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दशहरा पर्व का संदेश एवं सीख और माहात्म्य।।

दशहरा पर्व का संदेश एवं सीख और माहात्म्य।। Dussehra Parv Ka Sandesh.

दशहरा पर्व का परिचय।। Introduction.

मित्रों, हमने पिछले लेखों में हमने नवरात्रि की नवों देवियों के पूजन-विधान का विस्तार से अध्ययन किया था। तथा अब नवरात्रि के पश्चात आने वाला दशहरा अर्थात विजयादशमी का पर्व संपूर्ण नवरात्रि की साधना के फलस्वरूप प्राप्त होने वाली विजय का ही उत्सव माना जाता है। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व केवल एक सामाजिक उत्सव मात्र नहीं है।।

अपितु यह सत्य, धर्म तथा शुभता की असत्य, अधर्म तथा अशुभता पर होने वाली शाश्वत विजय का प्रतीक भी माना जाता है। इसीलिए इसे “विजयादशमी” के नाम से भी जाना जाता है। इतना ही नहीं यह पर्व हमें यह भी स्मरण करवाता है कि चाहे अंधकार कितना भी सघन क्यों न हो। अंततः प्रकाश की ही विजय होती है। तथा चाहे अधर्म कितना भी बलशाली क्यों न प्रतीत हो। धर्म की शक्ति के समक्ष उसे अंततः पराजित होना ही पड़ता है।।

परन्तु आप बिलकुल घबराएँ नहीं। आज हम इसी विषय पर विस्तार से समझेंगे कि दशहरा पर्व क्यों मनाया जाता है। यह किसके प्रतीक स्वरूप मनाया जाता है। इस पर्व का वास्तविक संदेश क्या है। तथा इससे जुड़ी कुछ विशेष बातें भी आपलोगों को बताएँगे। आज के इस लेख में हम इस विषय पर विस्तार से समझने का प्रयास करेंगे।।

दशहरा पर्व क्यों मनाया जाता है।। Why Is Dussehra Celebrated.

मित्रों, दशहरा पर्व मनाए जाने के पीछे मुख्य रूप से दो महत्वपूर्ण पौराणिक घटनाएँ जुड़ी हुई हैं। प्रथम मान्यता के अनुसार, इसी दिन भगवान श्रीराम ने लंकापति रावण का वध करके माता सीता को उसके बंधन से मुक्त कराया था। तथा धर्म की पुनर्स्थापना की थी। इसीलिए इस दिन रावण, कुंभकर्ण तथा मेघनाद के पुतलों का दहन करके, भगवान श्रीराम की धर्म पर विजय का उत्सव मनाया जाता है।।

द्वितीय मान्यता के अनुसार, इसी दिन माँ दुर्गा ने नवरात्रि के नौ दिनों तक चले भीषण युद्ध के पश्चात महिषासुर नामक अत्यंत बलशाली तथा अहंकारी असुर का वध किया था। तथा संपूर्ण सृष्टि को उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई थी। इसीलिए नवरात्रि की समाप्ति के तुरंत पश्चात आने वाला यह दिन माँ दुर्गा की भी विजय का प्रतीक माना जाता है।।

दशहरा किसके प्रतीक स्वरूप मनाया जाता है।। As A Symbol Of What Is Dussehra Celebrated.

मित्रों, दशहरा पर्व मुख्य रूप से सत्य की असत्य पर, धर्म की अधर्म पर, तथा सद्गुणों की दुर्गुणों पर विजय का प्रतीक है। रावण जहाँ अहंकार, काम-वासना, छल-कपट तथा अधर्म का प्रतीक माना जाता है। वहीं भगवान श्रीराम मर्यादा, धैर्य, करुणा तथा धर्म के साक्षात स्वरूप माने जाते हैं। रावण के दस सिरों को प्रतीकात्मक रूप से मनुष्य के भीतर विद्यमान दस प्रमुख दुर्गुणों का प्रतिक माना जाता है। जैसे काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, स्वार्थ, अन्याय, अहंकार तथा ईर्ष्या का भी प्रतीक माना जाता है।।

इसी प्रकार माँ दुर्गा द्वारा महिषासुर का वध, स्त्री-शक्ति अर्थात शक्ति-तत्व की उस असुरी-प्रवृत्ति पर विजय का प्रतीक है। जो समाज में अहंकार तथा अत्याचार के रूप में प्रकट होती है। अतः दशहरा पर्व वास्तव में हमारे भीतर विद्यमान समस्त नकारात्मक-प्रवृत्तियों के दहन तथा सकारात्मक-गुणों की स्थापना का भी प्रतीक माना जाता है।।

दशहरा पर्व का वास्तविक संदेश।। The Real Message Of The Dussehra Festival.

मित्रों, दशहरा पर्व का सबसे गहन तथा वास्तविक संदेश यही है कि विजय सदैव बाह्य शत्रु पर ही नहीं। अपितु अपने भीतर विद्यमान दुर्गुणों पर भी विजय प्राप्त करनी चाहिए। रावण अत्यंत विद्वान, शक्तिशाली तथा शिव-भक्त होते हुए भी केवल अपने अहंकार तथा अनुचित इच्छाओं के कारण ही विनष्ट हुआ। जो हमें यह शिक्षा देता है कि चाहे कोई व्यक्ति कितना भी सामर्थ्यवान अथवा ज्ञानी क्यों न हो। यदि उसके आचरण में धर्म तथा मर्यादा का अभाव हो। तो उसका पतन निश्चित होता है।।

इसके साथ ही यह पर्व हमें धैर्य, संयम तथा निरंतर प्रयास का भी संदेश देता है। क्योंकि भगवान श्रीराम ने भी रावण पर विजय दीर्घकालिक तपस्या, संगठन-शक्ति तथा धैर्यपूर्ण रणनीति के पश्चात ही प्राप्त की थी। ना कि किसी अल्पकालिक अथवा शीघ्र उपाय से। अतः यह पर्व हमें यह सिखाता है कि जीवन में आने वाली किसी भी बड़ी बाधा पर विजय प्राप्त करने के लिए धैर्य तथा सतत परिश्रम अनिवार्य है।।

दशहरा पर्व से जुड़ी कुछ विशेष बातें।। Some Special Facts Related To Dussehra.

मित्रों, दशहरा पर्व से जुड़ी कुछ विशेष बातें भी अत्यंत रोचक तथा ज्ञानवर्धक हैं। इस दिन शस्त्र-पूजा तथा शमी-वृक्ष के पूजन की भी विशेष परंपरा है। क्योंकि मान्यता है कि महाभारत-काल में पांडवों ने अपने अज्ञातवास की समाप्ति पर अपने शस्त्र शमी-वृक्ष पर से ही पुनः प्राप्त किए थे। तथा इसी दिन से विराट-युद्ध की विजय-यात्रा भी आरंभ हुई थी। अतः इस दिन शस्त्रों तथा वाहनों का पूजन करना भी विशेष रुप से शुभ माना जाता है।।

इसके साथ ही यह भी मान्यता है कि इसी दिन भगवान श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई से पूर्व माँ दुर्गा की विशेष उपासना तथा शक्ति-पूजा की थी। जिसे “अकाल-बोधन” कहा जाता है। क्योंकि सामान्यतः देवी की पूजा वसंत ऋतु में की जाती थी। परंतु श्रीराम ने असमय अर्थात शरद ऋतु में माता की पूजा करके उनकी विशेष कृपा प्राप्त की थी। इसी कारण इसे शारदीय नवरात्रि भी कहा जाता है।।

शास्त्रीय प्रमाण।। Scriptural References.

मित्रों, वाल्मीकि रामायण तथा श्रीमद्देवी भागवत पुराण में दशहरा पर्व को धर्म की अधर्म पर विजय का प्रतीक बताया गया है। स्कंद पुराण में भी यह उल्लेख मिलता है कि आश्विन शुक्ल दशमी को शमी-पूजन तथा विजय-यात्रा आरंभ करना अत्यंत शुभ तथा समस्त कार्यों में सफलता प्रदान करने वाला माना जाता है।।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न।। Frequently Asked Questions. (FAQ)

प्रश्न 1. दशहरा पर्व को विजयादशमी क्यों कहा जाता है।। Why Is Dussehra Called Vijayadashami.

उत्तर:- इसी दिन भगवान श्रीराम ने रावण पर तथा माँ दुर्गा ने महिषासुर पर विजय प्राप्त की थी। इसीलिए इसे विजय की दशमी तिथि अर्थात विजयादशमी कहा जाता है।।

प्रश्न 2. रावण के दस सिरों का प्रतीकात्मक अर्थ क्या है।। What Is The Symbolic Meaning Of Ravana’s Ten Heads.

उत्तर:- रावण के दस सिर मनुष्य के भीतर विद्यमान काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार जैसे दस प्रमुख दुर्गुणों के प्रतीक माने जाते हैं। जिनका दहन करना ही वास्तविक दशहरा पर्व होता है।।

प्रश्न 3. दशहरा पर्व का सबसे महत्वपूर्ण संदेश क्या है।। What Is The Most Important Message Of Dussehra.

उत्तर:- इस पर्व का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि धर्म तथा सद्गुणों के मार्ग पर चलकर, धैर्यपूर्वक प्रयास करने से अधर्म तथा दुर्गुणों पर अवश्य विजय प्राप्त होती है।।

प्रश्न 4. दशहरा के दिन शस्त्र-पूजन क्यों किया जाता है।। Why Is Weapon Worship Done On Dussehra.

उत्तर:- मान्यता है कि पांडवों ने अपने अज्ञातवास की समाप्ति पर इसी दिन शमी-वृक्ष से अपने शस्त्र प्राप्त किए थे। इसीलिए इस दिन शस्त्र-पूजन की परंपरा भी है।।

प्रश्न 5. दशहरा पर्व का नवरात्रि से क्या संबंध है।। What Is The Relation Of Dussehra With Navratri.

उत्तर:- नवरात्रि के नौ दिवसों की माँ दुर्गा की उपासना के पश्चात दसवें दिन महिषासुर पर उनकी विजय का उत्सव ही दशहरा के रूप में मनाया जाता है। अतः यह नवरात्रि-साधना का ही सफल समापन माना जाता है।।

लेख का निष्कर्ष।। Conclusion.

मित्रों, दशहरा पर्व वास्तव में केवल रावण-दहन अथवा पुतला-दहन का बाह्य उत्सव मात्र नहीं है। अपितु यह हमारे भीतर विद्यमान अहंकार, क्रोध, लोभ तथा अन्य समस्त दुर्गुणों के दहन करके, धर्म, सत्य तथा सद्गुणों की स्थापना करने का एक गहन आध्यात्मिक संदेश भी देता है। भगवान श्रीराम तथा माँ दुर्गा की विजय हमें यह स्मरण कराती है कि चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी विपरीत क्यों न हों। धैर्य, धर्म तथा सत्य के मार्ग पर अडिग रहकर अंततः विजय अवश्य प्राप्त होती है।।

परन्तु मेरी आपको यही सलाह है कि इस पर्व को केवल बाह्य उत्सव के रूप में न मनाकर। अपने भीतर विद्यमान दुर्गुणों के आत्म-निरीक्षण तथा उनके शमन के संकल्प के साथ ही मनाना चाहिए। ताकि इस पर्व की वास्तविक सार्थकता सिद्ध हो सके।।

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नारायण सभी का नित्य कल्याण करें । सभी सदा खुश एवं प्रशन्न रहें ।।
जय जय श्री राधे ।।
जय श्रीमन्नारायण ।।
Swami Ji Maharaj
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''स्वामी धनञ्जय महाराज'' जो वैदिक आध्यात्मिक वाङ्गमयी व्यास परम्परा कि विलक्षण तथा रसमयी वाग्धारा को प्रवाहित करने वाले परम संत हैं । जो हास्यात्मक एवं कवित्व कला से परिपूर्ण भागवत कथा के माध्यम से भक्तों के मन को अनायास ही भगवान श्री मुरली मनोहर कृष्ण के श्री चरणों में लगा देते हैं ।। स्वामी जी हिन्दी, गुजराती, अवधी एवं भोजपुरी में सरस भागवत कथा एवं श्री राम कथा कहते हैं । बदले में दक्षिणा की कोई मांग नहीं रखते जो मिल जाय उसी से संतुष्ट रहते हैं ।। स्वामी जी को ''वेंकटेश स्वामी का मंदिर'' सिलवासा (संघ शासित प्रदेश, दादरा एवं नगर हवेली) में भगवत्कृपा से सेवा का अवसर मिला । पूरी निष्ठा से भगवान की सेवा की । भगवत्कृपा से आज भी वहीँ रहकर भगवान की सेवा करते हुए भागवत जी की कथा का देश-विदेशों में रसमय गायन करते हैं तथा भगवद्भक्ति (भगवान के श्री चरणों) में अपना जीवन समर्पित कर आनन्द का अनुभव करते हैं ।।
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