संतों के मिलते ही भगवान मिल जाते हैं।।

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Sant Mahima
Sant Mahima

संतों के मिलते ही भगवान मिल जाते हैं।। Sant Mahima.

जय श्रीमन्नारायण,

“संत मिलन को जाईये तजि ममता अभिमान। ज्यों-ज्यों पग आगे बढ़े, कोटिन्ह यज्ञ समान। सन्तों की महिमा अनंतानंत है। जिसका गान सहस्रों मुख वाले शेषजी भी नहीं कर सकते। स्वयं शारदा, महेश, गणेश भी सन्तों की महिमा का गान करने में अपने-आप को असमर्थ पाते हैं। एक बार की बात है, कि एक जंगल में एक महात्मा जी अपनी एक कुटिया बनाकर उसमें रहते थे। एक शिकारी जब भी वहाँ से निकलता संत को प्रणाम ज़रूर करता था।।

एक दिन वह शिकारी संत से बोला की बाबा मैं तो शिकार करने जंगल में भटकता हूँ। परन्तु आपको भी मैं प्रतिदिन देखता हूँ। आप यहाँ किसका शिकार करने की ताक में बैठे रहते हैं? संत ने सोंचा बड़ा भोला है, सो कहा कि मैं यहाँ मेरे गोपाल को ढूंढने आया हूँ। उसी की ताक में नजरें गड़ाये बैठा रहता हूँ। ऐसा कहते ही महात्मा फूट फूट कर रोने लगे। इस दृश्य को देखकर शिकारी बोला बाबा रोते क्यों हो?।।

बाबा मुझे बताओ वो दिखता कैसा है? मैं पकड़ के लाऊंगा उसको। सरल हृदय महात्मा ने भगवान के उस मनोहारी स्वरुप वर्णन कर दिया। बाबा ने बताया वो सांवला सलोना है। मोर पंख लगाता है। बांसुरी बजाता है। शिकारी बोला – बाबा! अब मैं जबतक आपका शिकार पकड़ के ले नहीं आता पानी तक नहीं पियूँगा। फिर वो एक जगह पर जाल बिछा कर बैठ गया।।

मित्रों, उस शिकारी को प्रतीक्षा करते हुए 3 दिन बीत गए। परम दयालू ठाकुर को दया आ गयी। मेरा गोपाल भला दूर कहाँ है? बांसुरी बजाते आ गया और खुद ही जाल में फंस गया। किरात तो मेरे ठाकुर की त्रिभुवन मोहिनी छवि के जाल में खुद ही फंस गया। एक टक श्यामसुंदर को निहारते हुए अश्रु बहाने लगा। जब उसे चेतना आयी तो बाबा का स्मरण आया और जोर जोर से चिल्लाने लगा बाबा! आपका शिकार मिल गया, शिकार मिल गया, शिकार मिल गया।।

बेचारे शिकारी को क्या पता की वो बोल क्या रहा है? परन्तु ठाकुरजी की ओर देख कर बोला! अच्छा बच्चु तीन दिन भूखा प्यासा रखा। और अब मिले भी हो तो मुझ पर जादू कर रहे हो। मेरे शयाम सुंदर उस शिकारी के भोलेपन पर रीझे जा रहे थे। मंद मंद मुस्कान लिए उसे देखे जा रहे थे। शिकारी कन्हैया को शिकार की भांति अपने कंधे पे डाल कर महात्मा जी के पास ले आया।।

बोला बाबा! आपका शिकार ले आया हुँ। बाबा ने जब ये दृश्य देखा तो क्या देखते हैं। किरात के कंधे पे मेरे गोपाल बंधे पड़े हैं। और जाल में से मुस्कुरा रहे हैं। महात्मा जी के तो होश ही उड़ गए। और बाबा उस शिकारी के चरणों में गिर पड़े। फिर ठाकुर की ओर देखते हुए कातर वाणी में बोले – हे नाथ! मैंने बचपन से अब तक इतने प्रयत्न किये आप को अपना बनाने के लिए घर बार छोडा इतना भजन किया आप नही मिले और इसे 3 दिन में ही मिल गए।।

भगवान बोले – इसका तुम्हारे प्रति निश्छल प्रेम व कहे हुए वचनों पर इसके दृढ़ विश्वास से मैं रीझ गया। और मुझसे इसके समीप आये बिना रहा नहीं गया। भगवान तो भक्तों एवं सच्चे सन्तों के ही अधीन होते हैं। भागवत में उद्धवजी से स्वयं भगवान ने कहा है – अहं भक्त पराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज। मैं अपने भक्तों के वश में रहता हूँ, मेरे उपर मेरी कोई स्वतंत्रता नहीं है ब्रह्मन्।।

जिन पर संतों की कृपा दृष्टि हो जाय मेरे ठाकुर उसे तत्काल अपनी सुखद शरण प्रदान कर देते हैं। बेचारा शिकारी तो जानता भी नहीं था की भगवान कौन हैं। परन्तु महात्मा जी को प्रतिदिन प्रणाम अवश्य करता था। संत प्रणाम और दर्शन का फल ये है, कि तीन दिन में ही ठाकुर मिल गए। यह होता है, संत की संगति का परिणाम। इसलिए “संत मिलन को जाईये तजि ममता अभिमान, ज्यो ज्यो पग आगे बढे कोटिन्ह यज्ञ समान”।।

नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

।। सदा सत्संग करें । सदाचारी और शाकाहारी बनें । सभी जीवों की रक्षा करें ।।

नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्।।

।। नमों नारायण ।।

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