प्यार के रिश्ते आखिर टूटते क्यों हैं।।

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Pyar Ke Riste Tutate Kyon Hai
Pyar Ke Riste Tutate Kyon Hai

प्यार के रिश्ते आखिर टूटते क्यों हैं।। Pyar Ke Riste Tutate Kyon Hai.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, नारद भक्तिसूत्र में नारद जी ने प्रेम की व्याख्या अपने तरीके से की है। जो आज भी पूर्णतः प्रैक्टिकल है। “तत्सुखे सुखित्वं” अर्थात दोनों एक दुसरे के सुख में त्याग की भावना रखें। एक पुरुष और स्त्री अक्सर यही सोचकर विवाह के बंधन में बंधते हैं, कि एक दूसरे के प्रति उनकी भावनाएं कभी नहीं बदलेंगी। लेकिन समय के साथ हम बदलते हैं और हमारे संबंध भी। समय के साथ बदलने वाले संबंध स्थिर हो ही नहीं सकते।।

परन्तु समय के बदलाव में भी संबंधों को मधुर बनाये रखना सीखना चाहिये। क्योंकि बदलाव को समझने पर ही हम रिश्तों को बनाए रख पायेंगे। अगर यह समझ नहीं आती है तो रिश्ते बिखर ही जाते हैं। विवाह केवल दो लोगों के साथ जीवन गुजारने की सार्वजनिक सूचना मात्र नहीं होती। वह तो दो लोगों के एक मधुर बंधन में बंधने का नाम होता है। ऐसे बंधन में जो समय के साथ परिपक्व होता रहे।।

साथ ही वह एकतरफा नहीं होता अपितु पति और पत्नी दोनों से ही परिपक्व होने की मांग भी करता है। आज वैवाहिक बंधन की उम्र कम हो रही है और तलाक के बहुत मामले सामने आ रहे हैं, तो इसके पीछे कुछ बहुत ठोस कारण हैं। अक्सर युवा इस सोच के साथ विवाह करते हैं, कि उनके साथी के प्रति उनकी भावनाएं कभी भी नहीं बदलेंगी। लेकिन संबंधों में समय के साथ बदलाव आता ही है और प्रेम की भावनाएं भी समय के साथ एक जैसी नहीं रह जातीं।।

जिस तरह समय के साथ व्यक्तित्व में बदलाव आता है। वैसे ही हमारी इच्छाएं भी बदलती हैं। हम एक दूसरे के प्रति प्रेम की अभिव्यक्ति में भी बदलाव पाते ही हैं। हर वैवाहिक जीवन में आपसी झगड़े होते हैं। महत्वपूर्ण यह नहीं है, कि इस झगड़े का उन पर क्या असर होता है। बल्कि महत्व इसका है, कि आपसी झगड़े से वे क्या सीखते हैं। एक दूसरे से अलगाव उन्हें किस तरह परिपक्व बनाता है। विवाह तरक्की या आगे बढ़ने की संभावना मात्र नहीं है। बल्कि वह आगे बढ़ने की जरूरत भी आपके सामने रखता है।।

हमारी संवेदनायें भी हमें बेहतर बनाती है।। Our feelings also make us better.

जब हम पहली बार किसी पर मुग्ध होते हैं तो हम उसकी सुंदरता पर ही मुग्ध होते हैं। उस समय हमारा आकर्षण तो बस हमारी सुंदरता ही होती है। इसमें हम इतना खोए रहते हैं, कि हम उस व्यक्ति में उन्हीं चीजों को देखते हैं जो सकारात्मक हैं। हमारा ध्यान उन बातों पर नहीं जाता जिन्हें हम पसंद नहीं करते हैं। प्रेम इसी तरह एक अच्छा और बेहतर इंसान बनने में हमारी मदद करता है। क्योंकि तब हम दूसरे के सकारात्मक पक्ष पर ही नजर रखते हैं। यह सकारात्मकता ही हमें अधिक करुण, दयालु, प्रशंसक और दूसरों के प्रति संवेदनशील बनाती है।।

किसी भी संबध या विवाह की शुरुआत में हम सोचते हैं, कि हमारा साथी अच्छा है। इसलिए हम अच्छा महसूस करते हैं। यह सच नहीं होता। हम अच्छा इसलिए महसूस करते हैं, क्योंकि हम अपने साथी की अच्छाइयों पर ही ध्यान देते हैं। उन बातों पर ध्यान देते हैं जो हमें अच्छा महसूस करने में मदद करती हैं। तब हम सकारात्मक तरीके से चीजों को देखते हैं और अभिभूत रहते हैं।।

प्रेम कम होने का कारण नकारात्मकता ही है।। Negativity is the reason for falling in love.

यह हम मनुष्यों का स्वभाव है, कि जैसे-जैसे समय बीतता है जिस साथी पर हम बहुत ज्यादा ध्यान दे रहे थे उससे हमारा ध्यान हटने लगता है। और अपने जीवन की छोटी-छोटी चीजों की तरफ जाने लगता है। यह भी मानव स्वभाव ही कहा जाएगा, कि नकारात्मक चीजें हमारा ध्यान ज्यादा खींचती हैं। यही कारण है, कि हमारा ध्यान अपने साथी की सकारात्मक बातों से हटकर उन चीजों की ओर जाता है जिन्हें हम पसंद नहीं करते हैं।।

प्रेम की पवित्र और सकारात्मक उर्जा पर नकारात्मकता हावी होने लगती है। यही नकारात्मकता कारण बनती है, जिससे आपसी प्रेम कम होने लगता है। इसका हमारे साथी से सीधा संबंध नहीं है। प्रेम में कमी आना यह बताता है, कि हमारा ध्यान नकारात्मक दिशा में जा रहा है। जब हम सकारात्मकता से नकारात्मकता की ओर एकाग्र होने लगते हैं तो प्रेम की भावुक तीव्रता कम होने लगती है।।

जैसे ही प्रेम की तीव्रता कम होने लगती है, एक दूसरे का खयाल, करुणा, संवेदना भी कमतर लगने लगती है। इसी का परिणाम होता है, कि हम खुद को एक अच्छे इंसान की तरह नहीं पाते। हम अंतरंग क्षणों में प्रेम को नहीं जी पाते। कुछ खालीपन अपने भीतर महसूस होने लगता है। किसी संबंध में जब दोनों ही साथी इस तरह से महसूस करते हैं तब हमारा पवित्र संबंध टूटने की कगार पर पहुंच जाता है।।

समय के साथ बदलने लगता है हमारा प्रेम।। Samay Ke Sath Badalata Hai Prem.

मित्रों, दरअसल जब हम प्रेम में होते हैं तो उसे जीवनभर की सुनिश्चितता मानने लगते हैं। हम यह मान लेते हैं, कि चीजें वैसी ही रहेंगी जैसी हम चाहते हैं। इसलिए हम यह विचारने लगते हैं, कि यह हमारी जीवन भर की प्रसन्नता की गारंटी है। इस तरह के भ्रम के कारण ही हम अपनी अप्रसन्नता के लिए दूसरे को दोष देने लगते हैं। और संबंध बिखरने लगता है। जीवन भर का साथ निभाने वाले दोनों प्राणियों को लगता है, कि वे पैसे, रिश्ते, अन्य लोगों या किसी भी और कारण की वजह से एक दूसरे से लड़ रहे हैं।।

लेकिन असल में लड़ाई की वजह है, हमारे भीतर की अच्छाईयों का न्यूनतम स्थितियों तक पहुँच जाना। हम यह चाहते हैं, कि हमारा साथी हमेशा वैसा ही रहे जैसा हम चाहते हैं। लेकिन हमारा साथी कभी हमारे अनुकूल हमें नजर ही नहीं आता है। वह तो हमारे अपने ही भीतर की करुणा और संवेदनशीलता बेहतर बनने में हमारी मदद करती है। हम अपने प्रति अच्छा महसूस करना चाहते हैं तो हमें अपनी संवेदनशीलता को बढ़ाने की जरूरत है।।

जब हम पहले की तरह एक दूसरे के प्रति पेश आने लगेंगे तन हम उसमें अच्छाइयां दिखने ही लगेंगी। जब भी आप अपने संबंध में पहले की तरह पेश आने लगेंगे या अपनी उसी संवेदनशीलता को जीने लगेंगे। तब आपको अपने संबंधों में प्रेम नजर आने लगेगा। तब अचानक सबकुछ बदला हुआ नजर आने लगेगा। जब अपने आनंद में रहेंगे तो नजदीकी लोगों को भी उसका लाभ दे पायेंगे। तब सबसे पहला लाभ तो आपके जीवनसाथी को ही मिलेगा।।

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नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्।।

।। नमों नारायण ।।

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