गीता के कर्म से परमात्म प्राप्ति संभव।।

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Paramatm Prapti Sambhav
Paramatm Prapti Sambhav

गीता के कर्म से परमात्म प्राप्ति संभव।। Satkarm Se Paramatm Prapti Sambhav.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, महाभारत का युद्ध शुरू होने वाला था, दोनों तरफ सेनायें खड़ी थी। श्री कृष्ण भगवान ने अर्जुन के रथ को रणभूमि के मध्य में खड़ा किया और अर्जुन से युद्ध के लिए पांचजन्य का उदघोष करने के लिए कहा।।

अर्जुन ने दूर तक नजर पसार कर देखा, दोनों तरफ उसके परिजन एवं प्रजाजन ही खड़े थे। उसके पांचजन्य के उदघोष के साथ ही रणभूमि रक्त से नहाने लगती। चारों ओर अपनों को देखकर अर्जुन का आत्मविश्वास डगमगानें लगा। वह सोचने लगा, अपनों की बलि देकर राज्य प्राप्त करना कौन सी बहादुरी का कार्य है।।

वह असमंजस की स्थिति लिये गांडिव छोडकर बैठ गया। भगवान कृष्ण ने कहा, अर्जुन किस सोच में बैठ गये हो? अर्जुन ने कहा, आर्यश्रेष्ठ मेरे सामने मेरे अपने ही खड़े है, मैं उन पर कैसे जहर बुझे बाणों को चला सकता हूँ? यह मुझसे संभंव नही है।।

भगवान कृष्ण ने कहा, अर्जुन जिन्हें तुम अपने समझ रहे हो, वे तुम्हारे नहीं है। यदि तुम्हारे होते तो इस प्रकार का व्यवहार नहीं करते और तुम यहां खड़े नहीं होते। अर्जुन यह संसार एक माया है। यहां सब अपने कर्मो के अनुसार ही जन्म लेते है। और कर्मो के अनुसार ही सुख-दुख को अनुभव करते है।।

ये सब जो सामने खडे हैं, अधर्म की नीति को धारण कर अपने स्वयं के लिए लड़ रहे है। तुम धर्म की नीति को धारण कर मानवता के लिए लड़ रहे हो। तुम्हारा लड़ना श्रेष्ठता के लिए है, इनका लड़ना निकृष्ठता के लिए है। अर्जुन जब लड़ाई श्रेष्ठता के लिए होती है तो उसमें सबसे पहले अपने प्रिय ही आडे आते है। पहला युद्ध उन्हीं से होता है।।

परन्तु जब व्यक्ति अपनों से लड़कर सकुशल निकल जाता है, तो उसे धर्म की नीति पर चलने के लिए कोई नहीं रोक सकता। अर्जुन यह जीवन यों हताश होकर बैठ जाने के लिए नहीं है। उठो और कर्म करो फल की चिन्ता मत करो। तुम श्रेष्ठता के लिए कर्म कर रहे हो।।

अर्जुन ने भगवान के उपदेशानुसार सकारात्मक भाव के साथ गांडीव उठाया और आगे बढा तो बढता ही गया। उस समय महाभारत का युद्ध बाहर मैदान में था। आज महाभारत हर मानव के अन्दर चल रहा है। हम हर समय युद्ध करते रहते है, वैचारिक युद्ध। इस युद्ध का परिणाम भी आता है।।

हम हर बार थक हार कर बैठ जाते हैं। हमें अर्जुन की तरह मार्ग दिखाने वाले भगवान भी है, पर हम उनकी आवाज सुनते ही नहीं। हम सोच बैठते हैं, कि यह मार्ग जो श्रेष्ठता का बताया जाता है, बहुत कठिन है। निकृष्ठता का मार्ग सहज और सुगम लगता है।।

हम अविश्वास के भावों को जल्दी ग्रहण करते है, विश्वास के भावों को नहीं। कारण कि हमारें चारों ओर का वातावरण ही अविश्वास से भरा हुआ है। जहां नीति पूर्ण कार्य नहीं, अनीति पूर्ण कार्य ज्यादा हो रहे हैं। हम भी उन कार्यो को करने में संलग्न है।।

हालांकि हमारे अन्दर बैठा भगवान हमें हर समय सचेत करता है, कि नीति पूर्ण कार्य एवं धर्म आधारित कर्त्तव्य करें। यही श्रेष्ठता की ओर ले जाते है। धर्म की जड़ हमेशा हरी होती है, यह जानकर भी हम इस ओर कदम नहीं उठाते। यदि किसी के कहने सुनने से उठकर चल भी पड़ते है, तो ज्यादा नहीं चल पाते, थककर बैठ जाते है! और पुनः उसी वातावरण में लौटने लगते है।।

जिन कामों से हम अपने पूरे जीवन को श्रेष्ठ बना सकते है, उसके अनुरूप कार्य नहीं कर पाते। यही कारण है, कि हम श्रेष्ठता के लिए उठते हैं और कुछ करने से पहले ही बैठ जाते हैं। जबकि सर्वशक्तिमान परमात्मा हमारा हाथ पकड़कर चलने के लिए तैयार है।।

वे अर्जुन को दिशा देते है, तो हमें भी उठकर चलने को कहते है, कि एक बार पूर्ण आत्मविश्वास और दृढ़ संकल्प शक्ति से उठो और चलो। फिर देखो, चारों ओर का वातावरण तुम्हारे मनोनुकुल होगा। भगवान कहते है, जो परिस्थितियों से डर गया, वह मंजिल नहीं पा सकता।।

सोना आग में जलकर ही कुन्दन बनता है, अपनी चमक ज्यादा बिखेरता है। उसी प्रकार जो मनुष्य प्रतिकूल वातावरण में भी अपने श्रेष्ठ निर्णयानुसार चलता रहता है, वही श्रेष्ठ बनता है। हमें समाज में सब कुछ करते हुए ही श्रेष्ठता को धारण करना है, और अपने अन्दर के युद्ध को जीतना है।।

हमारे चारों ओर अनीति के योद्धा खड़े है, वे आगे बढ़ने से रोकते है, ये अनीति के योद्धा भावात्मक हैं। जब हम बुरे एवं तुच्छ भावों को नजदीक ही नहीं आने देंगे, तो मन दिमाग में सजगता का पहरा होगा। सजगता कहने सुनने के प्रति, सजगता काम के प्रति, सजगता अपने पराये के प्रति, सजगता छोटे बड़े के प्रति, रहने से धर्म नीति पूर्ण कर्म के प्रति निष्ठा बढती है।।

कर्मठता की निष्ठा भगवान कृष्ण का उपदेश है जो महाभारत के समय अर्जुन को दिया गया था। श्रेष्ठता के लिए लड़ो, चाहे वह अन्दर हो या बाहर हो। यही श्रेष्ठता सत्यता के नजदीक ले जाती है। सत्य ही भगवान है, शेष सब माया है। हमें संतों, ब्राह्मणों और शास्त्रों के उपदेशो का कर्मठता के साथ पालन करना चाहिये। निश्चय ही हम अर्जुन की तरह युद्ध जीतने में सफल होगें।।

नारायण सभी का नित्य कल्याण करें। सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें।।

 
जय जय श्री राधे ।।
जय श्रीमन्नारायण ।।

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