विचारों की शक्ति से संसार को वश में करें।।

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Vicharon Ki Shakti
Vicharon Ki Shakti

विचारों की शक्ति से संसार को वश में करें।। Vicharon Ki Shakti.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, इस संसार में हम जो कुछ देखते हैं वह सब हमारे विचारों का ही मूर्त रूप है। यह समस्त सृष्टि विचारों का ही चमत्कार है। किसी भी कार्य की सफलता या असफलता, अच्छाई या बुराई और उच्चता या न्यूनता के लिए मनुष्य के अपने विचार ही उत्तरदायी होते हैं। जिस प्रकार के विचार होंगे, सृजन भी उसी प्रकार का होगा।।

विचार अपने आप में एक ऐसी शक्ति है जिसकी तुलना में संसार की समस्त शक्तियों का समन्वय भी हल्का पड़ता है। विचारों का दुरुपयोग स्वयं का ही नहीं अपितु संसार का भी विनाश कर सकता है। सूर्य की किरणें जब शीशे द्वारा एक ही केंद्र पर डाली जाती हैं तो उससे अग्नि उत्पन्न हो जाती है।।

इसी प्रकार विचारों का एक केंद्र पर एकाग्र होने से जो शक्ति निर्मित होती है वह संसार को भी वशिभुय कर सकती हैं। आशय यह है, कि हमारे विचारों की ताकत हमारे मन की एकाग्रता पर निर्भर करती है। एकाग्रता के बिना मानसिक सामर्थ्य अथवा मन का बल प्राप्त नहीं हो सकता।।

परमार्थ के क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि संसार के व्यावहारिक कार्यों में भी एकाग्रता की बड़ी आवश्यकता होती है। जो मनुष्य जैसा विचार करता है, वैसा ही कार्य करता है। फिर वैसी ही उसकी आदत बन जाती है और अंत में वैसा ही उसका स्वभाव बन जाता है।।

भगवान ने गीता में भी ऐसा ही कहा है, कि जो जैसा सोचता है वह वैसा ही बन जाता है। यदि आप उत्तम जीवन जीना चाहते हैं तो आपको वैसे ही विचार करने का अभ्यास करना चाहिए। विचारों का सदुपयोग करने से मनुष्य विश्व विजयी भी हो सकता है।।

हजारों आविष्कार उन्हीं अच्छे विचारों के परिणाम हैं। विचार करते समय ध्यान रखना चाहिये, कि सकारात्मक बातों, दृश्यों, वस्तुओं और पदार्थो के बारे में ही चिंतन करना चाहिए। ताकि हमारे मन में आनंदपूर्ण विचारों का ही प्रवाह बहता रहे तथा उदासीनता के विचार हमारे पास फटकने तक न पाएं।।

बेईमानी, धोखेबाजी और खुदगर्जी के विचार लौकिक और पारलौकिक दोनों ही दृष्टि से बहुत ही घातक होते हैं। इस प्रकार के विचारों वाले व्यक्ति को पग-पग पर घृणा, उपहास, बदनामी और अविश्वास का सामना करना पड़ता है।।

विचारों का सदुपयोग करने के लिए विचारों को योजनाबद्ध बनाना चाहिए। एकाग्रता का तात्पर्य है, कि अस्त-व्यस्त ढंग से सोचने की बुरी आदत को क्रमबद्ध और सुसंस्कृत बनाया जाए। ताकि उसका सदुपयोग हम कर सकें तथा जीवन को उन्नत एवं सुसंस्कृत बना सकें।।

आप सभी अपने मित्रों को फेसबुक पेज को लाइक करने और संत्संग से उनके विचारों को धर्म के प्रति श्रद्धावान बनाने का प्रयत्न अवश्य करें।।

नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम्।।

।। नमों नारायण ।।

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भागवत प्रवक्ता- स्वामी धनञ्जय जी महाराज "श्रीवैष्णव" परम्परा को परम्परागत और निःस्वार्थ भाव से निरन्तर विस्तारित करने में लगे हैं। श्रीवेंकटेश स्वामी मन्दिर, दादरा एवं नगर हवेली (यूनियन टेरेटरी) सिलवासा में स्थायी रूप से रहते हैं। वैष्णव धर्म के विस्तारार्थ "स्वामी धनञ्जय प्रपन्न रामानुज वैष्णव दास" के श्रीमुख से श्रीमद्भागवत जी की कथा का श्रवण करने हेतु संपर्क कर सकते हैं।।

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