शास्त्रों के ज्ञान से बड़ा कुछ भी नहीं होता है।। Shastra Gyan Sarvottam Hota Hai.
जय श्रीमन्नारायण,
मित्रों, निश्चित ही शास्त्र ज्ञान से बड़ा कुछ भी नहीं होता यह मैंने अपने जीवन में भी अनुभव किया है। मैंने स्वयं अपने जीवन काल में जब-जब भी गरीबी का अनुभव होनेपर कुछ भी करने को सोचा जो करणीय नहीं था।।
तब-तब मेरे ज्ञान ने जैसे सम्मुख खड़ा होकर मुझे नाचरणीय कार्यों को करने से रोका। मैं चाहकर भी किसी को अपने स्वार्थ सिद्धि हेतु कोई सलाह नहीं दे पाया आजतक। क्या करूँ शायद ऐसा कुछ होता कि कोई बीच का मार्ग सूझ जाता।।
परन्तु ऐसा नहीं है । सभी मार्ग कंटकों से भरे पड़े हैं। अज्ञानता में तो कुछ भी किया जा सकता है। परन्तु जानकर कुछ भी करना मुश्किल होता है।।
एक बार कि बात है, राजा भोज के नगर में एक विद्वान ब्राह्मण रहते थे। एक दिन गरीबी से परेशान होकर उन्होंने राजभवन में चोरी करने का निश्चय किया। अर्द्ध रात्रि राजमहल में वे चुपचाप घर से निकलकर वहां पहुंचे।।
देखा राजमहल में सभी लोग सो रहे थे। सिपाहियों की नजरों से बचते-बचाते वे राजा के कक्ष तक पहुंच गए। वहाँ देखा स्वर्ण, रत्न, बहुमूल्य पात्र इधर-उधर बिखरे पड़े थे। किंतु वे जो भी वस्तु उठाने का विचार करते, उनका शास्त्र ज्ञान उन्हें रोक देता।।
ब्राह्मण ने जैसे ही स्वर्ण राशि उठाने का विचार किया, मन में स्थित शास्त्र ने कहा- स्वर्ण चोर नर्कगामी होता है। जो भी वे लेना चाहते, उसी की चोरी को पाप बताने वाले शास्त्रीय वाक्य उनकी स्मृति में जाग उठते।।
रात बीत गई पर वे चोरी नहीं कर पाए। सुबह पकड़े जाने के भय से ब्राह्मण राजा के पलंग के नीचे छिप गए। महाराज के जागने पर रानियां एवं दासियां उनके अभिवादन हेतु प्रस्तुत हुई।।

राजा भोज के मुंह से किसी श्लोक की तीन पंक्तियां निकली। फिर अचानक वे रुक गए। शायद चौथी पंक्ति उन्हें याद नहीं आ रही थी। विद्वान ब्राह्मण से रहा नहीं गया। चौथी पंक्ति उन्होंने पूर्ण कर दी।।
महाराज चौंके और ब्राह्मण को बाहर निकलने को कहा। जब ब्राह्मण से राजा भोज ने चोरी न करने का कारण पूछा तो वे बोले- राजन्, मेरा शास्त्र ज्ञान मुझे रोकता रहा। उसी ने आज मेरे धर्म की रक्षा की है।।
राजा बोले- सत्य है, कि ज्ञान उचित- अनुचित का बोध कराता है। जिसका धर्म संकट के क्षणों में उपयोग कर उचित राह पाया जा सकता है। राजा ने ब्राह्मण को प्रचुर धन देकर सदा के लिए उनकी निर्धनता दूर की दी।।

जय श्रीमन्नारायण ।।
