सर्वतीर्थमयी माता.. सर्वदेवमयो पिता।।

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Mata Pita Sarvashreshtha
Mata Pita Sarvashreshtha

सर्वतीर्थमयी माता.. सर्वदेवमयो पिता।। Mata Pita Sarvashreshtha.

जय श्रीमन्नारायण,

“सर्वतीर्थमयी माता… सर्वदेवमयो पिता”।।

मित्रों, एक बार भगवान शंकर के यहाँ उनके दोनों पुत्रों में होड़ लगी कि, कौन बड़ा? निर्णय लेने के लिए दोनों गये शिव-पार्वती के पास। शिव-पार्वती ने कहाः जो संपूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा करके पहले पहुँचेगा, उसी का बड़प्पन माना जाएगा।।

स्वामी कार्तिकेय तुरन्त अपने वाहन मयूर पर बैठकर निकल गये पृथ्वी की परिक्रमा करने के लिये। अब गणेश जी बेचारे सोंचने लगे, और चुपके-से एकांत में चले गये। थोड़ी देर शांत होकर उपाय खोजा तो झट से उन्हें उपाय मिल गया। जो निष्ठावान और कर्मयोगी होता हैं उन्हें अंतर्यामी परमात्मा सत्प्रेरणा देते हैं।।

अतः किसी कठिनाई के समय घबराना नहीं चाहिए। बल्कि भगवान का स्मरण करना चाहिए। थोड़ी देर शांत बैठना और चिन्तन-मनन करना चाहिए। इससे आपको जल्द ही किसी भी समस्या का समाधान मिल जाता है।।

फिर गजानन गणपति जी महाराज आये शिव-पार्वती के पास। माता-पिता का हाथ पकड़ कर दोनों को ऊँचे आसन पर बिठाया। पत्र-पुष्प से उनके श्रीचरणों की पूजा की और प्रदक्षिणा करने लगे। एक चक्कर पूरा हुआ तो प्रणाम किया…. दूसरा चक्कर लगाकर प्रणाम किया…. इस प्रकार माता-पिता की सात प्रदक्षिणा कर ली।।

शिव-पार्वती ने पूछाः वत्स। आज अचानक ये हमारी प्रदक्षिणाएँ तूं क्यों कर रहा है? गणपति गजानन महाराज को याद आया, कि सर्वतीर्थमयी माता… सर्वदेवमयो पिता। सारी पृथ्वी की प्रदक्षिणा करने से जो पुण्य होता है। वही पुण्य माता की प्रदक्षिणा करने से हो जाता है। यह शास्त्रवचन है। पिता का पूजन करने से सब देवताओं का पूजन हो जाता है।।

फिर क्या था, गणपति महाराज बोले – माता सभी तीर्थों के समान हैं और पिता देवस्वरूप होते हैं। अतः आप दोनों कि परिक्रमा करके मैंने संपूर्ण पृथ्वी की सात परिक्रमाएँ कर लीं हैं। महादेव और महादेवी गणेश जी कि इस बुद्धिमता से अत्यंत प्रशन्न हुए और तब से गणपति जी प्रथम पूज्य हो गये।।

मित्रों, जब माता-पिता के पूजन से गणेश जैसा बालक प्रथम पूज्य बन सकता है। तो क्या हम हमारे जीवन में हमारे माता पिता का पूजन करके अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकते? अवश्य ही कर सकते हैं।।

इसलिए हम सभी को अपने माता-पिता के प्रति श्रद्धा एवं त्याग की भावना पूर्वक, निष्ठा से उनकी सेवा करनी चाहिए। और अगर आप निस्वार्थ भाव से अपने माता-पिता का पूजन करते हैं, तो आपके जीवन में कोई भी ऐसा ड्रीम्स, कोई भी ऐसा सपना नहीं होगा जो पूरा ना हो। इसलिए श्रद्धा पूर्वक माता पिता की सेवा कीजिए फिर देखिए आपके सारे सपने सच हो जाएंगे और अवश्य ही होंगे इसमें कोई संशय नहीं है।।

आप सभी अपने मित्रों को फेसबुक पेज को लाइक करने और संत्संग से उनके विचारों को धर्म के प्रति श्रद्धावान बनाने का प्रयत्न अवश्य करें।।

नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्।।

।। नमों नारायण ।।

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भागवत प्रवक्ता- स्वामी धनञ्जय जी महाराज "श्रीवैष्णव" परम्परा को परम्परागत और निःस्वार्थ भाव से निरन्तर विस्तारित करने में लगे हैं। श्रीवेंकटेश स्वामी मन्दिर, दादरा एवं नगर हवेली (यूनियन टेरेटरी) सिलवासा में स्थायी रूप से रहते हैं। वैष्णव धर्म के विस्तारार्थ "स्वामी धनञ्जय प्रपन्न रामानुज वैष्णव दास" के श्रीमुख से श्रीमद्भागवत जी की कथा का श्रवण करने हेतु संपर्क कर सकते हैं।।

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  1. अति सुंदर लेख ऐसे ही कुछ अन्य माँ के लिए चुनिंदा सब्दों के लिए देखिये हमारी दी हुई लिंक पर Lines For Mother

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