कर्ता भाव हटाइए होगा चमत्कार।।

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Karta Bhav Hatao Unnati Hoga
Karta Bhav Hatao Unnati Hoga

कर्ता भाव हटाइए होगा चमत्कार।। Karta Bhav Hatao Unnati Hoga.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, हमारी आदत है, किसी भी कर्म में अपने कर्ता भाव का प्रदर्शन करने की। परन्तु कर्म करते समय ही अपने कर्ता भाव को हटाइए, फिर देखिए कैसा चमत्कार होता है आपके जीवन। चमत्कार आपके लिए कोई दूसरा नहीं कर सकता।।

उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्‌ ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ।।


अर्थ:- अपने आप के द्वारा इस संसार-समुद्र से स्वयं का उद्धार हम कर सकते हैं एवं स्वयं अपने को हम अधोगति में भी ड़ाल सकते हैं। क्योंकि हम मनुष्य स्वयं ही तो अपना मित्र हैं और स्वयं ही अपना शत्रु भी हैं।।5।।(गी. अ. 6, श्लो. 5.)

मित्रों, एक पुरानी कहानी है, कि एक पण्डित जी ने अपनी पत्नी की आदत बना दी थी कि घर में रोटी खाने से पहले कहना है कि “कृष्णार्पण” बोलो फिर रोटी खाओ। अगर पानी पीना हो तो पहले कहना है कि “कृष्णार्पण”। उस औरत की इतनी आदत पक्की हो गई, कि जो भी काम करती पहले मन में यह कहती कि “कृष्णार्पण” “कृष्णार्पण”। फिर वह काम करती।।

एक दिन उसने घर का कूड़ा इकट्ठा किया और फेंकते हुए कहा कि “कृष्णार्पण” “कृष्णार्पण”। वहीँ पास से नारद मुनि जा रहे थे। नारद मुनि ने जब यह सुना तो उस औरत को थप्पड़ मारा कि विष्णु जी को कूड़ा अर्पण कर रही है। फेंक कूड़ा रही है और कह रही है कि “कृष्णार्पण”। वह औरत विष्णु जी के प्रेम में रंगी हुई थी। कहने लगी नारद मुनि तुमने जो थप्पड़ मारा है वो थप्पड़ भी “कृष्णार्पण”।।


अब नारद जी ने दूसरे गाल पर थप्पड़ मारते हुए कहा कि बेवकूफ़ औरत तू थप्पड़ को भी “कृष्णार्पण” कह रही है। उस औरत ने फिर यही कहा आपका मारा यह थप्पड़ भी “कृष्णार्पण”। इसके बाद जब नारद वैकुंठ में गए तो क्या देखते है, कि भगवान विष्णु के दोनों गालों पर उँगलियों के निशान बने हुए थे। नारद पूछने लगे कि “भगवन यह क्या हो गया”? आप के चेहरे पर यह निशान कैसे पड़े”?

भगवान विष्णु कहने लगे कि “नारद मुनि थप्पड़ मारे भी तू और पूछे भी तू”। नारद जी कहने लगे कि “मैं आपको थप्पड़ कैसे मार सकता हूँ”? भगवान विष्णु कहने लगे, “नारद मुनि जिस औरत ने कूड़ा फेंकते हुए यह कहा था, “कृष्णार्पण” और तूने उसको थप्पड़ मारा था तो वह थप्पड़ सीधे मेरे को ही लगा था, क्योकि वह मुझे अर्पण था”।।

मित्रों, जब हम कर्म करते समय कर्ता का भाव को निकाल लेते हैं और अपने हर काम में मैं, मेरी, मेरा की भावना हटा कर अपने इष्ट या सद्गुरु को आगे रखते हैं तो कर्मों का बोझ भी नहीं बढ़ता और वो काम आप से भी अच्छे तरीके से हो जाता है।।


मानस मे गोस्वामी जी रामजी से कहलवाते हैं:- मैं अरु मोर तोर तैं माया। जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया।।1।। अर्थ:- (श्री रामजी कहते हैं) हे तात! मैं थोड़े ही में सब समझाकर कहे देता हूँ। तुम मन, चित्त और बुद्धि लगाकर सुनो! मैं और मेरा, तू और तेरा- यही माया है, जिसने समस्त जीवों को वश में कर रखा है।।
              

।। नारायण सभी का कल्याण करें ।।
 
 
जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम् ।।
 
जय जय श्री राधे ।।
जय श्रीमन्नारायण ।।
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भागवत प्रवक्ता- स्वामी धनञ्जय जी महाराज "श्रीवैष्णव" परम्परा को परम्परागत और निःस्वार्थ भाव से निरन्तर विस्तारित करने में लगे हैं। श्रीवेंकटेश स्वामी मन्दिर, दादरा एवं नगर हवेली (यूनियन टेरेटरी) सिलवासा में स्थायी रूप से रहते हैं। वैष्णव धर्म के विस्तारार्थ "स्वामी धनञ्जय प्रपन्न रामानुज वैष्णव दास" के श्रीमुख से श्रीमद्भागवत जी की कथा का श्रवण करने हेतु संपर्क कर सकते हैं।।

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