पापांकुशा एकादशी व्रत कथा एवं पूजा विधि।। Papankusha Ekadashi Vrat Katha And Puja Vidhi.
जय श्रीमन्नारायण,
मित्रों, आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि पापांकुशा एकादशी के नाम से प्रसिद्ध है। जो शारदीय नवरात्रि एवं विजयादशमी के ठीक पश्चात आती है। इस एकादशी का नाम ही इसके महत्व को स्पष्ट कर देता है। क्योंकि जिस प्रकार अंकुश से मदमस्त हाथी को वश में किया जाता है। उसी प्रकार यह व्रत मनुष्य के पाप रूपी हाथी को नियंत्रित कर उसका नाश करता है।।
मान्यता है कि जो जातक इस दिन भगवान श्री पद्मनाभ अर्थात क्षीरसागर में शेषशय्या पर शयन करने वाले भगवान श्रीविष्णु की श्रद्धापूर्वक आराधना करता है। उसके जन्म-जन्मांतर के संचित पापों का क्षय होता है। यह पापांकुशा एकादशी व्रत संसार-सागर में डूबते हुए प्राणियों के लिए एक सुदृढ़ नौका के समान मानी गई है।।
मित्रों, आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी अक्टूबर मास आसपास प्रतिवर्ष आता है। और द्वादशी तिथि में सूर्योदय के पश्चात इस व्रत का पारण किया जाता है। साथ ही यह ध्यान रखें की पारण द्वादशी तिथि की समाप्ति से पूर्व कर लेना चाहिए। तिथि तथा पारण के सटीक मिनट स्थान-भेद से भिन्न हो सकते हैं। इसलिए अपने नगर के स्थानीय पंचांग से समय की पुष्टि अवश्य कर लें।।
यदि आपके आसपास कोई विद्वान ब्राह्मण हों तो उनसे संपर्क करके पारण के सही समय को स्पष्ट कर लेना चाहिए। क्योंकि यह बहुत आवश्यक होता है, कि एकादशी व्रत की पूर्णता एवं शुद्धता द्वादशी लगने से पहले ही व्रत का पारण किया जाय।।
पापांकुशा एकादशी पूजा विधि।। Papankusha Ekadashi Puja Vidhi.
मित्रों, एकादशी व्रत का आरंभ अक्सर दशमी तिथि की रात्रि से ही हो जाता है। दशमी को सायंकाल से पूर्व सात्विक तथा हल्का भोजन ग्रहण करना चाहिए। रात्रि में अन्न का त्याग करना चाहिए। तथा ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए मन को शुद्ध रखना चाहिए।।
एकादशी के दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। तत्पश्चात पूजा-स्थल को स्वच्छ कर भगवान श्रीविष्णु की प्रतिमा अथवा चित्र के समक्ष घी का दीपक प्रज्वलित करें। तथा हाथ में जल, अक्षत एवं पुष्प लेकर व्रत का संकल्प लें।।
संकल्प के पश्चात भगवान श्रीपद्मनाभ की प्रतिमा को पंचामृत से स्नान कराएँ। तथा उस चरणामृत को स्वयं पर एवं परिवारजनों पर छिड़ककर ग्रहण करें। इसके पश्चात चंदन, पीले पुष्प, अक्षत, धूप, दीप तथा ऋतुफल अर्पित करें। साथ ही तुलसी दल का अर्पण अवश्य करें। क्योंकि तुलसी भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय होता है।।
पूजन के समय ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जप करें, तथा विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। इसके पश्चात आरती उतारें, भोग अर्पित करें और पूरे श्रद्धा-भाव से पापांकुशा एकादशी की व्रत कथा का श्रवण अथवा पाठ करें।।
एकादशी की रात्रि में भगवान के समक्ष ही जागरण करना। भजन-कीर्तन करना तथा हरि-नाम का स्मरण करना अत्यंत फलदायी माना गया है। जो जातक जागरण न कर सकें, वे प्रतिमा के समीप भूमि पर शयन कर सकते हैं।।
व्रत के नियम एवं आहार।। Fasting Rules And Diet.
मित्रों, व्रत अपनी शारीरिक सामर्थ्य के अनुसार निर्जल, केवल जल पर अथवा फलाहार के रूप में रखा जा सकता है। फलाहार में फल, दूध, दही, मेवे, साबूदाना, आलू, शकरकंद, कुट्टू एवं सिंघाड़े का आटा तथा सेंधा नमक का सेवन सामान्यतः मान्य है।।
इस दिन चावल एवं समस्त अनाज, दालें, प्याज-लहसुन, मांस-मदिरा आदि का सर्वथा त्याग करना चाहिए। रोगी, गर्भवती, वृद्ध अथवा औषधि पर निर्भर जातकों को अपने चिकित्सक की सलाह से हल्का फलाहार के साथ व्रत रखना चाहिए। क्योंकि शास्त्रों में भी सामर्थ्य के अनुसार व्रत का विधान है।।
द्वादशी को पारण एवं दान।। Parana And Donation On Dwadashi.
मित्रों, द्वादशी तिथि को प्रातःकाल स्नान तथा भगवान विष्णु के पूजन के पश्चात योग्य ब्राह्मणों को भोजन कराएँ। पश्चात् यथाशक्ति दक्षिणा देकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करें। इसके पश्चात स्वयं पारण कर व्रत का समापन करें।।
इस एकादशी पर भूमि, गौ, जल, अन्न, छत्र तथा पादुका अर्थात जूते-चप्पल आदि के दान का विशेष महत्व बताया गया है। जो सामर्थ्य हो, उसके अनुसार निःस्वार्थ भाव से दान करना ही इसका सार है।।
पापांकुशा एकादशी व्रत कथा।। Papankusha Ekadashi Vrat Katha.
मित्रों, एक समय धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से विनयपूर्वक पूछा, हे मधुसूदन, आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है। इस दिन किस देवता का पूजन किया जाता है, तथा इसके व्रत से क्या फल प्राप्त होता है। कृपा कर यह सब विस्तारपूर्वक बताने की कृपा करें।।
तब भगवान श्रीकृष्ण बोले, हे राजन, इस एकादशी का नाम पापांकुशा है। यह समस्त पापों का नाश करने वाली तथा मनुष्य को स्वर्ग एवं मोक्ष प्रदान करने वाली है। इस दिन पद्मनाभ भगवान का पूजन करना चाहिए। अब मैं तुम्हें इसकी पावन कथा सुनाता हूँ, उसे ध्यानपूर्वक सुनो।।
प्राचीन काल में विंध्याचल पर्वत पर क्रोधन नाम का एक अत्यंत क्रूर बहेलिया निवास करता था। उसने अपना संपूर्ण जीवन हिंसा, लूटपाट, मदिरापान तथा असत्य भाषण में ही व्यतीत कर दिया था। तथा कभी किसी सत्कर्म की ओर उसका ध्यान नहीं गया।।
जब उसके जीवन का अंतिम समय निकट आया, तब यमराज ने अपने दूतों को आज्ञा दी कि क्रोधन को यमलोक ले आओ। यमदूतों ने जाकर उसे बताया कि कल तुम्हारे जीवन का अंतिम दिन है। यह सुनकर क्रोधन भय से काँप उठा, तथा अपने पूरे जीवन के पापों का स्मरण कर अत्यंत व्याकुल हो गया।।
भयभीत क्रोधन तुरंत महर्षि अंगिरा के आश्रम पहुँचा। और उनके चरणों में गिरकर कहने लगा। हे मुनिवर, मैंने जीवन भर घोर पाप किए हैं, अब मेरे पास समय बहुत कम है। कृपा कर मुझे इस नरक-यातना से बचने का कोई उपाय बताइए।।
उसकी करुण पुकार सुनकर महर्षि अंगिरा का हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने कहा, हे वत्स, कल आश्विन शुक्ल पक्ष की पापांकुशा एकादशी का व्रत है। तुम श्रद्धा एवं विधि-पूर्वक इस एकादशी का व्रत करो तथा भगवान विष्णु की आराधना में रात्रि जागरण करो। इससे तुम्हारे समस्त पाप नष्ट हो जाएँगे।।
क्रोधन ने महर्षि के वचनों पर पूर्ण विश्वास कर विधिपूर्वक पापांकुशा एकादशी का व्रत किया। भगवान विष्णु का पूजन किया तथा रात्रि जागरण कर हरि-नाम का स्मरण किया। उसके इस व्रत के प्रभाव से भगवान श्रीहरि प्रसन्न हो गए।।
जब यमदूत उसे लेने पहुँचे, तब तक वह समस्त पापों से मुक्त हो चुका था। भगवान विष्णु की कृपा से क्रोधन को विष्णुलोक की प्राप्ति हुई। तथा यमदूत निराश होकर खाली हाथ यमलोक लौट गए।।
व्रत का फल एवं माहात्म्य।। Phala-Shruti And Greatness Of The Vrat.
मित्रों, कथा सुनाने के पश्चात भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा, हे राजन, जो मनुष्य इस पापांकुशा एकादशी का व्रत करता है। उसे अर्थ, काम तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है। तथा उसके संचित पापों का नाश हो जाता है। कलियुग में यह व्रत उस पुण्य के समान फल देने वाला होता है। जो सतयुग में ऋषि-मुनियों को कठोर तपस्या से प्राप्त होता था।।
इस व्रत के प्रभाव से व्रती के माता तथा पिता दोनों पक्ष के पितरों को भी पाप-मुक्ति तथा सद्गति की प्राप्त होती है। ऐसी शास्त्रीय मान्यता है। जो श्रद्धालु इस कथा को सुनता अथवा पढ़ता है। वह भी समस्त पापों से मुक्त होकर भगवान विष्णु के चरणों में स्थान प्राप्त करता है।।
सभी भक्तों का कल्याण हो, सभी सुखी रहें, सभी निरोगी रहें।।
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जय श्रीमन्नारायण ।।
