HomeEkadashi Vratयोगिनी एकादशी व्रत की पूजा विधि एवं व्रत कथा।।

योगिनी एकादशी व्रत की पूजा विधि एवं व्रत कथा।।

योगिनी एकादशी व्रत की पूजा विधि एवं व्रत कथा।। Yogini Ekadashi Vrat Vidhi And Katha.

जय श्रीमन्नारायण,

मित्रों, आषाढ़ कृष्णपक्ष की एकादशी का नाम “योगिनी” है। यह बड़े बडे पातकों का नाश करनेवाली है। संसारसागर में डूबे हुए प्राणियों के लिए यह सनातन नौका के समान है।।

योगिनी एकादशी व्रत की पूजा विधि ।। (Yogini Ekadashi Vrat Vidhi in Hindi).
Yogini Ekadashi Vrat Vidhi And Katha
मित्रों, शास्त्रों के अनुसार योगिनी एकादशी के व्रत की शुरुआत दशमी तिथि की रात से ही हो जाता है। फिर अगली सुबह उठकर नित्यक्रम करने के बाद स्नान करके व्रत का संकल्प लेना चाहिये।।

योगिनी एकादशी व्रत का माहात्म्य सम्पूर्ण ब्रह्मांड में प्रसिद्ध है। इस व्रत को नियमपूर्वक करने से मनुष्य के सभी पापों का नाश हो जाता है तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है।।

योगिनी एकादशी का व्रत दशमी के दिन से ही आरम्भ हो जाता है। अर्थात यह व्रत दशमी की रात से शुरू होकर द्वादशी की सुबह में पूजा एवं दान तथा पारण के बाद पूर्ण होता है।।

मित्रों, स्नान के लिए मिट्टी या तिल के लेप का प्रयोग करना शुभ माना जाता है। स्नान के बाद कुम्भ स्थापित करने का भी विधान है। भगवान विष्णु की मूर्ति रखकर उन्हें स्नान कराकर यथाशक्ति भोग लगाएं।।

फिर इसके बाद फल, फूल, धूप, दीप और नैवेद्य चढायें। फिर दीप से आरती उतारें, इसके बाद योगिनी एकादशी की कथा सुनें। इसके अलावा इस एकादशी के दिन पीपल के पेड़ की पूजा भी जरूर करनी चाहिए। क्योंकि ऐसा करने से सभी तरह के पाप नष्ट हो जाते हैं।।

योगिनी एकादशी व्रत की रात में भगवान विष्णु का जागरण करना चाहिए। पारण यानि द्वादशी के दिन पूजन के बाद ब्राह्मण को भोजन और दान देकर विदा करने के बाद भोजन ग्रहण करना चाहिए।।

योगिनी एकादशी व्रत कथा।। (Yogini Ekadashi Vrat Katha in Hindi)

Yogini Ekadashi Vrat Katha
Yogini Ekadashi Vrat Katha

मित्रों, एक बार युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण से पूछा : वासुदेव! आषाढ़ के कृष्णपक्ष में जो एकादशी होती है, उसका क्या नाम है? तथा किसने इस व्रत को और क्यों किया था? कृपया उसका वर्णन कीजिये।।

भगवान श्रीकृष्ण बोले : नृपश्रेष्ठ! आषाढ़ कृष्णपक्ष की एकादशी का नाम “योगिनी” है। यह बड़े बडे पातकों का नाश करनेवाली है। संसारसागर में डूबे हुए प्राणियों के लिए यह सनातन नौका के समान है।।

अलकापुरी के राजाधिराज कुबेर सदा भगवान शिव की भक्ति में तत्पर रहनेवाले हैं। उनका “हेममाली” नामक एक यक्ष सेवक था, जो पूजा के लिए फूल लाया करता था।।

हेममाली की पत्नी का नाम “विशालाक्षी” था। वह यक्ष कामपाश में आबद्ध होकर सदा अपनी पत्नी में आसक्त रहता था। एक दिन हेममाली मानसरोवर से फूल लाकर अपने घर में ही ठहर गया और पत्नी के प्रेमपाश में खोया रह गया।।

ऐसे में वह महाराज कुबेर के भवन में न जा सका। इधर कुबेर मन्दिर में बैठकर भगवान शिव का पूजन कर रहे थे। उन्होंने दोपहर तक फूल आने की प्रतीक्षा की।।

जब पूजा का समय व्यतीत हो गया तो यक्षराज ने कुपित होकर सेवकों से कहा : “यक्षों! यह दुरात्मा हेममाली अबतक क्यों नहीं आया कहाँ रह गया, पता लगाओ?”

यक्षों ने कहा: राजन्! वह तो पत्नी की कामना में आसक्त हो घर में ही रमण कर रहा है। यह सुनकर कुबेर क्रोध से भर गये और तुरन्त ही हेममाली को बुलवाया। वह आकर कुबेर के सामने खड़ा हो गया।।

उसे देखकर कुबेर बोले : “ओ पापी! अरे दुष्ट ! ओ दुराचारी! तूने भगवान की अवहेलना की है। इसलिए अब तूं कोढ़ से युक्त और अपनी उस प्रियतमा से वियुक्त होकर इस स्थान से भ्रष्ट होकर अन्यत्र चला जा।।”

कुबेर के ऐसा कहने पर वह उस स्थान से नीचे गिर गया। कोढ़ से सारा शरीर पीड़ित था परन्तु शिव पूजा के प्रभाव से उसकी स्मरणशक्ति लुप्त नहीं हुई। तदनन्तर वह पर्वतों में श्रेष्ठ मेरुगिरि के शिखर पर गया।।

वहाँ पर मुनिवर मार्कण्डेयजी का उसे दर्शन हुआ। पापकर्मा यक्ष ने मुनि के चरणों में प्रणाम किया। मुनिवर मार्कण्डेय ने उसे भय से काँपते देख कहा : “तुझे कोढ़ के रोग ने कैसे दबा लिया?”

यक्ष बोला : हे मुने ! मैं कुबेर का अनुचर हेममाली हूँ। मैं प्रतिदिन मानसरोवर से फूल लाकर शिव पूजा के समय कुबेर को दिया करता था। एक दिन पत्नी सहवास के सुख में फँस जाने के कारण मुझे समय का ज्ञान ही नहीं रहा।।

इसलिये राजाधिराज कुबेर ने कुपित होकर मुझे शाप दे दिया, जिससे मैं कोढ़ से आक्रान्त होकर अपनी प्रियतमा से बिछुड़ गया। हे मुनिश्रेष्ठ ! संतों का चित्त स्वभावत: परोपकार में लगा रहता है।।

यही सोंचकर मैं आपके पास आया हूँ! इसलिये मुझ अपराधी को कर्त्तव्य का उपदेश दीजिये। मार्कण्डेयजी ने कहा: तुमने यहाँ सच्ची बात कही है, इसलिए मैं तुम्हें कल्याणप्रद व्रत का उपदेश करता हूँ।।

तुम आषाढ़ मास के कृष्णपक्ष की “योगिनी एकादशी” का व्रत करो। इस व्रत के पुण्य के प्रभाव से तुम्हारा कोढ़ निश्चय ही दूर हो जायेगा और तुम पहले की भाँती।।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं: राजन्! मार्कण्डेयजी के उपदेश से उसने “योगिनी एकादशी” का व्रत किया। जिससे उसके शरीर को कोढ़ दूर हो गया। उस उत्तम व्रत का अनुष्ठान करने पर वह पूर्ण सुखी हो गया।।

नृपश्रेष्ठ! यह “योगिनी एकादशी” का व्रत ऐसा पुण्यशाली है कि अठ्ठासी हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने से जो फल मिलता है, वही फल इस “योगिनी एकादशी” का व्रत करनेवाले मनुष्य को मिलता है।।

“योगिनी एकादशी” महान पापों को दूर करनेवाली और महान पुण्य फल देनेवाला व्रत है। इस माहात्म्य को पढ़ने और सुनने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है।।

नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।

जय जय श्री राधे ।।
जय श्रीमन्नारायण ।।

Swami Ji Maharaj
Swami Ji Maharajhttp://sansthanam.com
''स्वामी धनञ्जय महाराज'' जो वैदिक आध्यात्मिक वाङ्गमयी व्यास परम्परा कि विलक्षण तथा रसमयी वाग्धारा को प्रवाहित करने वाले परम संत हैं । जो हास्यात्मक एवं कवित्व कला से परिपूर्ण भागवत कथा के माध्यम से भक्तों के मन को अनायास ही भगवान श्री मुरली मनोहर कृष्ण के श्री चरणों में लगा देते हैं ।। स्वामी जी हिन्दी, गुजराती, अवधी एवं भोजपुरी में सरस भागवत कथा एवं श्री राम कथा कहते हैं । बदले में दक्षिणा की कोई मांग नहीं रखते जो मिल जाय उसी से संतुष्ट रहते हैं ।। स्वामी जी को ''वेंकटेश स्वामी का मंदिर'' सिलवासा (संघ शासित प्रदेश, दादरा एवं नगर हवेली) में भगवत्कृपा से सेवा का अवसर मिला । पूरी निष्ठा से भगवान की सेवा की । भगवत्कृपा से आज भी वहीँ रहकर भगवान की सेवा करते हुए भागवत जी की कथा का देश-विदेशों में रसमय गायन करते हैं तथा भगवद्भक्ति (भगवान के श्री चरणों) में अपना जीवन समर्पित कर आनन्द का अनुभव करते हैं ।।
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