स्त्रियों पर अत्याचार समाज का एक कोढ़ है।।

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Nari Atyachar Samaj Ka Kodha
Nari Atyachar Samaj Ka Kodha

स्त्रियों पर अत्याचार समाज का एक कोढ़ है।। Nari Atyachar Samaj Ka Kodha.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, संस्कृत का एक श्लोक है – यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता। अर्थात, जहाँ नारी का सम्मान किया जाता है। वहाँ देवता निवास करते हैं। बचपन से यह सुनते आ रहे हैं। इसी पर विश्वास किया है। धैर्य, बलिदान, ममता, वात्सल्य, त्याग, लज्जा, समर्पण, शील, माधुर्य, कोमलता और सौम्यता यही नारी के सुलभ गुण माने गये हैं। और हर आदर्श नारी को इन्हीं गुणों की कसौटी पर क़स कर परखा गया।।

अक्सर यही देखा जाता है, कि हर नारी में इसी प्रकार गुण पाए गए हैं। फिर भी समाज इनका अनादर करता है, क्यों? ऐसा नहीं होना चाहिए। और खासकर भारतीय समाज में तो बिलकुल नहीं। इस प्रकार का दोष अगर किसी समाज में है। तो यह समाज का कोढ़ है। और इसे मिटाना हमारी जिम्मेवारी होनी चाहिये। और इसे मिटाने का सरल उपाय सत्संग ही है। इसके अलावा और कोई उपाय हमें नजर नहीं आता।।

क्योंकि कोई अन्य उपाय कहीं सार्थक नजर नहीं आ रहा है। चाहे कितने भी सख्त से सख्त कानून बनाये जा रहें हैं। फिर भी, नारी पर होनेवाले अत्याचार कम होने के बजाय, बढ़ते ही जा रहा है। अत: सत्संग का जितना अधिक से अधिक आयोजन हो और सत्संग कर्ता जितना अधिक से अधिक इस विषय पर बोलें। यही इस दुर्धर्ष संकट से निपटने का उपाय है।।

सत्संग तो ऐसी चीज है की सामान्य मनुष्य को भी देवता बना देती है। देवता बनने के लिए जो गुण चाहिए वह किसी स्त्री अर्थात किसी माता के गर्भ से लेकर और उसके गोद में पलते हैं। इसलिए स्त्रियों का सुसंस्कृत होना और उन्हीं के माध्यम से उनके संतानों का संस्कारवान बनाना यही प्रकृति का नियम है। और वही आनेवाली हमारी सभी संताने ही इस आने वाले संसार में हमारी अगली पीढ़ियां स्त्रियों का सम्मान करना सीखेंगी।।

इसलिए सत्संग का अधिक से अधिक आयोजन अगर इस संसार में हो। और उस सत्संग को कराने वाला अगर स्वयं सुसंस्कृत हो। तथा संस्कारों का समुचित ज्ञान अगर समाज को प्रदान करें। तो निश्चित रूप से हमारा समाज सुसंस्कृत बनेगा। और इस सुसंस्कृत समाज में ही स्त्रियों के लिए सम्मान की उम्मीद की जा सकती है। अन्यथा अगर हम अपने आने वाली संतानों को सुसंस्कृत नहीं बना पाए। तो स्त्रियों के सम्मान के लिए हमें विचार करना पड़ेगा। क्योंकि अन्य कोई मार्ग है नहीं।।

।। सदा सत्संग करें । सदाचारी और शाकाहारी बनें । सभी जीवों की रक्षा करें ।।

नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्।।

।। नमों नारायण ।।

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भागवत प्रवक्ता- स्वामी धनञ्जय जी महाराज "श्रीवैष्णव" परम्परा को परम्परागत और निःस्वार्थ भाव से निरन्तर विस्तारित करने में लगे हैं। श्रीवेंकटेश स्वामी मन्दिर, दादरा एवं नगर हवेली (यूनियन टेरेटरी) सिलवासा में स्थायी रूप से रहते हैं। वैष्णव धर्म के विस्तारार्थ "स्वामी धनञ्जय प्रपन्न रामानुज वैष्णव दास" के श्रीमुख से श्रीमद्भागवत जी की कथा का श्रवण करने हेतु संपर्क कर सकते हैं।।

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