मत्स्य अवतार का रहस्य।।

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Matsya Avatar Ka Rahasya
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मत्स्य अवतार का रहस्य।। Matsya Avatar Ka Rahasya.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, एक बार एक बहुत बड़े दैत्य ने वेदों को चुरा लिया। उस दैत्य का नाम हयग्रीव था। वेदों को चुरा ले गया इसके कारण ज्ञान लुप्त हो गया। चारों ओर अज्ञानता का अंधकार फैल गया और पाप तथा अधर्म का बोलबाला हो गया। तब भगवान विष्णु ने धर्म की रक्षा के लिए मत्स्य रूप धारण करके हयग्रीव का वध किया और वेदों की रक्षा की। भगवान ने मत्स्य का रूप किस प्रकार धारण किया।।

भगवान नारायण के दशावतार की कथा में सबसे प्रथम अवतार मत्स्य अवतार है। भगवान ने अपने इस स्वरुप से सत्यव्रत राजा को निमित्त बनाकर सृष्टि की रक्षा की थी। सत्यव्रत बड़े ही पुण्यात्मा एवं बड़े उदार हृदय के राजा थे। एक दिन प्रभात काल में जब सूर्योदय हो चुका था। राजा सत्यव्रत कृतमाला नदी में स्नान कर रहे थे। उन्होंने स्नान करने के पश्चात जब तर्पण के लिए अंजलि में जल लिया, तो अंजलि में जल के साथ एक छोटी-सी मछली भी आ गई।।

राजा सत्यव्रत ने मछली को नदी के जल में छोड़ दिया। परन्तु मछली बोली- राजन! जल के बड़े-बड़े जीव छोटे-छोटे जीवों को मारकर खा जाते हैं। अवश्य ही कोई बड़ा जीव मुझे भी मारकर खा जाएगा। अतः हे राजन! कृपा करके आप मेरे प्राणों की रक्षा कीजिए। राजा सत्यव्रत के हृदय में दया उमड़ पड़ी। उन्होंने मछली को जल से भरे हुए अपने कमंडलु में डाल लिया। तभी एक आश्चर्यजनक घटना घटी। एक रात में ही मछली का शरीर इतना बढ़ गया कि कमंडलु उसके रहने के लिए छोटा पड़ने लगा।।

दूसरे दिन मछली राजा से बोली- राजन! मेरे रहने के लिए कोई दूसरे स्थान की व्यवस्था कीजिये, क्योंकि मेरा शरीर बढ़ गया है। मुझे घूमने-फिरने में बड़ा कष्ट होता है। सत्यव्रत ने मछली को कमंडलु से निकालकर पानी से भरे हुए मटके में रख दिया। यहाँ भी मछली का शरीर रात भर में ही मटके में इतना बढ़ गया कि मटका भी उसके रहने कि लिए छोटा पड़ गया। दूसरे दिन मछली पुनः सत्यव्रत से बोली- राजन! मेरे रहने के लिए कहीं और प्रबंध कीजिए, क्योंकि मटका भी मेरे रहने के लिए छोटा पड़ रहा है।।

तब राजा सत्यव्रत ने मछली को निकालकर एक सरोवर में छोड़ दिया। किंतु सरोवर भी मछली के लिए छोटा पड़ गया। इसके बाद राजा ने मछली को नदी में और फिर उसके बाद समुद्र में डाल दिया। आश्चर्य! समुद्र में भी मछली का शरीर इतना अधिक बढ़ गया कि मछली के रहने के लिए वह छोटा पड़ गया। अतः मछली पुनः सत्यव्रत से बोली- राजन! यह समुद्र भी मेरे रहने के लिए उपयुक्त नहीं है। मेरे रहने की व्यवस्था कहीं और कीजिए।।

अब सत्यव्रत विस्मित हो उठा। उसने आज तक ऐसी मछली कभी नहीं देखी थी। वह विस्मय-भरे स्वर में बोला- मेरी बुद्धि को विस्मय के सागर में डुबो देने वाले आप कौन हैं? मत्स्य रूपधारी भगवान श्रीहरि ने उत्तर दिया- राजन! हयग्रीव नामक दैत्य ने वेदों को चुरा लिया है। जगत में चारों ओर अज्ञान और अधर्म का अंधकार फैला हुआ है। मैंने हयग्रीव को मारने के लिए ही मत्स्य का रूप धारण किया है।।

परन्तु हे राजन! मेरी बात ध्यान से सुनो। आज से सातवें दिन पृथ्वी प्रलय की गोद में समां जाएगी। समुद्र उमड़ उठेगा भयानक वृष्टि होगी। सारी पृथ्वी पानी में डूब जाएगी। जल के अतिरिक्त कहीं कुछ भी दृष्टिगोचर नहीं होगा। परन्तु आप घबराना नहीं आपके पास एक नाव पहुँचेगी। आप हर प्रकार के अनाजों और औषधियों के बीजों को लेकर सप्त ऋषियों के साथ नाव पर बैठ जाना। मैं उसी समय आपको पुनः दिखाई पड़ूँगा और आपको आत्मतत्त्व का ज्ञान भी प्रदान करूँगा।।

राजा सत्यव्रत उसी दिन से हरि का स्मरण करते हुए प्रलय की प्रतीक्षा करने लगे। सातवें दिन प्रलय का दृश्य उपस्थित हो उठा। समुद्र भी उमड़कर अपनी सीमाओं से बाहर बहने लगा। भयानक वृष्टि होने लगी। थोड़ी ही देर में सारी पृथ्वी पर जल ही जल हो गया। संपूर्ण पृथ्वी जल में समा गई। उसी समय एक नाव दिखाई पड़ी। राजा सत्यव्रत सप्त ऋषियों के साथ उस नाव पर बैठ गए। उन्होंने नाव के ऊपर संपूर्ण अनाजों और औषधियों के बीज भी रख लिए।।

नाव प्रलय के सागर में तैरने लगी। प्रलय के उस सागर में उस नाव के अतिरिक्त कहीं भी कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा था। सहसा मत्स्य रूपी भगवान प्रलय के सागर में दिखाई पड़े। राजा सत्यव्रत और सप्त ऋषि गण मत्स्य रूपी भगवान की प्रार्थना करने लगे। भगवान ने नाव को खीचते हुए राजा सत्यव्रत को आत्मतत्व का उपदेश करने लगे। स्वयं साक्षात् भगवान श्रीमन्नारायण से आत्मज्ञान पाकर सत्यव्रत का जीवन धन्य हो उठा। वे जीते जी ही जीवन मुक्त हो गए।।

प्रलय का प्रकोप शांत होने पर मत्स्य रूपधारी भगवान ने हयग्रीव को मारकर उससे वेद छीन लिए। भगवान ने ब्रह्माजी को पुनः वेद दे दिए। इस प्रकार भगवान ने मत्स्य रूप धारण करके वेदों का उद्धार तो किया ही, साथ ही संसार के प्राणियों का भी अमित कल्याण किया। अगर आप धर्मशास्त्रो के अनुसार जीवन को धारण करते हैं अंतिम में भगवान स्वयं उनका वरण करते हैं। उन्हें ढूंढने के लिये अन्यत्र कहीं जाना नहीं पड़ता है।।

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नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्।।

।। नमों नारायण ।।

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