सत्संग ऐसे जीवन बदलता है।।

0
453
Satsang Se Jivan Badal Jata Hai
Satsang Se Jivan Badal Jata Hai

सत्संग ऐसे जीवन बदलता है।। Satsang Se Jivan Badal Jata Hai.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, किसी नगर में एक बूढ़ा चोर रहता था। सोलह वर्षीय उसका एक लड़का भी था। चोर जब ज्यादा बूढ़ा हो गया तो अपने बेटे को चोरी की विद्या सिखाने लगा। कुछ ही दिनों में वह लड़का चोरी विद्या में प्रवीण हो गया। दोनों बाप बेटा चोरी करते और आराम से जीवन व्यतीत करने लगे।।

एक दिन चोर ने अपने बेटे से कहा- देखो बेटा, साधु-संतों की बात कभी नहीं सुननी चाहिए। अगर कहीं कोई महात्मा उपदेश देता हो तो अपने कानों में उंगली डालकर वहां से भाग जाना, समझे। बेटे ने कहा- हां बापू, समझ गया। एक दिन लड़के ने सोचा, क्यों न आज राजा के घर पर ही हाथ साफ कर लूँ। ऐसा सोचकर उधर ही चल पड़ा।।

थोड़ी दूर जाने के बाद उसने देखा कि रास्ते में बगल में कुछ लोग एकत्र होकर खड़े हैं। उसने एक आते हुए व्यक्ति से पूछा, उस स्थान पर इतने लोग क्यों एकत्र हुए हैं? उस आदमी ने उत्तर दिया- वहां एक महात्मा उपदेश दे रहे हैं। यह सुनकर उसका माथा ठनका। इसका उपदेश नहीं सुनूंगा। ऐसा सोचकर अपने कानों में उंगली डालकर वह वहां से भागने लगा।।

जैसे ही वह भीड़ के निकट पहुंचा एक पत्थर से ठोकर लगी और वह गिर गया। उस समय महात्मा जी कह रहे थे। “कभी झूठ नहीं बोलना चाहिए। जिसका नमक खाएं उसका कभी बुरा नहीं सोचना चाहिए। ऐसा करने वाले को भगवान सदा सुखी बनाए रखते हैं।” ये दो बातें उसके कान में पड़ीं। वह झटपट उठा और कान बंद कर राजा के महल की ओर चल दिया।।

वहां पहुंचकर जैसे ही अंदर जाना चाहा कि उसे वहां बैठे पहरेदार ने टोका। अरे भाई कहां जा रहे हो? तथा तुम कौन हो? उसे महात्मा का उपदेश याद आया। “झूठ नहीं बोलना चाहिए।” चोर ने सोचा, आज सच ही बोल कर देखें। उसने उत्तर दिया- “मैं चोर हूं, चोरी करने जा रहा हूं। पहरेदार बोला- अच्छा जाओ। उसने सोचा राजमहल का नौकर होगा! मजाक कर रहा है।।

चोर सच बोलकर राजमहल में प्रवेश कर गया। एक कमरे में घुसा। वहां ढेर सारा पैसा तथा जेवर देख उसका मन खुशी से भर गया। एक थैले में सब धन भर लिया और दूसरे कमरे में घुसा। वहां रसोई घर था। अनेक प्रकार का भोजन वहां रखा था। वह खाना खाने लगा। खाना खाने के बाद वह थैला उठाकर चलने लगा कि तभी फिर महात्मा का उपदेश याद आया, ‘जिसका नमक खाओ, उसका बुरा मत सोचो।।

उसने अपने मन में कहा, खाना खाया उसमें नमक भी था। इसका बुरा नहीं सोचना चाहिए। इतना सोचकर, थैला वहीं रख वह वापस चल पड़ा। पहरेदार ने फिर पूछा- क्या हुआ, चोरी क्यों नहीं की? देखिए जिसका नमक खाया है, उसका बुरा नहीं सोचना चाहिए। मैंने राजा का नमक खाया है, इसलिए चोरी का माल नहीं लाया। वहीं रसोई घर में छोड़ आया। इतना कहकर वह वहां से चल पड़ा।।

उधर रसोइये ने शोर मचाया- पकड़ो, पकड़ों चोर भागा जा रहा है। पहरेदार ने चोर को पकड़कर दरबार में उपस्थित किया। राजा के पूछने पर उसने बताया कि एक महात्मा के द्धारा दिए गए उपदेश के मुताबिक मैंने पहरेदार के पूछने पर अपने को चोर बताया क्योंकि मैं चोरी करने आया था।।

राजन! मैंने आपका धन भी चुराया और आपका खाना भी खाया। जिसमें आपका नमक मिला हुआ था। इसीलिए आपके प्रति बुरा व्यवहार नहीं किया और धन छोड़कर जा रहा था। उसके उत्तर पर राजा बहुत खुश हुआ और उसे अपने दरबार में नौकरी दे दी। वह दो-चार दिन घर नहीं गया तो उसके बाप को चिंता हुई कि लगता है, बेटा राजा के यहाँ पकड़ा गया।।

लेकिन चार दिन के बाद लड़का आया तो बाप अचंभित रह गया। अपने बेटे को अच्छे वस्त्रों में देखकर। लड़का बोला- बापू, आप तो कहते थे कि किसी साधु संत की बात मत सुनो। लेकिन मैंने एक महात्मा के दो शब्द सुने और उसी के मुताबिक काम किया तो देखिए सच्चाई का फल। सच्चे संत की वाणी से अमृत बरसता है, आवश्यकता है तो सिर्फ आचरण में उतारने की है।।

आप सभी अपने मित्रों को फेसबुक पेज को लाइक करने और संत्संग से उनके विचारों को धर्म के प्रति श्रद्धावान बनाने का प्रयत्न अवश्य करें।।

नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्।।

।। नमों नारायण ।।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here