प्रेम का परम स्वरूप।। Prem Ka Swarup.
भूमिका:- श्रीकृष्ण प्रेम के सर्वोच्च स्वरूप हैं। उनके भीतर अनुराग, माधुर्य, करुणा और सौंदर्य — सबका दिव्य समन्वय है। भक्त उनके प्रेम में डूबकर स्वयं को पाता है। यह रचना उसी परम प्रेम का अभिव्यंजन है। श्रीकृष्ण को प्रेम के परम स्वरूप के रूप में चित्रित करती यह संस्कृतनिष्ठ हिंदी शायरी भाव, माधुर्य और साधना से परिपूर्ण है।।
शायरी:-
कृष्ण स्वयं प्रेम के परम, अनुपम और उदात्त रूप हैं।।
उनके बिना सब रंग फीके, सब सौंदर्य अपूर्ण रूप हैं।।
हृदय में यदि उनका वास हो, तो जीवन में मधुरता आए।।
साधना की हर एक बेला में, शुभता का दीप जल जाए।।
प्रेम यदि निष्कपट हो जाए, तो प्रभु अवश्य मिल जाते।।
भावों की निर्मल सरिता में, वे स्वयं ही उतर आते।।

मुझको केवल इतना वर दो, तेरा प्रेम सदा बना रहे।।
मेरे जीवन के प्रत्येक क्षण में, तेरा ही रस भरा रहे।।
जय श्रीमन्नारायण ।।
