भगवान श्रीजगन्नाथ जी और भक्त माधवदास की कटहल चोरी की कथा।। Lord Jagannath and Madhavdas Ki Katha.
जय जगन्नाथ! भगवान श्रीजगन्नाथ जी अपने भक्तों के साथ जो लीलाएँ रचते हैं, वे सुनने में जितनी अद्भुत लगती हैं, उतनी ही मार्मिक भी होती हैं। ऐसी ही एक प्रसंग है भक्त माधवदास जी की है जिनका प्रभु के साथ सखा भाव था। प्रभु उन्हें अपना सखा मानते थे और सखा की भाँति ही उनके साथ खेला भी करते थे। ठीक वैसे ही जैसे वृंदावन में बाल-गोपाल अपने ग्वाल-बालों के संग करते थे।।
कौन थे भक्त माधवदास जी।। Who was Bhakt Madhavdas.
श्रीक्षेत्र पुरी के पास ही माधवदास जी एकाकी जीवन व्यतीत करते थे। संसार से उनका कोई विशेष नाता नहीं था। न धन की चाह, न मान की इच्छा – बस एक ही धुन थी, प्रभु का भजन। दिन हो या रात, वे अपनी कुटिया में बैठे श्रीजगन्नाथ जी का नाम-स्मरण करते रहते थे।।
और नित्य भगवान के दर्शन करने मंदिर जाया करते थे। उनकी भक्ति में इतनी सरलता और इतना निश्छल प्रेम था कि प्रभु स्वयं कभी-कभी उनसे मिलने चले आते थे। यह सखा भाव इतना प्रगाढ़ था कि भगवान माधवदास जी के साथ बालकों जैसी नटखट लीलाएँ भी रचा करते थे।।
प्रभु की अद्भुत इच्छा।। The Lord’s wondrous will.
एक दिन की बात है। माधवदास जी प्रभु के दर्शन को पहुँचे तो देखा कि प्रभु का मुख कुछ उदास-सा है, मानो मन किसी बात के लिए मचल रहा हो। माधवदास जी से रहा न गया, पूछ बैठे – “प्रभु, आज आप कुछ उदास से जान पड़ते हैं। ऐसी क्या बात है?”
भगवान मुस्कुराए और बोले – “माधवदास, मुझे तो यहाँ प्रतिदिन छप्पन भोग मिलते हैं, किसी वस्तु की कमी नहीं। किंतु जो आनंद माता यशोदा के हाथों माखन खाने में था। जो सुख सखाओं के संग मिलकर चोरी से माखन चुराने में था। वह आनंद इस राजभोग में कहाँ? आज मन कर रहा है कि राजा के बगीचे से कटहल चुराकर खाऊँ।।”
यह सुनकर माधवदास जी अचरज में पड़ गए। बोले – “प्रभु, चोरी करना तो हमने कभी सीखा ही नहीं। जीवन भर तो बस आपका भजन ही किया है। फिर भला चोरी कैसे करूँ?”
प्रभु ने हँसते हुए कहा – “इसमें चिंता की कोई बात नहीं, मन दृढ़ करो, चोरी की विद्या मैं स्वयं सिखा दूँगा। बस थोड़ी फुर्ती और सावधानी रखनी होती है, और कुछ नहीं।।”
माधवदास जी ने सोचा, राजा तो उनके परम शिष्यों में से हैं, कल जाकर विनम्रता से माँग लेंगे तो सहज ही कटहल मिल जाएगा। चोरी की क्या आवश्यकता? किंतु प्रभु कहाँ मानने वाले थे। उन्होंने कहा – “माँगकर पाने का सुख और है, और चुराकर पाने का आनंद बिल्कुल और। आज तुम्हें भी वही आनंद चखाना है। चलो मेरे साथ।।”
राजा के बगीचे में रात्रि-लीला।। Night-play in the King’s garden.
भक्त की न कुछ चलती है प्रभु के आगे! माधवदास जी अनमने मन से प्रभु के साथ चल पड़े। रात्रि के सन्नाटे में दोनों राजा के उस बगीचे में जा पहुँचे, जहाँ बड़े ही सुंदर, पके हुए कटहल फलों से लदे वृक्ष खड़े थे। प्रभु ने धीरे से कहा – “माधवदास, तुम वृक्ष पर चढ़ जाओ, सबसे अच्छे और सबसे बड़े कटहल तोड़कर नीचे गिराओ, मैं यहीं नीचे खड़ा होकर थाम लूँगा। फिर हम दोनों यहाँ से निकल लेंगे।।”
माधवदास जी भोले भक्त थे, प्रभु की आज्ञा शिरोधार्य कर वृक्ष पर चढ़ गए और एक के बाद एक कटहल तोड़-तोड़कर नीचे गिराने लगे। किंतु फलों के गिरने की आहट से बगीचे के रखवाले माली जाग उठे और लाठी लिए उसी दिशा में दौड़ पड़े जहाँ से आवाज़ आ रही थी।।
रखवालों को आता देख प्रभु तो पल भर में चहारदीवारी लाँघकर अंतर्ध्यान हो गए। किंतु बेचारे माधवदास जी वृक्ष से उतरते-उतरते रंगे हाथों पकड़े गए। अंधेरी रात में मालियों ने उन्हें पहचाना नहीं, बस चोर समझकर खूब लाठियाँ बरसाईं और रातभर के लिए बाँधकर रख दिया।।
प्रभात की लीला और सत्य का उजागर होना।। The play of dawn and the revelation of truth.
रात्रि भर माधवदास जी बंधे रहे, न कोई शिकायत, न कोई विलाप। मुख पर वही सहज भाव, मानो यह भी प्रभु की ही एक लीला हो। जब प्रातःकाल हुआ और मंदिर में सेवक जन भगवान श्रीजगन्नाथ जी का श्रृंगार करने पहुँचे, तो सबने आश्चर्यचकित होकर देखा – प्रभु के दिव्य विग्रह पर मार के वही निशान थे, जो रातभर बेचारे माधवदास जी की देह पर पड़े थे!।।
यह देखकर सभी सन्न रह गए। जब यह बात राजा तक पहुँची और उन्होंने माधवदास जी को बंधन से मुक्त करवाया, तो सत्य सबके समक्ष प्रकट हो गया – जो दंड भक्त को मिला, वह वस्तुतः स्वयं भगवान ने अपनी देह पर सह लिया था। भक्त और भगवान में कोई भेद ही नहीं रह गया था। राजा ने जब यह लीला देखी तो उनका हृदय भक्ति और श्रद्धा से भर उठा, और उन्होंने माधवदास जी को अत्यंत सम्मान सहित विदा किया।
कथा का सार।। Summary of the story.
यह कथा हमें सिखाती है कि भगवान अपने भक्त से किसी बड़े ऐश्वर्य या राजभोग की अपेक्षा नहीं रखते, वे तो बस निश्छल प्रेम और सखा भाव के भूखे हैं। जिस प्रकार माता यशोदा के आँगन में गोपाल ने माखन-चोरी की लीलाएँ रचीं, उसी प्रकार श्रीक्षेत्र पुरी में प्रभु श्रीजगन्नाथ जी ने अपने भक्त माधवदास के साथ कटहल-चोरी की लीला रचकर यह सिद्ध किया कि जो भक्त सच्चे हृदय से प्रभु को अपना सखा मान लेता है, प्रभु भी उसका कष्ट अपनी देह पर लेने में तनिक संकोच नहीं करते।।
भक्त और भगवान के इस अनूठे प्रेम-संबंध की यह कथा आज भी पुरी क्षेत्र में बड़े श्रद्धा भाव से सुनाई-सुनी जाती है, और भक्तों के हृदय को प्रभु के प्रति और भी अधिक समर्पित कर देती है।।
जय श्रीमन्नारायण ।।
जय श्रीजगन्नाथ! जय भक्त माधवदास!
