भगवान कपिल द्वारा भक्ति का विवेचन।। Bhagwan Kapil Dwara Bhakti Ka Vivechan.

जय श्रीमन्नारायण, Shrimad Bhagwat Katha.

मित्रों, जैसा की आप सभी जानते हैं, कि माता देवहूति के प्रश्न और भगवान कपिल के द्वारा दिए गए उत्तर के विषय पर चर्चा चल रही है। तो आइये इस चर्चा को कुछ और आगे बढायें।।

श्रीमद्भागवत महापुराण – स्कन्ध तृतीय – अध्याय – २५ वाँ।।

माता देवहुति ने पूछा – देवहूतिरुवाच:-

काचित्त्वय्युचिता भक्तिः कीदृशी मम गोचरा।।
यया पदं ते निर्वाणमञ्जसान्वाश्नवा अहम्।।२८।।

अर्थात:- देवहुति ने कहा- भगवन्! आपकी समुचित भक्ति का स्वरूप क्या है? और मेरी जैसी अबलाओं के लिए कैसी भक्ति ठीक है, जिससे कि मैं सहज में ही आपके निर्वाण पद को प्राप्त कर सकूँ?।।२८।।

निर्वाणस्वरूप प्रभो! जिसके द्वारा तत्वज्ञान होता है और जो लक्ष्य को बेधनेवाले बाण के समान भगवान कि प्राप्ति करवाने वाला है, वह आपका कहा हुआ योग कैसा है और उसके कितने अंग हैं?। हे हरे! यह सब आप मुझे इस प्रकार समझाइये जिससे कि आपकी कृपा से मैं मन्दमति स्त्रीजाति भी इस दुर्बोध विषय को सुगमता से समझ सकूँ।।

भगवान मैत्रेय जी महात्मा विदुर जी से कहते हैं, विदुर जी! जिसके शरीर से उन्होंने स्वयं जन्म लिया था, उस अपनी माता का ऐसा अभिप्राय जानकर कपिलजी के ह्रदय में स्नेह उमड़ आया और उन्होंने प्रकृति आदि तत्वों का निरूपण करनेवाले शास्त्र का, जिसे सांख्य कहते हैं, उपदेश किया। साथ ही भक्ति के स्वरूप का विस्तार एवं योग का भी वर्णन किया।।

Bhakti Ka vivechan

श्रीभगवानुवाच:-
देवानां गुणलिङ्गानामानुश्रविककर्मणाम्।।
सत्त्व एवैकमनसो वृत्तिः स्वाभाविकी तु या।।३२।।

अर्थात:- श्री भगवान ने कहा- माता! जिसका चित्त एकमात्र भगवान में ही लग गया है, ऐसे मनुष्य की वेदविहित कर्मों में लगी हुई तथा विषयों का ज्ञान करवाने वाली इन्द्रियाँ (कर्मेन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियाँ – दोनों प्रकार की) की जो सत्वमुर्ती श्रीहरी के प्रति स्वाभाविकी प्रवृत्ति है, वही भगवान की अहैतुकी भक्ति है। यह मुक्ति से भी बढ़कर है, क्योंकि जठरानल जिस प्रकार से खाए हुए अन्न को पचाता है, उसी प्रकार यह भी कर्मसंस्कारों के भण्डार स्वरूप लिंग शरीर को तत्काल भस्म कर देती है।।

मेरी ही प्रशन्नता के लिए समस्त कार्य करनेवाले कितने ही बड़भागी भक्त, जो एक दुसरे से मिलकर प्रेमपूर्वक मेरे ही पराक्रमों की चर्चा किया करते हैं, मेरे साथ एकीभाव (सायुज्य मोक्ष) की भी इच्छा नहीं करते।।३४।।

कुछ लोग कहते हैं, की कहाँ लिखा है, की मूर्ति पूजन श्रेयस्कर होता है? तो ऐसे लोगों को भागवत जी का ये श्लोक जो स्वयं भगवान कपिल के द्वारा कही गयी है – देखना चाहिए।।

पश्यन्ति ते मे रुचिराण्यम्ब सन्तः प्रसन्नवक्त्रारुणलोचनानि।।
रूपाणि दिव्यानि वरप्रदानि साकं वाचं स्पृहणीयां वदन्ति।।३५।।

अर्थात:- हे माँ! वे साधुजन अरुण-नयन एवं मनोहर मुखारविन्द से युक्त मेरे परम सुन्दर और वरदायक दिब्य रूपों की झाँकी करते हैं और उनके साथ संभाषण भी करते हैं, जिसके लिए बड़े-बड़े तपस्वी भी लालायित रहते हैं।।३५।।

इस श्लोक का भावार्थ यही है, की भगवान की प्रतिमा को जिनका पूजन, अर्चन और वंदन करते हुए नित्य निहारा करो। क्योंकि ऐसा मेरे परम भक्तजन किया करते हैं, दुष्टजन ऐसा नहीं करते।।

और आगे कहते हैं, कि दर्शनीय अंग-प्रत्यंग, उदार हास-विलास, मनोहर चितवन और सुमधुर वाणी से युक्त मेरे उन रूपों की माधुरी में उनका मन और उनकी इन्द्रियाँ फँस जाती है। ऐसी मेरी भक्ति न चाहने पर भी उन्हें परमपद की प्राप्ति करा देती है।।

अविद्या की निवृत्ति हो जाने पर यद्यपि वे मुझ मायापति के सत्यादि लोकों की भोग संपत्ति, भक्ति की प्रवृत्ति के पश्चात् स्वयं प्राप्त होनेवाली अष्टसिद्धि अथवा वैकुण्ठ लोक के भगवदीय ऐश्वर्य की भी इच्छा नहीं करते, तथापि मेरे धाम में पहुँचने पर उन्हें ये सब विभूतियाँ स्वयं ही प्राप्त हो जाती है।।

Bhakti Ka vivechan

न कर्हिचिन्मत्पराः शान्तरूपे नङ्क्ष्यन्ति नो मेऽनिमिषो लेढि हेतिः।।
येषामहं प्रिय आत्मा सुतश्च सखा गुरुः सुहृदो दैवमिष्टम्।।३८।।

अर्थात:- जिनका एकमात्र मैं ही प्रिय, आत्मा, पुत्र, मित्र, गुरु सुहृद और इष्टदेव हूँ – वे मेरे ही आश्रय में रहनेवाले भक्तजन शान्तिमय वैकुण्ठधाम में पहुंचकर किसी प्रकार की इन दिब्य भोगों से रहित नहीं होते और न ही उन्हें मेरा कालचक्र ही ग्रस सकता है।।

माताजी! जो लोग इहलोक, परलोक और इन दोनों लोकों में साथ जानेवाले वासनामय लिंगदेह को तथा शरीर से सम्बन्ध रखनेवाले जो धन, पशु एवं गृह आदि पदार्थ हैं, उन सबको और अन्याय संग्रहों को भी छोड़कर अनन्य भक्ति से सब प्रकार से मेरा ही भजन करते हैं। उन्हें मैं मृत्युरूप संसार सागर से सहजता से पार कर देता हूँ।।

ये उपर के सारे व्याख्यान भगवान कपिल ने माता देवहुति को भक्ति के स्वरूप का वर्णन करते हुए दिया है। अब आप इस विषय को आसानी एवं सरलता से यहाँ श्री रामचरितमानस के अयोध्याकाण्ड में श्री राम-वाल्मीकि सम्वाद में देख सकते हैं:-

जिन्ह के श्रवन समुद्र समाना। कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना॥
भरहिं निरंतर होहिं न पूरे। तिन्ह के हिय तुम्ह कहुँ गुह रूरे॥
लोचन चातक जिन्ह करि राखे। रहहिं दरस जलधर अभिलाषे॥

निदरहिं सरित सिंधु सर भारी। रूप बिंदु जल होहिं सुखारी॥
तिन्ह कें हृदय सदन सुखदायक। बसहु बंधु सिय सह रघुनायक॥

जसु तुम्हार मानस बिमल हंसिनि जीहा जासु।
मुकताहल गुन गन चुनइ राम बसहु हियँ तासु॥

प्रभु प्रसाद सुचि सुभग सुबासा। सादर जासु लहइ नित नासा॥
तुम्हहि निबेदित भोजन करहीं। प्रभु प्रसाद पट भूषन धरहीं॥

सीस नवहिं सुर गुरु द्विज देखी। प्रीति सहित करि बिनय बिसेषी॥
कर नित करहिं राम पद पूजा। राम भरोस हृदयँ नहिं दूजा॥

चरन राम तीरथ चलि जाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं॥
मंत्रराजु नित जपहिं तुम्हारा। पूजहिं तुम्हहि सहित परिवारा॥

तरपन होम करहिं बिधि नाना। बिप्र जेवाँइ देहिं बहु दाना॥
तुम्ह तें अधिक गुरहि जियँ जानी। सकल भायँ सेवहिं सनमानी॥

सबु करि मागहिं एक फलु राम चरन रति होउ।
तिन्ह कें मन मंदिर बसहु सिय रघुनंदन दोउ॥

काम कोह मद मान न मोहा। लोभ न छोभ न राग न द्रोहा॥
जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया। तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया॥
सब के प्रिय सब के हितकारी। दुख सुख सरिस प्रसंसा गारी॥
कहहिं सत्य प्रिय बचन बिचारी। जागत सोवत सरन तुम्हारी॥
तुम्हहि छाड़ि गति दूसरि नाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं॥
जननी सम जानहिं परनारी। धनु पराव बिष तें बिष भारी॥
जे हरषहिं पर संपति देखी। दुखित होहिं पर बिपति बिसेषी॥
जिन्हहि राम तुम्ह प्रान पिआरे। तिन्ह के मन सुभ सदन तुम्हारे॥

स्वामि सखा पितु मातु गुर जिन्ह के सब तुम्ह तात।
मन मंदिर तिन्ह कें बसहु सीय सहित दोउ भ्रात॥

अवगुन तजि सब के गुन गहहीं। बिप्र धेनु हित संकट सहहीं॥
नीति निपुन जिन्ह कइ जग लीका। घर तुम्हार तिन्ह कर मनु नीका॥
गुन तुम्हार समुझइ निज दोसा। जेहि सब भाँति तुम्हार भरोसा॥
राम भगत प्रिय लागहिं जेही। तेहि उर बसहु सहित बैदेही॥
जाति पाँति धनु धरमु बड़ाई। प्रिय परिवार सदन सुखदाई॥
सब तजि तुम्हहि रहइ उर लाई। तेहि के हृदयँ रहहु रघुराई॥
सरगु नरकु अपबरगु समाना। जहँ तहँ देख धरें धनु बाना॥
करम बचन मन राउर चेरा। राम करहु तेहि कें उर डेरा॥

Bhakti Ka vivechan

आगे भगवान कपिल कहते हैं:-
नान्यत्र मद्भगवतः प्रधानपुरुषेश्वरात्।।
आत्मनः सर्वभूतानां भयं तीव्रं निवर्तते।।४१।।

अर्थात:- मैं साक्षात् भगवान हूँ, प्रकृति और पुरुष का भी प्रभु हूँ तथा समस्त प्राणियों की आत्मा हूँ। मेरे सिवा और किसी का आश्रय लेने से मनुष्य मृत्युरूप महाभय से छुटकारा नहीं पा सकता।।४१।।

मेरे भय से यह वायु चलती है, मेरे भय से ही सूर्य तप रहा है। मेरे भय से इन्द्र वर्षा करता है और अग्नि जलाती है तथा मेरे ही भय से मृत्यु अपने कार्य में प्रवृत्त होता है। योगीजन ज्ञान-वैराग्य युक्त भक्तियोग के द्वारा शान्ति प्राप्त करने के लिए मेरे निर्भय चरण कमलों का ही आश्रय लेते हैं।।

एतावानेव लोकेऽस्मिन्पुंसां निःश्रेयसोदयः।।
तीव्रेण भक्तियोगेन मनो मय्यर्पितं स्थिरम्।।४४।।

अर्थात:- संसार में मनुष्य के लिए सबसे बड़ी कल्याण प्राप्ति यही है, कि उसका चित्त तीव्र भक्तियोग के द्वारा मुझमें लगकर स्थिर हो जाय।।४४।।

इस उपर वाले श्लोक को इस दोहा से मिलाकर देखिये सेम टू सेम कॉपी है इस श्लोक का:-

दोहा:- जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु।।
बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु।।131।।

अर्थात:- जिसको कभी कुछ भी नहीं चाहिए और जिसका आपसे स्वाभाविक प्रेम है, आप उसके मन में निरंतर निवास कीजिए, वह आपका अपना घर है।।131।।

तो अब आज के लिए इतना ही, और मैं अपने अगले अंक में आप सभी मित्रों को उस ओर ले चलने का प्रयास करूँगा और भी कुछ अनूठी ज्ञान से भी अवगत करवायेंगे भगवान कपिल और मेरा प्रयास रहेगा की मैं उस विषय को सहज एवं सरल शब्दों में आपलोगों के सम्मुख रख सकूं।।

Bhakti Ka vivechan

आप सभी अपने मित्रों को फेसबुक पेज को लाइक करने और संत्संग से उनके विचारों को धर्म के प्रति श्रद्धावान बनाने का प्रयत्न अवश्य करें।।

नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।। 

 
जय जय श्री राधे ।।
जय श्रीमन्नारायण ।। 

विजया एकादशी व्रत कथा एवं विधि।। Vijaya Ekadashi Vrat Katha in Hindi.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, एकादशी व्रत का माहात्म्य सुनने में अर्जुन को अपार हर्ष की अनुभूति हो रही थी। जया एकादशी की कथा श्रवण करने के बाद अर्जुन ने कहा- “हे पुण्डरीकाक्ष! फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है? तथा उसके व्रत का क्या विधान है? कृपा करके मुझे इसके सम्बंध में भी विस्तारपूर्वक बताएं।।”

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- “हे अर्जुन! फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम विजया है। इसके व्रत के प्रभाव से मनुष्य को विजयश्री मिलती है। इस विजया एकादशी के माहात्म्य के श्रवण एवं पठन से सभी पापों का अंत हो जाता है। एक बार देवर्षि नारद ने जगत पिता ब्रह्माजी से कहा- “हे ब्रह्माजी! आप मुझे फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की विजया एकादशी व्रत का माहात्म्य एवं उस व्रत की विधि बताने की कृपा करें।।”

नारद जी का यह प्रश्न सुनकर ब्रह्माजी ने कहा- “हे पुत्र! विजया एकादशी व्रत का उपवास पूर्व कृत पाप तथा वर्तमान के सभी पापों को नष्ट करने वाला है। इस एकादशी का विधान मैंने आज तक किसी से नहीं कहा परंतु तुम्हें बताता हूँ। यह उपवास करने वाले सभी मनुष्यों को विजयश्री प्रदान करती है। अब श्रद्धापूर्वक कथा का श्रवण करो।।

विजया एकादशी व्रत कथा।। Vijaya Ekadashi Vrat Katha in Hindi.

ब्रह्माजी ने कहा – भगवान श्रीराम को जब चौदह वर्ष का वनवास मिला। तब वह अपने भ्राता लक्ष्मण तथा माता सीता सहित पंचवटी में निवास करने लगे। उस समय महापापी रावण ने माता सीता का हरण कर लिया। इस दुःखद घटना से श्रीरामजी तथा लक्ष्मणजी अत्यंत दुखी हुए और सीताजी की खोज में वन-वन भटकने लगे।।

जंगल-जंगल घूमते हुए, वे मरणासन्न जटायु के पास जा पहुंचे। जटायु ने उन्हें माता सीता के हरण का पूरा वृत्तांत सुनाया। फिर भगवान श्रीराम की गोद में प्राण त्यागकर स्वर्ग की तरफ प्रस्थान किया। कुछ आगे चलकर श्रीराम एवं लक्ष्मण की सुग्रीव के साथ मित्रता हो गई और वहां उन्होंने बालि का वध किया। श्रीराम भक्त हनुमानजी ने लंका में जाकर माता सीता का पता लगाया और माता से श्रीरामजी तथा महाराज सुग्रीव की मित्रता का वर्णन सुनाया।।

वहां से लौटकर हनुमानजी श्रीरामचंद्रजी के पास आए और अशोक वाटिका का सारा वृत्तांत कह सुनाया। सब हाल जानने के बाद श्रीरामचंद्रजी ने सुग्रीव की सहमति से वानरों तथा भालुओं की सेना सहित लंका की तरफ प्रस्थान किया। समुद्र किनारे पहुंचने पर श्रीरामजी ने विशाल समुद्र को घड़ियालों से भरा देखकर लक्ष्मणजी से कहा- “हे लक्ष्मण! अनेक मगरमच्छों और जीवों से भरे इस विशाल समुद्र को कैसे पार करेंगे?”

प्रभु श्रीराम की बात सुनकर लक्ष्मणजी ने कहा- भ्राताश्री! आप पुराण पुरुषोत्तम आदिपुरुष हैं। आपसे कुछ भी विलुप्त नहीं है। यहां से आधा योजन दूर कुमारी द्वीप में वकदाल्भ्य मुनि का आश्रम है। वे अनेक शास्त्रों के ज्ञाता हैं। वे ही आपकी विजय का उपाय बता सकते हैं। अपने छोटे भाई लक्ष्मणजी के इन वचनों को सुनकर श्रीरामजी वकदाल्भ्य ऋषि के आश्रम में गए और उन्हें प्रणाम कर एक ओर बैठ गए।।

अपने आश्रम में श्रीराम को आया देख महर्षि वकदाल्भ्य ने पूछा- हे श्रीराम! आपने किस प्रयोजन से मेरी कुटिया को पवित्र किया है? कृपा कर अपना प्रयोजन कहें प्रभु! मुनि के मधुर वचनों को सुन श्रीरामजी ने कहा- हे ऋषिवर! मैं सेना सहित यहां आया हूँ और राक्षसराज रावण को जीतने की इच्छा से लंका जा रहा हूं। कृपा कर आप समुद्र को पार करने का कोई उपाय बताएं। आपके पास आने का मेरा यही प्रयोजन है।।

महर्षि वकदाल्भ्य ने कहा- हे राम! मैं आपको एक अति उत्तम व्रत बतलाता हूं। जिसको करने से आपको विजयश्री अवश्य ही प्राप्त होगी। भगवान श्रीराम ने पूछा – यह कैसा व्रत है मुनिश्रेष्ठ! जिसे करने से समस्त क्षेत्रों में विजय की प्राप्ति होती है? जिज्ञासु हो श्रीराम ने जब पूछा तो इस पर महर्षि वकदाल्भ्य ने कहा- हे श्रीराम! फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की विजया एकादशी का उपवास करने से आप अवश्य ही समुद्र को पार कर लेंगे और युद्ध में भी आपकी विजय होगी।।

विजया एकादशी व्रत की विधि।। Vijaya Ekadashi Vrat Vidhi in Hindi.

हे मर्यादा पुरुषोत्तम! इस एकादशी व्रत के उपवास के लिए दशमी के दिन स्वर्ण, चांदी, तांबे या मिट्टी का एक कलश बनाएं। उस कलश को जल से भरकर तथा उस पर पंच पल्लव रखकर उसे वेदिका पर स्थापित करें। उस कलश के नीचे सतनजा अर्थात मिले हुए सात अनाज और ऊपर जौ रखें। उसके उपर भगवान विष्णु की स्वर्ण की प्रतिमा स्थापित करें।।

अगले दिन एकादशी को स्नानादि से निवृत्त होकर धूप, दीप, नैवेद्य, नारियल आदि से भगवान श्रीहरि का पूजन करें। वह सारा दिन भक्तिपूर्वक कलश के सम्मुख ही व्यतीत करें। रात्रि में भी उसी तरह बैठे रहकर जागरण करें। द्वादशी के दिन किसी नदी या तलाब के किनारे स्नान आदि से निवृत्त होकर उस कलश को ब्राह्मण को दे दें।।

हे दशरथनंदन! यदि आप इस व्रत को सेनापतियों के साथ करेंगे तो अवश्य ही विजयश्री आपका वरण करेगी। मुनि के इन वचनों को सुनकर भगवान श्रीरामचंद्रजी ने विधिपूर्वक विजया एकादशी का व्रत किया। इसी व्रत के प्रभाव से भगवान श्रीराम ने राक्षसों के ऊपर विजय प्राप्त की। हे अर्जुन! जो मनुष्य इस व्रत को विधि-विधान के साथ पूर्ण करेगा, उसकी दोनों’ लोकों में विजय होगी। श्री ब्रह्माजी ने नारदजी से कहा था- जो इस व्रत का माहात्म्य श्रवण करता है या पढ़ता है उसे वाजपेय यज्ञ के फल की प्राप्ति होती है।।”

Vijaya Ekadashi Vrat Katha

विजया एकादशी व्रत का माहात्म्य।। Vijaya Ekadashi Vrat Mahatmya in Hindi.

भगवान विष्णु का किसी भी रूप में पूजन मानव मात्र की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करता है। श्रीराम हालांकि स्वयं विष्णु के अवतार थे, अपितु अपनी लीलाओं से समस्त प्राणियों को सन्मार्ग दिखाने के लिए ही उन्होंने विष्णु भगवान के निमित्त इस व्रत को किया। विजय की इच्छा रखने वाला इस उपवास को करके अनंत फल का भागी बन सकता है।।

।। नारायण सभी का कल्याण करें ।।
जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम् ।।
जय जय श्री राधे ।।
जय श्रीमन्नारायण ।।

आवश्यकता के अनुसार यंत्रों का प्रयोग एक वैदिक रीति!! Yantra Prayog Vidhi.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, जैसा की मैं पहले भी बता चूका हूँ, की कुछ नम्बर्स ऐसे होते हैं, जिनको सही जगह पर बिठाकर सही रूप देने पर, किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति हो सकती है! हमारे देश में कुछ अनुभवी व्यक्ति हुए, जिन्होंने इस प्रकार की अपनी अनुभूतियाँ हमें हमारे कल्याणार्थ प्रदान किया!!
 
अगर आप पुछेंगें की उस अनुभवी व्यक्ति का नाम क्या था, तो शायद ये, बताना मुश्किल होगा ! लेकिन इन अनुभूतियों को आज भी बहुत लोग हैं, जिन्होंने प्रयोग में लिया है, और सत्य प्रमाणित किया है! लेकिन केवल भगवान अथवा किसी यंत्र के भरोसे बैठ जाना, और ये सोंच लेना की हमने तो यंत्र पहन लिया अब मेरा तो काम हो ही जायेगा, मुर्खता होगी! क्योंकि – उद्योगिनं हि पुरुष सिंहमुपैती लक्ष्मी – उद्योगी अर्थात परिश्रमी व्यक्ति को हि लक्ष्मी भी वरण करती है, कायरों को वो भी नकार देती है!!
 
यंत्र प्रभावी होते हैं, लेकिन परिश्रमी पुरुष को हि ये भी सहायता करते हैं, अत: हमें मेहनत जी जान से करना है, और इन विद्याओं का भी सहारा लेना है, तभी हमें पूर्ण सफलता मिलेगी! इन विद्याओं को आध्यात्मिक व्यक्तियों द्वारा दबाया जाता है, क्योंकि लोग कभी-कभी इन विद्याओं का दुरुपयोग करने लगते हैं!!
 
लेकिन आप कभी-भी इन विद्याओं का सही समय एवं सही जगह पर नेक नियत से प्रयोग करेंगें, तो सफलता निश्चित ही आपके कदम चूमेगी!!
 
वैसे ये यंत्र सफलता प्राप्ति यंत्र है, अगर आपको किसी सेवा क्षेत्र के कार्य में, बार-बार असफलता मिलती है, तो आप इस यंत्र का निर्माण काली स्याही से, भोजपत्र पर, शनिवार के दिन!! ॐ क्लीं महाकाल्यै नम: मम कार्यं सिद्धं कुरु कुरु हूँ फट !! इस मन्त्र का जप करते हुए, एकांत स्थान में बैठकर निर्मित करें!!
 
यंत्र तैयार होने के बाद, इसकी पूजा षोडशोपचार से करें, और उपरोक्त मन्त्र का १००८ बार जप करें! फिर इस यंत्र को, ताबीज में भर कर, पुरुष अपने दाहिनी भुजा पर, एवं स्त्री अपनी बायीं भुजा पर, काले रंग के धागे में बांधे! और फिर किसी भी तरह की परीक्षा अथवा प्रतियोगिता में निश्चिन्त होकर बैठे! सफलता निश्चित रूप से उसकी कदम चूमेगी, इस यंत्र के प्रभाव से!!
 
इन यंत्रों का कोई पूर्ण प्रमाण तो नहीं मिलता, लेकिन यह गुरु-शिष्य की श्रवण परंपरा से, आदिकाल से चली आ रही है! तथा नियम पूर्वक सच्ची भावना से धारण करने पर, कारगर भी होती है!!
आप मेरे साथ जुड़ने के लिए, मेरी वेबसाईट पर आयें – Sevashra Sansthan 
मेरे पेज पर भी आप मेरे साथ जुड़ सकते हैं, तथा इस प्रकार की या किसी भी तरह की अन्य जानकारी ले सकते हैं ! इसलिए मेरे पेज पर आयें – Swami Ji Maharaj
और अधिक जानकारी के लिए, मेरा ब्लॉग पढ़ें – Swami Dhananjay Maharaj
 
!! नमों नारायणाय !!

कर्ता भाव हटाइए होगा चमत्कार।। Karta Bhav Hatao Unnati Hoga.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, हमारी आदत है, किसी भी कर्म में अपने कर्ता भाव का प्रदर्शन करने की। परन्तु कर्म करते समय ही अपने कर्ता भाव को हटाइए, फिर देखिए कैसा चमत्कार होता है आपके जीवन। चमत्कार आपके लिए कोई दूसरा नहीं कर सकता।।

उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्‌ ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ।।


अर्थ:- अपने आप के द्वारा इस संसार-समुद्र से स्वयं का उद्धार हम कर सकते हैं एवं स्वयं अपने को हम अधोगति में भी ड़ाल सकते हैं। क्योंकि हम मनुष्य स्वयं ही तो अपना मित्र हैं और स्वयं ही अपना शत्रु भी हैं।।5।।(गी. अ. 6, श्लो. 5.)

मित्रों, एक पुरानी कहानी है, कि एक पण्डित जी ने अपनी पत्नी की आदत बना दी थी कि घर में रोटी खाने से पहले कहना है कि “कृष्णार्पण” बोलो फिर रोटी खाओ। अगर पानी पीना हो तो पहले कहना है कि “कृष्णार्पण”। उस औरत की इतनी आदत पक्की हो गई, कि जो भी काम करती पहले मन में यह कहती कि “कृष्णार्पण” “कृष्णार्पण”। फिर वह काम करती।।

एक दिन उसने घर का कूड़ा इकट्ठा किया और फेंकते हुए कहा कि “कृष्णार्पण” “कृष्णार्पण”। वहीँ पास से नारद मुनि जा रहे थे। नारद मुनि ने जब यह सुना तो उस औरत को थप्पड़ मारा कि विष्णु जी को कूड़ा अर्पण कर रही है। फेंक कूड़ा रही है और कह रही है कि “कृष्णार्पण”। वह औरत विष्णु जी के प्रेम में रंगी हुई थी। कहने लगी नारद मुनि तुमने जो थप्पड़ मारा है वो थप्पड़ भी “कृष्णार्पण”।।


अब नारद जी ने दूसरे गाल पर थप्पड़ मारते हुए कहा कि बेवकूफ़ औरत तू थप्पड़ को भी “कृष्णार्पण” कह रही है। उस औरत ने फिर यही कहा आपका मारा यह थप्पड़ भी “कृष्णार्पण”। इसके बाद जब नारद वैकुंठ में गए तो क्या देखते है, कि भगवान विष्णु के दोनों गालों पर उँगलियों के निशान बने हुए थे। नारद पूछने लगे कि “भगवन यह क्या हो गया”? आप के चेहरे पर यह निशान कैसे पड़े”?

भगवान विष्णु कहने लगे कि “नारद मुनि थप्पड़ मारे भी तू और पूछे भी तू”। नारद जी कहने लगे कि “मैं आपको थप्पड़ कैसे मार सकता हूँ”? भगवान विष्णु कहने लगे, “नारद मुनि जिस औरत ने कूड़ा फेंकते हुए यह कहा था, “कृष्णार्पण” और तूने उसको थप्पड़ मारा था तो वह थप्पड़ सीधे मेरे को ही लगा था, क्योकि वह मुझे अर्पण था”।।

मित्रों, जब हम कर्म करते समय कर्ता का भाव को निकाल लेते हैं और अपने हर काम में मैं, मेरी, मेरा की भावना हटा कर अपने इष्ट या सद्गुरु को आगे रखते हैं तो कर्मों का बोझ भी नहीं बढ़ता और वो काम आप से भी अच्छे तरीके से हो जाता है।।


मानस मे गोस्वामी जी रामजी से कहलवाते हैं:- मैं अरु मोर तोर तैं माया। जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया।।1।। अर्थ:- (श्री रामजी कहते हैं) हे तात! मैं थोड़े ही में सब समझाकर कहे देता हूँ। तुम मन, चित्त और बुद्धि लगाकर सुनो! मैं और मेरा, तू और तेरा- यही माया है, जिसने समस्त जीवों को वश में कर रखा है।।
              

।। नारायण सभी का कल्याण करें ।।
 
 
जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम् ।।
 
जय जय श्री राधे ।।
जय श्रीमन्नारायण ।।

जया एकादशी व्रत पूजा विधि एवं कथा सहित हिन्दी में ।। Jaya Ekadashi Vrat Vidhi And Katha in Hindi.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, एक समय की बात है, कि धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से माघ शुक्ल एकादशी के विषय में पूछा । युधिष्ठिर बोले – हे भगवन्! आपने माघ के कृष्ण पक्ष की षटतिला एकादशी का अत्यन्त सुंदर वर्णन किया । आप स्वदेज, अंडज, उद्भिज और जरायुज चारों प्रकार के जीवों के उत्पत्ति, पालन तथा संहार करने वाले हैं । अब आप कृपा करके माघ शुक्ल एकादशी का वर्णन कीजिए । इसका क्या नाम है, इसके व्रत की क्या विधि है तथा इसमें कौन से देवता का पूजन किया जाता है ?।।

भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे, कि हे राजन्! इस एकादशी का नाम “जया एकादशी” है । इसका व्रत करने से मनुष्य ब्रह्म हत्यादि तक के पापों से छूट कर मोक्ष को प्राप्त हो जाता है । इसके प्रभाव से भूत, पिशाच आदि योनियों से भी सहज ही मुक्ति प्राप्त हो जाती है । इस व्रत को विधिपूर्वक करना चाहिए । अब मैं आपको पद्मपुराण में वर्णित इस एकादशी की महिमा का जो वर्णन है, उस कथा का वर्णन करता हूँ ।।

स्वर्ग के राजा देवराज इंद्र स्वर्ग में राज करते थे और अन्य सब देवगण सुखपूर्वक स्वर्ग में निवास करते थे । एक समय देवराज इंद्र अपनी इच्छानुसार नंदन वन में अप्सराओं के साथ विहार कर रहे थे और वहाँ गंधर्व गान कर रहे थे । उन गंधर्वों में प्रसिद्ध पुष्पदंत तथा उसकी कन्या पुष्पवती और चित्रसेन तथा उसकी स्त्री मालिनी भी वहाँ उपस्थित थे । साथ ही मालिनी का पुत्र पुष्पवान और उसका पुत्र माल्यवान भी उपस्थित थे ।।

गंधर्व कन्या पुष्पवती गंधर्व माल्यवान को देखकर उस पर मोहित हो गई और माल्यवान पर काम-बाण चलाने लगी । उसने अपने रूप लावण्य और हावभाव से माल्यवान को वश में कर लिया । हे राजन्! वह पुष्पवती अत्यन्त सुन्दरी थी । अब वे इंद्र को प्रसन्न करने के लिए गान करने लगे परंतु परस्पर मोहित हो जाने के कारण उनका चित्त भ्रमित हो गया था ।।

इनके ठीक प्रकार न गाने तथा स्वर ताल ठीक नहीं होने के कारण देवराज इंद्र इनके प्रेम को समझ गए । देवराज ने इसमें अपना अपमान समझ लिया और उनको शाप दे दिया । इंद्र ने कहा अरे मूर्खों ! तुमने मेरी आज्ञा का उल्लंघन किया है, इसलिए तुम्हें धिक्कार है । अब तुम दोनों अपनी इस उदंडता के वजह से स्त्री-पुरुष के रूप में मृत्यु लोक में जाकर पिशाच रूप धारण करो और अपने कर्म का फल भोगो ।।

इंद्र का ऐसा शाप सुनकर वे दोनों अत्यन्त दु:खी हुए और वहाँ से निकलकर सीधा हिमालय पर्वत पर चले गए । परन्तु वहाँ ये अपना जीवन दु:खपूर्वक व्यतीत करने लगे । उन्हें गंध, रस तथा स्पर्श आदि का कुछ भी ज्ञान नहीं रहा । परन्तु फिर भी वहाँ उनको महान दु:ख ही मिल रहे थे । रात्रि में भी उन्हें एक क्षण के लिए भी निद्रा नहीं आती थी ।।

वहाँ अत्यन्त शीत था, जिससे उनके रोंगटे खड़े रहते और मारे शीत के दाँत भी सदैव बजते रहते थे । एक दिन पिशाच ने अपनी स्त्री से कहा, कि पिछले जन्म में हमने ऐसे कौन-से पाप किए थे, जिससे हमको यह दु:खदायी पिशाच योनि प्राप्त हुई । इस पिशाच योनि से तो नर्क का दु:ख सहना ही उत्तम होता । अत: हमें अब किसी प्रकार का पाप नहीं करना चाहिए । इस प्रकार विचार करते हुए वे अपने दिन व्यतीत कर रहे थे ।।

दैवयोग से तभी एक दिन माघ मास के शुक्ल पक्ष की जया नामकी एकादशी आई । उस दिन उन दोनों ने कुछ भी भोजन नहीं किया और न ही कोई पाप कर्म ही किया । उस दिन उन दोनों ने केवल फल-फूल खाकर ही दिन व्यतीत किया और सायंकाल के समय कष्टमय स्थिति में ही पीपल के वृक्ष के नीचे बैठ गए । उस समय सूर्य भगवान अस्त हो रहे थे । उस रात को अत्यन्त ठंड थी, इस कारण वे दोनों शीत के मारे अति दु:खी होकर मृतक के समान आपस में चिपटे हुए पड़े रहे । उस रात्रि को उनको निद्रा भी नहीं आई ।।

हे राजन् ! जया एकादशी के उपवास और रात्रि के जागरण से दूसरे दिन प्रभात होते ही उनकी पिशाच योनि छूट गई । एकादशी व्रत के प्रभाव से अत्यन्त सुंदर गंधर्व और अप्सरा का शरीर धारण कर सुंदर वस्त्राभूषणों से अलंकृत होकर दोनों ने स्वर्गलोक को प्रस्थान किया । उस समय आकाश में देवता लोग भी उनकी स्तुति करते हुए पुष्पवर्षा करने लगे । स्वर्गलोक में जाकर इन दोनों ने देवराज इंद्र को प्रणाम किया ।।

देवराज इंद्र इनको पूर्व स्वरूप में देखकर अत्यन्त आश्चर्यचकित हुये और पूछने लगे, कि तुमने अपनी पिशाच योनि से किस तरह छुटकारा पाया, सो सब बतालाओ। माल्यवान बोले कि हे देवेन्द्र! भगवान विष्णु की कृपा और जया एकादशी के व्रत के प्रभाव से ही हमारी पिशाच शरीर छूटी है। तब इंद्र बोले कि हे माल्यवान! भगवान की कृपा और एकादशी का व्रत करने से न केवल तुम्हारी पिशाच योनि छूट गई, वरन् हम लोगों के भी वंदनीय हो गए हो।।

देवराज इन्द्र ने कहा, तुम हमारे भी बन्दनीय इसलिये हो गए, क्योंकि भगवान विष्णु और भगवान शिव के भक्त हम देवताओं के वंदनीय होते हैं। अत: आप धन्य है और अब आप पुष्पवती के साथ जाकर विहार करो। भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे धर्मराज युधिष्ठिर ! इस जया एकादशी व्रत के प्रभाव से बुरी से बुरी योनि भी छूट जाती है।।

यदुकुल श्रेष्ठ भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, कि राजन ! जिस मनुष्य ने इस जया नाम के एकादशी का व्रत किया है उसने मानो सभी प्रकार के यज्ञ, जप, तप एवं दान आदि कर लिए हैं । जो मनुष्य जया एकादशी का व्रत करते हैं वे अवश्य ही हजार वर्ष तक स्वर्ग में वास करते हैं ।।

 

।। नारायण सभी का कल्याण करें ।।
जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम् ।।
जय जय श्री राधे ।।
जय श्रीमन्नारायण ।।

 

पुत्रदा एकादशी व्रत पूजा विधि एवं कथा सहित हिन्दी में ।। Putrada Ekadashi Vrat Vidhi And Katha in Hindi.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, एक बार की बात है, महाराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा- हे भगवन्! कृपा करके यह बतलाइए, कि पौष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है ? उसकी विधि क्या है और उसमें किस देवता का पूजन किया जाता है ।।

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा:- हे राजन! इस एकादशी का नाम पुत्रदा एकादशी है । इसमें भी भगवान नारायण की पूजा की जाती है । इस चर-अचर संसार में पुत्रदा एकादशी के व्रत के समान दूसरा कोई व्रत नहीं है । इसके पुण्य से मनुष्य तपस्वी, विद्वान और लक्ष्मीवान होता है । इसके विषय में मैं एक कथा आपको बताता हूं, सो तुम ध्यानपूर्वक सुनो ।।

राजन! भद्रावती नामक नगरी में सुकेतुमान नाम का एक राजा राज्य करता था । उसके कोई पुत्र नहीं था, उसकी पत्नी का नाम शैव्या था । वह पुत्रहीन होने के कारण सदैव चिंतित रहा करती थी । राजा के पितर भी रो-रोकर पिंड लिया करते थे और सोचा करते थे, कि इसके बाद हमको कौन पिंड देगा । राजा को भाई, बांधव, धन, हाथी, घोड़े, राज्य और मंत्री इन सबमें से किसी से भी संतोष नहीं होता था ।।

वह सदैव यही विचार करता था, कि मेरे मरने के बाद मुझको कौन पिंडदान करेगा । बिना पुत्र के पितरों और देवताओं का ऋण मैं कैसे चुका सकूंगा । जिस घर में पुत्र न हो उस घर में सदैव अंधेरा ही रहता है । इसलिए पुत्र उत्पत्ति के लिए मुझे कोई प्रयत्न करना चाहिए । जिस मनुष्य ने पुत्र का मुख देखा है, वह धन्य है । उसको इस लोक में यश और परलोक में शांति मिलती है अर्थात उनके दोनों लोक सुधर जाते हैं ।।

पूर्व जन्म के कर्म से ही इस जन्म में पुत्र, धन आदि प्राप्त होते हैं । राजा इसी प्रकार रात-दिन चिंता में लगा रहता था । एक समय तो राजा ने अपने शरीर को त्याग देने का निश्चय किया परंतु आत्मघात को महान पाप समझकर उसने ऐसा नहीं किया । एक दिन राजा ऐसा ही विचार करता हुआ अपने घोड़े पर चढ़कर वन को चल दिया तथा पक्षियों और वृक्षों को देखने लगा । उसने देखा कि वन में मृग, व्याघ्र, सूअर, सिंह, बंदर, सर्प आदि सब भ्रमण कर रहे हैं।।

देखा कि एक हाथी अपने बच्चों और हथिनियों के बीच घूम रहा है । इस वन में कहीं तो गीदड़ अपने कर्कश स्वर में बोल रहे हैं, कहीं उल्लू ध्वनि कर रहे हैं । वन के दृश्यों को देखकर राजा सोच-विचार में लग गया । इसी प्रकार आधा दिन बीत गया । वह सोचने लगा, कि मैंने कई यज्ञ किए, ब्राह्मणों को स्वादिष्ट भोजन से तृप्त किया फिर भी मुझको दुख प्राप्त हुआ, क्यों?।।

राजा प्यास के मारे अत्यंत दुखी हो गया और पानी की तलाश में इधर-उधर घूमने लगा । थोड़ी दूरी पर राजा ने एक सरोवर देखा । उस सरोवर में कमल खिले थे तथा सारस, हंस, मगरमच्छ आदि विहार कर रहे थे । उस सरोवर के चारों तरफ मुनियों के आश्रम बने हुए थे । उसी समय राजा के दाहिने अंग फड़कने लगे । राजा शुभ शकुन समझकर घोड़े से उतरकर मुनियों को दंडवत प्रणाम करके बैठ गया।।

राजा को देखकर मुनियों ने कहा- हे राजन! हम तुमसे अत्यंत प्रसन्न हैं । तुम्हारी क्या इच्छा है, सो कहो । राजा ने पूछा- महाराज आप कौन हैं और किसलिए यहां आए हैं । कृपा करके बताइए । मुनि कहने लगे, कि हे राजन! आज संतान देने वाली पुत्रदा एकादशी है । हम लोग विश्वदेव हैं और इस सरोवर में स्नान करने के लिए आए हैं । यह सुनकर राजा कहने लगा कि महाराज मेरे भी कोई संतान नहीं है, यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो एक पुत्र का वरदान दीजिए।।

मुनिजन बोले- हे राजन! आज पुत्रदा एकादशी है । आप इस व्रत का पालन करें, भगवान की कृपा से अवश्य ही आपके घर में पुत्र होगा । मुनियों के वचनों को सुनकर राजा ने उसी दिन एकादशी का व्रत किया और द्वादशी को विधि अनुसार उसका पारण किया । इसके पश्चात मुनियों को प्रणाम करके महल में वापस आ गया । कुछ समय बीतने के बाद रानी ने गर्भ धारण किया और नौ महीने के पश्चात उनके एक पुत्र हुआ ।।

वह राजकुमार अत्यंत शूरवीर, यशस्वी और प्रजापालक हुआ । भगवान श्रीकृष्ण बोले- हे राजन! पुत्र की प्राप्ति के लिए पुत्रदा एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए । जो व्यक्ति मनुष्य इस माहात्म्य को पढ़ता या सुनता है उसे अंत में स्वर्ग की प्राप्ति होती है ।।

 

।। नारायण सभी का कल्याण करें ।।
जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम् ।।
जय जय श्री राधे ।।
जय श्रीमन्नारायण ।।

ऐसे में लोगों की प्रगति रुक जाती है।। Aapki Pragati Aise Rukati Hai.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, जब आप अपने जीवन में उबाऊ महशूस करने लगते हैं। भले ही वह नौकरी बदलने की बात हो, नई कला या कौशल सीखने का मौका हो या फिर घर या शहर बदलने का अवसर।।

जब भी आपको लगे कि अब आपको जंग सा लग रहा है तो बदलाव के लिए कोशिश करें।।


ऐसे में लोग पाते हैं कि वे एक ही जगह टिक से गए हैं और उन्होंने लंबे समय से कुछ नया नहीं सीखा । लेकिन फिर भी वे उसी जगह बने रहते हैं ।।

ऐसे में धीरे-धीरे जीवन में नएपन का उत्साह खत्म सा होने लगता है ।।

अगर आपको भी ऐसा लगता है कि आप वर्षों से एक ही जगह हैं और प्रगति रुक गई है तो आगे निकलने के बारे में आपको सोचना चाहिए ।।


अगर आप एक ही ढर्रे पर चल रहे तो जीवन ऊबाऊ होना ही है । इसलिए जीवन को थोड़ा उलटते-पलटते रहना जरूरी होता है ।।

अपने करियर में कुछ नए क्षेत्रों में हाथ आजमाना चाहिए । साधारण बदलावों के जरिए आप नई ऊर्जा पा सकते हैं ।।

जब आप छोटे या बड़े बदलाव करेंगे तो वे आपको नई चीजें सीखने का मौका देंगे ।।


यह स्वीकार करना कि अब आपने पिछले वर्षों में कुछ नहीं बदला आपको आगे बढ़ने में मदद अवश्य करेगा ।।

।। नारायण सभी का कल्याण करें ।।
 
 
जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम् ।।
 
जय जय श्री राधे ।।
जय श्रीमन्नारायण ।।

दान के कितने अंग होते हैं तथा किसे दान करें ।। Dan Ke Kitane Ang And Kise Dan Kare.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, हमारे पूर्वज ऋषियों ने हर एक विषय पर अपना मत दिया है । क्योंकि दान एक बहुत ही अहम मुद्दा होता है। इसलिए अपने खून पसीने की कमाई को किस को दान करें। यह बहुत बड़ा प्रश्न है?

आज हम शास्त्रानुसार दान के कितने अंग होते हैं तथा दान लेने का सही हकदार कौन है? इस विषय में चर्चा करेंगे। तो आइए आज हम इसी विषय में चर्चा करते हैं।।

मित्रों, जैसा की आप देखते हैं, आजकल कुछ लोग एक फोटो बनाते हैं, जिसमें एक तरफ शिव जी के मंदिर में वेस्ट होते हुए दूध को दिखाते हैं और वहीं दूसरी तरफ एक फोटो में एक गरीब बच्चा जो भूख से तड़पता हुआ होता है ऐसी तस्वीरें एक साथ करके दिखाते हैं।।

अब ऐसे में हमें विचार करना है, कि वह दूध जो शिवलिंग के ऊपर गिराया जा रहा है, वह बेकार है अथवा उस दूध का सही हक़दार भूख से तड़पता हुआ बच्चा है। अगर भौतिक दृष्टिकोण से देखें, तो उस दूध का सही हक़दार वह भूख से तड़पता हुआ बच्चा ही नजर आता है। परंतु जब हम गहराई से विचार करते हैं, तो यह हमारे ऋषि यों का मत है, कि धर्म की मान्यता के अनुसार भगवान शिव के शिवलिंग के ऊपर दूध से अभिषेक करना महान पुण्य का कर्म होता है।।

अब इसमें दो बातें हैं, एक भौतिक दृष्टिकोण से प्रत्यक्ष दिखती हुई भावनाएं तो दूसरी तरफ धर्म। यहां बच्चे को दूध दे तो धर्म से विचलित होते हैं और शिवलिंग के ऊपर दूध चढ़ाएं वह बच्चा भूख से तड़प रहा होता है। ऐसे में यह बहुत बड़ा धर्म संकट होता है ऐसी स्थिति में हमारे निर्णय लेने की क्षमता थम सी जाती है। ऐसी स्थिति में हम क्या करें? यह एक बहुत बड़ा प्रश्न है।।

सर्वप्रथम हम दान के अंगों के विषय में जानते हैं। मुख्य रूप से शास्त्रानुसार दान के छः अंग होते हैं, तो आइये जानते हैं दान के उस छः अंगों के विषय में।।

दाता प्रतिगृहीता च शुद्धिर्देयं च धर्मयुक्।
देशकालौ च दानानामङ्गन्येतानि षड् विदुः।।

अर्थ:- दाता (दान देने वाला), दान लेनेवाला (सुपात्र), पावित्र्य (शुद्ध भावना से), देय वस्तु (क्या किसको दे रहे हैं), देश (किस स्थान पर दे रहे हैं), और काल (किस समय दे रहे हैं) – ये छ: दान के अंग हैं।।

ये तो हो गयी कि असल में दाता कौन है? तथा किसे दिया जाय। साथ ही किस स्थान पर और किसे देना चाहिये एवं किस भाव से देना चाहिये। अब इसके अभिप्राय को समझने का प्रयत्न करते हैं।।

मित्रों, शास्त्र कहता है, कि अपनी कमाई का 10 प्रतिशत दान करना चाहिए हर एक व्यक्ति को। ऐसे में 10% को कहां किसके ऊपर और किस प्रकार खर्च करना है।।

शास्त्रानुसार 10 में से 5% बिल्कुल विशुद्ध कर्मकांड के ऊपर दान करना चाहिए। अपने स्वार्थ हेतु अथवा अपने कल्याण के निमित्त दैविय साधना में 5% धन का खर्च बिलकुल ईमानदारी से करना चाहिए।।

बचे 5 प्रतिशत को साधु-संतजन जो तपस्वी हैं अथवा जो धर्म प्रचार में लगे हुए हैं एवं जो गरीब तथा बेरोजगार हैं अथवा विकलांग है, ऐसे लोगों के ऊपर अपना 5% दान करना चाहिए।।

मंदिर में आप धर्म की भावना लेकर जाते हैं और कोई गरीब अगर वहीं बैठा है तो इसका मतलब है, कि वह वास्तव में लाचार नहीं है मजबूर नहीं है। बल्कि भीख मांगना उसका फैशन बन गया है और उसे ही वह कमाई का जरिया बना कर बैठा है।।

इसलिए पहले तो इस तरह की उलझन एवं इस तरह कि बातों में फँसने से पहले आप अपने आप को देखिए, कि क्या ईमानदारी से आप अपनी आमदनी का दसवां हिस्सा दान करने को तैयार हैं।।

दूसरी बात इस प्रकार की विकृत भावनाएं किसी मिशनरी के तहत हिंदुओं को भ्रम में डालने के लिए फैलाए जाते हैं। जिसे अज्ञानतावश बड़े से बड़े कुलीन लोग भी उनके झांसे में आकर इस तरह की विकृत बातों का भ्रामक प्रचार करने में लग जाते हैं।।

इससे हमें बचना है और दूसरों को भी बचाना है। शास्त्रों में यह भी ति हर जगह लिखा है, कि गरीबों एवं लाचारों कि मदद करो। ध्यान रखें धर्म को इसी अनुसार करना है क्योंकि शास्त्रानुसार यही सही है।।

नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।
जय जय श्री राधे ।।
जय श्रीमन्नारायण ।।

मुरली वाले ने ऐसा, करम कर दिया, अब किसी के रहम, की जरुरत नहींMurali Wale Ne Aisa Karam Kar Diya.

मुरली वाले ने ऐसा, करम कर दिया,
अब किसी के रहम, की जरुरत नहीं।
नैनो से नैना मिले, हम उनके हो गए,
अब किसी के रहम, की जरुरत नहीं।।
तेरे चरणों में, आ गए मोहन,
नजरो से दिल में, समा गए मोहन,
अब किसी के, रहम की जरुरत नहीं,
मुरली वाले ने ऐसा, करम कर दिया,
अब किसी के रहम, की जरुरत नहीं।
Murali Wale Ne Aisa
मुखड़ा ये तेरा, भा गया मोहन,
बावरे मन में, आ गया मोहन,
अब किसी और, चाहत की परवाह नहीं,
मुरली वाले ने ऐसा, करम कर दिया,
अब किसी के रहम, की जरुरत नहीं।
तुम को ही चाहूँ, सांझ सवेरे,
चैन ना आए, बिना अब तेरे,
अब बिना तेरे, हमको तो जीना नहीं,
मुरली वाले ने ऐसा, करम कर दिया,
अब किसी के रहम, की जरुरत नहीं।
Murali Wale Ne Aisa
मुरली वालें ने ऐसा, करम कर दिया,
अब किसी के रहम, की जरुरत नहीं।
नैनो से नैना मिले, हम उनके हो गए,
अब किसी के रहम, की जरुरत नहीं।।

नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

जय जय श्री राधे ।।
जय श्रीमन्नारायण ।।

पर्दा ना कर पुजारी दिखने दे राधा प्यारी।। parda naa kar pujari dikhane de radha pyari.

पर्दा ना कर पुजारी दिखने दे राधा प्यारी ।
मेरे पास वक्त कम है और बात है ढेर सारी ।।
कहने दे मुझको मेरे मन में जो चल रहा है ।
एक आस के सहारे जीवन निकल रहा है ।।
बड़ी मुश्किल को सह कर आई है अब मेरी बारी,
पर्दा ना…….
dikhane de radha pyari
जग ने जो तीर मारे मैं थक के गिर पड़ी थी ।
जब होश आयी मुझको श्यामा सामने खड़ी थी ।।
फिर हाथ ऐसा थामा चढ़ी नाम की खुमारी ।
पर्दा ना……

dikhane de radha pyari

भव सिंधु में गिरी थी कैसे मुझे उबारा ।
मैं खुद नहीं हूँ आयी इनका हुआ इशारा ।।
क्या क्या सुनाये तुमको हरिदास ये बिचारी ।
पर्दा ना……..
dikhane de radha pyari

 

कुछ शायरियाँ:- इस तरह मेरी तरफ मेरा कन्हैया देखे ।
दर्द दिल में ही रहे और दवा हो जाए ।।
जिंदगी को मिले कोई हुनर ऐसा भी ।
सबमे मौजूद भी हो और फना हो जाए ।।

दिल में उम्मीद की समां जला रखी है ।
हमने अपनी अलग दुनिया बसा रखी है ।।
इस उम्मीद के साथ की आएंगे वो कभी ।
हमने हर राह पर अपनी पलकें बिछा रखी है ।।

क्योंकि प्यारे ! आपके बिना हमारा कोई आस्तित्व ही नहीं बचता ।।

जय जय श्री राधे ।।
जय श्रीमन्नारायण ।।