुई थी। उसके प्रत्येक अंग को विधाता ने बड़ी ही रुचि के साथ संवार-संवार कर बनाया था। सवरण ने आज तक ऐसी स्त्री देखने की कौन कहे, कल्पना तक नहीं की थी। राजा सवरण उस स्त्री पर आक्स्त हो गये और सबकुछ भूलकर अपने आपको उस पर निछावर कर दिया।।

वह उसके पास जाकर, तृषित नेत्रों से उसकी ओर देखता हुआ बोला, तन्वंगी, तुम कौन हो? तुम देवी हो, गंधर्व हो या किन्नरी हो? तुम्हें देखकर मेरा चित चंचल हो उठा। तुम मेरे साथ गंधर्व विवाह करके सुखोपभोग करो। पर युवती ने राजा सवरण की बातों का कुछ भी उत्तर नहीं दिया। वह कुछ क्षणों तक राजा सवरण की ओर देखती रही, फिर अदृश्य हो गई। युवती के अदृश्य हो जाने पर राजा सवरण अत्यधिक आकुल हो गये।।

वे धनुष-बाण फेंककर उन्मतों की भांति विलाप करने लगे। हे सुंदरी! तुम कहां चली गईं? जिस प्रकार सूर्य के बिना कमल मुरझा जाता है। और जिस प्रकार पानी के बिना पौधा सूख जाता है। उसी प्रकार मैं तुम्हारे बिना मैं जीवित नहीं रह सकता। तुम्हारे सौंदर्य ने मेरे मन को चुरा लिया है। तुम प्रकट होकर मुझे बताओ, कि तुम कौन हो और मैं तुम्हें किस प्रकार पा सकता हूं?।।

युवती पुन: प्रकट हुई। वह सवरण की ओर देखती हुई बोली, राजन! मैं स्वयं आप पर मुग्ध हूं। पर मैं अपने पिता की आज्ञा के वश में हूं। मैं सूर्यदेव की छोटी पुत्री हूं। मेरा नाम तप्ती है। जब तक मेरे पिता आज्ञा नहीं देंगे, मैं आपके साथ विवाह नहीं कर सकती। यदि आपको मुझे पाना है तो मेरे पिता को प्रसन्न कीजिए। युवती अपने कथन को समाप्त करके पुन: अदृश्य हो गई। राजा सवरण पुन: उन्मत्तों की भांति विलाप करने लगे।।

वे आकुल होकर पृथ्वी पर गिर पड़े और तप्ती-तप्ती की पुकार से पर्वत को ध्वनित करने लगे। राजा सवरण तप्ती को पुकारते-पुकारते धरती पर गिर पड़े और बेहोश हो गये। परन्तु जब उन्हें होश आया, तो पुन: तप्ती याद आ गयी और याद आया उसका कथन। यदि मुझे पाना चाहते हैं, तो मेरे पिता सूर्यदेव को प्रसन्न कीजिए। उनकी आज्ञा के बिना मैं आपसे विवाह नहीं कर सकती।।

राजा सवरण की रगों में विद्युत की तरंग-सी दौड़ उठी। वह मन ही मन सोचते रहे। वे तप्ती को पाने के लिए सूर्यदेव की आराधना करने लगे। उन्हें प्रसन्न करने में सबकुछ भूल गए। राजा सवरण सूर्यदेव की आराधना करने लगे। धीरे-धीरे सालों बीत गए और राजा तप करता रहा। आखिर सूर्यदेव के मन में सवरण की परीक्षा लेने का विचार उत्पन्न हुआ। रात का समय था चारों ओर सन्नाटा छाया हुआ था। सवरण आंखें बंद किए हुए ध्यानमग्न बैठे थे।।

सहसा उसके कानों में किसी की आवाज आयी, कि राजन! तूं यहां तप में संलग्न है। तेरी राजधानी आग में जल रही है। राजा फिर भी चुपचाप अपनी जगह पर बैठे रहे। उसके मन में रंचमात्र भी दुख पैदा नहीं हुआ। उसके कानों में पुन: दूसरी आवाज पड़ी, राजन! तेरे कुटुंब के सभी लोग आग में जलकर मर गए। किंतु फिर भी वह हिमालय-सा दृढ़ होकर अपनी जगह पर बैठा रहा। उसके कानों में पुन: तीसरी बार कड़क स्वर पड़ा, अरे मुर्ख! तेरी प्रजा अकाल की आग में जलकर भस्म हो रही है।।

तेरे नाम पर लोग थू-थू कर रहे हैं। फिर भी राजा दृढतापूर्वक तप में लगा रहा। उसकी दृढ़ता पर सूर्यदेव प्रसन्न हो गए और उन्होंने प्रकट होकर कहा। सवरण! मैं तुम्हारी दृढ़ता पर मुग्ध हूं। बोलो, तुम्हें क्या चाहिए? सवरण सूर्यदेव को प्रणाम करते हुए बोले! देव ! मुझे आपकी पुत्री तप्ती को छोड़कर और कुछ नहीं चाहिए। कृपा करके मुझे तप्ती को देकर मेरे जीवन को कृतार्थ कीजिए।।

सूर्यदेव ने प्रसन्नता की मुद्रा में उत्तर दिया, राजन! मैं सबकुछ जानता हूं। तप्ती भी तुमसे प्रेम करती है। तप्ती तुम्हारी है। सूर्यदेव ने अपनी पुत्री तप्ती का सवरण के साथ विधिवत विवाह कर दिया। सवरण तप्ती को लेकर उसी पर्वत पर रहने लगे। और राग-रंग में अपनी प्रजा को भी भूल गये। उधर राजा सवरण के राज्य में भीषण अकाल पद गया। धरती सूख गई, कुएं, तालाब और पेड़-पौधे भी सुख गए। प्रजा भूखों मरने लगी। लोग राज्य को छोड़कर दूसरे देशों में जाने लगे।।

किसी देश का राजा जब राग रंग में डूब जाता है, तो उसकी प्रजा का यही हाल होता है। सवरण का मंत्री बड़ा बुद्धिमान और उदार हृदय का था। वह राजा का पता लगाने के लिए निकला। वह घूमता हुआ उसी पर्वत पर पहुंचा। जिस पर राजा सवरण तप्ती के साथ निवास कर रहे थे। राजा सवरण के साथ तप्ती को देखकर बुद्धिमान मंत्री समझ गया कि उसका राजा स्त्री के सौंदर्य जाल में फंसा हुआ है। मंत्री ने बड़ी ही बुद्धिमानी के साथ काम लिया।।

मंत्री ने राजा सवरण को वासना के जाल से छुड़ाने के लिए अकाल की आग में जलते हुए मनुष्यों के चित्र बनवाए। वह उन चित्रों को लेकर राजा के सामने उपस्थित हुआ। उसने राजा सवरण से कहा, महाराज! मैं आपको चित्रों की एक पुस्तक भेंट करना चाहता हूं। मंत्री ने चित्रों की वह पुस्तक राजा की ओर बढ़ा दी। सवरण पुस्तक के पन्ने उलट-पलट कर देखने लगा। किसी पन्ने में मनुष्य पेड़ों की पत्तियां खा रहे थे। किसी पन्ने में माताएं अपने बच्चों को कुएं में फेंक रही थीं।।

साथ ही पुस्तक के किसी पन्ने में भूखे मनुष्य जानवरों को कच्चा मांस खा रहे थे। और किसी पन्ने में प्यासे मनुष्य हाथों में कीचड़ लेकर चाट रहे थे। राजा सवरण चित्रों को देखकर गंभीरता के साथ बोला, यह किस राजा के राज्य की प्रजा का दृश्य है? मंत्री ने बहुत ही धीमे और प्रभावपूर्वक स्वर में उत्तर दिया, उस राजा का नाम सवरण है। यह सुनकर राजा चकित हो गया। वह विस्मय भरी दृष्टि से मंत्री की ओर देखने लगा।।

मंत्री पुन: अपने ढंग से बोला, मैं सच कह रहा हूं महाराज! यह आपकी ही प्रजा का दृश्य है। प्रजा भूखों से मर रही है। चारों ओर हाहाकार मचा है। राज्य में न अन्न है, न पानी है। धरती की छाती फट गई है। महाराज! वृक्ष भी आपको पुकारते-पुकारते सूख गए हैं। यह सुनकर सवरण का हृदय कांप उठा। वह उठकर खड़ा हो गया और बोला, मेरी प्रजा का यह हाल है और मैं यहां मद में पड़ा हुआ हूं। मुझे धिक्कार है। मंत्री जी! मैं आपका कृतज्ञ हूं, आपने मुझे जगाकर बहुत अच्छा किया।।

सवरण तप्ती के साथ अपनी राजधानी पहुंचा। उसके राजधानी में पहुंचते ही जोरों की वर्षा हुई। सूखी हुई पृथ्वी हरियाली से ढक गई। अकाल दूर हो गया। प्रजा सुख और शांति के साथ जीवन व्यतीत करने लगी। वह राजा सवरण को परमात्मा और तप्ती को देवी मानकर दोनों की पूजा करने लगी। सवरण और तप्ती से ही कुरु का जन्म हुआ था। कुरु भी अपने माता-पिता के समान ही प्रतापी और पुण्यात्मा थे। युगों बीत गए हैं, किंतु आज भी घर-घर में कुरु एवं कुरुवंश को लोग जानते हैं।।

आप सभी अपने मित्रों को फेसबुक पेज को लाइक करने और संत्संग से उनके विचारों को धर्म के प्रति श्रद्धावान बनाने का प्रयत्न अवश्य करें।।

नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्।।

।। नमों नारायण ।।

Previous articleसत्संग ऐसे जीवन बदलता है।।
Next articleचिंता “चिता” एवं चिंतन “अमृत” समान है।।
भागवत प्रवक्ता- स्वामी धनञ्जय जी महाराज "श्रीवैष्णव" परम्परा को परम्परागत और निःस्वार्थ भाव से निरन्तर विस्तारित करने में लगे हैं। श्रीवेंकटेश स्वामी मन्दिर, दादरा एवं नगर हवेली (यूनियन टेरेटरी) सिलवासा में स्थायी रूप से रहते हैं। वैष्णव धर्म के विस्तारार्थ "स्वामी धनञ्जय प्रपन्न रामानुज वैष्णव दास" के श्रीमुख से श्रीमद्भागवत जी की कथा का श्रवण करने हेतु संपर्क कर सकते हैं।।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here