भगवान से सच्चे प्रेम का स्वरुप।।

0
672
Natural love for god
Natural love for god

भगवान से सच्चे प्रेम का स्वरुप।। Natural love for god.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, प्रेम ही सबसे बड़ा धन है इसमें कोई संसय नहीं है। प्रेम ही पञ्चम पुरुषार्थ है। और यही श्री कृष्ण के माधुर्य का आस्वादन करवाता है।।

“प्रीतम प्रीति ही ते पैये” सूरदास जी कहते हैं, कि प्रभु रीति से नहीं प्रीति से ही प्राप्त होते हैं। मुक्ति तो भगवान् किसी भी भाव से भक्ति करने वाले को दे ही देते हैं।।

परन्तु मित्रों, भक्ति किसी प्रेमी को ही देते हैं। परन्तु प्रेम के लक्षण क्या है? भागवत में लिखा है – वाग्गद्गदा द्रवते यस्य चित्तं रुदत्यभिक्ष्णम् हसति क्वचिच्च। विल्लज्ज उद्गायति नृत्यते वा मद्भक्तियुक्तो भुवनं पुनाति।।

अर्थात् = जब भगवान् के नाम, रूप, लीला का स्मरण होते ही आँखों से अश्रुपात तथा शरीर में रोमांच होने लगे। वाणी गदगद हो जाये, कंठ अवरुद्ध हो जाये तो उसे प्रेम की दशा समझनी चाहिए।।

मित्रों, ऐसी दशा पर रीझकर ही तो भगवान् अपने भक्तों को दर्शन देते हैं। ऐसा प्रेम जिसके बश में भगवान् भी हो जाते हैं। वह प्रेम केवल दो ही मार्ग से प्राप्त होता है।।

पहला सन्तों के संग से और दूसरा भगवत्कथा श्रवण से अर्थात सत्संग से। इसलिए मेरी समझ से जीवन में सन्त महापुरुषों की सेवा तथा निरंतर सत्संग श्रवण इन दोनों का आश्रय लेना चाहिए।।

नारद जी अपने भक्ति सूत्र नामक ग्रंथ में कहते हैं, कि “तत्सूखे सुखित्वं” अर्थात अपने प्रियतम के सुख में ही अपना सुख जानना चाहिए अथवा अनुभव करना चाहिए। अगर मेरा कन्हैया चाहता है, कि मैं रोता रहूं तो यही सही। क्योंकि मेरे रोने से आए जो तुमको हंसी तो हम रो रो के तुमको मनाया करें। हे प्रियतम! मैं नित्य प्रति रोता ही रहूं परंतु तुम खुश रहो तुम प्रसन्न रहो। तुम सदा ही वह मुस्कुराते रहो।।

अगर सच में आपकी भावनाएं यही है, यही चाहना है, यही इच्छा है तो समझो तुम ईश्वर से सच्चे प्रेम करते हो। अर्थात मेरे प्रियतम के सच्चे प्रेमी तुम हो। इसलिए भगवान की भक्ति में सर्वस्व न्योछावर करने की क्षमता यदि रखते हो तो भक्ति करो।।

अन्यथा सकाम भक्ति भी कम प्रभावी नहीं होती है। आप कामनाओं के सहित भगवान की भक्ति कर सकते हो। क्योंकि इससे आपका कुछ बिगड़ेगा नहीं। आप स्पष्ट रूप से कहो कि हे प्रभु! मुझे भोग चाहिए, मुझे विलास चाहिए, मुझे वैभव चाहिए।।

क्योंकि इसी के लिए ही सिर्फ मैं आपकी भक्ति करता हूं। क्योंकि मैं एक कामी हूं, क्रोधी हूं, लोभी हूं, सांसारिक मोह से ग्रस्त हूं। इसलिए हे प्रभु! आप मेरी कामनाओं को पूर्ण करो। क्योंकि मैं जैसा भी हूं बस तुम्हारा हूं।।

भले ही गीता के अनुसार यह भक्ति अधम श्रेणी में आती है। लेकिन फिर भी भक्ति तो है। और क्या पता इसी तरह की भक्ति करते करते शायद आपके जीवन में आपको उत्तम श्रेणी की भक्ति भी प्राप्त हो जाए।।

।। सदा सत्संग करें । सदाचारी और शाकाहारी बनें । सभी जीवों की रक्षा करें ।।

नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्।।

।। नमों नारायण ।।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here