श्री वैष्णव सम्प्रदाय का दीक्षा विधान।।

3
1201
Shri Vaishnav Deeksha Vidhan
Shri Vaishnav Deeksha Vidhan

श्री वैष्णव सम्प्रदाय का दीक्षा विधान।। Shri Vaishnav Deeksha Vidhan.

जय श्रीमन्नारायण, Swami Shri Dhananjay ji Maharaj.

मित्रों, विशिष्टाद्वैत मत जिसके प्रतिपादक या संस्थापक श्री रामानुजाचार्य हैं। इन्हीं से श्री वैष्णवों के लिए निम्नांकित संस्कार शास्त्रानुमोदित है।।

ताप: पुण्ड्रं तथा नाम मन्त्रो यागश्च पञ्चमः।।
अमी पञ्चैव संस्काराः परमैकान्तिनो मताः।।

पंचसंस्कर वो संस्कार है, जो भगवन की शरणागति ग्रहण करते हुए आचार्य अपने शिष्यों को दिया जाता है। जिसमें ताप, उर्ध्वपुण्ड्र, नाम, अष्टाक्षरी मन्त्र तथा यज्ञ कार्य सम्पादन करके करवाये जाते हैं।।

(१) ताप:- आचार्य दीक्षा देते समय चाँदी के बने हुए शँख-चक्र की मुद्राओं को हवन कुण्ड की अग्नि में तपा कर दीक्षा ग्रहण करनेवाले शिष्य के दोनों बहुमूल में क्रमशः अंकित किया जाता है। इसे ताप संस्कार कहा जाता है।।

(२) उर्ध्वपुण्ड्र:- शरणागति ग्रहण करने वाले को ललाट पर पाशा तथा श्री चूर्ण से उर्ध्वपुण्ड्र तिलक लगाया जाता है।।

(३) नामकरण:- दीक्षा ग्रहण करने वाले व्यक्ति के नाम के प्रथम अक्षर का आधार लेकर एक सांप्रदायिक नाम दिया जाता है। इसे ही नामकरण संस्कार कहा जाता है।।

(४) मन्त्र:- इस में आचार्य शिष्य के दायें कान में “ॐ नमो नारायणाय” यह अष्टाक्षरी मन्त्र प्रदान करते हैं। हमारे श्रीवैष्णव संप्रदाय का यही मूलमन्त्र अथवा गुरुमंत्र है। इस के बाद द्वय मन्त्र दिया जाता है।।

श्रीमन्नारायणस्य चरणौ शरणं प्रपद्ये।। श्रीमते नारायणाय नमः।।

अन्त मे चरम दिया जाता है:-

सर्वधर्मान परित्यज्य मामेकं शरणं ब्रज।।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।

(५) याग:- इसके बाद पंच भू संस्कार से संस्कारित वेदी पर पुरुष सूक्त तथा श्री सूक्त से हवन कराया जाता है। यही पंच संस्कार कहे जाते है। जो वैष्णव दीक्षा ग्रहण करते समय योग्य आचार्य के द्वारा सम्पन्न करवाया जाता है।।

तदुपरान्त आचार्य अपने शिष्यों को उपदेश देते है, कि मॉस-मदिरा इत्यादि का सेवन नहीं करना चाहिए। श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी के उपदेशों का पूर्ण निष्ठा से पालन करते हुए जीवन बिताना चाहिए। अपने सम्प्रदाय के मत का पूर्णतः पालन करना चाहिये। अपने आचार्य एवं पूर्वाचार्य के उपदेशों का पालन करना चाहिए। भगवान एवं भागवतो का सदैव आदर करना चाहिए।।

Shri Vaishnav Deeksha Vidhan

नोट : शास्त्रानुसार सबको इन पंचसंस्करों से संस्कृत कर, किसी को भी दीक्षा देकर शिष्य बनाने का अधिकार नही है। त्रिदंड धारी कोई आचार्य जिसको यह अधिकार दे, वही और किसी को इस प्रकार संस्कारित कर वैष्णव दीक्षा दे संकता है।।

आप सभी अपने मित्रों को फेसबुक पेज को लाइक करने और संत्संग से उनके विचारों को धर्म के प्रति श्रद्धावान बनाने का प्रयत्न अवश्य करें।।

नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्।।

।। नमों नारायण ।।

Previous articleJagad Guru Shri Tridandi Swami ji & Shri Jiyar Swami ji Ki Aarati.
Next articleसत्कर्म से ही परमात्म प्राप्ति संभव है।।
भागवत प्रवक्ता- स्वामी धनञ्जय जी महाराज "श्रीवैष्णव" परम्परा को परम्परागत और निःस्वार्थ भाव से निरन्तर विस्तारित करने में लगे हैं। श्रीवेंकटेश स्वामी मन्दिर, दादरा एवं नगर हवेली (यूनियन टेरेटरी) सिलवासा में स्थायी रूप से रहते हैं। वैष्णव धर्म के विस्तारार्थ "स्वामी धनञ्जय प्रपन्न रामानुज वैष्णव दास" के श्रीमुख से श्रीमद्भागवत जी की कथा का श्रवण करने हेतु संपर्क कर सकते हैं।।

3 COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here