दंडवत प्रणाम क्यों करना चाहिए?

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Sanshtang Pranam Ke Labh
Sanshtang Pranam Ke Labh

साष्टांग दंडवत प्रणाम का लाभ एवं साष्टांग क्यों करना चाहिए? Sanshtang Pranam Ke Labh.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, दंडवत प्रणाम भारत में ऎसी परंपरा है, जिसमें अभिवादन की पराकाष्ठा है। यदि इस मानव शरीर से किसी व्यक्ति, मूर्ति या देवता का अभिवादन या उसके प्रति श्रद्धा का अर्पण पूर्ण मनोयोग से किया जाए, तो उसकी मुद्रा दंडवत प्रणाम ही हो सकती है। शास्त्रों में दंडवत प्रणाम को “साष्टांग प्रणाम” भी कहा जाता है। प्राचीनकाल में “दंड” सीधे बाँस को कहा जाता था। और जब इस बाँस को भूमि पर समतल रख दिया जाए, तो वह मुद्रा “दण्डवत” हो जाती है।।

जब शरीर को इसी अवस्था में मुंह के बल भूमि पर लिटा दिया जाए, तो इसे दंडवत प्रणाम कहते हैं। शरीर की इस मुद्रा में शरीर के छ: अंगों का भूमि से सीधा स्पर्श होता है। अर्थात् शरीर में स्थित छ: महामर्मो का स्पर्श भूमि से हो जाता है। जिन्हें वास्तुशास्त्र में “षण्महांति” या “छ:महामर्म” स्थान माना जाता है। ये अंग वास्तुपुरूष के महामर्म इसलिए कहे जाते हैं, क्योंकि ये शरीर (प्लॉट) के अतिसंवेदनशील अंग होते हैं।।

योगशास्त्र में इन्हीं छ: अंगों में षड्चकों को लिया जाता है। षड्चक्रों का भूमि से स्पर्श होना इन चक्रौं की सक्रियता और समन्वित एकाग्रता को इंगित करता है। एक साथ संपूर्ण शरीर के षड्चक्रों का स्पर्श होना, संपूर्ण एकाग्रता, पूर्ण समर्पण और पूर्ण श्रद्धा का प्रमाण है। दंडवत प्रणाम में व्यक्ति सब कुछ भूलकर केवल अपने श्रद्धेय के प्रति समर्पित हो जाता है। दंडवत प्रणाम की मुद्रा में व्यक्ति सभी इंद्रियों (पाँच ज्ञानेंद्रियाँ और पाँचों कर्मेद्रियाँ) को कछुए की भाँति समेटकर अपने श्रद्धेय को समर्पित होता है।।

उसे ऎसा आभास होता है, कि अब आत्म निवेदन और मौन श्रद्धा के अतिरिक्त उसे कुछ नहीं करना। इसके विपरीत श्रद्धेय जब अपने प्रेय (दंडवत प्रणाम करने वाला) को दंडवत मुद्रा में देखता है, तो स्वत: ही उसके मनोविकार या किसी भी प्रकार की दूषित मानसिकता धुल जाती है। और उसके पास रह जाता है, केवल त्याग, बलिदान या अर्पण। वह अपने प्रियपात्र के हित में सब कुछ लुटाने को लालायित हो उठता है।।

सब कुछ देने को तैयार हो जाता है। उसकी रक्षा के लिए कुछ भी बलिदान या त्याग करने को तैयार हो जाता है। यहाँ पर श्रेय और प्रेय दोनों ही पराकाष्ठा का समन्वय दंडवत प्रणाम के माध्यम से किया गया है। अभिवादन की “दंडवत प्रणाम” मुद्रा में व्यक्ति के पूर्ण समर्पण भाव से मांगने और पूर्ण उदार भाव से देने की प्रक्रिया को व्यावहारिक बनाया गया है।।

दंडवत प्रणाम की मुद्रा की तुलना हम मगरमच्छ की उस मुद्रा से कर सकते हैं। जब वह जल से बाहर निकलकर दंडवत प्रणाम की मुद्रा में भूमि पर लेट जाता है। और अधिकतम सूर्य किरणों का अवशोषण निश्चल, निर्बाध, निर्विकार और स्थिर मुद्रा में रहकर करता है। यहाँ तक कि अपनी साँसों की गति भी अत्यंत धीमी कर लेता है। और दंडवत की इस मुद्रा में वह सूर्य भगवान की रश्मियों से इतनी अधिक ऊर्जा प्राप्त कर लेता है, कि अपने शरीर से कई गुणा विशाल हाथी, भैंसे, शेर जैसे जीवों को भी दबोच लेता है।।

इतनी ऊर्जा मगरमच्छ को दंडवत प्रणाम मुद्रा में एकाग्र होकर सूर्य रश्मियों के निर्बाध सेवन से ही मिल पाती है। इस दृष्टांत से हम आसानी से समझ सकते हैं, कि दंडवत प्रणाम की मुद्रा में हम भी निर्विकार, निश्चल, निर्बाध, निर्विचार केवल श्रद्धेय की ऊर्जा शक्ति का स्वयं में आरोहण या प्रवेश करा रहे होते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं, कि दंडवत प्रणाम करने के उपरांत व्यक्ति कई गुणी शक्ति और ऊर्जा से परिपूर्ण होकर उठता है।।

कई मंदिरों, तीर्थो या उपासना स्थलों पर दंडवत परिक्रमा करने की परंपराएँ बनाई गई हैं। उनके पीछे भी यही वैज्ञानिकता है। व्यक्ति निर्विकार भाव से वहां व्याप्त सकारात्मक विद्युत-चुबंकीय शक्ति को तेजी से आत्म-सात् करे। उसमें संघर्ष करने, सहने तथा उत्साहित होकर कार्य करने की क्षमता विकसित हो पाये। अभिवादन की परंपराओं के अंतर्गत “दण्डवत प्रणाम” की मुद्रा सर्वोत्कृष्ट श्रेणी की श्रद्धा मानी जाती है।।

संतजन, योगीजन इसे सहर्ष स्वीकार कर तत्काल वरदान देने की मानसिकता में आ जाते हैं। प्रसंगवश यह उल्लेख करना भी समीचीन होगा, कि यदि कोई शिष्य अपने गुरू के समक्ष चरण स्पर्श या दंडवत प्रणाम नहीं करता है। तब उसमें से विवेक शक्ति का ह्रास होने लगता है। अर्थात् जिनमें देने की शक्ति होती है, उनमें अपने संकल्प के बल पर लेने की शक्ति भी स्वत: विद्यमान रहती है। जो अनायास है, प्रतिकूल कार्य करने को विवश हो जाती है।।

इस लेख के माध्यम से हम अपने मित्रों तक केवल नमस्कार, चरण स्पर्श और दंडवत प्रणाम की सारगर्भित वैज्ञानिकता एवं सामाजिक अनिवार्यता पर ही प्रकाश डाल रहे हैं। गुरू चरण सेवा, गुरू चरण स्पर्श, गुरू चरण पूजा, गुरू चरण वंदन, गुरू चरण स्तवन आदि अलग विषय हैं। जिनमें गुरू की रहस्यात्मक शक्तियों का शिष्य में सन्निपात होने के रहस्यों का उद्घाटन किया जाता है। नमस्कार, चरण स्पर्श और दंडवत प्रणाम की इस शास्त्रोक्त मींमासा में हमारा निवेदन है, कि उत्तरोत्तर अधिक उर्जावान बनने के लिए, क्रमश: नमस्कार, चरण स्पर्श और दंडवत प्रणाम की मुद्राएँ हम परंपरा स्वरूप ग्रहण एवं प्रयुक्त करते रहें।।

नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

।। सदा सत्संग करें । सदाचारी और शाकाहारी बनें । सभी जीवों की रक्षा करें ।।

नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्।।

।। नमों नारायण ।।

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