अथ श्रीरघुनाथ अष्टकम्।।

0
815
Shri Raghunath Ashtakam
Shri Raghunath Ashtakam

अथ श्रीरघुनाथ अष्टकम् ।। Shri Raghunath Ashtakam.

श्रीरघुनाथाष्टकम्।।

शुनासीराधीशैरवनितलज्ञप्तीडितगुणं,
प्रकृत्याऽजं जातं तपनकुलचण्डांशुमपरम्।
सिते वृद्धिं ताराधिपतिमिव यन्तं निजगृहे,
ससीतं सानन्दं प्रणत रघुनाथं सुरनुतम्॥१॥

निहन्तारं शैवं धनुरिव इवेक्षुं नृपगणे,
पथि ज्याकृष्टेन प्रबलभृगुवर्यस्य शमनम्।
विहारं गार्हस्थ्यं तदनु भजमानं सुविमलं,
ससीतं सानन्दं प्रणत रघुनाथं सुरनुतम्॥२॥

#Shri Raghunath Ashtakam
गुरोराज्ञां नीत्वा वनमनुगतं दारसहितं,
ससौमित्रिं त्यक्त्वेप्सितमपि सुराणां नृपसुखम्।
विरुपाद्राक्षस्याः प्रियविरहसन्तापमनसं,
ससीतं सानन्दं प्रणत रघुनाथं सुरनुतम्॥३॥

विराधं स्वर्नीत्वा तदनु च कबन्धं सुररिपुं,
गतं पम्पातीरे पवनसुतसम्मेलनसुखम्।
गतं किष्किन्धायां विदितगुणसुग्रीवसचिवं,
ससीतं सानन्दं प्रणत रघुनाथं सुरनुतम्॥४॥

Shri Ram Raksha Stotram
प्रियाप्रेक्षोत्कण्ठं जलनिधिगतं वानरयुतं,
जले सेतुं बद्ध्वाऽसुरकुल निहन्तारमनघम्।
विशुद्धामर्धाङ्गीं हुतभुजि समीक्षन्तमचलं,
ससीतं सानन्दं प्रणत रघुनाथं सुरनुतम्॥५॥

#Shri Raghunath Ashtakam
विमानं चारुह्याऽनुजजनकजासेवितपद,
मयोध्यायां गत्वा नृपपदमवाप्तारमजरम्।
सुयज्ञैस्तृप्तारं निजमुखसुरान् शान्तमनसं,
ससीतं सानन्दं प्रणत रघुनाथं सुरनुतम्॥६॥

प्रजां संस्थातारं विहितनिजधर्मे श्रुतिपथं,
सदाचारं वेदोदितमपि च कर्तारमखिलम्।
नृषु प्रेमोद्रेकं निखिलमनुजानां हितकरं,
सतीतं सानन्दं प्रणत रघुनाथं सुरनुतम्॥७॥

#Shri Raghunath Ashtakam
तमः कीर्त्याशेषाः श्रवणगदनाभ्यां द्विजमुखास्तरिष्यन्ति,
ज्ञात्वा जगति खलु गन्तारमजनम्॥
अतस्तां संस्थाप्य स्वपुरमनुनेतारमखिलं,
ससीतं सानन्दं प्रणत रघुनाथं सुरनुतम्॥८॥

रघुनाथाष्टकं हृद्यं रघुनाथेन निर्मितम्।
पठतां पापराशिघ्नं भुक्तिमुक्तिप्रदायकम्॥९॥

॥ इति पण्डित श्रीशिवदत्तमिश्रशास्त्रि विरचितं श्रीरघुनाथाष्टकं सम्पूर्णम् ॥ Shri Raghunathashtakam.

आप सभी अपने मित्रों को फेसबुक पेज को लाइक करने और संत्संग से उनके विचारों को धर्म के प्रति श्रद्धावान बनाने का प्रयत्न अवश्य करें।।

नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्।।

।। नमों नारायण ।।

Previous articleMan Bhajle Govinda Gopala Hari ka Pyara Nam Hai By Swami Shri
Next articleश्री राघवाष्टकम् ।।
भागवत प्रवक्ता- स्वामी धनञ्जय जी महाराज "श्रीवैष्णव" परम्परा को परम्परागत और निःस्वार्थ भाव से निरन्तर विस्तारित करने में लगे हैं। श्रीवेंकटेश स्वामी मन्दिर, दादरा एवं नगर हवेली (यूनियन टेरेटरी) सिलवासा में स्थायी रूप से रहते हैं। वैष्णव धर्म के विस्तारार्थ "स्वामी धनञ्जय प्रपन्न रामानुज वैष्णव दास" के श्रीमुख से श्रीमद्भागवत जी की कथा का श्रवण करने हेतु संपर्क कर सकते हैं।।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here