देवालय-निर्माण से प्राप्त होने वाले फल।।

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Mandir Nirman Ka Fal
Mandir Nirman Ka Fal

देवालय-निर्माण से प्राप्त होने वाले फल।। Mandir Nirman Ka Fal.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, भगवान् लक्ष्मीनारायण अथवा वासुदेव आदि विभिन्न स्वरूपों के निमित्त मंदिर का निर्माण कराने से जिस फल की प्राप्ति होती हैं, आज हम उसी के विषय में बातें करेंगे। जो मनुष्य देवताओं के लिये मंदिर-जलाशय आदि के निर्माण कराने की इच्छा करता हैं, उसका वह शुभ संकल्प ही उसके हजारों जन्मों के पापों का नाश कर देता हैं। जो व्यक्ति मन से भावना द्वारा भी मंदिर का निर्माण करते हैं, उनसे भी सैकड़ों जन्मों के पापों का नाश हो जाता हैं।।

जो लोग भगवान् श्रीकृष्ण के लिये किसी दुसरे के द्वारा बनवाये जाते हुए मंदिर के निर्माण कार्य का अनुमोदन मात्र करते हैं, वे भी समस्त पापों से मुक्त हो उन अच्युतदेव के लोक (वैकुण्ठ अथवा गोलोकधाम को) प्राप्त होते हैं। भगवान् विष्णु के निमित्त मंदिर का निर्माण करके मनुष्य अपने भूतपूर्व तथा भविष्य में होनेवाले दस हजार कुलों को तत्काल विष्णुलोक में जाने का अधिकारी बना देता हैं।।

भगवान श्रीकृष्ण-मंदिर का निर्माण करनेवाले मनुष्य के पितर नरक के क्लेशों से तत्काल छुटकारा पा जाते हैं। साथ ही दिव्य वस्त्राभूषणों से अलंकृत हो बड़े हर्ष के साथ विष्णुधाम में निवास करते हैं। देवालय का निर्माण ब्रह्महत्या आदि पापों के पुंज का नाश कर देता है। यज्ञों से जिस फल की प्राप्ति नहीं होती हैं, वह भी देवालय का निर्माण करवाने मात्र से प्राप्त हो जाता है।।

देवालय का निर्माण कराने पर समस्त तीर्थों में स्नान करने का फल प्राप्त हो जाता हैं। देवता-ब्राह्मण आदि के लिये रणभूमि में मारे जानेवाले धर्मात्मा शूरवीरों को जिस फल आदि की प्राप्ति होती हैं, वही देवालय के निर्माण से भी सुलभ होता है। कोई शठता (कंजूसी) के कारण धुल-मिट्टी से भी देवालय बनवा दे तो भी वह उसे स्वर्ग या दिव्यलोक प्रदान करनेवाला होता है।।

एकायतन (एक ही देव विग्रह के लिये एक कमरे का) मंदिर बनवाने वाले पुरुष को स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है। त्र्यायतन मंदिर का निर्माता ब्रह्मलोक में निवास पाता है। पंचायतन मंदिर का निर्माण करनेवाले को शिवलोक की प्राप्ति होती है और अष्टायतन मंदिर के निर्माण से श्रीहरि के सन्निधि में रहने का सौभाग्य प्राप्त होता है। जो षोडशायतन मंदिर का निर्माण कराता है, वह भोग और मोक्ष, दोनों पाता है।।

श्रीहरि के मंदिर की तीन श्रेणियाँ हैं – कनिष्ठ, माध्यम और श्रेष्ठ। इनका निर्माण कराने से क्रमश: स्वर्गलोक, विष्णुलोक तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है। धनवान मनुष्य भगवान् विष्णु का उत्तम श्रेणी का मंदिर बनवाकर जिस फल को प्राप्त करता हैं, उसे ही निर्धन मनुष्य निम्न श्रेणी का मंदिर बनवाकर भी प्राप्त कर लेता हैं। धन-उपार्जन कर उसमें से थोडा-सा ही खर्च करके यदि मनुष्य देव-मंदिर बनवा ले तो बहुत अधिक पुण्य एवं भगवान् का वरदान प्राप्त करता हैं।।

एक लाख या एक हजार या एक सौ अथवा उसका आधा (५०) मुद्रा ही खर्च करके भगवान् विष्णु का मंदिर बनवाने वाला मनुष्य उस नित्य धाम को प्राप्त होता हैं, जहाँ साक्षात् गरुड की ध्वजा फहरानेवाले भगवान् विष्णु विराजमान होते हैं। जो लोग बचपन में खेलते समय धूलि से भगवान् विष्णु का मंदिर बनाते हैं, वे भी उनके धाम को प्राप्त होते हैं।।

तीर्थ में, पवित्र स्थान में, सिद्धक्षेत्र में तथा किसी आश्रम पर जो भगवान् विष्णु का मंदिर बनवाते हैं, उन्हें अन्यत्र मंदिर बनाने का जो फल बताया गया हैं, उससे तीन गुना अधिक फल मिलता है। जो लोग भगवान् विष्णु के मंदिर को चुने से लिपवाते और उस पर बन्धुक के फुल का चित्र बनाते हैं, वे अन्त में भगवान् के धाम में पहुँच जाते हैं।

भगवान् का जो मंदिर गिर गया हो, गिर रहा हो, अथवा आधा गिर चूका हो, उसका जो मनुष्य जीर्णोद्धार करवाता है, वह नवीन मंदिर बनवाने की अपेक्षा दूना पुण्यफल प्राप्त करता है। जो गिरे हुए विष्णु-मंदिर को पुन: बनवाता और गिरे हुए की रक्षा करता है, वह मनुष्य साक्षात भगवान् विष्णु के स्वरुप को प्राप्त करता है। भगवान् के मंदिर की ईटें जब तक रहती हैं, तब तक उसका बनवाले वाला विष्णुलोक में कुल सहित प्रतिष्ठित होता है।।

इस संसार में और परलोक में वही पुण्यवान और पूजनीय है, जो भगवान् श्रीकृष्ण का मंदिर बनवाता है। वही पुण्यवान उत्पन्न हुआ है, उसी ने अपने कुल की रक्षा की है। जो भगवान् विष्णु, शिव, सूर्य और देवी आदि का मंदिर बनवाता है, वही इस लोक में कीर्ति का भागी होता है। सदा धन की रक्षा में लगे रहनेवाले मुर्ख मनुष्य को बड़े कष्ट से कमाये हुए अधिक धन से क्या लाभ? यदि उससे भगवान का मंदिर ही नहीं बनवाता।।

जिसका धन पितरों, ब्राह्मणों और देवताओं के उपयोग में नहीं आ सका, उसके धन की प्राप्ति व्यर्थ हुई। जैसे प्राणियों की मृत्यु निश्चित हैं, उसी प्रकार कमाये हुए धन का नाश भी निश्चित है। मूर्ख मनुष्य ही क्षणभंगुर जीवन और चचंल धन के मोह में बंधा रहता हैं। जब धन दान के लिये, प्राणियों के उपभोग के लिये, कीर्ति के लिये और धर्म के लिये काम में नहीं लाया जा सके तो उस धन का मालिक बनने में क्या लाभ हैं?।।

इसलिये प्रारब्ध से मिले अथवा पुरुषार्थ से, किसी भी उपाय से धन को प्राप्तकर उसे उत्तम ब्राह्मणों को दान दें। अथवा कोई स्थिर कीर्ति बनवावे। चूँकि दान और कीर्ति से भी बढ़कर मंदिर बनवाना हैं, इसलिये बुद्धिमान मनुष्य विष्णु आदि देवताओं का मंदिर आदि बनवावे। भक्तिमान श्रेष्ठ पुरुषों के द्वारा यदि भगवान् के मंदिर का निर्माण और उसमें भगवान् का प्रवेश (स्थापन आदि) हुआ तो यह समझना चाहिये कि उसने समस्त चराचर त्रिभुवन को रहने के लिये भवन बनवा दिया।।

ब्रह्मा से लेकर तृणपर्यन्त जो कुछ भी भूत, वर्तमान, भविष्य, स्थूल, सूक्ष्म और इससे भिन्न है, वह सब भगवान् विष्णु से ही प्रकट हुआ है। उन देवाधिदेव सर्वव्यापक महात्मा विष्णु का मंदिर में स्थापन करके मनुष्य पुन:संसार में जन्म नहीं लेता (मुक्त हो जाता हैं)। जिस प्रकार विष्णु का मंदिर बनवाने में फल बताया गया हैं, उसी प्रकार अन्य देवताओं- शिव, ब्रह्मा, सूर्य, गणेश, दुर्गा और लक्ष्मी आदि का भी मंदिर बनवाने से होता है।।

मंदिर बनवाने से अधिक पुण्य देव प्रतिमा बनवाने (लगवाने) से होता है। देव-प्रतिमा की स्थापना-सम्बन्धी जो यज्ञ होता है, उसके फल का तो अंत ही नहीं है। कच्ची मिटटी की प्रतिमा से लकड़ी की प्रतिमा उत्तम होती है। उससे ईट की, उससे भी पत्थर की और उससे भी अधिक सुवर्ण आदि धातुओं की प्रतिमा का फल होता है। देवमंदिर का प्रारम्भ करने मात्र से सात जन्मों के किये हुए पाप का नाश हो जाता है।।

इतना ही नहीं मन्दिर बनवानेवाला मनुष्य स्वर्गलोक का अधिकारी होता है, वह कभी-भी नरक में नहीं जाता। इतना ही नहीं, वह मनुष्य अपनी सौ पीढ़ी का उद्धार करके उसे विष्णुलोक में पहुंचा देता है। यमराज ने अपने दूतों से देवमंदिर बनानेवालों को लक्ष्य करके ऐसा कहा था, यम बोले – (देवालय और) देव-प्रतिमा का निर्माण तथा उसकी पूजा आदि करनेवाले मनुष्यों को तुम लोग नरक में न ले आना।।

परन्तु जो लोग सम्पन्नता में रहते हुये भी देव-मन्दिर आदि नहीं बनवाते, उन्हें ख़ास तौर पर पकड़ लाना। जाओ! तुमलोग संसार में विचरो और न्यायपूर्वक मेरी आज्ञा का पालन करो। संसार के कोई भी प्राणी कभी तुम्हारी आज्ञा नहीं टाल सकेंगे। केवल उन लोगों को तुम छोड़ देना जो कि जगत्पिता भगवान् अनंत की शरण में जा चुके हैं। क्योंकि उन लोगों की स्थिति यहाँ (यमलोक में) नहीं होती।।

संसार में जहाँ भी भगवान् में चित्त लगायें हुए, भगवान् की ही शरण में पड़े हुए भगवद्भक्त महात्मा सदा भगवान् विष्णु की पूजा करते हों, उन्हें दूर से ही छोडकर तुम लोग चले जाना। जो स्थिर होते, सोते, चलते, उठते, गिरते, पड़ते या खड़े होते समय भगवान् श्रीकृष्ण का नाम-कीर्तन करते हैं, उनके दूर से ही निकल जाना। जो नित्य-नैमित्तिक कर्मों द्वारा भगवान् जनार्दन की पूजा करते हैं, उनकी ओर तुम लोग आँख उठाकर देखना भी नहीं।।

क्योंकि भगवान् का व्रत करनेवाले लोग भगवान् को ही प्राप्त होते हैं। जो लोग फुल, धूप, वस्त्र और अत्यंत प्रिय आभूषणों द्वारा भगवान् की पूजा करते हैं, उनका स्पर्श न करना; क्योंकि वे मनुष्य जीते जी भगवान् श्रीकृष्ण के धाम को पहुँच चुके होते हैं। जो भगवान् के मंदिर में लेप करते या बुहारी लगाते हैं, उनके पुत्रों को तथा उनके वंश को भी छोड़ देना।।

जिन्होंने भगवान् विष्णु का मंदिर बनवाया हो, उनके वंश में सौ पिढी तक के मनुष्यों की ओर तुम लोग बुरे भाव से न देखना। जो लकड़ी का पत्थर का अथवा मिटटी का ही देवालय भगवान् विष्णु के लिये बनवाता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। प्रतिदिन यज्ञों द्वारा भगवान् की आराधना करनेवाले को जो महान फल मिलता हैं, उसी फल को, जो भगवान विष्णु का मंदिर बनवाता है, वह भी प्राप्त करता है।।

जो भगवान अच्युत का मंदिर बनवाता है, वह अपनी बीती हुई सौ पीढ़ी के पितरों को तथा होनेवाले सौ पीढ़ी के वंशजों को भगवान् विष्णु के लोक को पहुँचा देता है। भगवान् विष्णु सप्तलोकमय हैं। उनका मंदिर जो बनवाता है, वह अपने कुल को तारता ही नहीं उन्हें अक्षय लोकों की प्राप्ति कराता हैं और स्वयं भी अक्षय लोकों को प्राप्त होता है।।

मंदिर में ईट के समूह का जोड़ जितने वर्षो तक रहता हैं, उतने ही हजार वर्षो तक उस मंदिर के बनवानेवाले की स्वर्गलोक में स्थिति होती है। भगवान् की प्रतिमा बनानेवाला विष्णुलोक को प्राप्त होता है। उसकी स्थापना करनेवाला भगवान् में लीन हो जाता है। और देवालय बनवाकर उसमें प्रतिमा की स्थापना करवाने वाला सदा भगवान् के लोक में निवास पाता है।।

।। सदा सत्संग करें । सदाचारी और शाकाहारी बनें । सभी जीवों की रक्षा करें ।।

नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्।।

।। नमों नारायण ।।

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