प्रथम स्कन्धः ।। अथ प्रथमोऽध्यायः ।। BHAGWAT PURAN.

0
163


।। श्री राधाकृष्णाभ्याम् नम: ।। ।। श्रीमद्भागवत महापुराणम् ।।
।। प्रथम स्कन्धः ।। ।। अथ प्रथमोऽध्यायः ।।

जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट् ।
तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये मुह्यन्ति यत्सूरयः ।।
तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गोऽमृषा ।
धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि ।।1।।

अर्थ:- जिससे इस जगत की सृष्टि, स्थिति और प्रलय होते है— क्योकि वह सभी सद्रूप पदार्थो में अनुगत है और असत पदार्थो से पृथक है जड़ नहीं चेतन है ; परतंत्र नहीं, स्वयंप्रकाश है ; जो ब्रम्हा अथवा हिरण्यगर्भ नही, प्रयुत उन्हें अपने संकल्प से ही जिसने उस वेदज्ञान का दान किया है ; जिसके संबध में बड़े-बड़े विद्वान् भी मोहित हो जाते है; जैसे तेजोमय सुर्यरश्मियो में जल का, जल में स्थल का और स्थल में जल का भ्रम होता है, वैसे ही जिसमे यह त्रिगुणमयी जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्तिरूपा सृष्टी मिथ्या होने पर भी अधिष्ठान- सत्ता से सत्यवत प्रतीत हो रही है, उस अपनी स्वयंप्रकाश ज्योति से सर्वदा और सर्वथा माया और मायाकार्य से पूर्णतः मुक्त रहने वाले परम सत्यरूप परमात्मा का हम ध्यान करते है।।1।।

धर्मः प्रोज्झितकैतवोऽत्र परमो निर्मत्सराणां सतां ।
वेद्यं वास्तवमत्र वस्तु शिवदं तापत्रयोन्मूलनम् ।।
श्रीमद्भागवते महामुनिकृते किं वा परैरीश्वरः ।
सद्यो हृद्यवरुध्यतेऽत्र कृतिभिः शुश्रूषुभिस्तत्क्षणात् ।।2।।

अर्थ:- महामुनि व्यासवेद के द्वारा निर्मित श्रीमद्भागवतमहापुराण में मोक्षपर्यन्त फलकीरहित परम धर्म कानिरूपण हुआ है। इसमें शुद्धान्त:करण सत्यपुरुषो के जाननेयोग्य उस वास्तविक वस्तु परमात्माका निरूपण हुआ है, जो तीनो तापों का जड़से नाश करनेवाली और परम कल्याण देनेवाली है। अब और किसी साधन या शास्त्र से क्या प्रयोजन। जिस समय भी सुकृति पुरुष इसके श्रवण की इच्छा करते है, ईश्वर उसी समय अविलम्ब उनके हृदय में आकर बंदी बन जाता है ।।2।।

निगमकल्पतरोर्गलितं फलं शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम् ।।
पिबत भागवतं रसमालयं मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः ।।3।।

अर्थ:- रस के मर्मज्ञ भक्तजन ! यह श्रीमद्भागवत वेदरूप कल्पवृक्ष का पका हुआ फल है । श्रीशुकदेवरूप तोते के * मुख का संबन्ध हो जाने से यह परमानन्दमयी सुधा से परिपूर्ण हो गया है। इस फल में छिलका, गुठली आदि त्याज्य अंश तनिक भी नही है। यह मूर्तिमान रस है। जब तक शरीर में चेतना रहे, तबतक इस दिव्य भगवद्रसका निरंतर बार-बार पान करते रहो। यह पृथ्वीपर ही सुलभ है ।।3।।

नैमिषेऽनिमिषक्षेत्रे ईशयः शौनकादयः ।।
सत्रं स्वर्गाय लोकाय सहस्रसममासत ।।4।।

अर्थ:- एक बार भगवान् विष्णु एव देवताओ के परम पुण्यमय क्षेत्र नैमिषारण्य में शौनकादि ऋषियों ने भगवत्प्राप्ति की इच्छा से सहस्त्र वर्षो में पुरे होनेवाले एक महान यज्ञ का अनुष्ठान किया ।।4।।

त एकदा तु मुनयः प्रातर्हुतहुताग्नयः ।।
सत्कृतं सूतमासीनं पप्रच्छुरिदमादरात् ।।5।।

अर्थ:- एक दिन उन लोगो ने प्रात:काल अग्निहोत्र आदि नित्यकृत्यों से निवृत्त होकर सूतजी का पूजन किया और उन्हेंउँचे आसन पर बैठाकर बड़े आदर से यह प्रश्न किया ।।5।।

ऋषय ऊचुः-
त्वया खलु पुराणानि सेतिहासानि चानघ ।।
आख्यातान्यप्यधीतानि धर्मशास्त्राणि यान्युत ।।6।।

अर्थ:- ऋषियों ने कहा–सूतजी ! आप निष्पाप है। आप ने समस्त इतिहास,पुराण और धर्मशास्त्रो का विधिपूर्वकअध्ययन किया है तथा उनकीभलीभांति व्याख्या भी की है ।।6।।

यानि वेदविदां श्रेष्ठो भगवान्बादरायणः ।।
अन्ये च मुनयः सूत परावरविदो विदुः ।।7।।
वेत्थ त्वं सौम्य तत्सर्वं तत्त्वतस्तदनुग्रहात् ।।
ब्रूयुः स्निग्धस्य शिष्यस्य गुरवो गुह्यमप्युत ।।8।।

अर्थ:- वेदवेत्ताओ में श्रेष्ठ भगवान बादरायण ने एंव भगवान के ,सगुण-निर्गुण रूप को जानने वाले दुसरे मुनियोंने जो कुछ जाना है—–उन्हें जिन विषयों का ज्ञान है, वह सब आप वास्तविक रूप में जानते है। आप का ह्रदय बड़ा ही उनकी कृपा के पात्र बने हुए है। गुरुजन अपने प्रेमी शिष्य को गुप्त-से-गुप्त बात भी बता दिया करते है।।7-8।।

तत्र तत्राञ्जसायुष्मन्भवता यद्विनिश्चितम् ।।
पुंसामेकान्ततः श्रेयस्तन्नः शंसितुमर्हसि ।।9।।

अर्थ:- आयुष्मन ! आप कृपा करके यह बतलाइए की उन सब शास्त्रों, पुराणों और गुरुजनों के उपदेशो में कलियुगी जीवो के परम कल्याण का सहज साधन आप ने क्या निश्चय किया है।।9।।

प्रायेणाल्पायुषः सभ्य कलावस्मिन्युगे जनाः ।।
मन्दाः सुमन्दमतयो मन्दभाग्या ह्युपद्रुताः ।।10।।

अर्थ:- लोगो की रूचि और प्रवृति भी नही है। लोग आलसी हो गए है। उनका भाग्य तो मंद है ही,समझ भी थोड़ी है। इसके साथ ही वे नाना प्रकार की विध्न-बाधाओ से घिरे हुए भी रहते है।।10।।

भूरीणि भूरिकर्माणि श्रोतव्यानि विभागशः ।।
अतः साधोऽत्र यत्सारं समुद्धृत्य मनीषया ।।
ब्रूहि भद्राय भूतानां येनात्मा सुप्रसीदति ।।11।।

अर्थ:- शास्त्र भी बहुत-से है। परन्तु उनमें एक निश्चत साधन का नहीं। अनेक प्रकारप्रकार के कर्मो का वर्णन है। साथ ही वे इतने बड़े है कि उनका एक अंश परोपकारी हैं। अपनी बुध्दि से उनका सार निकलकर प्राणियों के परम कल्याण के लिए हम श्रधालुओं को सुनाइए, जिससे हमारे अन्तःकरण की शुध्दि प्राप्त हो।।11।।

सूत जानासि भद्रं ते भगवान्सात्वतां पतिः ।।
देवक्यां वसुदेवस्य जातो यस्य चिकीर्षया ।।12।।

अर्थ:- प्यारे सूतजी ! आप का कल्याण हो। आप तो जानते ही है कि यदुवंशियों के रक्षक भक्तवत्सल भगवान श्रीकृष्ण वासुदेव की धर्मपत्नी देवकी के गर्भ से क्या करने की इच्छा से अवतीर्णहुए थे।।12।।

तन्नः शुष्रूषमाणानामर्हस्यङ्गानुवर्णितुम् ।।
यस्यावतारो भूतानां क्षेमाय च भवाय च ।।13।।

अर्थ:- हम उसे सुनना चाहते हैं। आप कृपा करके हमारे लिए उसका वर्णन कीजिये; क्योंकि भगवान् का अवतार जीवों के परम कल्याण और उनकी भगवत्प्रेममयी समृद्धि के लिए होता है ।।13।।

आपन्नः संसृतिं घोरां यन्नाम विवशो गृणन् ।।
ततः सद्यो विमुच्येत यद्बिभेति स्वयं भयम् ।।14।।

अर्थ:- यह जीव जन्म-मृत्यु के घोर चक्र में पड़ा हुआ है—–इस स्थिति में भी यदि वह भगवान के मंगलमय नाम का उच्चारण कर तो उसी क्षण उससे मुक्त हो जाये; क्योकि स्वयं भय भी भगवान् से डरता है।।14।।

यत्पादसंश्रयाः सूत मुनयः प्रशमायनाः ।।
सद्यः पुनन्त्युपस्पृष्टाः स्वर्धुन्यापोऽनुसेवया ।।15।।

अर्थ:- सूतजी ! परम विरक्त और परम शान्त मुनिजन भगवान् के चरणों की शरण में ही रहते हैं, अतएव उनके स्पर्शमात्र से ही संसार के जीव तुरंत पवित्र हो जाते हैं। इधर गंगा जी के जल का बहुत दिनों तक सेवन जाये तब कहीं पवित्रता प्राप्त होती है।।15।।

को वा भगवतस्तस्य पुण्यश्लोकेड्यकर्मणः ।।
शुद्धिकामो न शृणुयाद्यशः कलिमलापहम् ।।16।।

अर्थ:- ऐसे पुण्यात्मा भक्त जिनकी लीलाओं का गान करते रहते हैं, उन भगवान् का कलिमलहारी पवित्र यश भला आत्मशुद्धी की इच्छावाला ऐसा कौन मनुष्य होगा, जो श्रवण न करे।।16।।

तस्य कर्माण्युदाराणि परिगीतानि सूरिभिः ।।
ब्रूहि नः श्रद्दधानानां लीलया दधतः कलाः ।।17 ।।

अर्थ:- वे लीला से ही अवतार धारण करते हैं। नारदादि महात्माओं ने उनके उदार कर्मो का गान किया है। हम श्रध्दालुओ के प्रति आप उनका वर्णन कीजिये।।17।।

अथाख्याहि हरेर्धीमन्नवतारकथाः शुभाः ।।
ईला विदधतः स्वैरमीश्वरस्यात्ममायया ।।18।।

अर्थ:- बुद्धिमान सूतजी ! सर्वप्रथम प्रभु अपनी योगमाया से स्वच्छंद लीला करते हैं। आप उन श्रीहरि की मंगलमयी अवतार-कथाओं का वर्णन कीजिये ।।18।।

वयं तु न वितृप्याम उत्तमश्लोकविक्रमे ।।
यच्छृण्वतां रसज्ञानां स्वादु स्वादु पदे पदे ।।19।।

अर्थ:- पुण्यकीर्ति भगवान की लीला सुनने से हमें कभी भी तृप्ति नहीं हो सकती; क्योंकि रसज्ञ श्रोताओं को पद-पद पर भगवान् की लीलाओं में नये-नये रस का अनुभव होता है ।।19।।

कृतवान्किल कर्माणि सह रामेण केशवः ।।
अतिमर्त्यानि भगवान्गूढः कपटमानुषः ।।20।।

अर्थ:- भगवान श्रीकृष्ण अपने को छिपाए हुए थे, लोगों के सामने ऐसी चेष्टा करते थे मानो कोई मनुष्य हों। परन्तु उन्होंने बलरामजी के साथ ऐसी लीलाएँ भी की हैं, ऐसा पराक्रम भी प्रकट किया है, जो मनुष्य नहीं कर सकते ।।20।।

कलिमागतमाज्ञाय क्षेत्रेऽस्मिन्वैष्णवे वयम् ।।
आसीना दीर्घसत्रेण कथायां सक्षणा हरेः ।।21।।

अर्थ:- कलियुग को आया जानकार इस वैष्णवक्षेत्र में हम दीर्घकालीन सत्र का संकल्प करके बैठे हैं। श्रीहरि की कथा सुनने के लिये हमें अवकाश प्राप्त है ।।21।।

त्वं नः सन्दर्शितो धात्रा दुस्तरं निस्तितीर्षताम् ।।
कलिं सत्त्वहरं पुंसां कर्णधार इवार्णवम् ।।22।।

अर्थ:- यह कलियुग अंतःकरण की पवित्रता और शक्ति का नाश करने वाला है। इससे पार पाना कठिन है। जैसे समुद्र से पार जानेवालों को कर्णधार मिल जाय, उसी प्रकार इससे पार पाने की इच्छा रखनेवाले हम लोगों से ब्रम्हा ने आप को मिलाया है ।।22।।

ब्रूहि योगेश्वरे कृष्णे ब्रह्मण्ये धर्मवर्मणि ।।
स्वां काष्ठामधुनोपेते धर्मः कं शरणं गतः ।।23।।
अर्थ:- धर्मरक्षक, ब्राम्हणभक्त, योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण के अपने धाम में पधार जाने पर धर्म ने अब किसकी शरण ली है –यह बताइये ।।23।।

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायाम् प्रथमस्कन्धे नैमिषियोपाख्याने प्रथमोऽध्यायः ।।


LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here