श्रीविष्णुपरिवर्तनोत्सव।। Shri Vishnu Parivartan Utsav.
लेख का परिचय।। Introduction.
मित्रों, सनातन धर्म में चातुर्मास का समय अत्यंत पवित्र माना गया है। क्योंकि इसी अवधि में भगवान श्रीविष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में लीन हो जाते हैं। परंतु इस चार महीने की गहन निद्रा के बीच भी एक ऐसा दिन आता है। जब प्रभु अपना करवट बदलते हैं। और यही करवट बदलने का पावन क्षण श्रीविष्णुपरिवर्तनोत्सव कहलाता है। भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को यह उत्सव मनाया जाता है। इसीलिए इस एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी भी कहा जाता है। धर्मशास्त्रों में इसका इतना अधिक महत्व बताया गया है कि इसे कार्तिक मास की देवउठनी एकादशी जितना ही पुण्यदायी माना गया है।।
पौराणिक मान्यता के अनुसार जब भगवान क्षीरसागर में शयन करते हुए करवट बदलते हैं। तो उस क्षण संपूर्ण सृष्टि में एक विशेष प्रकार की ऊर्जा तरंगित होती है। इसी कारण इस दिन विष्णु-पूजा, व्रत तथा दान करने से जातक को असाधारण पुण्यफल की प्राप्ति होती है। श्रीविष्णुपुराण में इस व्रत की महिमा का विस्तृत वर्णन मिलता है। और इसे परिवर्तिनी एकादशी, पार्श्व एकादशी तथा वामन एकादशी, इन तीनों नामों से भी जाना जाता है। तीनों नाम अपने-अपने ढंग से इसी एक घटना अर्थात प्रभु के करवट बदलने की ओर संकेत करते हैं।।
मित्रों, इस दिन भगवान विष्णु के पाँचवें अवतार अर्थात वामन अवतार की पूजा का विशेष विधान बताया गया है। इसी कारण इसे वामन जयंती अथवा वामन एकादशी भी कहा जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार राजा बलि के अहंकार को शांत करने हेतु भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण कर तीन पग भूमि माँगी थी। और तीसरा पग बलि के मस्तक पर रखकर उन्हें पाताल लोक भेज दिया था। यही कथा हमें यह सीख देती है कि सच्चा सामर्थ्य विनम्रता तथा धर्म में ही निहित होता है, न कि अहंकार अथवा भौतिक शक्ति में।।
मित्रों, आज हम विस्तार से जानेंगे कि वर्ष 2026 में श्रीविष्णुपरिवर्तनोत्सव अर्थात परिवर्तिनी एकादशी कब मनाई जाएगी। पूजा का शुभ मुहूर्त क्या रहेगा। व्रत की विधि किस प्रकार संपन्न की जाती है। तथा भारत के किन-किन प्रदेशों में यह उत्सव विशेष रूप से प्रचलित तथा लोकप्रिय है।।
वर्ष 2026 में तिथि एवं मुहूर्त।। Date and Muhurat in 2026.
मित्रों, वैदिक पंचांगों के अनुसार वर्ष 2026 में श्रीविष्णुपरिवर्तनोत्सव अर्थात परिवर्तिनी एकादशी का व्रत मंगलवार, 22 सितंबर को रखा जाएगा। एकादशी तिथि का आरंभ 21 सितंबर 2026 की संध्या लगभग 8:00 बजे होगा। तथा इसका समापन 22 सितंबर 2026 की रात्रि लगभग 9:43 बजे होगा। चूँकि उदयातिथि तथा सूर्योदयव्यापिनी तिथि की मान्यता के अनुसार व्रत 22 सितंबर को ही रखा जाना शास्त्रसम्मत माना गया है। इसलिए इसी दिन व्रत तथा पूजा-अर्चना संपन्न करनी चाहिए।।
व्रत का पारण सदैव द्वादशी तिथि में किया जाता है। और वर्ष 2026 में यह पारण 23 सितंबर को प्रातः लगभग 6:10 बजे से 8:35 बजे के मध्य किया जाएगा। पारण के समय का विशेष ध्यान रखना चाहिए। क्योंकि गलत समय पर पारण करने से व्रत का समुचित फल प्राप्त नहीं होता। मित्रों, यहाँ यह भी बता दूँ कि उपवास तथा पारण से जुड़े इन समयों में स्थान-विशेष के पंचांग के अनुसार कुछ मिनटों का अंतर संभव है। इसलिए अपने क्षेत्र के पंचांग अथवा स्थानीय पुरोहित से एक बार अवश्य पुष्टि कर लें।।
पूजा का शुभ मुहूर्त सामान्यतः प्रातःकाल स्नान-ध्यान के पश्चात रखा जाता है। तथा संध्याकाल में भी विशेष आरती एवं भजन-कीर्तन का आयोजन किया जाता है। भाद्रपद माह वैसे भी भगवान विष्णु की पूजा के लिए अत्यंत उत्तम माना गया है। तथा इसी माह में अजा एकादशी तथा परिवर्तिनी एकादशी दोनों का सुंदर संयोग बनता है। जो इस माह की धार्मिक महत्ता को और अधिक बढ़ा देता है।।
व्रत एवं पूजा की विधि।। Vrat and Puja Vidhi.
मित्रों, इस व्रत की विधि अन्य एकादशियों की भाँति ही आरंभ होती है। अर्थात दशमी तिथि की संध्या से ही सात्विक तथा हल्का आहार ग्रहण करना चाहिए। तथा एकादशी के दिन प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करने के पश्चात व्रत का संकल्प लेना चाहिए। घर के पूजा-स्थान को स्वच्छ करके वहाँ भगवान विष्णु अथवा वामन अवतार की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। तथा पीले वस्त्र, पीले पुष्प एवं तुलसी दल अर्पित करें। भगवान को पंचामृत से स्नान कराकर विधिवत पूजा करनी चाहिए।।
पूजा के दौरान “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” इस मंत्र का जप करते हुए भगवान को भोग अर्पित करें। तथा विष्णु सहस्रनाम अथवा वामन अवतार की कथा का श्रवण अवश्य करें। दिनभर निराहार अथवा फलाहार व्रत रखते हुए मन को धार्मिक कार्यों में लगाना चाहिए। तथा व्यर्थ की बातों एवं क्रोध से बचना चाहिए। संध्याकाल में दीपदान करना तथा भगवान की आरती करना भी इस व्रत का अनिवार्य अंग माना जाता है।।
अगले दिन द्वादशी तिथि में निर्धारित शुभ मुहूर्त पर ब्राह्मण भोजन कराकर तथा दान-पुण्य करके ही व्रत का पारण करना चाहिए। इस दिन वस्त्र, अन्न, छाता अथवा जल से भरा कलश दान करना विशेष रूप से पुण्यदायी माना गया है। जो जातक इस व्रत को पूर्ण श्रद्धा तथा नियम-संयम के साथ करते हैं। उन्हें समस्त पापों से मुक्ति तथा सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है, ऐसी धार्मिक मान्यता है।।
किन प्रदेशों में यह उत्सव अधिक प्रचलित है।। Regions Where This Festival Is Most Popular.
मित्रों, यह उत्सव संपूर्ण भारत में विष्णु-भक्तों द्वारा श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है। परंतु कुछ प्रदेशों में इसका स्वरूप विशेष रूप से भव्य तथा सार्वजनिक देखने को मिलता है। राजस्थान, मध्य प्रदेश तथा ब्रज क्षेत्र अर्थात मथुरा-वृंदावन में इसे जलझूलनी एकादशी अथवा डोल ग्यारस के नाम से बड़े उत्साह से मनाया जाता है। इन क्षेत्रों में भगवान की प्रतिमा को सुसज्जित पालकी अथवा डोले में बिठाकर भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है। तथा उन्हें नदी अथवा तालाब में औपचारिक स्नान कराया जाता है।।
उडिशा, गुजरात तथा दक्षिण भारत के अनेक वैष्णव मंदिरों में भी इस दिन विशेष पूजा-अर्चना तथा भजन-कीर्तन का आयोजन होता है। पुष्टिमार्ग तथा रामानंदी जैसी वैष्णव परंपराओं में भी इस दिन को अत्यंत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। क्योंकि इन संप्रदायों में भगवान विष्णु तथा उनके अवतारों की उपासना का विशेष स्थान है। इस्कॉन से जुड़े मंदिरों में भी परिवर्तिनी एकादशी को पूरे विश्व में एक प्रमुख वैष्णव पर्व के रूप में मनाया जाता है।।
गाँव-देहात के क्षेत्रों में इस दिन को कृषि तथा वर्षा ऋतु के समापन से भी जोड़कर देखा जाता है। क्योंकि इसी समय के आसपास फसलों की देखभाल का कार्य विशेष रूप से किया जाता है। यही कारण है कि यह उत्सव केवल एक धार्मिक अनुष्ठान न होकर, ग्रामीण जीवन तथा सामाजिक एकता का भी प्रतीक बन जाता है। जहाँ पूरा गाँव मिलकर भगवान की शोभायात्रा में सम्मिलित होता है।।
लेख का निष्कर्ष।। Conclusion.
मित्रों, श्रीविष्णुपरिवर्तनोत्सव हमें यह सुंदर संदेश देता है कि विश्राम के क्षणों में भी परिवर्तन तथा गति अवश्य बनी रहती है। और यही जीवन का शाश्वत नियम भी है। वामन अवतार की कथा हमें विनम्रता तथा धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। जबकि प्रभु का करवट लेना स्वयं में यह दर्शाती है कि परिवर्तन ही सृष्टि का स्वाभाविक स्वभाव है।।
जो श्रद्धालु इस पावन तिथि को व्रत, पूजा तथा दान के माध्यम से मनाते हैं। वे न केवल धार्मिक पुण्य अर्जित करते हैं। बल्कि अपने जीवन में भी नई ऊर्जा तथा सकारात्मकता का संचार अनुभव करते हैं। इसलिए इस वर्ष 22 सितंबर को श्रद्धापूर्वक इस व्रत को अवश्य करें। तथा परिवार सहित भगवान श्रीविष्णु का आशीर्वाद प्राप्त करें।।
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नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।
जय श्रीमन्नारायण ।।
