पराई वस्तुओं का लोभ नहीं करना चाहिये।।

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Lobh Na Karen
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पराई वस्तुओं का लोभ नहीं करना चाहिये।। Lobh Na Karen.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, यह पूर्ण सत्य बात है, कि जो वस्तुएं हमारा न हो अथवा हमारे पास न हो उसका लोभ कैसा? वैसे आज के समय में इन बातों को लोग निरर्थक समझते हैं। परन्तु यह आज भी उतना ही कड़वा सत्य है जितना तब था। इस जीव जगत में बह्म पूर्ण है। इसलिए यह जगत भी पूर्ण है।।

उसी पूर्ण से इस पूर्ण की उत्पत्ति हुई है। अतः हम अगर इस पूर्ण को निकाल देते है तो शेष भी पूर्ण ही रहता है। ईशोपनिषद में इस नश्वर जीवन के बारे में कुछ यही कहा गया है। वैदिक सनातन धर्म में 108 उपनिषदों के उल्लेख है। यह धर्म ग्रंथ आदिकाल में लिखे गए थे।।

परबतु जैसा कि मैंने बताया उस उपनिषदों की बातें आज भी उतनी ही सार्थक हैं जितनी की पहले थीं। ईशोपनिषद की कुछ ऐसी ही ज्ञानदायक विषयों की चर्चा आज हम यहाँ करेंगे। इस परिवर्तनशील संसार में सब कुछ ईश्वर ने ही बनाईं हैं और इनमें ही ईश्वर रहता भी है।।

इसलिये इस प्रकृति में जो कि उस परमात्मा की संरचना भी है और यही प्रकृति परमात्मा का निवास स्थल भी है। उस प्रकृति में आपको अपने कर्म अपने पुरुषार्थ के द्वारा जो प्राप्त है उसी से संतुष्ट रहना ही आपके कल्याण का उत्तम मार्ग हो सकता है।।

हाँ हम अधिक प्राप्ति के लिए पुरुषार्थ कर सकते हैं। उसी से जो कुछ भी हम कर सकते हैं, वही हमारा है। क्योंकि इस प्रकृति में सब कुछ परमात्मा का है। तो इसलिए जो आपका अपना नहीं है उसके लिए किसी के दूसरे की वस्तुओं को अनैतिक तरीके से प्राप्त करने का प्रयत्न भिब करना चाहिये।।

किसी दूसरे की किसी वस्तुओं को किसी भी अनैतिक तरीके से प्राप्त करने का जो प्रयत्न है उसे ही लालच, कुटिलता अथवा चतुराई कहते हैं। जो आगे आनेवाले समय में आपके भविष्य के लिए हानिकारक हो सकता है। इसलिये जो वस्तुएं आपके पास नहीं है उसका लोभ मत करो।।

जो लोग केवल शारीरिक बल प्रदर्शन यानी दूसरों को पीड़ा देने के लिए ही प्रसिद्ध हो जाते हैं। जिनमें आदर्श अथवा मानवीय मार्ग को समझने की शक्ति नहीं रह जाती है। ऐसे लोगों को मृत्यु के बाद नर्क (बुरे भविष्य) जाने को तैयार रहना चाहिये।।

ब्रम्ह एक है, उसमें चंचलता है, वह सबसे प्राचीन है तथा इन्सान को स्फूर्ति प्रदान करने वाला है एवं मन से भी तेज चलने वाला है। वह स्थिर रहने पर भी दौड़ते हुए आगे बढ़ जाता है। मां के गर्भ में रहनेवाला जीव उसी ब्रह्म के आधर से अपने पूर्व में किए कर्म के फल को प्राप्त होता है।।

जो मनुष्य सभी प्राणियों की आत्मा के अंदर आत्मा है, ऐसा अनुभव करता है। तथा समस्त प्राणियों में उसी एक आत्मा का विश्वासपूर्ण अनुभव करता है। उसे किसी के प्रति घृणा नहीं रह जाती। इसी विद्या यानी आत्मज्ञान से आत्मा की उन्नति होती है।।

आप सभी अपने मित्रों को फेसबुक पेज को लाइक करने और संत्संग से उनके विचारों को धर्म के प्रति श्रद्धावान बनाने का प्रयत्न अवश्य करें।।

नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्।।

।। नमों नारायण ।।

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भागवत प्रवक्ता- स्वामी धनञ्जय जी महाराज "श्रीवैष्णव" परम्परा को परम्परागत और निःस्वार्थ भाव से निरन्तर विस्तारित करने में लगे हैं। श्रीवेंकटेश स्वामी मन्दिर, दादरा एवं नगर हवेली (यूनियन टेरेटरी) सिलवासा में स्थायी रूप से रहते हैं। वैष्णव धर्म के विस्तारार्थ "स्वामी धनञ्जय प्रपन्न रामानुज वैष्णव दास" के श्रीमुख से श्रीमद्भागवत जी की कथा का श्रवण करने हेतु संपर्क कर सकते हैं।।

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